मद्रास हाई कोर्ट ने बहुत बड़ी बात कह दी है। हाई कोर्ट ने एक ईसाई के द्वारा घर को गिरिजाघर के तौर पर इस्तेमाल किए जाने के मामले में अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि है कि प्रशासन की अनुमति के बगैर निजी आवास को प्रार्थना स्थल में बदलना अवैध है। बिना अनमति के इस प्रकार के परिवर्तन कानूनों का उल्लंघन है।
दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, ये अहम फैसला मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस एन आनंद वेंकटेश ने सुनाया है। जस्टिस आनंद तिरुवरूर जिले के कोडावसाल तालुक के पादरी एल जोसेफ विल्सन की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें एल जोसेफ ने अदालत से अपने सील किए गए घर को फिर से चर्च के तौर पर शुरू करने की इजाजत देने की मांग की थी।
क्या है पूरा मामला
मामला कुछ यूं है कि 2007 में पादरी जोसेफ एक ट्रस्ट बनाता है, जिसका नाम होता है वर्ड ऑफ गॉड मिनिस्ट्रीस ट्रस्ट। 2023 में इसी ट्रस्ट के नाम पर एक पट्टा अलॉट होता है। 2 जनवरी 2023 को पादरी उस जमीन को खरीद लेता है और वहां पर अपना घर बनाता है। बाद में वह अपने घर में प्रार्थना सभाएं करने लगता है। जब प्रशासन को इसकी शिकायत की जाती है तो प्रशासन उसे सील कर देता है। इसी को लेकर एल जोसेफ हाई कोर्ट पहुंच जाते हैं। पादरी का कहना है कि उसने जिला कलेक्टर को पत्र लिखकर अपने घर को चर्च में बदलने की मांग की थी, लेकिन कलेक्टर ने इससे इंकार कर दिया था।
बहरहाल, अब जब ये मामला हाई कोर्ट पहुंचा तो कोर्ट ने पादरी को झटका देते हुए स्पष्ट कर दिया है कि अथॉरिटी की परमिशन के बिना वो घर को प्रार्थना स्थल में नहीं बदल सकते हैं।
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एक ही शर्त पर हटेगी सील
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में पादरी को बता दिया है कि कोर्ट प्रशासन को सील हटाने का आदेश भी देगा, जब पादरी संबंधित अथॉरिटी की इजाजत के बिना संपत्ति का इस्तेमाल प्रार्थना सभा के तौर पर नहीं करेगा। अगर वो इसे चर्च के तौर पर बदलना चाहता है तो उसे कलेक्टर की इजाजत लेनी होगी। बिना अनुमति के इस तरह के परिवर्तन न केवल कानून का उल्लंघन हैं, बल्कि आसपास के क्षेत्र में रहने वाले लोगों के लिए असुविधा का कारण भी बन सकते हैं।
उचित प्रक्रिया का पालन जरूरी
जस्टिस आनंद ने अपने आदेश में कहा, “किसी भी निजी संपत्ति को सार्वजनिक या धार्मिक उपयोग में लाने से पहले उचित प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है। यह सुनिश्चित करता है कि स्थानीय नियमों और पड़ोसियों के हितों का सम्मान हो।”

















