अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी भी व्यक्ति की भावनाओं के साथ खिलवाड़ सहन नहीं
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न्यायपालिका : अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी भी व्यक्ति की भावनाओं के साथ खिलवाड़ सहन नहीं

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी भी व्यक्ति की भावनाओं के साथ खिलवाड़ सहन नहीं किया जा सकता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर बनाए गए एक आपत्तिजनक व्यंग्य चित्र पर उच्चतम न्यायालय ने फटकार लगाते हुए कहा- यह कार्टून भड़काऊ, अपरिपक्व और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग है

Written byआशीष रायआशीष राय
Jul 22, 2025, 02:06 pm IST
inभारत, विश्लेषण, संघ @100

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर पांथिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने वालों पर अब उच्चतम न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाते हुए कार्टूनिस्ट हेमंत मालवीय मामले को ‘टेस्ट केस’ के रूप में ले लिया है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 की अपनी सुविधानुसार व्याख्या करने वालों पर भी उच्चतम न्यायालय सख्त हो गया है।

आशीष राय
अधिवक्ता सर्वोच्च न्यायालय

भारत के संविधान को बनाते समय संविधान निर्माताओं ने लोकतांत्रिक मूल्यों का विशेष ध्यान रखा था। अनुच्छेद 19 प्रत्येक नागरिक को बोलने, लिखने, शांतिपूर्वक प्रदर्शन करने, यूनियन/समूह बनाने, भारत में स्वतंत्र घूमने, किसी भी राज्य में बसने या कोई भी व्यवसाय करने जैसे मौलिक अधिकार तो प्रदान करता है, परन्तु इसकी मर्यादा भी तय कर दी गई है। संविधान अनुच्छेद 19 की आड़ में राष्ट्र की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता, यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में किसी व्यक्ति या संगठन की गरिमा का हनन करने के लिए अश्लीलता और अनैतिक कार्यों की अनुमति भी नहीं देता।

आपत्तिजनक व्यंग्य चित्र

उच्चतम न्यायालय रा.स्व.संघ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर बनाए गए एक आपत्तिजनक व्पंग्य चित्र यर सक्रिय हुआ। दरअसल कार्टूनिस्ट हेमंत मालवीय द्वारा कोरोना काल में बनाये गए एक बेहद ही आपत्तिजनक व्पंग्य चित्र को हाल ही में दोबारा पोस्ट किया गया था। इस व्पंग्य चित्र को वर्ष 2021 में बनाया गया था और 6 जनवरी, 2021 को पोस्ट किया गया था। इसमें कोविड वैक्सीन की प्रभावशीलता पर सवाल उठाए गए थे। इस व्पंग्य चित्र को मई 2025 में एक फेसबुक उपयोगकर्ता ने फिर से साझा किया, जिसमें उसने सरकार द्वारा जातिगत जनगणना कराए जाने के निर्णय के परिप्रेक्ष्य में आपत्तिजनक टिप्पणियां भी जोड़ीं। हेमंत मालवीय ने उस पोस्ट को दोबारा साझा किया और उन टिप्पणियों का समर्थन किया था। व्पंग्य चित्र में एक व्यक्ति को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गणवेश में दर्शाया गया था, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कैरिकेचर को स्टेथोस्कोप और सीरिंज के साथ उस व्यक्ति को तयका लगाते हुए चित्रित किया गया था।

भावनाएं हुईं आहत

इस व्पंग्य चित्र के सोशल मीडिया पर वायरल होने पर लोगों की भावनाएं आहत हुईं। इंदौर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सम्बद्ध एक व्यक्ति ने इसकी रिपोर्ट स्थानीय पुलिस को दी और 21 मई, 2025 को कार्टूनिस्ट मालवीय के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता की धारा 196, 299, 302, 352 और 353(2) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67 ए के अंतर्गत मुकदमा दर्ज कर लिया गया। दरअसल 2014 में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद से बौखलाया हुआ एक सेकुलर इकोसिस्टम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर ज्यादा ही हमलावर है। संघ और सत्ता को एक दिखाने के चक्कर में मर्यादा की सीमा को भी पार किया जा रहा है।

संघ कभी भी अपने पर हमलों और आरोपों का जवाब यह सोचकर नहीं देता कि देशहित में उसके स्वयंसेवकों द्वारा किए जा रहे कार्य ही आलोचना का उत्तर होते हैं, लेकिन कई घटनाओं ने संघ समर्थकों की भावनाओं को आहत किया है। भले ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अभी भी अपने इस निर्णय पर अडिग हो कि हमारे कार्य ही सभी आलोचनाओं के उत्तर हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर हिन्दू, हिंदुत्व व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारें में आने वाली आपतिजनक पोस्ट पर उनके समर्थकों द्वारा अब कानूनी लड़ाई शुरू कर दी गई है। उसी कड़ी में कार्टूनिस्ट हेमंत मालवीय पर मुकदमा दर्ज हुआ।

खारिज हुई अग्रिम जमानत याचिका

कार्टूनिस्ट मालवीय ने मुकदमा दर्ज होते ही अपनी गिरफ्तारी से बचने के लिए इंदौर की अदालत में अग्रिम जमानत की याचिका दायर की जिसे 24 मई, 2025 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश इंदौर ने खारिज कर दिया। इस पर मालवीय ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में अग्रिम जमानत की गुहार लगाई, उच्च न्यायालय ने कार्टून का संज्ञान लेकर इस मामले को बेहद ही संगीन मानते हुए कहा कि यह सिर्फ ‘राजनीतिक व्यंग्य’ नहीं बल्कि एक गंभीर अपराध है। न्यायालय ने माना कि हेमंत ने अनुच्छेद 19(1)(ए) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) की सीमाओं को पार किया है, इसलिए उनसे पुलिस हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता है और 3 जुलाई, 2025 को उच्च न्यायालय ने भी अग्रिम जमानत याचिका अस्वीकार कर दी।

सेकुलर इकोसिस्टम ने कार्टूनिस्ट मालवीय की मदद करते हुए तत्काल उच्चतम न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका दायर कर गिरफ्तारी से बचने के लिए सुरक्षा की गुहार लगाई।
जैसे ही यह मामला सुनवाई के लिए पीठ के समक्ष आया, उच्चतम न्यायालय ने भी डांट लगाते हुए कहा, ‘‘यह कार्टून भड़काऊ, अपरिपक्व और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग है।’’

उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी से घबराकर मालवीय के अधिवक्ता ने मामले में अगले दिन ही सुनवाई का आग्रह करते हुए तुरंत कार्टून को हटाने की बात कर दी। अगले दिन की सुनवाई के दौरान पीठ ने कार्टूनिस्ट की बदनीयती पर सवाल उठाते हुए कहा, ‘‘यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में किया गया दुर्व्यवहार है।’’ न्यायालय ने इस कार्टून को सोशल मीडिया के सभी प्लेटफार्म से तत्काल हटाने और शपथपत्र के माध्यम से लिखित माफीनामा दाखिल करने का आदेश पारित किया। साथ ही यह टिप्पणी की कि यह मुकदमा ‘टेस्ट केस’ के रूप में सुना जाएगा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किस हद तक छूट दी जा सकती है।

उच्चतम न्यायालय ने कार्टूनिस्ट हेमंत मालवीय को केवल अंतरिम संरक्षण प्रदान किया और निर्देश दिया कि माफीनामा को हिंदी में शपथपत्र के रूप में दाखिल किया जाए। न्यायालय ने यह भी आदेश दिया कि सभी पक्ष अगली तिथि से पूर्व अपनी दलीलें पूरी करें। अगली सुनवाई अगस्त में निर्धारित की गई है। न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति अरविन्द कुमार की पीठ ने प्रथम दृष्टया यह मानते हुए कि यह कार्टून राजनीतिक व्यंग्य नहीं बल्कि दुर्व्यहार है, कार्टूनिस्ट हेमंत को स्पष्ट चेतावनी दी है कि अगर दोबारा ऐसा हुआ तो कड़ी कार्रवाई होगी। वर्तमान केंद्र सरकार के ऊपर ‘अघोषित तानाशाही’ का आरोप लगा कर तथाकथित इकोसिस्टम ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का खूब दुरुपयोग किया है। इसके लिए हास्य कलाकारों और तथाकथित यूट्यूबर्स को माध्यम बनाया गया। इन सबके माध्यम से समाज में बिखराव की स्थिति बनाने का इनका प्रयास रहता है।

गरिमा को प्राथमिकता

न्यायमूर्ति सूर्यकांत की पीठ ने हाल ही में उच्चतम न्यायालय में एक मामले की सुनवाई के दौरान स्पष्ट रूप से कहा है कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 19 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार तो देता है परन्तु अनुच्छेद 21 जीवन, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा का अधिकार भी देता है और अगर दोनों में टकराव होता है, तो अनुच्छेद 21 को ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना की अध्यक्षता वाली एक अन्य पीठ ने भी एक अन्य मामले की सुनवाई के दौरान अपमानजनक सोशल मीडिया पोस्ट की निंदा की थी और इस समस्या पर अंकुश लगाने के लिए दिशा-निर्देशों पर विचार किया था। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने मौखिक टिपण्णी करते हुए कहा था, ‘‘हम सेंसरशिप की बात नहीं कर रहे हैं बल्कि भाईचारे और लोगों की गरिमा के हित में कुछ करने की बात कर रहे हैं।’’ न्यायालय की इन टिप्पणियों ने स्पष्ट कर दिया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी भी व्यक्ति की भावनाओं के साथ खिलवाड़ सहन नहीं किया जा सकता।

 

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