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सोनिया का लेख और असली अनैतिकता

सोनिया गांधी के लेख के बहाने कांग्रेस ने फिर दिखाया वोटबैंक प्रेम, इजराइल विरोध और ईरान-फिलिस्तीन समर्थन के पीछे असली एजेंडा क्या है...?

Written byअनिल पांडेयअनिल पांडेय
Jun 28, 2025, 07:00 am IST
in भारत, विश्लेषण

अगर देश से सबसे बड़ा झूठ कुछ बोला गया है तो वह यह है कि फिलस्तीन, ईरान और इंडोनेशिया भारत के सबसे पुराने और विश्वसनीय सहयोगी हैं। दशकों से यह आख्यान रचा गया जो सच्चाई से कोसों दूर है। सोनिया गांधी ने हाल ही में एक अंग्रेजी अखबार में आलेख लिखकर एक बार इसे दोहराने की कोशिश की है। उन्होंने भारतीय विदेश नीति को कठघरे में खड़ा करते हुए कहा है कि गाजा में इजराइली कार्रवाई और ईरान पर हमले को लेकर भारत के रुख को लंबे समय से चली आ रही कूटनीतिक परंपराओं और नैतिक मूल्यों का समर्पण करार दिया है।

यह तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। भारत, गाजा में राहत सामग्री भेजने वाले सबसे पहले देशों में था। भारत सैद्धांतिक रूप से अब भी स्वंतत्र फिलिस्तीन और स्वतंत्र इजराइल का पक्षधर है। इस रुख में कोई बदलाव नहीं आया है। हालांकि कितने अरब देशों ने इजराइल के अस्तित्व को मान्यता दी है, इस पर आलेख में खामोशी है। गाजा की तबाही का जिक्र है लेकिन हमास के बर्बर हमले पर चुप्पी है। ईरान का जिक्र करते हुए उन्होंने बरसों से दोनों देशों के बीच अच्छे संबंधों का हवाला दिया है लेकिन आलेख में ट्विस्ट ये है कि सोनिया ने कबूल किया है कि 1965 और 1971 के युद्धों में ईरान का झुकाव पाकिस्तान की ओर था। यह असुविधाजनक तथ्यों पर लीपापोती की कोशिश है। उन्होंने सुविधाजनक तरीके से इस तथ्य की अनदेखी कर दी कि हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर के समय यह ईरान ही था जो मध्यस्थता के लिए सबसे ज्यादा उछलकूद कर रहा था।

जाहिर है कि इन आरोपों के जरिए राष्ट्रहित को तवज्जो देने के बजाय मुस्लिम वोटबैंक को साधने की कोशिश की गई है। कांग्रेस ने खुद को ईरान और गाजा समर्थक दिखाकर नैतिक मूल्यों की आड़ में राष्ट्रहित के बजाय वोटहित को साधने की कोशिश की है। कांग्रेस बांग्लादेश से लेकर बंगाल में हिंदुओं के खिलाफ अत्याचारों पर चुप्पी साधे रही है लेकिन प्रियंका गांधी संसद में फ्री फिलिस्तीन वाला बैग लिए खुद को फिलिस्तीन समर्थक दिखाने की कोशिश करती हैं। वह भी तब जब हालिया समय में हमास के कमांडर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में खुलेआम जिहाद भड़काते देखे गए हैं।

सोनिया का मानना है कि भारत को हर हाल में फिलस्तीन की स्वतंत्रता का समर्थन करना चाहिए। हालांकि फिलस्तीन हमेशा से कश्मीर को विवादित इलाका मानता रहा है। इस्लामिक देशों के संगठन आर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कंट्रीज (ओआईसी) में भी ईरान और फिलिस्तीन का रुख हमेशा पाकिस्तान की ओर झुका रहा है। लेकिन इसकी अनदेखी कर नैतिक मूल्यों के समर्पण के आरोप लगाने के पीछे जाहिर है कि वोटबैंक का दबाव है।

सोनिया गांधी भारत के ईरान का ‘अपेक्षानुसार’ समर्थन नहीं कर पाने से हताश हैं लेकिन अगर इतिहास में जाएं तो इन ऐतिहासिक संबंधों के नारे का खोखलापन स्पष्ट होता है। यह कांग्रेस के राज में हुआ और उसने देश को कभी नहीं बताया कि 1965 और 1971 के युद्धों में ईरान ने भारत के खिलाफ क्या-क्या किया था। ईरान ने 1965 में पाकिस्तान को पांच हजार टन पेट्रोल देने के अलावा दवाइयां व मेडिकल उपकरण मुहैया कराए और घायलों की देखभाल के लिए नर्सें भी भेजी। युद्ध के बाद अमेरिका ने पाकिस्तान को हथियारों की आपूर्ति पर पाबंदी लगा दी। बताते हैं कि ईरान ने इससे मुकाबले के लिए पश्चिमी जर्मनी से खरीदे गए 90 सैबरजेट विमान औने-पौने दामों पर पाकिस्तान को सुपुर्द कर दिए। 1971 के युद्ध के समय भी यही कहानी दोहराई गई जब ईरान ने राजनयिक मोर्चे पर पाकिस्तान के पक्ष में अभियान छेड़ने के अलावा फिर हथियारों और तेल से उसकी मदद की। ईरान के शाह ने एक पाकिस्तानी अखबार से कहा कि हम सौ प्रतिशत पाकिस्तान के साथ हैं।

शाह ने भारत को हमलावर करार देते हुए कहा कि वह पाकिस्तान के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप कर रहा है। शाह ने ईरानी वायुसैनिक अड्डों पर पाकिस्तानी विमानों के उतरने और वहां मुफ्त में तेल भरवाने की भी छूट दे दी। ईरान ने कराची पर हमले की स्थिति में पाकिस्तान को हवाई सुरक्षा भी मुहैया कराने का आश्वासन दिया पर बाद में सोवियत संघ की जवाबी कार्रवाई की धमकी के बाद इससे मुकर गया। यहां तक कि बांग्लादेश के उदय के बाद भी ईरान हमें धमकी देने से बाज नहीं आया और कहा कि पश्चिमी पाकिस्तान पर कोई भी हमला ईरान पर हमला माना जाएगा। कहते हैं कि यहां तक कि कारगिल युद्ध के दौरान भी परमाणु मिसाइलों से लैस पाकिस्तान के एफ-16 विमान अपने ईरान के वायुसेना अड्डों पर तैनात थे ताकि युद्ध अगर विकराल रूप ले ले तो इनसे भारत पर एटमी हमला किया जा सके।

सिर्फ युद्धों के दौरान ही नहीं, ईरान कश्मीर मुद्दे पर भी भारत को घेरने का कोई मौका नहीं चूकता। साल दर साल आर्गेनाइजेशन आफ इस्लामिक कंट्रीज की बैठकों में ईरान कश्मीर पर ‘भारतीय कब्जे’ के खिलाफ प्रस्ताव पेश करता रहा है और फिलिस्तीन उसका समर्थन करता रहा है। हालांकि कहना होगा कि यासिर अराफात ने हमेशा यही कहा कि कश्मीर और फिलिस्तीन मुद्दे की कोई तुलना नहीं की जा सकती। पर ईरान अपने रुख पर कायम है। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खोमैनी ने 19 नवंबर, 2010 को कश्मीर व गाजा को आजाद कराने की मांग करते हुए दुनियाभर के मुसलमानों से भारत व इजराइल के खिलाफ एकजुट हो जाने का आह्वान किया। उन्होंने पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की ओर संकेत करते हुए कहा कि अब हमारे पास भी इन्हें जवाब देने की ताकत है। अयातुल्ला का कश्मीर और उम्मा से प्रेम अक्सर उमड़ता रहा है।

अब इसकी तुलना उस इजराइल से कर लें जिसे खलनायक बताया जा रहा है। करगिल युद्ध के दौरान जब ऊंची पहाड़ियों पर बंकरों में घुसे बैठे पाकिस्तानियों के ठिकानों की टोह ले पाना नामुमकिन सा था। इसके लिए भेजे गए भारतीय युद्धक विमान पाकिस्तानी हमलों की जद में थे और एकाध विमान तो उनके हमले में बाल-बाल बचे। ऐसे में भारत को मजबूरन इजराइल की ओर देखना पड़ा। इजराइल ने सिर्फ 24 घंटे में भारत को हेरोन और सर्चर जैसे पायलट रहित ड्रोन (यूएवी) मुहैया करा दिए। इसके अलावा लेजर गाइडेड मिसाइलें भी मुहैया कराईं। पाकिस्तान ने इसकी कल्पना भी नहीं की थी। बेहद ऊपर और लगातार 24 घंटे उड़ान भर सकने वाले इन यूएवी से भेजी गई तस्वीरों से भारत को प्रतिक्षण पाकिस्तानी ठिकानों की जानकारी मिलने लगी और रातोंरात युद्ध का नक्शा बदल गया। इजराइल ने 1962 और 1965 के युद्धों में तो भारत की मदद की ही, 1971 में इसने इंदिरा गांधी के कहने पर किसी अन्य देश को भेजी रही हथियारों की खेप को रास्ते में ही भारत की तरफ रवाना कर दिया।

इजराइल आज भी रक्षा, कृषि व अन्य तमाम क्षेत्रों भारत का सबसे बड़ा मददगार है। शायद ही कोई देश तकनीकी हस्तांकरण के मामले में भारत के साथ इजराइल जैसी उदारता बरते। आसानी से समझा जा सकता है कि भारत का मददगार कौन और विरोधी कौन है। आड़े वक्त पर हमेशा आगे आने वाले इजराइल का इतना विरोध क्यों है? साफ है कि इसकी जड़ें सियासी हैं। कांग्रेस इस विदेश नीति की आड़ में अल्पसंख्यक वोट बैंक को साधना चाहती है। तथ्य ये है कि अल्पसंख्यक वोटों के लिए कांग्रेस ने एक तरह से भारतीय विदेश नीति को इस्लामिक देशों के आगे बंधक रख दिया। लेकिन सत्ता प्रतिष्ठान के कथित बुद्धिजीवियों ने वोट पर नजर वाली इस विदेश नीति को साम्राज्यवाद विरोधी और तीसरी दुनिया के साथ एकजुटता की रोमानी चाशनी में लपेट कर पेश किया।

आज भारत की विदेश नीति फिलहाल किसी के अनुमोदन या वाहवाही की मोहताज नहीं है। यह विदेश नीति शुद्ध रणनीतिक हितों के हिसाब से चलती है न कि गुटनिरपेक्षता या तीसरी दुनिया की एकता के नारों से। भारत अब इजराइल के खिलाफ सिर्फ इसलिए नहीं खड़ा होगा कि ऐसा नहीं करने से एक वर्ग विशेष नाराज हो जाएगा। यह बंधक विदेश नीति से मुक्ति है। लेकिन हमास और ईरान के भारत विरोध की तरफ से आंख बंद कर हमेशा संकट के समय भारत के साथ खड़े रहने वाले इजराइल पर लगातार हमलों से स्पष्ट है कि कांग्रेस ‘राष्ट्रहित’ के बजाय ‘वोटबैंक की राजनीति’ को तरजीह देगी, भले ही इससे हमारे अपने मित्र देशों के साथ संबंध खराब हों। असली अनैतिकता यहां है।

(स्वतंत्र लेखन- आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। लेखक, मीडिया रणनीतिकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)

Topics: israel-india relationsइजराइल भारत का दोस्तसोनिया गांधी विदेश नीतिईरान बनाम इज़राइलफिलिस्तीन भारत संबंधकांग्रेस वोटबैंकहमास समर्थन कांग्रेसकश्मीर पर ईरानShashi Tharoor Hamasभारत फिलिस्तीन समर्थनभारत की विदेश नीतिअल्पसंख्यक तुष्टिकरणCongress Muslim appeasementFree Palestine Politics
अनिल पांडेय
अनिल पांडेय
मीडिया रणनीतिकार और राजनीतिक विश्लेषक [Read more]
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