तुलसी जयंती पर विशेष : खीरी के एक ब्राह्मण परिवार के पास दस पीढ़ियों से सुरक्षित है सुंदरकांड की पांडुलिपि 
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तुलसी जयंती पर विशेष : खीरी के एक ब्राह्मण परिवार के पास दस पीढ़ियों से सुरक्षित है सुंदरकांड की पांडुलिपि 

पंडित जागेश्वर तिवारी के पुत्र संजय तिवारी बताते हैं कि यह तुलसीदास जी की हस्तलिखित यह पांडुलिपि उनके पूर्वज पं. भवानी प्रसाद तिवारी की रामभक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं गोस्वामी तुलसीदास ने उपहार स्वरूप उन्हें भेंट की थी।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी
Jul 31, 2025, 11:13 am IST
inउत्तराखंड
Tulsidas Jayanti

लखीमपुर खीरी में सुरक्षित तुलसीदास रचित सुदंरकांड की पांडुलिपि

लोकमंगल के अमर गायक व भारतीय वांग्मय की अमर धरोहर “रामचरित मानस” के सर्जक गोस्वामी तुलसीदास ने इस कालजयी कृति के सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंश सुंदरकांड की रचना 16वीं सदी के उत्तरार्द्ध में उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले की धौरहरा तहसील के दुलही गांव में की थी। इस बात की साक्षी देती है दुलही गांव के निवासी जागेश्वर तिवारी के परिवार के पास मौजूद सुंदरकांड की पांडुलिपि। गोस्वामी तुलसीदास की इस अनमोल विरासत की सुरक्षा खीरी जिले की धौरहरा तहसील के दुलही गांव निवासी पंडित जागेश्वर दयाल तिवारी का परिवार बीती दस पीढ़ियों से कर रहा है।

गोस्वामी तुलसीदास की हस्तलिखित पांडुलिपि

पंडित जागेश्वर तिवारी के पुत्र संजय तिवारी बताते हैं कि यह तुलसीदास जी की हस्तलिखित यह पांडुलिपि उनके पूर्वज पं. भवानी प्रसाद तिवारी की रामभक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं गोस्वामी तुलसीदास ने उपहार स्वरूप उन्हें भेंट की थी। तब से इस सनातन हिन्दू संस्कृति की इस अनमोल सांस्कृतिक धरोहर की सुरक्षा उनका परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी करता आ रहा है। बकौल संजय तिवारी; उनके दादा को उनके दादा के दादा ने बताया था कि सोलहवीं शताब्दी में काशी के घाट पर रामचरित मानस की रचना का श्रीगणेश करने के उपरान्त एक बार गोस्वामी तुलसीदास जी भ्रमण करते-करते वर्तमान लखीमपुर जिले के सघन वन प्रांत में आ पहुंचे थे। यहां का सुरम्य शांत नैसर्गिक प्राकृतिक सौन्दर्य उनके अंतस को लुभा गया और उन्होंने मानस के अगले अंश सुंदरकांड की रचना के लिए कुछ समय के लिए वहीं एक वट वृक्ष के नीचे डेरा डाल दिया था। वह विशाल वट वृक्ष आज भी महाकवि के सृजन का मूक साक्षी बना हुआ है।

पंडित संजय तिवारी

 

भोजपत्र पर लिखी गई है पांडुलिपि

जानना दिलचस्प होगा कि यह पांडुलिपि भोजपत्र पर काली स्याही से मोटे अक्षरों में लिखी गयी है तथा इसके प्रत्येक पन्ने पर सीता राम लिखी गोल मुहर भी लगी हुई है। इस पांडुलिपि पर संवत 1672 भी अंकित है। पंडित संजय तिवारी के बताते हैं कि सुन्दरकाण्ड की इस पाण्डुलिपि की जानकारी मिलने पर बीती सदी में गीता प्रेस (गोरखपुर) के संचालक हनुमान प्रसाद पोद्दार जी स्वयं यहां उनके दादा पंडित भवानी शंकर तिवारी से मिलने आये थे और उन्होंने उस पांडुलिपि को देख उसे तुलसीदास के हस्त लिखित होने की पुष्टि करते हुए उसे मौलिक और प्रामाणिक बताया था। साथ ही उन्होंने कल्याण पत्रिका में इस जानकारी से जुड़ा एक लेख भी प्रकाशित किया था।

लखीमपुर खीरी में लिखे सुंदरकांड के कुछ अंश

पंडित संजय तिवारी के अनुसार 20वीं सदी के पूर्वार्ध में मौजा धौरहरा से निकलने वाली एक उर्दू पत्रिका “बाजिलबुलअर्ज” में प्रकाशित धौरहरा के तत्कालीन जांगड़ा राजा खड़क सिंह द्वारा उर्दू में लिखे गये एक आलेख में भी  तुलसीदास जी के यहां रहने और सृजन करने की जानकारी दी गयी थी। पंडित तिवारी को यह जानकारी उनके पिता ने दी थी। क्षेत्र के तत्कालीन राजा खड़क सिंह के उक्त आलेख के विवरण के अनुसार सोलहवीं सदी में गोस्वामी तुलसीदास ने कुछ समय तक इस वन्य क्षेत्र में प्रवास किया था और प्रवास की उस अवधि में यहां रामचरित मानस के कुछ अंशों की रचना भी की थी। एक बार गोस्वामी जी स्वयं उनसे (राजा खड़क सिंह) से भेंट करने राजा साहब की कोठी पर गये तो उनके कर्मचारियों ने उनके इशारे पर यह कहकर भेंट करने से रोक दिया कि इस समय राजा साहब पूजा कर रहे हैं; आप बाद में आइयेगा।

इस पर तुलसीदास जी ने कहा कि तुम्हारे राजा इस समय ईश्वर की पूजा नहीं वरन पैसों का हिसाब किताब कर रहे हैं। यह कह कर वे वापस अपनी कुटिया को लौट गये। जब राजा को यह बात पता चली तो उनके मन में तुलसीदास से मिलने की तीव्र उत्कंठा जाग उठी और वे उसी वक्त तुलसीदास की कुटिया पर जा पहुंचे। तुलसीदास जी उस समय शौच के लिए गए हुए थे। तब राजा साहब उनकी शक्ति की परीक्षा लेने के उद्देश्य से उनके आसन पर जा बैठे। थोड़ी देर बाद हाथ में बरगद की दातून लिए तुलसीदास जी नित्य कर्म से निवृत होकर वापस लौटे। अपने आसन पर मुझे आसीन देख कर वे बोले- राजा! तुमने पृथ्वी का राजा होकर भी फकीर का आसन ले लिया।

इसलिए अब पृथ्वी का राज्य तुम्हारे हाथ से निकल जाएगा। यह सुनते ही राजा साहब को अपनी भूल का भारी पश्चाताप हुआ और वे तत्क्षण तुलसीदास जी के चरणों में गिर कर क्षमा मांगने लगे। दयावान संत को उन पर दया आ गयी और उन्होंने मुस्कुराते हुए अपने हाथ में पकड़ी दातून अपने आसन के पास ही जमीन में गाड़ दी और राजा साहब से बोले, जब तक यह दातुन यहां दबी रहेगी तब तक इस राज्य की भूमि पर तुम्हारा अधिकार सुरक्षित रहेगा। तुलसीदास जी द्वारा रोपी गयी वह दातुन आज विशाल वट वृक्ष में तब्दील हो चकी है और यह स्थान “रामवटी” के नाम से समूचे क्षेत्र में विख्यात है। जिस स्थान पर गोस्वामी जी ने सुंदरकांड की रचना की थी, उस स्थान को वर्तमान में तुलसी चौरा के नाम में जाना जाता है।

रामवटी वृक्ष

पंडित तिवारी कहते हैं कि धौरहरा के जांगड़ा राजा खड़क सिंह के परिवार द्वारा इस तुलसी चौरे के पश्चिम में एक बीती सदी में ठाकुरद्वारा का निर्माण कराकर उसमें श्रीराम, सीता और लक्ष्मण की प्रतिमा के साथ संत तुलसी दास की प्रतिमा भी स्थापित की गयी थी। ठाकुरद्वारे पर लगे शिलालेख के मुताबिक इसका निर्माण वर्ष 1937 में हुआ था। इस ठाकुरद्वारे में एक हवन कुंड भी है। कहा जाता है कि तुलसीदास जी यहां नियमित यज्ञ किया करते थे। संत तुलसीदास की यह रचनास्थली क्षेत्रीय लोगों के बीच आस्था केन्द्र के रूप में दूर दूर तक विख्यात है।

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