तमिलनाडु को मंदिरों की भूमि भी कहा जाता है, यहां चार लाख मंदिर हैं। यहां के मंदिर स्वयं में शताब्दियों का इतिहास समेटे हुए हैं। यहां सैकड़ों ऐसे मंदिर हैं जो प्राचीन काल से तमिल संस्कृति और समाज के बहुत महत्वपूर्ण केंद्र रहे हैं। छठी शताब्दी में तमिलनाडु की धरती पर ही भक्ति आंदोलन का जन्म हुआ था, जो बाद में भारत के अन्य हिस्सों में अपना प्रभाव बनाता गया। तमिल, जिसे दुनिया की सबसे प्राचीन भाषा माना जाता है, मंदिरों और आस्था से बड़ी गहराई से जुड़ी है।
द्रमुक का हिंदू विरोध

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन, नई दिल्ली के ट्रस्टी एवं सचिव तथा भाजपा-तमिलनाडु के उपाध्यक्ष
द्रमुक पार्टी का गठन ई. वी. रामासामी द्वारा स्थापित द्रविड़ कड़गम की एक शाखा के तौर पर हुआ था। रामासामी ने 1950 के दशक में भगवान गणेश की मूर्तियों को तोड़ा और भगवान राम के चित्रों को जलाया था। द्रमुक की करुणानिधि सरकार जब सत्ता में आई तो उसने मंदिरों के सामने ई. वी. रामासामी की मूर्तियों की स्थापना की, जिन पर नारे लिखे थे- ‘जो ईश्वर में विश्वास करते हैं वे मूर्ख हैं।’ इसका उद्देश्य था हिंदू भावनाओं को ठेस पहुंचाना। 2021 में एम. के. स्टालिन की सरकार सत्ता में आई और उन्होंने हिंदू विरोधी गतिविधियों को भरपूर बढ़ावा दिया। एक तरफ वे हिंदू धर्म और उसकी प्रथाओं की निंदा करते, वहीं अब्राह्मिक मजहब का महिमामंडन करते। स्टालिन ने एक कार्यक्रम में खुद हिंदू रीति-रिवाजों की खिल्ली उड़ाई थी।
2023 में ‘सनातन उन्मूलन सम्मेलन’ में भाषण देते समय उनके बेटे, उपमुख्यमंत्री उदयनिधि ने सनातन धर्म की तुलना ‘डेंगू’, ‘मलेरिया’ और ‘कोरोना’ से की और कहा कि ‘हमें केवल इसका विरोध ही नहीं करना, बल्कि हमें इसका उन्मूलन करना चाहिए’। द्रमुक के एक वरिष्ठ नेता और सांसद ए. राजा ने सनातन पर टिप्पणी की थी कि ‘हिंदू धर्म एचआईवी और कुष्ठ रोग के समान है। यह समाज के लिए कलंक है।’ पार्टी की एक बैठक में उन्होंने कहा कि ‘सभी शूद्र वेश्याओं की संतान हैं और जब तक वे हिंदू धर्म का पालन करते रहेंगे, उनकी पहचान वही रहेगी।’ हाल ही में उन्होंने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं से कहा है कि वे तिलक जैसे हिंदू प्रतीकों का उपयोग न करें। इन नेताओं की तरह कई अन्य लोग भी हैं जो लगातार हमारे सनातन धर्म के विरुद्ध अपमानजनक बयान देते रहते हैं।
मंदिरों की बदहाल स्थिति
राज्य सरकार के हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती बोर्ड के अंतर्गत लगभग 45,000 मंदिर आते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से हिंदू मंदिरों की जबरदस्त उपेक्षा के कारण उनकी स्थिति बदहाल हो रही है। 1980 के दशक में सरकार के अधीन मंदिरों के हिस्से लगभग 5.25 लाख एकड़ भूमि थी। बाद में कहा गया कि मात्र 4.75 लाख एकड़ भूमि थी। इसके अलावा, यह भी बताया गया कि लगभग 1.25 लाख एकड़ भूमि का कोई स्वामित्व संबंधी दस्तावेज सरकार के पास उपलब्ध नहीं है। मंदिर उपासक संगम के टी. आर. रमेश का अनुमान है कि अगर आवश्यक कदम उठाए जाएं तो आज भी मंदिरों की सालाना आय लगभग 6,000 करोड़ रुपये पहुंच सकती है। वर्तमान में यह आय केवल 150 करोड़ रुपये है। सरकार न्यायालय के आदेशों की अवहेलना कर सार्वजनिक दान और शुल्क के माध्यम से एकत्रित मंदिर निधि का उपयोग प्रशासनिक उद्देश्यों के लिए कर रही है।
न्यायालय द्वारा अंतिम स्वीकृति न मिलने के बावजूद द्रमुक सरकार मयलापुर स्थित कपालेश्वर मंदिर के कोष का उपयोग करके स्टालिन के विधानसभा क्षेत्र कोलाथुर में एक कॉलेज का निर्माण कर रही है। जबकि उच्च न्यायालय ने सरकार पर रोक लगाई है कि वह मंदिरों के अतिरिक्त कोष का उपयोग जीर्ण-शीर्ण मंदिरों के रखरखाव और हिंदू धर्म के प्रचार के अलावा किसी और कार्य में नहीं कर सकती। फिर भी सरकार उस कोष को अपने अन्य हितों के लिए उपयोग करने से परहेज नहीं कर रही। हाल ही में उन्होंने कॉलेज और व्यावसायिक भवन बनाने के लिए मंदिर निधि के इस्तेमाल पर सरकार के खिलाफ न्यायालय का स्थगन आदेश प्राप्त किया है।

आस्था पर की जा रही चोट
भगवान मुरुगा प्राचीन काल से तमिल भाषा और संस्कृति के साथ गहराई से जुड़े हैं। तमिल लोगों के जीवन से भगवान मुरुगा का रिश्ता इतना गहरा है कि अधिकांश लोग उन्हें तमिल भगवान के रूप में पूजते हैं। भगवान मुरुगा के छह लोकप्रिय मंदिर हैं जो पवित्र पहाड़ियों पर स्थित हैं। हर साल राज्य भर से लाखों लोग अपने कंधों पर कांवड़ लेकर कई किलोमीटर पैदल तीर्थयात्रा पर जाते हैं। इसके अलावा, हर महीने हजारों भक्त इन मंदिरों के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इसलिए, राज्य में सक्रिय हिंदू विरोधी गुट तमिलों को भगवान मुरुगा से अलग करने की कोशिश कर रहे हैं।
छह पवित्र पहाड़ियों पर स्थित भगवान मुरुगा के मंदिरों का प्रबंधन सरकार ने अपनी मर्जी से नियुक्त विशेष अधिकारियों के हाथों में दे रखा है। रमेश कहते हैं कि यह प्रक्रिया छह दशकों से संविधान के प्रावधानों के विरुद्ध जारी है। 2020 के दौरान, ‘करुप्पार कूटम’ (काला समूह) नामक हिंदू विरोधी समूह के एक सदस्य ने हिंदू देवताओं की गरिमा के खिलाफ यू-ट्यूब वीडियो पोस्ट किए और तिरुचेंदूर के सुब्रमण्यम स्वामी की वंदना में गाए जाने वाली अत्यधिक लोकप्रिय स्तुति ‘कांडा षष्ठी कावसम’ पर अश्लील टिप्पणियां कीं।
अपमान के विरूद्ध सड़क पर उतरे सनातनी
हर साल लाखों तमिलवासी छह दिन का उपवास करते हैं और इस अवधि में वे बाला देवराय स्वामीगल द्वारा 19वीं शताब्दी में रचित ‘कांडा षष्ठी कावसम’ का पाठ करते हैं जिसमें 270 पंक्तियां हैं। इसका वीडियो बनाने के खिलाफ जनता क्रोधित होकर विरोध प्रदर्शन करने सड़क पर उतर आई। साक्ष्यों से पता चला कि अपराधी द्रमुक से जुड़ा था। सरकार पहले तो मौन रही, लेकिन जैसे ही उसे एहसास हुआ कि कहीं यह उसके लिए आफत न बन जाए, उसने अपना रुख बदलना शुरू किया।
द्रमुक सरकार को यह भय सताने लगा कि उसका हिंदू विरोधी रुख जनता को उसके विरुद्ध न कर दे। लिहाजा, सरकार ने पिछले साल छह धामों में से एक पलानी में दो दिवसीय ‘मुथामिझमुरुगन अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन’ का आयोजन किया। सरकार का यह पहला कदम था जो उसने विवशता में उठाया था। हालांकि, मुख्यमंत्री ने इस कार्यक्रम में सीधे शामिल न होकर लोगों को ऑनलाइन संबोधित किया था। जनता द्वारा इस कार्यक्रम में हुए व्यय का हिसाब मांगने के एक साल बीतने के बाद भी सरकार ने अब तक कोई ब्योरा नहीं दिया है। संभावना है कि सरकार ने मंदिर निधि का बेजा इस्तेमाल किया हो।
दिखाई एकजुटता
हाल ही में 22 जून को तमिलनाडु में हिंदुओं के अधिकारों के लिए लड़ने वाले रा.स्व. संघ से जुड़े संगठन हिंदू मुन्नानी (हिंदू फ्रंट) ने मदुरै में ‘मुरुगा भक्तार्गलिन आनमीगा मानाडु (मुरुगा भक्त सम्मेलन)’ का आयोजन किया। आयोजकों ने सम्मेलन से पांच दिन पहले भक्तों के लिए भगवान मुरुगा के छह अलग-अलग रूपों की उपासना के लिए आयोजन स्थल के पास विशेष व्यवस्था की थी। हिंदू मुन्नानी के राज्य अध्यक्ष कादेश्वर सुब्रमण्यम का कहना है कि सम्मेलन से पहले करीब चार लाख लोग दर्शन के लिए पहुंचे थे। उन्होंने बताया कि उस समय मदुरै आने वाले लोगों की कुल संख्या करीब छह लाख थी, जिसमें से केवल अस्सी प्रतिशत ही कार्यक्रम स्थल तक पहुंच पाए।
मुख्य अतिथि के रूप में आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री श्री पवन कल्याण ने तमिल में एक भावुक भाषण दिया जिसमें पंथनिरपेक्षता के नाम पर हिंदुओं के साथ हो रहे भेदभाव को उजागर किया गया। उन्होंने सभी तमिल लोगों से राज्य में हिंदू धर्म को बचाने के लिए एकजुट होने की अपील की। सम्मेलन अत्यधिक सफल रहा जिसमें पूरे राज्य से समाज के विभिन्न वर्गों से भारी संख्या में लोगों ने भाग लिया।
द्रमुक सरकार एड़ी-चोटी का जोर लगाकर इसे रोकना चाहती थी। लेकिन वह विफल रही। आयोजन के पक्ष में न्यायालय से सशर्त आदेश प्राप्त हुए, जिसके बाद सम्मेलन का भव्य शुभारंभ हुआ। हैरानी की बात है कि आयोजन स्थल के अंदर एक भी पुलिसकर्मी नियुक्त नहीं किया गया था। ऐसे में भारी भीड़ को संभालने का दायित्व स्वयंसेवकों ने खुद उठाया और उसे शानदार और सुव्यवस्थित तरीके से संपन्न किया। लगातार हो रही बूंदाबांदी के बावजूद कार्यक्रम बहुत सफल रहा। संघ परिवार के समर्पित स्वयंसेवकों के सहयोग से हिंदू मुन्नानी कार्यकर्ताओं की कड़ी मेहनत सार्थक हुई।

आज, प्रदेश के हिन्दुओं में एकजुट होकर अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने की इच्छाशक्ति दृढ़ हो रही है, जिनका द्रमुक और उसके सहयोगी दल की वर्षों से पोषित हिंदू विरोधी विचारधारा द्वारा दमन होता रहा है। राज्य ने पहले कभी इतनी बड़ी संख्या में लोगों को स्वेच्छा और उल्लास से ऐसे आयोजन में भाग लेते नहीं देखा था। यह तमिलनाडु के लिए एक ऐतिहासिक क्षण और निश्चित रूप से, स्वतंत्रता के बाद राज्य के इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ था।
यह सम्मेलन वर्तमान वातावरण में अत्यधिक प्रासंगिक है। यह सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर बहुत प्रभावशाली भूमिका निभाने वाला है। संभव है कि कल का राजनीतिक रंगमंच पहले से पैर जमाए छद्म निर्देशकों से हाथ छुड़ा अपनी मौलिक कहानियों की प्रस्तुति के साथ पूरे गौरव से जगमगा उठे।















