महाराष्ट्र के मालेगांव में 29 सितंबर 2008 को एक बड़ा बम विस्फोट हुआ था, जिसमें 6 लोगों की मौत हो गई थी और 100 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। इस मामले की शुरुआत में जांच महाराष्ट्र आतंकवाद रोधी दस्ते (ATS) ने की थी, लेकिन बाद में यह मामला NIA को सौंप दिया गया।
अब इस मामले में एक नया मोड़ आया है। महाराष्ट्र ATS के एक पूर्व पुलिस अधिकारी महबूब मुजावर ने बड़ा दावा किया है। उनका कहना है कि जांच के दौरान उन पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत को गिरफ्तार करने का दबाव बनाया गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि उस समय के कुछ वरिष्ठ अधिकारी ‘भगवा आतंकवाद’ की थ्योरी को सही साबित करना चाहते थे।
अदालत ने सभी आरोपियों को किया बरी- हाल ही में निचली अदालत ने इस मामले में भाजपा की पूर्व सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर समेत सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया। इसके बाद महबूब मुजावर ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि अदालत के इस फैसले से ATS की झूठी जांच और झूठे आरोपों की सच्चाई सामने आ गई है। उन्होंने दावा किया कि अदालत ने यह साबित कर दिया कि उस समय की जांच में कई गड़बड़ियां थीं।
मोहन भागवत को पकड़ने का मिला था आदेश- महबूब मुजावर ने बताया कि वह खुद 2008 के मालेगांव विस्फोट की जांच कर रही ATS टीम का हिस्सा थे। उन्होंने कहा कि जांच के दौरान उन्हें कुछ गोपनीय आदेश दिए गए थे, जिनमें उन्हें मोहन भागवत, राम कलसांगरा, संदीप डांगे और दिलीप पाटीदार जैसे लोगों को गिरफ्तार करने को कहा गया था। उनका कहना है कि ये आदेश ऐसे नहीं थे, जिनका पालन करना संभव हो। उन्होंने साफ कहा, “मैंने इन आदेशों को मानने से इनकार कर दिया, क्योंकि मुझे सच पता था। मैं झूठे केस में किसी को फंसाना नहीं चाहता था।” मुजावर ने आरोप लगाया कि जब उन्होंने इन आदेशों का पालन नहीं किया, तो उनके खिलाफ एक झूठा मामला दर्ज कर दिया गया। इससे उनका 40 साल का पुलिस करियर बर्बाद हो गया। उन्होंने कहा कि उनके पास कागजी सबूत हैं जो दिखाते हैं कि उस समय की जांच झूठी थी।
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उन्होंने आगे कहा, “मेरे खिलाफ जो कार्रवाई हुई, वह एक साजिश थी। मुझ पर झूठा मामला थोपकर मुझे बदनाम करने की कोशिश की गई, क्योंकि मैंने एक निर्दोष व्यक्ति को फंसाने से इनकार कर दिया था।” महबूब मुजावर ने कहा कि उस समय कुछ अधिकारी ‘भगवा आतंकवाद’ की थ्योरी को स्थापित करना चाहते थे। उनके अनुसार, “असल में कोई भगवा आतंकवाद नहीं था। सब कुछ एक साजिश थी।” उन्होंने आरोप लगाया कि मामले की जांच में जानबूझकर कुछ लोगों को फंसाया गया और असली अपराधियों को नजरअंदाज किया गया।

















