हाल ही में केरल में एक विवाद तब शुरू हुआ जब राज्यपाल राजेंद्र आर्लेकर ने राजभवन में भारत माता की तस्वीर पर पुष्पांजलि अर्पित की। राज्य सरकार ने इसे “असंवैधानिक” बताया, यह कहते हुए कि राजभवन में सिर्फ आधिकारिक राष्ट्रीय प्रतीकों का ही प्रदर्शन किया जा सकता है।
लेकिन यह दावा न केवल कानूनी रूप से गलत है, बल्कि सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से भी अनुचित है। चिंता की बात यह है कि कुछ वरिष्ठ अधिकारी, जैसे श्री पी.डी.टी. आचार्य, भी इस तर्क का समर्थन कर रहे हैं। जब कानूनी विशेषज्ञ राजनीति से प्रभावित होकर संविधान की गलत व्याख्या करते हैं, तो इससे नागरिकों में भ्रम फैलता है और हमारे राष्ट्रीय मूल्यों को नुकसान पहुंचता है।
यह पूरा विवाद उस राज्य से शुरू हुआ जो खुद को गर्व से “ईश्वर का अपना देश” कहता है। विडंबना यह है कि अब वहीं ‘भारत माता’ के आह्वान पर विवाद हो रहा है। जबकि भारत माता कोई नया या किसी एक दल से जुड़ा प्रतीक नहीं है। इसकी जड़ें आज़ादी के आंदोलन और भारत की आध्यात्मिक परंपरा में हैं। यह विचार बंकिम चंद्र चटर्जी के वंदेमातरम् और अवनींद्रनाथ टैगोर की 1905 की चित्रकला से जुड़ा है। भारत माता मातृभूमि का एक सांस्कृतिक और भावनात्मक रूप है।
इसे किसी खास धर्म या राजनीति से जोड़ना न केवल ऐतिहासिक रूप से गलत है, बल्कि बौद्धिक रूप से भी गैर-जिम्मेदाराना है। भारत माता जैसे सांस्कृतिक प्रतीकों पर न तो कोई संवैधानिक प्रतिबंध है और न ही कोई कानून इसका विरोध करता है। भारत का राज्य प्रतीक अधिनियम, 2005 केवल सरकारी प्रतीकों के दुरुपयोग को रोकता है, भारत माता जैसी प्रतीकात्मक छवियों पर नहीं। संविधान में निहित धर्मनिरपेक्षता का अर्थ यह नहीं कि राष्ट्रीय एकता या सांस्कृतिक समरसता के प्रतीकों को नकारा जाए। राज्य और उसके पदाधिकारियों का यह कर्तव्य है कि वे ऐसे प्रतीकों को बढ़ावा दें, न कि उन्हें विवादास्पद बनाएं।
क्या कहता है सुप्रीम कोर्ट का फैसला
एस.आर. बोम्मई बनाम भारत सरकार (1994) के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धर्मनिरपेक्षता का मतलब सिर्फ धर्म से दूरी बनाना नहीं है, बल्कि यह सभी धर्मों के प्रति समान आदर दिखाने की सकारात्मक सोच है। कोर्ट ने कहा कि भारत में धर्म और संस्कृति अलग नहीं हैं, और राज्य उन सांस्कृतिक परंपराओं को समर्थन दे सकता है जो राष्ट्रीय एकता को मजबूत करती हैं। इस्माइल फ़ारूक़ी बनाम भारत सरकार (1994) में भी कोर्ट ने कहा कि भारत में धर्मनिरपेक्षता का मतलब यह नहीं कि राज्य को धर्म-विरोधी होना चाहिए। सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देना धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह उसकी विशेषता है।
बिजोए इमैनुएल बनाम केरल राज्य (1986) में कोर्ट ने माना कि नागरिकों को अपने विवेक से देशभक्ति व्यक्त करने का अधिकार है। इसका मतलब यह है कि ‘भारत माता’ जैसे प्रतीकों को सम्मान देना कोई धार्मिक पक्षपात नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। इतिहास में भी धर्मनिरपेक्षता का विचार भारत की परंपरा का हिस्सा रहा है। जैसे मनुस्मृति में कहा गया है कि राजा को सबके साथ समान व्यवहार करना चाहिए, और नारद स्मृति के अनुसार राज्य को आस्तिकों और नास्तिकों सभी की सुरक्षा करनी चाहिए। संविधान के अनुच्छेद 163 के तहत राज्यपाल केवल कार्यकारी निर्णय लेने वाले मामलों में मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करने के लिए बाध्य है। औपचारिक कार्य और प्रतीकात्मक अभिव्यक्तियाँ, जैसे पुष्पांजलि, इस दायरे से बाहर हैं। ऐसे मामलों में भी राज्यपाल से वैचारिक अनुरूपता की मांग करना, कार्यालय और उसकी संवैधानिक स्वतंत्रता को बुनियादी रूप से गलत समझना है।
राज्यपाल के कार्यक्रम से मंत्रियों का बाहर जाना गंभीर मामला
राज्यपाल के कार्यक्रम से मंत्रियों का बहिर्गमन एक गंभीर मामला है। यह कोई नीतिगत असहमति नहीं, बल्कि भारत माता को श्रद्धांजलि देने जैसे सांस्कृतिक प्रतीक के विरोध में था। यह संविधान के अनुच्छेद 153 के तहत राज्यपाल को दिए गए सम्मान और मंत्रियों की शपथ के खिलाफ है, जिसमें वे बिना भय और पक्षपात के संविधान की रक्षा का वचन देते हैं। ऐसे कृत्य न केवल संवैधानिक मर्यादा को तोड़ते हैं, बल्कि नागरिकों का लोकतंत्र और राष्ट्रीय प्रतीकों में विश्वास भी डगमगाते हैं। दुर्भाग्य से, इस प्रकार की टकराव की घटनाएं पहले भी तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में देखने को मिली हैं। और भी चिंताजनक यह है कि देशभक्ति और प्रतीकों जैसे “भारत माता” को वैचारिक बहस में घसीटा जा रहा है। इससे छात्रों और युवाओं के मन में देश के प्रति गलत धारणाएं बनती हैं और राष्ट्रीय एकता कमजोर होती है।
राष्ट्रीय गीत है वंदेमातरम्
राज्यपाल का रुख न केवल संवैधानिक रूप से उचित था, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी सही है। 24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा ने वंदेमातरम् को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया था, जो भारत माता की भावना से जुड़ा है। यह विचार देश की आज़ादी से भी पहले से भारतीय चेतना का हिस्सा रहा है। देशभक्ति को राजनीतिक रंग देने के बजाय, हमें संविधान, संस्कृति और राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करना चाहिए।
राज्यपाल द्वारा भारत माता को श्रद्धांजलि देने पर सवाल उठाना सही दिशा में बहस नहीं है। असली प्रश्न यह है – क्या कोई संवैधानिक पदाधिकारी अपनी मातृभूमि को श्रद्धांजलि नहीं दे सकता? क्या हमारा संविधान भारतीय सभ्यता और संस्कृति के मूल्यों का सम्मान करता है, या वह बाहर से आयात किए गए विचारों के दबाव में काम करता है?
देश की आत्मा का प्रतीक हैं भारत माता
अब समय आ गया है कि हम उस पश्चिमी सोच को चुनौती दें जो हमारे राष्ट्रीय प्रतीकों और सांस्कृतिक भावनाओं को संकीर्णता का नाम देकर दबाना चाहती है। यही सोच पहले वंदेमातरम् को भी पूरी तरह स्वीकार करने से हिचकिचाई थी। क्या हमारी संस्कृति इतनी कमजोर है कि वह अपने ही प्रतीकों से डर जाए? भारत माता कोई धार्मिक प्रतीक नहीं हैं। वह इस देश की आत्मा का प्रतीक हैं, जो हर धर्म और समुदाय के लोगों के लिए समान रूप से पूजनीय है। उनके प्रति श्रद्धा हमारी एकता और अपनेपन की पहचान है।
साझा पहचान का प्रतीक
हमारा संविधान “हम भारत के लोग” से शुरू होता है- यह वाक्य हमारी साझा पहचान का प्रतीक है, जो किसी भी राजनीतिक विचारधारा से ऊपर है। राज्यपाल की यह सांस्कृतिक श्रद्धांजलि किसी पार्टी की तरफदारी नहीं बल्कि भारत की आत्मा के प्रति सम्मान है।हमें धर्मनिरपेक्षता को संस्कृति विरोध का हथियार बनाने से बचना चाहिए। सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का अधिकार हर नागरिक का है – और भारत माता उसकी सबसे सुंदर अभिव्यक्ति हैं।

















