इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मथुरा के शाही ईदगाह को विवादित ढांचा घोषित करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। इस याचिका की सुनवाई पूरी होने के बाद हाईकोर्ट ने 23 मई को फैसला सुरक्षित रख लिया था। हिंदुओं का कहना है कि शाही ईदगाह के स्थान पर पहले मंदिर था। वहां मस्जिद होने का कोई सबूत नहीं है।अतिक्रमण कर लेने से उस ढाँचे को शाही ईदगाह नहीं माना जा सकता। मुस्लिम पक्ष की ओर से कहा गया कि हिन्दुओं की मांग गलत है। वहां पर 400 साल से शाही ईदगाह है। इस लिए उसे विवादित ढांचा की मांग करने वाली इस याचिका को ख़ारिज किया जाना चाहिए। उच्च न्यायालय ने इस याचिका को खारिज कर दिया है।
हिंदुओं की मांग है कि मथुरा में केशव देव मंदिर के साथ 13.37 एकड़ के परिसर से शाही ईदगाह मस्जिद को हटाया जाए। इसके साथ यह भी प्रार्थना की गई है कि मौजूदा ढांचे को गिराया जाए। उच्च न्यायालय के समक्ष, प्रबंध ट्रस्ट शाही मस्जिद ईदगाह (मथुरा) की समिति ने मुख्य रूप से तर्क दिया कि उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित मुकदमों पर उपासना स्थल अधिनियम 1991, परिसीमा अधिनियम 1963 और स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट के अन्तर्गत केस की सुनवाई प्रतिबंधित है।
मस्जिद समिति की ओर से कहा गया कि उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित अधिकांश मुकदमों में वादी भूमि के स्वामित्व का अधिकार मांग रहे हैं, जो 1968 में श्री कृष्ण जन्म स्थान सेवा संघ और शाही मस्जिद ईदगाह के प्रबंधन के बीच हुए समझौते का विषय था। जिसके तहत विवादित भूमि को विभाजित किया गया और दोनों समूहों को एक-दूसरे के क्षेत्रों (13.37 एकड़ के परिसर के भीतर) से दूर रहने को कहा गया। हालांकि, ये मुकदमे कानून (उपासना स्थल अधिनियम 1991, परिसीमा अधिनियम 1963 और विशिष्ट राहत अधिनियम 1963) के तहत पोषणीय नहीं हैं।

















