आरक्षण के मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए 60 साल पुराने नियम में संशोधन किया है। इससे ओबीसी कैटेगरी से आने वाले लोगों को काफी फायदा होने वाला है। सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले के बाद अब अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के कैंडिडेट को भी सुप्रीम कोर्ट की नौकरियों में आरक्षण की सुविधा हासिल हो सकेगी। ये फैसला सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश बी आर गवई और पूर्व सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने मिलकर लिया है।
3 जुलाई को जारी किया गया था राजपत्र
सुप्रीम कोर्ट की ओर से बीते 3 जुलाई को इस संबंध में एक राजपत्र जारी किया गया था। इस अधिसूचना के अनुसार, शीर्ष अदालत ने अनुच्छेद 146 (2) के तहत प्रदत्त शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए 1961 के सुप्रीम कोर्ट ऑफिसर्स एंड सर्वेंट्स के नियमों में ये बदलाव किया है।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में अब तक आरक्षण व्यवस्था मुख्य रूप से अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) कैटेगरी वाले कैंडिडेट तक को ही मिलती थी। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद अब से ओबीसी वर्गों के लोगों को भी इसका लाभ मिल सकेगा। इसका सकारात्मक असर ये होगा कि ओबीसी समुदाय को लोगों को भी सुप्रीम कोर्ट की भर्तियों में समान अवसर प्राप्त होंगे। दावा यह भी किया जा रहा है कि केंद्र सरकार भी चाहती है कि ओबीसी को मुख्यधारा में लाया जाए। ऐसे में ये नियम सरकार के अनुरूप ही हैं।
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सुप्रीम कोर्ट की कार्य संस्कृति में आएगी विवधता
माना जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले के बाद ओबीसी कोटे के लोगों के लिए नए अवसर पैदा होंगे। शीर्ष अदालत की वर्किंग स्टाइल में भी विवधता देखने को मिलेगी। जिस सामाजिक न्याय की बात केंद्र सरकार करती है, उसे लागू करने में यह मील का पत्थर हो सकता है।
दिशानिर्देश तैयार करेगा SC
इस बीच कहा सुप्रीम कोर्ट इस नियम को लेकर जल्द ही एक विस्तृत दिशानिर्देश तैयार करने की तैयारी है, ताकि ये स्पष्ट किया जा सके कि आरक्षण का लाभ किस प्रकार से और किसे मिलेगा। साथ ही भर्ती के तरीके को पारदर्शी बनाने पर जोर दिया जाएगा। बहरहाल ऐसा दावा किया जा रहा है कि इससे न केवल नए अवसरों के द्वार खुलेंगे, बल्कि इससे देश की न्यायिक प्रमाली में समावेशिता और विश्वसनीयता का समावेश होगा।















