सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस राजेश बिंदल ने हाल ही में युवा वकीलों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के इस्तेमाल को लेकर आगाह किया है। एक कार्यक्रम में उन्होंने चिंता जताई कि AI टूल्स का गलत इस्तेमाल बढ़ रहा है, जिससे कोर्ट में फर्जी और गलत फैसले पेश किए जा रहे हैं। उन्होंने तकनीक के फायदों को मानते हुए इसके खतरों पर भी खुलकर बात की। जस्टिस बिंदल का कहना है कि यह समस्या हमारी न्याय व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन रही है, और इसे समझकर रोकना बेहद जरूरी है।
AI का बढ़ता इस्तेमाल और उसका जोखिम
आजकल, खासकर नए वकील, कानूनी रिसर्च के लिए AI टूल्स का जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं। ये टूल्स तेजी से जानकारी जुटाने में मदद करते हैं, जिससे काम आसान हो जाता है। लेकिन जस्टिस बिंदल ने बताया कि कई बार ये टूल्स गलत या पूरी तरह फर्जी जानकारी दे देते हैं। कुछ मामलों में तो AI से बने नकली कोर्ट फैसले या दस्तावेज तक कोर्ट में पेश कर दिए गए, जो बिल्कुल गलत थे। उन्होंने कहा कि ऐसी गलतियां न सिर्फ समय बर्बाद करती हैं, बल्कि कोर्ट की प्रक्रिया और उस पर लोगों के भरोसे को भी ठेस पहुंचाती हैं। जस्टिस बिंदल ने साफ कहा कि AI पर आंख मूंदकर भरोसा करने के बजाय वकीलों को अपनी समझ और पुराने तरीके की रिसर्च पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।
तकनीक के फायदे और उसकी सीमाएं
जस्टिस बिंदल ने यह भी साफ किया कि AI कोई बुरी चीज नहीं है। यह रिसर्च को तेज करने, दस्तावेजों को व्यवस्थित करने और समय बचाने में बहुत मददगार हो सकता है। लेकिन इसका इस्तेमाल सोच-समझकर करना होगा। उन्होंने सलाह दी कि AI से मिली जानकारी की हमेशा पुष्टि आधिकारिक स्रोतों से करनी चाहिए। मिसाल के तौर पर, कोर्ट के फैसलों की सच्चाई जांचने के लिए सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट्स का सहारा लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर तकनीक का सही इस्तेमाल हो, तो यह न्याय प्रक्रिया को और बेहतर बना सकता है, लेकिन गलत इस्तेमाल से बचना जरूरी है।
युवा वकीलों के लिए सलाह
जस्टिस बिंदल ने युवा वकीलों को खास सलाह दी कि वे तकनीक के साथ-साथ कानून की बारीकियां समझने पर भी जोर दें। उन्होंने कहा कि AI टूल्स को बस एक सहायक की तरह इस्तेमाल करें, न कि पूरी तरह उन पर निर्भर हों। साथ ही, उन्होंने बार काउंसिल और लॉ स्कूलों से गुजारिश की कि वे युवा वकीलों को AI के सही और गलत इस्तेमाल के बारे में ट्रेनिंग दें। इससे उनकी प्रैक्टिस बेहतर होगी और कोर्ट में गलत जानकारी पेश करने की समस्या भी कम होगी।















