भारतीय राजनीति में कांग्रेसी रीति-नीति की छाया और बदलाव की चुनौतियां
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भारतीय राजनीति में कांग्रेसी रीति-नीति की छाया और बदलाव की चुनौतियां

भारतीय राजनीति के पूरे ढांचे को आजादी के बाद से ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपने रंग में रंग दिया। भारतीय राजनीति के स्वरूप, चुनावी खर्चों की विसंगतियों, और बदलाव की संभावनाओं पर चर्चा मीडिया और समाज में ठीक से चर्चा भी कहां होती है?

Written byआशीष कुमार 'अंशु'आशीष कुमार 'अंशु'
Jul 7, 2025, 11:19 am IST
inमत अभिमत
कांग्रेस

कांग्रेस

भारतीय राजनीति के पूरे ढांचे को आजादी के बाद से ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपने रंग में रंग दिया। यह देश की विडंबना है कि चाहे सरकार किसी भी दल की बने, उसका संचालन कहीं न कहीं कांग्रेसी रीति-नीति की छाप लिए होता है। यह एक ऐसी व्यवस्था है, जो दशकों से भारतीय राजनीति की रीढ़ रही है। भले ही समय-समय पर विभिन्न दल सत्ता में आए हों, लेकिन सिस्टम की गति और दिशा में कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं हुआ।

भारतीय राजनीति के स्वरूप, चुनावी खर्चों की विसंगतियों, और बदलाव की संभावनाओं पर चर्चा मीडिया और समाज में ठीक से चर्चा भी कहां होती है? विचार करने की बात तो यह भी है कि समाज इस सिस्टम को बदलने की दिशा में कोई कदम उठा सकता है या नहीं?

कांग्रेसी रीति-नीति एक अटल सिस्टम

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने आजादी के बाद देश की राजनीति को न केवल आकार दिया, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था स्थापित की, जो आज भी भारतीय राजनीति का आधार बनी हुई है। यह व्यवस्था एक ऐसी आटा चक्की की तरह है, जिसमें चाहे गेहूं डालो, चावल डालो, या चना, बाहर निकलेगा वही- आटा। यानी, चाहे कोई भी दल सत्ता में आए, वह उसी पुरानी व्यवस्था के ढांचे में ढल जाता है।

यह व्यवस्था जातिवाद, क्षेत्रवाद, और अपराधियों को संरक्षण देने जैसे तत्वों से बनी है, जिसे कांग्रेस ने अपने शुरुआती वर्षों में पोषित किया। जनता पार्टी से लेकर भारतीय जनता पार्टी तक, कई दलों ने केंद्र और राज्यों में सत्ता हासिल की, लेकिन इस सिस्टम की गति को बदलने में कोई भी पूरी तरह सफल नहीं हुआ।

इसका कारण यह है कि यह सिस्टम इतना मजबूत और गहरे तक जड़ें जमाए हुए है कि इसे बदलना एक लंबी और जटिल प्रक्रिया है। परिवर्तन की राह कठिन है, और शायद यही कारण है कि इस दिशा में गंभीर प्रयास कम ही दिखाई देते हैं।

चुनावी खर्च: एक महंगा जुआ

भारतीय राजनीति की एक और विडंबना है चुनावी खर्च। हाल के आंकड़ों के अनुसार, एक सांसद का मासिक वेतन लगभग 1.25 लाख रुपये है (संदर्भ: द हिंदू, 24% वेतन वृद्धि की अधिसूचना)। इसके बावजूद, चुनाव आयोग प्रत्येक संसदीय उम्मीदवार को चुनाव में 90 लाख रुपये तक खर्च करने की अनुमति देता है (संदर्भ: द हिंदू, चुनाव आयोग की खर्च सीमा)। यदि हम गणना करें, तो एक सांसद को अपने 1.25 लाख रुपये के मासिक वेतन से 90 लाख रुपये की भरपाई करने में 72 महीने, यानी 06 साल लगेंगे। मतलब पांच साल सांसद रहने के लिए कोई छह साल का अपना वेतन दांव पर लगा रहा है। ऐसा वह क्यों कर रहा है? यह प्रश्न समाज क्यों नहीं पूछता?

यह केवल जीते हुए सांसद की बात है। उन उम्मीदवारों का क्या, जो चुनाव हार जाते हैं? उनका खर्चा भी तो लाखों में होता है लेकिन उनकी कोई आय नहीं होती। यह सवाल उठता है कि इतना पैसा कहां से आता है और क्यों खर्च किया जाता है? क्या यह सब समाज सेवा के लिए है? यह विश्वास करना कठिन है।

टीवी चैनलों पर इस मुद्दे पर शायद ही कभी कोई गंभीर बहस देखने को मिलती है। यूट्यूबर भी इस विषय पर चुप्पी साधे रहते हैं। इसका कारण शायद यह है कि, जैसा कि कहा जाता है, “चुनाव का कद्दू जब कटता है, तो सब में बंटता है।” सवाल यह है कि इस मुद्दे को फिर कौन उठाएगा? समाज को यह सवाल उठाना चाहिए लेकिन वह भी खामोश है।

खर्च का वास्तविक आंकड़ा: 90 लाख या उससे कहीं ज्यादा?

चुनावी समीक्षकों का मानना है कि 90 लाख रुपये की तय सीमा को मानने वाले उम्मीदवार गिनती के ही होंगे। वास्तव में, संसदीय चुनावों में खर्च करोड़ों रुपये तक पहुंच जाता है। यह एक ऐसा जुआ है, जहां जीत और हार अनिश्चित है, फिर भी उम्मीदवार लाखों-करोड़ों रुपये खर्च करने को तैयार रहते हैं। यह पैसा कहां से आता है? क्या यह काला धन है? क्या यह बड़े-बड़े कॉरपोरेट्स या प्रभावशाली लोगों का योगदान है? और यदि हां, तो क्या वे यह पैसा बिना किसी अपेक्षा के देते हैं?

यहां एक वैकल्पिक मॉडल पर विचार करने की जरूरत है। क्या यह संभव नहीं कि सभी उम्मीदवार अपने संसदीय क्षेत्र के विकास के लिए एक संसदीय केयर फंड बनाएं। वहां सभी विकास कार्यों के लिए अपनी अपनी धनराशि जमा करें। उनका दी हुई धनराशि को वे खर्च करें लेकिन वह सारा खर्च समाज के प्रबुद्ध लोगों की निगरानी में संसदीय केयर फंड से हो और जनता ऐसे उम्मीदवारों के काम के आधार पर वोट दे?

उदाहरण के लिए, यदि प्रत्येक उम्मीदवार को 90 लाख रुपये खर्च करने की अनुमति है, तो इस राशि को एक संसदीय क्षेत्र विकास फंड में जमा किया जाए। इस फंड का उपयोग क्षेत्र के विकास कार्यों, जैसे स्कूल, अस्पताल, सड़कें, या स्वच्छता सुविधाओं के लिए हो। जनता फिर उम्मीदवारों के इस योगदान और उनके काम को देखकर वोट दे। अपने पैसे को किस उम्मीदवार ने अधिक चतुराई से खर्च करके अधिक से अधिक लोगों का समर्थन हासिल किया। यह चुनाव के लिए एक रचनात्मक प्रयोग हो सकता है।

यह मॉडल न केवल पारदर्शी होगा, बल्कि यह सुनिश्चित करेगा कि पैसा समाज के हित में खर्च हो, न कि प्रचार, रैलियों, या वोट खरीदने में।

क्यों नहीं हो सकता ऐसा मॉडल?

ऐसा मॉडल लागू करना इतना आसान नहीं है। इसका कारण यह है कि भारतीय राजनीति में वोट अक्सर काम के आधार पर नहीं, बल्कि जाति, धर्म, क्षेत्र, या पैसे के प्रभाव पर आधारित होते हैं। कई उम्मीदवार अपनी गुंडागर्दी, जातिगत समीकरण, या धन-बल के दम पर वोट हासिल करते हैं। अगर वोट केवल विकास कार्यों के आधार पर मिलने लगे, तो ऐसे उम्मीदवारों का नंबर कभी नहीं आएगा।

यही कारण है कि इस तरह के सुधारों का विरोध हो सकता है। सिस्टम की जड़ें इतनी गहरी हैं कि इसे बदलने के लिए न केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति, बल्कि सामाजिक जागरूकता की भी जरूरत है।

अपराधीकरण और जातिवाद: कांग्रेसी मॉडल की देन

कांग्रेसी रीति-नीति का एक और पहलू है अपराधियों को संरक्षण देना और जातिवाद को बढ़ावा देना। आजादी के बाद से ही कांग्रेस ने अपने राजनीतिक लाभ के लिए समाज को जाति और धर्म के आधार पर बांटा। यह मॉडल इतना प्रभावी रहा कि आज भी अधिकांश राजनीतिक दल इसी रास्ते पर चलते हैं।

अपराधी तत्वों को टिकट देना और उन्हें संरक्षण देना भारतीय राजनीति का एक कड़वा सच है। यह सिस्टम न केवल समाज को बांटता है, बल्कि लोकतंत्र की मूल भावना को भी कमजोर करता है।

बदलाव की राह: क्या है समाधान?

भारतीय राजनीति में बदलाव की राह कठिन है लेकिन असंभव नहीं। इसके लिए कुछ ठोस कदम उठाए जा सकते हैं:

चुनावी खर्च में पारदर्शिता: उम्मीदवारों के खर्च का हिसाब-किताब और उसका स्रोत सार्वजनिक किया जाए। काले धन के उपयोग पर कड़ी निगरानी हो।

विकास आधारित मतदान: विकास कार्यों को वोट का आधार बनाने के लिए जनता को जागरूक करना होगा। इसके लिए शिक्षा और जागरूकता अभियान चलाए जा सकते हैं।

चुनावी सुधार: चुनाव आयोग को और सशक्त किया जाए ताकि वह खर्च की सीमा का सख्ती से पालन करवा सके।

राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र: दलों को अपने उम्मीदवारों का चयन पारदर्शी और लोकतांत्रिक तरीके से करना चाहिए, न कि गुंडागर्दी या धन-बल के आधार पर।

सामाजिक आंदोलन: समाज को इस सिस्टम के खिलाफ आवाज उठानी होगी। सोशल मीडिया और जन आंदोलनों के जरिए इस मुद्दे को उठाया जा सकता है।

भारतीय राजनीति की वर्तमान व्यवस्था एक ऐसी चक्की है, जो हर दल को अपने रंग में ढाल लेती है। कांग्रेसी रीति-नीति ने न केवल राजनीति को आकार दिया, बल्कि इसे एक ऐसी दिशा दी, जहां विकास से ज्यादा जाति, धर्म, और धन-बल की भूमिका है। चुनावी खर्चों की विसंगति और अपराधियों को संरक्षण देने की प्रवृत्ति ने लोकतंत्र को कमजोर किया है। बदलाव की राह कठिन है, लेकिन यदि समाज जागरूक हो और सही दिशा में कदम उठाए, तो एक ऐसी व्यवस्था बनाई जा सकती है, जहां वोट का आधार केवल विकास और काम हो। यह समय की मांग है कि भारतीय राजनीति को इस पुरानी चक्की से बाहर निकाला जाए और इसे एक नई, पारदर्शी, और जन-केंद्रित दिशा दी जाए।

Topics: indian politicsकांग्रेसी रीति-नीतिभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसIndian National CongressCongressचुनाव आयोगभारतीय राजनीति
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार अंशु पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और दस वर्षों तक मानवीय विकास से जुड़े विषयों की पत्रिका सोपान STEP से जुड़े रहे हैं। [Read more]
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