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माओवाद मुक्त भारत की ओर बढ़ते कदम

छत्तीसगढ़-तेलंगाना सीमा पर बसवराजू ढेर, माओवादी हिंसा पर निर्णायक प्रहार। भारत सरकार का 2026 तक माओवादी मुक्त देश का लक्ष्य

Panchjanyaसुनील बिश्नोईWritten byPanchjanyaandसुनील बिश्नोई
Jun 21, 2025, 09:19 pm IST
inविश्लेषण

21 मई 2025 को छत्तीसगढ़-तेलंगाना सीमा पर सुरक्षा बलों को बड़ी सफलता मिली, जब देश के सबसे वांछित माओवादी नेताओं में से एक मल्लोजुला वेंगुपाल उर्फ बसवराजू को एक मुठभेड़ में मार गिराया गया। बसवराजू माओवादी संगठन के पोलित ब्यूरो सदस्य और सैन्य गतिविधियों का प्रमुख रणनीतिकार था। इस घटना को माओवादी उग्रवाद के विरुद्ध निर्णायक मोड़ के रूप में देखा जा रहा है।

इस संदर्भ में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने यह स्पष्ट घोषणा की कि भारत सरकार का लक्ष्य है मार्च 2026 तक देश को माओवादी हिंसा से पूर्णतः मुक्त करना। यह वक्तव्य केवल एक संकल्प नहीं, बल्कि पिछले एक दशक से अपनाई गई बहुस्तरीय रणनीति का परिणाम है।
पिछले कुछ वर्षों में माओवादी हिंसा से प्रभावित जिलों की संख्या 96 से घटकर मात्र 6 रह गई है।

यह सरकार की व्यापक और समन्वित रणनीति का प्रतिफल है, जिसमें सुरक्षा सुदृढ़ीकरण, विकास की गति, आदिवासी समाज में विश्वास निर्माण, वैचारिक मोर्चे पर टक्कर, और आत्मसमर्पण व पुनर्वास जैसी मानवीय पहल शामिल हैं। सुरक्षात्मक दृष्टि से सरकार ने CRPF, ग्रेहाउंड्स और स्थानीय पुलिस बलों को आधुनिक हथियारों, ड्रोन, सैटेलाइट ट्रैकिंग और रीयल-टाइम इंटेलिजेंस से लैस किया है। कठिन इलाकों में फारवर्ड ऑपरेटिंग बेस की स्थापना और चौबीसों घंटे निगरानी से सुरक्षा बलों की ऑपरेशनल क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

दूसरी ओर, सरकार ने यह समझा कि माओवाद का समाधान केवल बंदूक से संभव नहीं, बल्कि विकास को हथियार बनाकर ही स्थायी समाधान लाया जा सकता है। बीते वर्षों में 11,000 किमी से अधिक सड़कों का निर्माण, 2,300 मोबाइल टावर की स्थापना, एकलव्य मॉडल स्कूलों की स्थापना, ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार और स्वच्छ जल व बिजली की सुविधा ने वनवासी क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ा है। इससे न केवल भौगोलिक दूरियाँ घटी हैं, बल्कि माओवादियों के वैचारिक प्रभाव में भी कमी आई है।

सरकार ने जनजातीय समुदाय के साथ संवाद को प्राथमिकता दी है। ‘गांव तक प्रशासन’ अभियान, जनसंवाद यात्राएँ, खेल-कूद प्रतियोगिताएँ और सांस्कृतिक आयोजन जैसे प्रयासों से शासन और समाज के बीच की खाई को पाटने का काम हुआ है। सामुदायिक पुलिसिंग और ‘जनजातीय मित्र’ जैसे कार्यक्रमों से स्थानीय सहभागिता बढ़ी है। आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति के तहत हजारों पूर्व माओवादियों को पुनः समाज में स्थापित किया गया है, जिन्हें आर्थिक सहायता, स्किल ट्रेनिंग और रोजगार के अवसर प्रदान किए गए हैं।

हालांकि, माओवादी हिंसा को पूरी तरह समाप्त करने के लिए केवल अब तक की उपलब्धियाँ पर्याप्त नहीं होंगी। 2026 तक माओवादी मुक्त भारत का लक्ष्य हासिल करने के लिए सरकार को एक पांच सूत्रीय भविष्य रणनीति को मजबूती से लागू करना होगा। पहला, वनवासियों के जल, जंगल और जमीन के पारंपरिक अधिकारों की रक्षा के लिए वन अधिकार अधिनियम और पेसा कानून को पूरी ईमानदारी से लागू करना होगा। दूसरा, शिक्षा और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर देकर युवाओं को माओवादी संगठनों के बहकावे से बचाना होगा। तीसरा, वैचारिक मोर्चे पर माओवाद के प्रचार-प्रसार का लोकतांत्रिक मूल्यों, संवैधानिक चेतना और जमीनी विकास के जरिए मुकाबला करना होगा।

चौथा, योजनाओं के पारदर्शी क्रियान्वयन के लिए जन निगरानी तंत्र और ग्राम सभा को सशक्त करना होगा ताकि भ्रष्टाचार और शोषण की गुंजाइश न रहे। और अंततः, न्यायसंगत और संवेदनशील प्रशासन को प्राथमिकता देकर आदिवासी समाज में विश्वास बहाल करना होगा। शासन प्रणाली में स्थानीय सहभागिता बढ़ाने से माओवाद के लिए सामाजिक आधार स्वतः ही समाप्त हो जाएगा।

निस्संदेह, भारत अब माओवादी उग्रवाद के विरुद्ध निर्णायक मोड़ पर है। बसवराजू जैसे शीर्ष नेता का खात्मा, हिंसाग्रस्त जिलों की संख्या में गिरावट और मार्च 2026 तक माओवादी मुक्त भारत का लक्ष्य – ये सब एक व्यापक रणनीतिक सफलता की ओर संकेत करते हैं। किंतु स्थायी समाधान तभी संभव होगा जब सुरक्षा, विकास, न्याय, और विश्वास – इन चार स्तंभों पर सरकार समान रूप से ध्यान दे।

अंततः, माओवादी हिंसा के समूल अंत के बिना समावेशी और न्यायपूर्ण विकास की परिकल्पना अधूरी रहेगी। ‘माओवादी मुक्त भारत’ न केवल एक आंतरिक सुरक्षा लक्ष्य है, बल्कि यह ‘विकसित भारत 2047’ की नींव भी है। जब देश का प्रत्येक कोना शांति, समृद्धि और अवसरों से परिपूर्ण होगा, तभी हम सच्चे अर्थों में समावेशी राष्ट्र निर्माण की दिशा में आगे बढ़ पाएंगे।

अतः आवश्यक है कि सरकार, प्रशासन और नागरिक समाज एकजुट होकर न केवल माओवाद को समाप्त करें, बल्कि उस वैकल्पिक व्यवस्था को भी मजबूत करें जो न्याय, समानता और संवेदनशील विकास पर आधारित हो। यही रास्ता हमें ‘विकसित भारत 2047’ की मंज़िल तक पहुँचाएगा — एक ऐसा भारत जहाँ हिंसा नहीं, बल्कि समरसता, प्रगति और जनहित की गूंज सुनाई दे।

(लेखक- शोधार्थी ,स्कूल ऑफ सोशल साइंस, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली)

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