गाजा से पहले भारत: बॉम्बे हाईकोर्ट का संदेश और लोकतंत्र की प्राथमिकताएं
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गाजा से पहले भारत: बॉम्बे हाईकोर्ट का संदेश और लोकतंत्र की प्राथमिकताएं

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) गाजा में इजरायली कार्रवाई का विरोध कर रही थी, लेकिन मुंबई पुलिस ने आजाद मैदान में प्रदर्शन की अनुमति सुरक्षा व विदेश नीति के कारण नहीं दी।

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी
Jul 27, 2025, 01:31 pm IST
in भारत
बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) गाजा में इजरायल की सैन्‍य कार्रवाई का लगातार विरोध कर रही है, लेकिन जब उसने मुंबई के आजाद मैदान में प्रदर्शन करने की अनुमति मांगी तो मुंबई पुलिस और प्रशासन ने सुरक्षा और विदेश नीति के संभावित प्रभावों के चलते अनुमति देने से इंकार किया। इसके बाद सीपीआई-(एम) बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर करने पहुंची है और अभिव्‍यक्‍ति एवं लोकतंत्र का हवाला दिया। लेकिन, उसे न्‍यायालय से भी सख्‍त टिप्पणी का सामना करना पड़ा।

यह सच है कि आलोचना और विरोध लोकतंत्र की आत्मा हैं। परंतु यदि विरोध की दिशा भ्रमित हो जाए, और यदि वह केवल प्रदर्शन मात्र बनकर रह जाए, तो वह न तो लोकतंत्र की रक्षा करता है, ना ही जनता की सेवा। आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत के भीतर, गाँव-शहरों में जो समस्याएं दिन-प्रतिदिन विकराल रूप ले रही हैं, उन पर ध्यान केंद्रित किया जाए। न्यायमूर्ति रवींद्र घुगे और न्यायमूर्ति गौतम अंखड की खंडपीठ ने इस याचिका को खारिज करते हुए जो शब्द कहे, वे केवल कानूनी वक्तव्य नहीं हैं, उन्‍हें प्रत्‍येक भारतवासी द्वारा गंभीरता से लेने की जरूरत है।

बॉम्बे हाईकोर्ट की टिप्पणी क्या है?

वास्‍तव में कोर्ट का कहना आज के संदर्भ में राष्ट्रीय चेतना की एक पुकार है। न्‍यायालय ने कहा, “देश में पहले से ही समस्याओं की कोई कमी नहीं है। ग़ाज़ा और फिलिस्तीन की चिंता करने से पहले अपने देश को देखिए। यह देशभक्ति नहीं है। देशभक्त बनिए।” न्यायालय की यह टिप्पणी सीधी और तीखी थी, लेकिन उसकी आवश्यकता उतनी ही गहरी है। कोर्ट का स्पष्ट मत था कि अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर प्रदर्शन देश की विदेश नीति पर विपरीत प्रभाव डाल सकते हैं। भारत की विदेश नीति एक संतुलित, तटस्थ और कूटनीतिक दृष्टिकोण अपनाती है, जहां प्रदर्शन जैसी गतिविधियां एकतरफा सन्देश दे सकती हैं, विशेषकर तब जब वे सरकार की आधिकारिक नीति से मेल नहीं खातीं।

इसके साथ ही बॉम्‍बे हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि हमारे देश में कचरा प्रबंधन, प्रदूषण, जल निकासी की विफलताएं, शहरी बाढ़, सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसी कई समस्‍याएं आज भी हैं, वास्‍तव में इन सब पर ध्यान देना अधिक प्रभावशाली और समाजोपयोगी कार्य है।

राजनीति और कूटनीति की लक्ष्मण रेखा

देखा जाए तो हाईकोर्ट का यह संकेत अत्‍यधिक महत्वपूर्ण है, “आप नहीं जानते कि इससे कितनी धूल उड़ सकती है। यह फिलिस्तीन या इज़रायल की दिशा में जा सकती है। आप क्यों ऐसा करना चाहते हैं?” यह प्रश्न केवल सीपीआई (एम) से नहीं, हम सब से भी न्‍यायालय का है। हर उस व्यक्ति, समूह और दल के लिए है जो “विदेशी मुद्दों पर प्रदर्शन” को अपने विचारधारात्मक अस्तित्व का आधार बना चुके हैं। देशप्रेम की सबसे बड़ी पहचान यह नहीं कि आप किसके लिए सड़क पर उतरे, बल्कि यह है कि आप अपने देश की सच्चाइयों और पीड़ाओं को कितनी प्राथमिकता देते हैं।

न्यायालयों के पूर्व के निर्णय

इसके साथ ही न्‍यायालयों द्वारा पहले भी दिए गए निर्णयों को भी देखना चाहिए। कोलकाता हाईकोर्ट ने वर्ष 2023 में विदेशी मुद्दों पर राजनीतिक प्रदर्शनों को सीमित करने के लिए राज्य को दिशानिर्देश जारी करने की सलाह दी थी। प्रयागराज हिंसा (2022) के दौरान भी देखने को मिला था कि कैसे इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा था कि जब प्रदर्शन देश में तनाव को बढ़ा सकता हो, तब प्रशासन को यह अधिकार है कि वह प्रदर्शन की अनुमति न दे।

सीएए विरोध पर दिल्ली हाईकोर्ट ने क्या कहा

दिल्ली हाईकोर्ट, 2021 में, सीएए विरोध के दौरान यह स्पष्ट कहा था कि प्रदर्शन का अधिकार असीम नहीं है और यदि उससे सार्वजनिक व्यवस्था पर प्रभाव पड़ता है तो प्रशासन को इसे नियंत्रित करने का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने शाहीन बाग मामले में भी स्पष्ट किया कि सार्वजनिक स्थानों पर अनिश्चितकालीन धरना प्रदर्शन नागरिकों के अन्य अधिकारों को बाधित करता है।

सुप्रीम कोर्ट का उदाहरण देखें

एक उदाहरण बाबरी ढांचे के समर्थन में प्रदर्शन के संदर्भ में ध्‍यान आता है, तब भी सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक रूप से संवेदनशील मुद्दों पर प्रदर्शन को लेकर दी गई अपनी राय में साफ बताया था कि भले ही प्रदर्शन शांतिपूर्ण हों, फिर भी ये कहीं भी तनाव का कारण बन सकते हैं, ऐसे में उन पर रोक टोक को न्यायोचित ठहराया गया था। इसी प्रकार के अनेकों मामले राज्‍य भर में हैं, जहां न्‍यायालय ने प्रदर्शन करने से सीधे-सीधे रोक दिया था।

वामपंथी दलों की आत्मा पहलगाम आतंकी हमले पर क्यों नहीं जागी

इस पूरे विवाद में एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि वामपंथी दल और अन्य इस प्रकार के आन्‍दोलनजीवी संगठनों की संवेदनाएं समान संवेदनशीलता वाले अन्‍य देश से जुड़े मुद्दों पर क्‍यों नहीं जागती है? कोई आज इनसे नहीं पूछा जाना चाहिए कि गलवान घाटी में भारतीय जवानों के बलिदान के वक्‍त इनकी संवेदना कहां गायब थी? जब पहलगाम में निर्दोष नागरिकों की हत्या हुई, तब आतंक के विरोध में ये आवाजें क्‍यों नहीं उठीं। इसके अलावा सीपीएम और अन्य संगठन भी ये समझ लें कि संविधान अनुच्छेद 19(1)(a) और (b) द्वारा दी गई स्वतंत्रता “यथोचित प्रतिबंधों” के अधीन है। संविधान का अनुच्छेद 19(2) स्पष्ट करता है कि यदि किसी अभिव्यक्ति से सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित हो, भारत की संप्रभुता को खतरा हो या विदेशी कूटनीति पर प्रतिकूल असर हो तो उस पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। अतः प्रदर्शन की स्वतंत्रता असीम नहीं थी, वह राष्ट्रहित से ऊपर नहीं हो सकती।

गाजा प्रेम से पहले कर्तव्यबोध जरूरी

अंत में कहना यही होगा कि भारत जैसे राष्ट्र में, जहां हर गली, हर मोहल्ला और हर राज्य किसी न किसी सामाजिक या प्रशासनिक समस्या से जूझ रहा है। वास्‍तव में वहां गाजा प्रेम से पहले भारत जागरूकता और कर्तव्यबोध अनिवार्य है। आज उक्त संदर्भ में बॉम्बे हाईकोर्ट की सलाह देश के लोकतांत्रिक विमर्श को केवल सजग ही नहीं बनाती, बल्कि एक नई नैतिकता का सूत्रपात करती है, जिसका कि सार्वभौमिक सत्‍य, सिद्धांत यही कहता है कि “पहले देश, फिर बाकी दुनिया।”

Topics: India's foreign policyCommunist Party of IndiaBombay High CourtMarxistIsrael palestine conflictGaza protestsIsraeli military action in GazaGaza protest in India 2025
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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