तथ्यों के आईने में आपातकाल : जिद की हकीकत
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तथ्यों के आईने में आपातकाल : जिद की हकीकत

1975 के आपातकाल के पीछे के रहस्य, इंदिरा गांधी की तानाशाही, संविधान संशोधन, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, प्रिवी पर्स समाप्ति और न्यायपालिका पर हमले की पूरी कहानी। पिता से सीखा संविधान का तिरस्कार करना।

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Jun 24, 2025, 05:00 pm IST
inविश्लेषण
Emergency Indira Gandhi a darkest history of india

प्रतीकात्मक तस्वीर

आपातकाल। एक ऐसा दौर, जब शासन का कोप कहर बनकर जनमानस पर टूटा। रोंगटे खड़े कर देने वाली यातनाओं के बारे में सोचकर आज भी सिहरन होती है। 21 महीने के उस कालखंड में निरंकुश शासन ने प्रत्यक्ष रूप से जो किया, उसे न तो भूला जा सकता है और न ही भूलना चाहिए। लेकिन उस दौर के परदे के पीछे के कुछ रहस्य भी हैं, जिनके बारे में कम ही लोग जानते होंगे।

क्या आप न्यायमूर्ति ए.एन. रे, न्यायमूर्ति बेग के बारे में जानते हैं?

अडनीर ट्रस्ट मामला क्या था, क्या इसके बारे में जानते हैं?

14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण कैसे किया गया?

देशी राजाओं के प्रिवी पर्स कैसे खत्म किए गए?

अगर आपको यह सब नहीं मालूम है, तो आपको शायद यह भी नहीं मालूम कि आपकी स्वतंत्रता कितनी कीमती है? उस पर किन लोगों की निगाह है? किन लोगों ने उस पर कुठाराघात किया और इसे बचाने की लड़ाई किसने लड़ी?

पारिवारिक राजनीति का दंभ

पहले आपातकाल की बात। आपातकाल भले ही 25 जून, 1975 को लगाया गया था, लेकिन इसकी तैयारी पहले से थी। इसके पीछे कारण था पारिवारिक राजनीति, जो दंभ पैदा करती है, क्योंकि इंदिरा गांधी ने अपने पिता जवाहरलाल नेहरू को शासन करते हुए देखा था और उन्हें लगता था कि शासन ऐसे ही किया जाता है। वह दंभ, प्रतिबद्ध तंत्र और तानाशाही की प्रवृत्ति — इन तीनों ने आपातकाल की नींव रखी थी।

इंदिरा गांधी 1971 में 352 सीटें जीतकर सत्ता में लौटी थीं। लेकिन उनके मन में सर्वोच्च न्यायालय को ‘ठिकाने’ लगाने का प्रबल संकल्प हिलोरें ले रहा था, क्योंकि वह उनकी तानाशाही में लगातार अवरोधक बना हुआ था। 11 जनवरी, 1966 को लाल बहादुर शास्त्री के निधन के एक सप्ताह बाद वह प्रधानमंत्री बनीं। 1967 में गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय आया, जिसमें कहा गया कि संसद कोई भी मौलिक अधिकार छीन या उसमें कटौती नहीं कर सकती है। नीति निर्देशक सिद्धांतों के कार्यान्वयन के लिए मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं किया जा सकता है। दरअसल, पंजाब के जालंधर में हेनरी और विलियम गोलकनाथ परिवार के पास 500 एकड़ से अधिक कृषि भूमि थी, जिसे ‘अतिरिक्त’ बताते हुए पंजाब सुरक्षा और भूमि काश्तकारी अधिनियम–1953 के तहत सरकार ने छीन ली थी।

24वां और 25वां संविधान संशोधन

इंदिरा गांधी को सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय खटक रहा था। इसलिए जब दूसरी बार वह सत्ता में आईं, तो उन्होंने 24वां और 25वां संविधान संशोधन कर उस पर प्रतिक्रिया दी। 24वें संविधान संशोधन में उन्होंने यह व्यवस्था की कि संसद के पास संविधान संशोधन अधिनियमों को लागू कर किसी भी मौलिक अधिकार को कम करने या छीनने की शक्ति है। इसी तरह, 25वें संशोधन में उन्होंने संविधान में एक नया अनुच्छेद 31-सी जोड़ा, जिससे लोगों के लिए संपत्ति की खरीद को नियंत्रित करने वाले कानूनों को चुनौती देना असंभव हो गया। साथ ही, ‘मुआवजा’ शब्द की ‘पर्याप्त मुआवजा’ के रूप में न्यायिक व्याख्या को देखते हुए उसे ‘रकम’ कर दिया।

मनमाने ढंग से निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण 

इससे पहले, इंदिरा सरकार ने 19 जुलाई, 1969 को ‘बैंकिंग कंपनीज़ ऑर्डिनेंस’ नाम से एक अध्यादेश जारी कर देश के 14 बड़े निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था। इस अध्यादेश का प्रारूप 24 घंटे में तैयार किया गया था। उस समय बैंकिंग डिवीजन का प्रभार डी.एन. घोष के पास था। 17 जुलाई को उनके पास एक फोन आया और उनसे रातों रात अध्यादेश का प्रारूप तैयार करने को कहा गया। दो दिन बाद, यानी 19 जुलाई को रात 8:30 बजे इंदिरा गांधी ने आकाशवाणी पर बैंकों के राष्ट्रीयकरण की घोषणा की थी। बाद में इसी नाम से विधेयक पारित कर कानून बनाया गया।

इसी तरह, 1971 में इंदिरा गांधी ने देशी राजाओं को मिलने वाले भत्ते ‘प्रिवी पर्स’ को खत्म कर दिया था। प्रिवी पर्स भारत की पूर्ववर्ती रियासतों के शासक परिवारों को दिया जाने वाला एक भुगतान था, जो भारत की स्वतंत्रता के बाद 1947 में पहली बार भारत के साथ एकीकृत होने और बाद में 1949 में अपने राज्यों के भारत में विलय के उनके समझौतों के हिस्से के तौर पर दिया जाता था। ये तीन ऐसे मुद्दे थे, जहां सरकार की राय और सर्वोच्च न्यायालय की राय आपस में नहीं मिलती थी। सर्वोच्च न्यायालय ने उक्त तीनों मामले में सरकार के कदम को असंवैधानिक बताकर खारिज कर दिया, जिससे इंदिरा गांधी बुरी तरह कुपित थीं। इसलिए बहुमत का दुरुपयोग करते हुए उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के तीनों फैसलों को पलट दिया और सार्वजनिक तौर पर प्रतिबद्ध न्यायपालिका और नौकरशाही को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता घोषित किया।

केशवानंद भारती मामले में CJI को ही बदल दिया

इसी तरह, केशवानंद भारती मामले में 68 दिन की बहस के बाद 24 अप्रैल, 1973 को सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय भारत के लोकतंत्र का आधार स्तंभ तो बना ही, इसने इंदिरा गांधी द्वारा न्यायपालिका को डराने, उसे नियंत्रित करने और कब्जाने की मंशा को भी उजागर किया। यह मामला इडनीर मठ की जमीन के अधिग्रहण से जुड़ा था। बाबा केशवानंद भारती केरल के कासरगोड स्थित इडनीर मठ के प्रमुख थे। केरल सरकार ने मठ की 400 एकड़ में से 300 एकड़ जमीन अधिग्रहित कर पट्टेदारों को खेती के लिए दे दी थी, जिसे केशवानंद ने चुनौती दी थी। इस प्रकार यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचा था। इंदिरा गांधी ने पूरा जोर लगाया, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली।

देश के न्यायिक इतिहास में पहली बार 13 जजों की पीठ ने 7–6 के बहुमत से निर्णय दिया। इसमें संविधान के आधारभूत सिद्धांत को प्रतिपादित किया, जो मानता है कि संविधान की कुछ मौलिक विशेषताएं जैसे – लोकतंत्र, पंथनिरपेक्षता, संघवाद और कानून का शासन — संसद द्वारा संशोधित नहीं किया जा सकता है। न्यायालय ने यह भी माना कि न्यायिक समीक्षा की शक्ति संविधान के मूल ढांचे का एक अभिन्न अंग है और इसे संसद द्वारा संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से नहीं छीना जा सकता है। इसी के साथ न्यायालय ने संविधान की सर्वोच्चता, कानून का शासन, न्यायालय की अक्षुण्ण स्वतंत्रता, संसदीय व्यवस्था, निष्पक्ष चुनाव, गणतांत्रिक ढांचा, संप्रभुता और आधारभूत ढांचे को परिभाषित किया और इनमें किसी भी प्रकार के संशोधन पर रोक लगा दी।

यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि 13 जजों की पीठ में 7 जज फैसले के पक्ष में थे। इनमें मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस.एम. सीकरी, न्यायमूर्ति के.एस. हेगड़े, न्यायमूर्ति ए.के. मुखर्जी, न्यायमूर्ति जे.एम. शेलाट, न्यायमूर्ति एन. ग्रोवर, न्यायमूर्ति पी. जगनमोहन रेड्डी और न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना शामिल थे। वहीं, 6 जज फैसले से सहमत नहीं थे। इनमें न्यायमूर्ति ए.एन. रे, न्यायमूर्ति डी.जी. पालेकर, न्यायमूर्ति के.के. मैथ्यू, न्यायमूर्ति एच.एम. बेग, न्यायमूर्ति एस.एन. द्विवेदी और न्यायमूर्ति वाई.के. चंद्रचूड़।

इस फैसले से नाराज इंदिरा सरकार ने क्या किया? अगले ही दिन, यानी 25 अप्रैल को प्रधानमंत्री कार्यालय से न्यायमूर्ति ए.एन. रे को फोन किया गया। उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें नए सीजेआई का पद स्वीकार है? उन्हें सोचने का समय भी नहीं दिया गया। उनसे 2 घंटे में जवाब देने को कहा गया और अगले ही दिन, यानी 26 अप्रैल, 1973 को उन्हें भारत का मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया। सरकार ने तीन वरिष्ठ जजों — न्यायमूर्ति शेलाट, न्यायमूर्ति ग्रोवर और न्यायमूर्ति हेगड़े — को दरकिनार कर यह फैसला किया। ये तीनों उन 7 जजों में शामिल थे, जिन्होंने कहा था कि सरकार संविधान से ऊपर नहीं है। मतलब साफ है कि न्यायमूर्ति रे को सरकार के पक्ष में खड़े होने का इनाम मिला। शपथ ग्रहण के दो दिन बाद न्यायमूर्ति रे ने नए सिरे से 13 जजों की पीठ गठित कर ‘मास्टर ऑफ रोस्टर’ का दुरुपयोग किया।

जस्टिस रे को रातों रात बना दिया था सुप्रीम कोर्ट का चीफ जस्टिस

जब कोई न्यायपालिका में हस्तक्षेप आदि की बात करता है, तो यह नहीं देखता कि न्यायमूर्ति रे ने भारत के नए मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्यभार संभालते ही अचानक केशवानंद भारती मामले की समीक्षा के लिए 13 न्यायाधीशों की पीठ कैसे पुनर्गठित कर दी थी। यही नहीं, मामले की समीक्षा भी शुरू हो गई, जबकि किसी ने न तो समीक्षा और न ही पुनर्विचार याचिका दाखिल की थी। एक जज ने जिज्ञासावश पूछा भी कि यह मामला सूचीबद्ध क्यों है? समीक्षा किसने दायर की? तब नानी पालकीवाला, जो उस मामले का नेतृत्व कर रहे थे, ने कहा, ‘मैं याचिकाकर्ता हूं।’ उनका सवाल था कि आप किसके कहने पर इस समीक्षा याचिका पर विचार कर रहे हैं? आपने 13 जजों की बेंच क्यों गठित की है?

बहरहाल, इंदिरा गांधी की मनमानी जारी रही। 1975 में उन्होंने 39वां और 41वां संशोधन किया। इसमें यह व्यवस्था की गई कि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव को अदालत में किसी भी आधार पर न तो चुनौती दी जा सकती है और न ही कोई मुकदमा ही दर्ज किया जा सकता है। केशवानंद मुकदमे के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय ने इन दोनों संशोधनों को खारिज कर दिया था। इसी तरह, 1975 में आपातकाल में मौलिक अधिकारों की बहाली से जुड़ा ए.डी.एम. जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा, तो पांच जजों की पीठ ने 4–1 के बहुमत से सरकार के पक्ष में निर्णय दिया। अकेले न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना ने सरकार के खिलाफ निर्णय दिया। इस कारण वह भी इंदिरा गांधी के निशाने पर आ गए। उन्हें इसकी सजा मिली। वह वरिष्ठतम थे, लेकिन सरकार ने उन्हें दरकिनार कर न्यायमूर्ति एम.एच. बेग को देश का मुख्य न्यायाधीश बना दिया, क्योंकि वह केशवानंद मामले में भी सरकार के साथ खड़े थे।

न्यायमूर्ति बेग 1978 तक मुख्य न्यायाधीश रहे। इसके बाद उन्हें अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष बनाया गया। वह 1981–88 तक आयोग के अध्यक्ष रहे। कार्यकाल पूरा होने के बाद कांग्रेस ने अपने मुखपत्र ‘नेशनल हेराल्ड’ का संचालक नियुक्त कर दिया। बहरुल इस्लाम की कहानी तो सभी जानते होंगे। उन्हें जब चाहा तब सांसद, जब चाहा तब उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय का जज बना दिया गया। न्यायमूर्ति जगनमोहन रेड्डी अपनी पुस्तक वी हैव रिपब्लिक में केशवानंद भारती मामले के बारे में विस्तार से लिखा है।

संविधान के तिरस्कार की शिक्षा इंदिरा गांधी को पिता से मिली

वास्तव में इंदिरा गांधी को संविधान के तिरस्कार की शिक्षा अपने पिता नेहरू से मिली थी, जिन्होंने कहा था, ‘‘यदि संविधान कांग्रेस की नीतियों के विपरीत जाता है, तो उसे बदलकर और अनुकूल बनाया जाना चाहिए।’’ यहां बाबासाहेब आंबेडकर की एक बात याद आती है। संविधान सभा में बहस के दौरान संविधान के प्रारूप पर आलोचनाओं का जवाब देते हुए उन्होंने कहा था, “मैं यह कहूंगा कि यदि नवीन संविधान के अंतर्गत कोई गड़बड़ी पैदा होती है, तो इसका कारण यह नहीं होगा कि हमारा संविधान खराब था, बल्कि यह कहना चाहिए कि सत्तारूढ़ व्यक्ति ही अधम था, नीच था।” उनकी आशंका आखिरकार 1975 में सच साबित हुई।

बहरहाल, इंदिरा गांधी को इस बात का भान था कि जिस तरह मोतीलाल नेहरू एवं गांधी जी के सहयोग से उनके पिता जवाहरलाल कांग्रेस और भारतीय जनता पर थोप दिए गए थे और नेहरू के एकाधिकार व उनके प्रति चाटुकारिता की परंपरा के चलते ही इंदिरा भी सरकार पर थोपी गई थीं। इसलिए उन्हें मालूम था कि इस अनैतिक परंपरा के बूते वह खुद भी संविधान पर अपनी मनमर्जी थोप सकती हैं — और उन्होंने ऐसा किया भी।

Topics: freedomकेशवानंद भारतीसंविधान संशोधनसर्वोच्च न्यायालयKesavananda BharatiSupreme Courtतानाशाहीइंदिरा गांधीConstitution Amendmentआपातकालन्यायमूर्ति ए.एन. रेIndira Gandhiन्यायमूर्ति बेगEmergencyJustice A.N. RayDemocracyJustice Begdictatorship
हितेश शंकर
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हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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