एक आम मान्यता है कि किसी भी संस्था की समीक्षा करते समय उसकी उपलब्धियां देखनी चाहिए। रा.स्व. संघ को आरम्भ हुए 100 साल हो रहे हैं। इस मौके पर इस संगठन की उपलब्धियों की चर्चा होनी जरूरी है।संघ के संस्थापक डाॅ. केशव बलिराम हेडगेवार कहा करते थे कि भारत मूलतः हिन्दू राष्ट्र है। देश और हिन्दू समाज की उन्नति, अवनति, सुख-दुख समान हैं। यदि हिन्दू जाग्रत और संगठित हुए तो देश आजाद होगा और उन्नति भी करेगा। उन्होंने देखा कि आजादी के प्रयास तो सब ओर हो रहे थे, पर एकसूत्रता न होने से वे शीघ्र ही दबा दिये जाते थे। कांग्रेस का प्रभाव पूरे देश में था, पर उसमें मुस्लिम तुष्टीकरण चलता था। गांधी जी सर्वमान्य नेता थे, पर वे नेहरू के सामने चुप हो जाते थे। अतः गोहत्या, उर्दू, वंदेमातरम्, भगवा ध्वज, कन्वर्जन, मजहबी दंगे, देश की अखंडता…आदि विषयों पर कांग्रेस की नीति मुसलमानों के सामने समर्पण की रही।
हिन्दू जागरण और संगठन
इसलिए डाॅ. हेडगेवार सदा स्वाधीनता, हिन्दुओं के जागरण और संगठन की बात कहते थे। अतः हमें संघ की उपलब्धि को इस परिप्रेक्ष्य में ही देखना होगा। उन दिनों आजादी के लिए बम-गोली वाला क्रांति का मार्ग था या कांग्रेस का अहिंसा पथ था। डाॅ. हेडगेवार दोनों पर चले। उन्हें दूसरा मार्ग अधिक उचित लगा। अतः वे स्वयं दो बार (1921 और 1930) तथा उनका अनुकरण करते हुए हजारों स्वयंसेवक जेल गये, पर उनके नाम कांग्रेस की सूची में नहीं हैं। अधिकांश स्वयंसेवकों ने आजादी के बाद ताम्रपत्र या पेंशन आदि भी नहीं ली, चूंकि वे देशसेवा के बदले कुछ लेना ठीक नहीं मानते थे। उन दिनों स्वयंसेवक अपनी प्रतिज्ञा में देश को स्वाधीन कराने की बात कहते थे।

वरिष्ठ प्रचारक, रा.स्व.संघ
यदि कोई गहरी नींद में हो, तो घर में घुसकर चोर सब माल ले जाते हैं; पर यदि मालिक जाग रहा हो, तो वह उन्हें मार-पीटकर पुलिस के हवाले कर देगा। यही स्थिति सुप्त हिन्दू समाज की थी। हजार वर्ष के विदेशी और विधर्मी हमलों ने उसका मनोबल गिरा दिया था। कन्वर्जन का बाजार गर्म था। लोग खुद को हिन्दू बताने में हिचकते थे। यूं तो तब हिन्दुओं की हजारों धार्मिक और सामाजिक संस्थाएं थीं, पर वे किसी राज्य, जिले, जाति, वर्ग, भाषा या पंथ तक सीमित थीं। कई तो खंडन-मंडन और दूसरों को झुकाकर अपना झंडा बुलंद करने में ही लगी रहती थीं।
ऐसे में संघ ने जाति, भाषा, वर्ग, संप्रदाय और क्षेत्र से ऊपर उठकर पूरे हिन्दू समाज को जगाया। इसके लिए दैनिक मिलन का ‘शाखा’ नामक अभिनव प्रयोग शुरू हुआ। उसी का परिणाम है कि आज हिन्दू समाज को चोट पहुंचाने वाले किसी भी विषय पर लोग तुरंत सड़क पर आ जाते हैं। अतः देश, धर्म और समाज विरोधी तत्वों को पीछे हटना पड़ता है।
हिन्दू लड़कियों के अपहरण, गोहत्या, मंदिर विध्वंस, तीर्थयात्राओं पर हमले पहले भी होते थे, पर तब लोग चुप रहते थे। केन्द्र और राज्यों की कांग्रेस सरकारें मुस्लिम वोट के लालच में सिर झुका लेती थीं। अतः पुलिस, प्रशासन और न्यायालय भी आंख मूंद लेता था, पर अब हिन्दू जागृति के कारण सरकारें बदली हैं। अतः पुलिस, प्रशासन और न्यायालय भी त्वरित कार्यवाही करता है। पुलिस के डंडे, जेल और बुलडोजर के भय से गुंडे और माफिया चुप हैं। यह संघ के 100 वर्ष के हिन्दू जागरण का सुखद परिणाम है।
लेकिन कोई भी जागरण बिना संगठन के नहीं होता। इसलिए डाॅ. हेडगेवार ने संगठन पर जोर दिया। लोग उनसे पूछते थे कि संगठन किसलिए कर रहे हो, तो वे कहते थे, जैसे शरीर स्वस्थ रखने के लिए व्यायाम जरूरी है, ऐसे ही देश और समाज के स्वास्थ्य के लिए संगठन जरूरी है। 50 वर्ष तक संघ ने केवल जमीनी संगठन पर ध्यान दिया। इससे हजारों प्रचारक और स्थानीय कार्यकर्ता तैयार हुए। उनके बल पर फिर समाज जीवन के हर क्षेत्र में नयी संस्थाओं का गठन हुआ।

कर्म की फलश्रुति
किसी धर्मस्थल पर दूर से मंदिर का ध्वज ही दिखता है। फिर क्रमशः दीवारें और देवप्रतिमाएं दिखती हैं। आज केन्द्र में भाजपानीत सरकार है तो कई राज्यों में विशुद्ध भाजपा सरकारें हैं। कई लोग उसे ही संघ समझते हैं, पर संघ तो दीवार, देव प्रतिमा और उससे भी अधिक नींव के पत्थरों में निहित है। आज देश का कोई जिला संघ कार्य से अछूता नहीं है। विदेश में जहां भी हिन्दू हैं, वहां किसी अन्य नाम से स्वयंसेवक सक्रिय हैं।
अब यदि फिर से अपने पहले प्रश्न की ओर लौटें, तो डाॅ. हेडगेवार ने केवल हिन्दू जागरण और संगठन की बात कही थी, पर आज शाखा के अलावा जो सैकड़ों विविध संस्थाएं और लाखों सेवा कार्य हैं, वे इस जागरण और संगठन की स्वाभाविक फलश्रुति हैं। ये सब समुद्र में तैरते विशाल हिमखंड के ऊपरी हिस्से की तरह हैं, जो 10 प्रतिशत से भी कम दिखता है, शेष समुद्र के अंदर अदृश्य रहता है। संघ का 90 प्रतिशत हिस्सा भी उसका विचार और संगठन है। पहले प्रायः देशविरोधी संस्थाएं ही संघ का विरोध करती थीं, पर अब वे राजनीतिक दल और नेता भी छाती पीट रहे हैं, जिनकी ‘पुश्तैनी दुकानें’ बंद होने लगी हैं। किसी भी संगठन की यात्रा उपेक्षा, उपहास, विरोध, समर्थन और समर्पण जैसे कई चरणों से गुजरती है। संघ उपेक्षा और उपहास को पार चुका है। आगे समर्पण की बारी है। यह संघ की 100 वर्षीय यात्रा की बड़ी उपलब्धि है।

















