सरस्वती नदी : ‘मिथक’ से सत्य की ओर
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‘मिथक’ से सत्य की ओर

वेदों, पुराणों, महाभारत और रामायण सहित अनेक ग्रथों में सरस्वती नदी का उल्लेख मिलता है। इस नदी के किनारे सभ्यता विकसित हुई, फिर भी वामपंथी इतिहासकारों ने इसकी अनदेखी की। हाल की खोजों, जैसे-राजस्थान में पेलियोचैनल की खोज ने सरस्वती नदी के ऐतिहासिक अस्तित्व को पुष्ट किया है

Written byनागार्जुननागार्जुन
Jul 6, 2025, 08:07 am IST
in भारत, विश्लेषण

सरस्वती नदी का उल्लेख ऋ ग्वेद, महाभारत, रामायण और अन्य पुराणों में प्रमुखता से किया गया है, जिसके तट पर सिंधु-सरस्वती सभ्यता विकसित हुई। सरस्वती के तट पर बसी बस्तियों के भग्नावशेष तक मिल चुके हैं। फिर भी लंबे समय तक वामपंथी और वामपंथी इतिहासकार उसे ‘मिथक’ बताते रहे। यही नहीं, जब सरस्वती नदी की खोज के लिए सरकार ने निधि जारी की तब भी सरस्वती को ‘अस्तित्वहीन’ बताते हुए इसे धन का दुरुपयोग करार दिया गया। वामपंथी इतिहासकार तो हड़प्पा सभ्यता को केवल सिंधु नदी की देन मानते आए थे। लेकिन ऐतिहासिक खोजों से यह साबित हो चुका है कि हड़प्पा सभ्यता के विकास में सरस्वती का भी बहुत बड़ा योगदान है।

के.एन. दीक्षित और एस.पी. गुप्ता की पुस्तक ‘An Atlas of the Indus Saraswati civilization’ के अनुसार, हड़प्पा सभ्यता और सरस्वती नदी, दोनों का अस्तित्व आपस में जुड़ता है। हड़प्पा सभ्यता में यदि 2600 बस्तियां मिली हैं, तो उनमें आज के पाकिस्तान में सिंधु तट पर मात्र 265 बसाहटें थीं, शेष अधिकतर सरस्वती नदी के तट पर मिली हैं।

सिंधु नदी सभ्यता से प्राप्त मुहर में सरस्वती नदी को प्रतीकात्मक रूप में दर्शाया गया है। नुकीली चोटियों के साथ लहर जैसी आकृति सरस्वती की ऊंची और तीखी लहरों के बारे में बताती है, जैसा कि ऋ ग्वेद में वर्णित है। X जैसा दिखने वाला प्रतीक ‘चतुष्पथ’ का प्रतिनिधित्व करता है, जहां चार सड़कें मिलती हैं, जो मानव बस्ती का प्रतिनिधित्व करता है। इस आकृति को सरस्वती नदी बताते हुए ऋ ग्वेद के छंद 6.61.2-14 से जोड़ा गया है।

…इसलिए पाठ्यक्रम में हो शामिल

कुछ विद्वानों और संगठनों का तर्क है कि सरस्वती नदी को पाठ्यपुस्तकों में शामिल करना चाहिए। यह भारतीय सभ्यता के इतिहास को समझने के लिए भी आवश्यक है, क्योंकि यह हड़प्पा और वैदिक सभ्यता को जोड़ती है। भारतीय सभ्यता के विकास में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण थी। इसे पाठ्यपुस्तकों में शामिल करने से वैदिक काल और सिंधु-सरस्वती सभ्यता के बारे में गहरी समझ विकसित होगी। कुछ स्रोतों में यह भी सुझाव दिया गया है कि सिंधु घाटी सभ्यता को ‘सिंधु-सरस्वती सभ्यता’ के रूप में पुनर्नामित किया जाए, जो इस नदी के महत्व को दर्शाता है-

इतिहासकार डॉ. हेमेन्द्र कुमार राजपूत ने सरस्वती नदी के ऐतिहासिक और वैदिक महत्व पर शोध किया है। उन्होंने सरस्वती नदी के उद्गम और मार्ग को पाठ्यपुस्तकों में शामिल करने की आवश्यकता पर जोर दिया है।

प्रसिद्ध इतिहासकार वासुदेव शरण अग्रवाल ने भी सरस्वती नदी के भौगोलिक और सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित करते हुए इसे वैदिक सभ्यता का हिस्सा माना है तथा इसे शैक्षिक पाठ्यक्रम में शामिल करने की बात की है।

कान्ति किशोर भरतिया का भी उल्लेख सरस्वती नदी के उद्गम और इसके ऐतिहासिक महत्व के संदर्भ में आता है। वे भी इसे शैक्षिक सामग्री में शामिल करने के पक्षधर हैं।

इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स के न्यासी सदस्य भरत गुप्त ने सरस्वती नदी के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व पर चर्चा करते हुए इसे शैक्षिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बताया है।

‘प्रयाग-दि साइट ऑफ कुंभ मेला’ के लेखक प्रोफेसर डी.पी. दुबे ने सरस्वती नदी के ऐतिहासिक संदर्भों को स्कूलों और कॉलेजों के पाठ्यक्रम में शामिल करने की आवश्यकता पर जोर दिया है।

जेएनयू के संस्कृत सेंटर के प्रोफेसर राम नाथ झा ने सरस्वती नदी के वैदिक और पुरातात्विक महत्व को उजागर किया और इसे भारतीय सभ्यता के अध्ययन का हिस्सा बनाने की वकालत की है।

संस्कृत के विद्वान संतोष कुमार शुक्ल भी सरस्वती नदी के सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व को पाठ्यपुस्तकों में शामिल करने की बात कह चुके हैं।

इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स (आईजीएनसीए) ने सरस्वती नदी के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व पर शोध को बढ़ावा दिया है। इसे भारतीय सभ्यता के अध्ययन के लिए पाठ्यपुस्तकों में शामिल करने की सिफारिश की है।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने हरियाणा, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान व गुजरात में सरस्वती पर शोध किया है और इसके ऐतिहासिक महत्व को स्कूल-कॉलेज के पाठ्यक्रम में शामिल करने के लिए शोध केंद्र स्थापित करने की योजना बनाई है।

हरियाणा में सरस्वती को पुनर्जीवित करने व इसके ऐतिहासिक महत्व को उजागर करने के लिए कार्यरत सरस्वती धरोहर बोर्ड इसे शैक्षिक सामग्री में शामिल करने के पक्ष में है।

तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ओएनजीसी) ने सरस्वती धरोहर बोर्ड के साथ मिलकर नदी के प्रवाह क्षेत्र का पता लगाने के लिए शोध किया है और वह इसके निष्कर्षों को शैक्षिक सामग्री में शामिल करने का समर्थन करता है।

सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड नामक संगठन ने सरस्वती नदी के किनारे पोजोमीटर लगाने की योजना बनाई है, जिसके परिणामों को शैक्षिक उद्देश्यों के लिए उपयोग करने की सिफारिश की गई है।

प्राचीन ग्रंथों में सरस्वती

वेद, पुराणों में गंगा और सिंधु नदी से अधिक सरस्वती को महत्व दिया गया है। हरियाणा में बाबा मस्तनाथ विश्वविद्यालय (रोहतक) के पूर्व प्रोफेसर और भारतीय इतिहास संकलन समिति (हरियाणा) से संबद्ध इतिहासकार प्रो. मनमोहन शर्मा अपने शोध पत्र ‘दी कल्चरल हेरिटेज ऑफ सरस्वती रिवर इन हरियाणा’ में लिखते हैं कि ऋ ग्वेद 10.75 की ऋ चा संख्या 5 और 6 में 19 नदियों के नाम हैं जो पूर्व से पश्चिम की ओर हैं। 1760 ई. के एक नक्शे में (ब्राइस, कोलियर और श्मित्ज की लाइब्रेरी एटलस में) सरस्वती को घग्गर नदी की सहायक नदी के रूप में दिखाया गया है। पाकिस्तान के सिंधु घाटी क्षेत्र में अभी तक 795 और सरस्वती घाटी में 2,378 पुरातात्विक स्थल सरस्वती-सिंधु सभ्यता संबंधित खोजे जा चुके हैं।

पांडवों ने लगभग 10 वर्ष सरस्वती के द्वैत वन में बिताए थे। कुरुक्षेत्र से सरस्वती पेहवा में पहुंची जो सरस्वती का सबसे प्राचीन और सबसे विशाल तीर्थ था। पेहवा में ही राजा पृथ्वी ने सबसे पहले खेती आरंभ की थी और 17 प्रकार की फैसलें उगाई थीं। महाभारत (12. 58) के अनुसार, सरस्वती के किनारों पर आदिबद्री चनेत स्तूप, कुरुक्षेत्र, पेहवा, कलायत, बनावली, राखीगढ़ी, सिरसा, कालीबंगा, लोथल तथा सोमनाथ जैसे प्रसिद्ध स्थल हैं। ऋ ग्वेद के दशम् मंडल में नदी सूक्त में नदियों की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। इसमें गंगा, यमुना, सरस्वती, शुतुद्रि (सतलुज), परुष्णी (रावी), असिक्नी (चेनाब), मरुधृधा, वितस्ता (झेलम) और सुषोमा (सिंधु) जैसी नदियों का उल्लेख है।

इमं में गंगे यमुने सरस्वति शुतुद्रि स्तोमै सचता परूष्ण्या।
असिवक्न्या मरूद्वृधे वितस्तयार्जीकीये श्रणुह्या सुषोमया।।
(ऋ ग्वेद, दशम् मंडल, 75वां सूक्त)
अर्थात् हे गंगा, यमुना, सरस्वती, शुतुद्रि, परुष्णी, असिक्नी, मरुधृधा, वितस्ता, और सुषोमा, मेरी स्तुति सुनो।
ऋ ग्वेद में सरस्वती को ‘नदीतमा’ की उपाधि दी गई है। यानी उस समय सरस्वती ही सबसे बड़ी और मुख्य नदी थी, गंगा नहीं। इसके अनुसार, हजारों वर्ष पहले सतलुज (सिंधु की सहायक नदी) और यमुना (गंगा की सहायक नदी) के बीच हिमालय से लेकर अरब सागर तक एक विशाल नदी बहती थी। यह पहाड़ों से निकल कर मैदानों से होती हुई समुद्र में जाकर मिलती थी। ऋ ग्वेद में कई मंडलों में सरस्वती का उल्लेख बार-बार हुआ है। वैदिक काल में राजस्थान सरस्वती के किनारे बसा हरा-भरा क्षेत्र था। यमुना, सतलुज और घग्गर इसकी प्रमुख सहायक नदियां थीं।

अम्बितमे नदीतमे देवितमे सरस्वति।
अप्रशस्ताइव स्मसि प्रशस्तिमम्ब नस्कृधि॥ (ऋ .2. 41.16)
हे (अम्बितमे) अतीव पढ़ाने वाली (देवितमे) अतीव पण्डिता (नदीतमे) अतीव अप्रकट विद्या का उपदेश करने (सरस्वति) बहुविज्ञान रखने वाली (अम्ब) माता अध्यापिका जो (अप्रशस्ताइव) अप्रशस्तों के समान हम लोग (स्मसि) हैं, उन (नः) हम लोगों को (प्रशस्तिम्) प्रशंसा को प्राप्त (कृधि) करो।

सरस्वती को ऋ ग्वेद में ‘नदीतमा’ (नदियों में श्रेष्ठ), ‘अन्नवती’ (अन्न से समृद्ध) और ‘उदकवती’ (जल से परिपूर्ण) कहा गया है। इससे पता चलता है कि नदियां किस तरह आदिकाल से हमारी जीवनधारा रही हैं। श्रीमद् भागवत, स्कंद पुराण में भी सरस्वती का उल्लेख बड़ी श्रद्धा-भक्ति से किया गया है। स्कंद पुराण और महाभारत के अनुसार, सरस्वती नदी हिमालय से निकल कर कुरुक्षेत्र, विराट, पुष्कर, सिद्धपुर, प्रभास आदि क्षेत्रों से होती हुई गुजरात के कच्छ होते हुए अरब सागर में मिलती थी। के.एस. वल्दिया की पुस्तक ‘Saraswati, the river that disappeared’ और बीपी राधाकृष्ण व एसएस मेढ़ा की पुस्तक ‘वैदिक सरस्वती’ में भी लिखा है कि मानसरोवर से निकल कर सरस्वती नदी हिमालय से गुजरते हुए हरियाणा और राजस्थान होते हुए कच्छ पहुंचती थी। बाद के वर्षों में कालिदास ने भी अपनी कृति ‘मेघदूत’ में ब्रह्मावर्त के अंतर्गत सरस्वती का उल्लेख किया है।

अंग्रेजों-वामपंथियों का झूठ

औपनिवेशिक काल में ब्रिटिश इतिहासकारों ने वेदों, पुराणों, महाभारत, रामायण और अन्य ग्रंथों को ‘पौराणिक’ मान कर न केवल उनकी उपेक्षा की, बल्कि उसमें वर्णित सरस्वती की भी अनदेखी की। यही नहीं, जिस नदी के किनारे सभ्यता विकसित हुई आजादी के बाद रोमिला थापर और इरफान हबीब जैसे वामपंथी इतिहासकारों और कुछ पश्चिमी इतिहासकारों ने उस सरस्वती को ‘मिथक’ बताया। इसके पीछे उन्होंने तर्क दिया कि 20वीं सदी तक सरस्वती नदी के भौतिक अस्तित्व के स्पष्ट पुरातात्विक या भूवैज्ञानिक साक्ष्य सीमित थे। ऋ ग्वेद और पुराणों में वर्णित सरस्वती एक काल्पनिक या प्रतीकात्मक नदी हो सकती है, जो केवल धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखती थी। इसलिए हड़प्पा सभ्यता को ‘सिंधु सभ्यता’ कहना अधिक उपयुक्त है, न कि ‘सिंधु-सरस्वती सभ्यता’।

इस प्रकार, वामपंथी इतिहासकारों ने वैदिक साहित्य और हिंदू धार्मिक ग्रंथों को ऐतिहासिक स्रोत नहीं माना। उनकी पद्धति पश्चिमी वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित थी, जिसमें लिखित और भौतिक साक्ष्यों को प्राथमिकता दी जाती है। सरस्वती नदी को ‘मिथक’ कहना उनके इस दृष्टिकोण का हिस्सा था, क्योंकि इसे धार्मिक प्रतीकवाद से जोड़ा गया। वामपंथी इतिहासकारों ने आर्य आक्रमण सिद्धांत को समर्थन दिया, जिसमें वैदिक संस्कृति को मध्य एशिया से आए आर्यों की देन माना गया। इस सिद्धांत में सरस्वती नदी को एक मिथकीय या विदेशी नदी (जैसे अफगानिस्तान की हरहवती) से जोड़ा गया, न कि भारतीय उपमहाद्वीप की वास्तविक नदी से।

हाल के दशकों में, विशेष रूप से 1990 के दशक से इसरो, ओएनजीसी और अन्य संस्थानों ने उपग्रह चित्रों और भू-वैज्ञानिक शोध के माध्यम से सरस्वती नदी के पेलियोचैनल (प्राचीन नदी मार्ग) के साक्ष्य जुटाए। हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में घग्घर-हकरा नदी को सरस्वती का अवशेष माना गया। हड़प्पा सभ्यता की अधिकांश बस्तियां इसी घग्घर-हकरा नदी के किनारे मिलीं, जिसे कुछ विद्वान सरस्वती नदी मानते हैं। लेकिन वामपंथी इतिहासकारों ने इसे घग्घर-हकरा के साथ जोड़ने पर संदेह जताया। उनका कहना था कि यह नदी मौसमी थी और वैदिक वर्णनों जैसी विशाल नदी नहीं थी। अब राजस्थान के भरतपुर में भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण की खुदाई में 4500 साल पुराने नदी चैनल और महाभारत कालीन अवशेष मिले, जो सरस्वती के अस्तित्व की पुष्टि करते हैं।

सरस्वती महात्म्य

सिंधु नदी सभ्यता से प्राप्त मुहर में सरस्वती नदी को प्रतीकात्मक रूप में दर्शाया गया है

वाल्मीकि रामायण में भी सरस्वती का संदर्भ मिलता है। इसमें भरत के केकय से अयोध्या वापस आने का एक प्रसंग है, जिसमें उनके सरस्वती और गंगा नदी पार करने का उल्लेख है।
सरस्वतीं च गंगा च युग्मेन प्रतिपद्य च,
उत्तरान् वीरमत्स्यानां भारुण्डं प्राविशद्वनम्।
महाभारत के शल्यपर्व में 35वें से 54वें अध्याय तक सरस्वती के तटवर्ती सभी तीर्थों का विस्तार से उल्लेख किया गया है। बलराम ने इन तीर्थों की यात्रा की थी। उत्तर वैदिक काल और महाभारत काल में यह नदी काफी हद तक सूख चुकी थी, लेकिन बरसात के दिनों में इसमें पानी आ जाता था। महाभारत में इसे ‘विनाशना’ (लुप्त होने वाला स्थान) और ‘दृश्यादृश्य’ (दृश्य-अदृश्य) नदी कहा गया, जो इसके सूखने की प्रक्रिया को दर्शाता है।

भारतवर्ष की प्राचीन नदियों में से प्रमुख नदी सरस्वती ही थी। ब्रह्मा जी ने मानव सृष्टि का आरंभ इसी नदी तट पर किया था। उनकी पत्नी सरस्वती के नाम पर ही इस नदी का नाम पड़ा। ऋग्वेद की रचना भी इसी के तट पर हुई। इतिहासकार डॉ. हेमेन्द्र कुमार राजपूत के अनुसार, सरस्वती का तटीय प्रदेश उपजाऊ एवं हरा-भरा था। महाभारत में इसके विशाल तटवर्ती क्षेत्र में काम्यक वन, द्वैतवन एवं कारप वन थे। कारप वन सिरमौर की पहाड़ियों से अंबाला तक, काम्यक वन सरस्वती के पश्चिमी भाग के कुरुक्षेत्र से मध्य राजस्थान तक और द्वैतवन सरस्वती के पूर्वी तटीय क्षेत्र में मध्य राजस्थान से उत्तरी गुजरात तक फैला था।

इसके उत्तर में पुष्करारण्य और दक्षिण-पश्चिम में अर्बुदारण्य था। हरियाणा में इस नदी के दक्षिण प्रदेश में रोहितकारण्य था। कुरुक्षेत्र के उत्तर में पुण्यशीत वन था। महाभारत काल में इसका प्रवाह बीकानेर से दक्षिण-पूर्व होकर दक्षिण की ओर था। महाभारत इसके प्रवाह की स्थिति को स्वयं सिद्ध करता है। वनवास के समय पांडव गंगा नदी तट के प्रमाण कोटि वृक्ष (शुक्र ताल, मुजफ्फरनगर, उ.प्र.) से पश्चिम की ओर चले और यमुना पार करके काम्यक वन पहुंचे। इससे सिद्ध होता है कि तब कुरुक्षेत्र में सरस्वती प्रवाहमान थी।

पाठ्यपुस्तकों से दूर क्यों?

वामपंथी इतिहासकारों और शिक्षाविदों का प्रभाव राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) और अन्य शैक्षिक संस्थानों पर रहा है। उनका मानना है कि सरस्वती नदी को शामिल करना वैदिक सभ्यता और हिंदू धार्मिक भावनाओं को बढ़ावा दे सकता है, जिसे वे ‘पंथनिरपेक्ष’ शिक्षा के खिलाफ मानते हैं। एनसीईआरटी, जो भारतीय पाठ्यपुस्तकों का पाठ्यक्रम निर्धारित करता है, अब धीरे-धीरे पाठ्यक्रमों में बदलाव कर रहा। नई खोजों को शामिल करने में समय लगता है, क्योंकि यह प्रक्रिया विशेषज्ञ समीक्षा और सहमति पर निर्भर करती है। हालांकि हरियाणा सरकार ने 2021 में सरस्वती नदी को स्कूल पाठ्यक्रम में शामिल करने का निर्णय लिया, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर इसे लागू करने में देरी हुई। इसके पीछे शोध की कमी, शिक्षकों की जागरूकता और पाठ्यक्रम संशोधन की जटिल प्रक्रिया भी है।

हाल की खोजों, जैसे-राजस्थान में पेलियोचैनल की खोज ने सरस्वती नदी के ऐतिहासिक अस्तित्व को पुष्ट किया है। ये साक्ष्य बताते हैं कि सरस्वती वैदिक काल में हिमालय से अरब सागर तक बहती थी और हड़प्पा सभ्यता के विकास में महत्वपूर्ण थी। हरियाणा और राजस्थान में सरस्वती नदी को पुनर्जीवित करने के प्रयास चल रहे हैं, जैसे कुओं की खुदाई और जल संरक्षण परियोजनाएं। पाठ्यपुस्तकों में सरस्वती और इससे जुड़े इतिहास को इसे शामिल न करने के पीछे शैक्षिक जड़ता, वैचारिक विवाद और वैज्ञानिक सहमति की कमी है। भविष्य में और साक्ष्य सामने आते हैं, तो इसे पाठ्यक्रम में शामिल करने की संभावना बढ़ सकती है, जैसा कि हरियाणा सरकार ने शुरू किया है।

 

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