झारखंड के रामगढ़ में आफताब अंसारी की नदी में डूबने से हुई मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। 23 जुलाई को जनजातीय समाज की एक महिला ने आफताब और रामगढ़ के अर्शी गारमेंट्स के मालिक पर यौन शोषण व अश्लील वीडियो-फोटो बनाने का आरोप लगाया था। इसके बाद हिंदू टाइगर फोर्स ने आफताब को रामगढ़ पुलिस को सौंपा। अगले दिन, 24 जुलाई को दोपहर 12:30 बजे, आफताब पुलिस को चकमा देकर थाने से भागा और दामोदर नदी में कूद गया, जहां तेज धारा में डूबने से उसकी मौत हो गई। उसकी लाश रजरप्पा में नदी किनारे मिली। पुलिस ने इस घटना को शुरू में छुपाया, लेकिन जन दबाव के बाद मामला सामने आया।
इसके बाद राज्य के स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी ने बिना जांच के इसे मॉब लिंचिंग करार देते हुए आफताब के परिवार को 3 लाख रुपये का मुआवजा देने की घोषणा की। उन्होंने आरोप लगाया कि आफताब की मौत इसलिए हुई क्योंकि वह अंसारी था, और बाबूलाल मरांडी के ट्वीट ने हिंदू संगठनों को उकसाया। हालांकि, सच्चाई सामने आने पर पता चला कि बाबूलाल ने घटना के 8 घंटे बाद, रात 8:30 बजे ट्वीट किया था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने भी पुष्टि की कि मौत डूबने से हुई।
पुलिस ने सत्ताधारी नेताओं के दबाव में हिंदू कार्यकर्ता राजेश सिन्हा को गिरफ्तार किया, जिन्होंने खुद उस पीड़ित महिला की मदद की थी। राजेश सिन्हा की गिरफ्तारी के बाद पूरे प्रदेश में आक्रोश का माहौल देखा गया।
हज़ारीबाग सांसद मनीष जायसवाल ने राजेश सिन्हा की गिरफ्तारी की निंदा की थी। उन्होंने कहा था कि पीड़ित जनजातीय महिला ने पुलिस द्वारा कार्रवाई न होने पर राजेश सिन्हा से मदद मांगी थी जो अपराध की श्रेणी में नही आता है। उन्होंने आगे कहा कि आफताब के पुलिस हिरासत से भागने और बाद में मृत पाए जाने की परिस्थितियों की जांच होनी चाहिए। उन्होंने डीजीपी को एक ज्ञापन सौंपकर निष्पक्ष जांच और सिन्हा की रिहाई की मांग की थी। वहीं दूसरी ओर राजेश सिन्हा की गिरफ्तारी के बाद, बरकागांव के भाजपा विधायक रोशनलाल चौधरी ने भुरकुंडा पुलिस स्टेशन के बाहर धरना दिया और सिन्हा की तत्काल रिहाई की मांग की थी।
हालांकि अब 30 जुलाई को राजेश सिन्हा को जमानत मिल गई है। लेकिन इस कार्रवाई से प्रशासन पर सवाल उठ रहे हैं। लोग कह रहे हैं कि पुलिस की लापरवाही को छिपाने के लिए मामले को हिंदू-मुसलमान का रंग देने का प्रयास किया गया।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष व नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने हेमंत सरकार पर तुष्टिकरण की राजनीति का आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार ने तथ्यों को नजरअंदाज कर भ्रामक विमर्श बनाया। स्वास्थ्य मंत्री ने बिना जांच के इसे मॉब लिंचिंग करार दिया, जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में साफ कहा गया कि आफताब की मौत डूबने से हुई। दूसरी ओर, बाबा बैद्यनाथ के दर्शन से लौट रहे श्रद्धालुओं की सड़क दुर्घटना में मौत पर उनके परिजनों को मात्र 1 लाख रुपये की सहायता दी गई। उन्होंने कहा कि सरकार ने मौत को धर्म और तुष्टिकरण के चश्मे से देखते हुए बलात्कार के आरोपियों की जान की कीमत शिव भक्तों से ज्यादा आंकी।
रामगढ़ पुलिस अधीक्षक ने 24 जुलाई को थाना प्रभारी पी.के. सिंह, सलीमुद्दीन खान, अजय करमाली और नीमा चंद्र महतो को निलंबित कर दिया। साथ ही, पी.के. सिंह पर घोर लापरवाही के लिए अनुशासनिक कार्रवाई की अनुशंसा की गई। पुलिस अधीक्षक अजय कुमार ने आश्वासन दिया कि दोषियों पर कड़ी कार्रवाई होगी और किसी निर्दोष को परेशान नहीं किया जाएगा।
हेमंत सरकार तुष्टिकरण की राजनीति में किस हद तक डूबी हुई है, यह उसके हर फैसले में साफ देखा जा सकता है।
रामगढ़ में आफताब अंसारी की मौत को लेकर राज्य सरकार ने तथ्यों को दरकिनार कर एक भ्रांति पूर्ण नैरेटिव गढ़ा। स्वास्थ्य मंत्री ने बिना जांच के इसे मॉब लिंचिंग करार देते हुए परिजनों…
— Babulal Marandi (@yourBabulal) July 29, 2025
दूसरी तरफ पीड़ित जनजातीय महिला के लिए न्याय की कोई चर्चा नहीं हो रही। न सरकार, न स्थानीय कांग्रेस विधायक ममता देवी, न ही स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी ने पीड़िता के प्रति संवेदना प्रकट की है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि आफताब के लिए सहानुभूति दिखाने वाले पीड़ित जनजातीय महिला को न्याय कब देंगे और बचे हुए दोषियों को सजा कब मिलेगी?

















