भारतीय राजनेताओं में सामरिक और कूटनीतिक संस्कृति विकसित करने का समय
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भारतीय राजनेताओं में सामरिक और कूटनीतिक संस्कृति विकसित करने का समय

ऑपरेशन सिंदूर में भारत की शानदार सैन्य जीत के बावजूद, राजनीतिक बयानों से रणनीतिक और कूटनीतिक कमियों का पता चलता है।

Written byलेफ्टिनेंट जनरल एम के दास,पीवीएसएम, बार टू एसएम, वीएसएम ( सेवानिवृत)लेफ्टिनेंट जनरल एम के दास,पीवीएसएम, बार टू एसएम, वीएसएम ( सेवानिवृत)
Jun 1, 2025, 06:33 am IST
in रक्षा, विश्लेषण
Operation sindoor

ऑपरेशन सिंदूर

पाकिस्तान के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर की शानदार सफलता के बाद राजनीतिक बयानों की झड़ी लग गई है। उनके कुछ बयानों से पता चलता है कि उन्हें आधुनिक युद्धकला के बारे में कम जानकारी है। कुछ वक्तव्यों से पता चलता है कि कई राजनेताओं के पास आवश्यक राजनयिक कौशल जो स्वाभाविक रूप से एक निर्वाचित प्रतिनिधि के पास होना चाहिए, नहीं है। कुछ सवालों और टिप्पणियों का समय और उनका लहजा हमें राजनीतिक वर्ग में सीमित रणनीतिक संस्कृति के बारे में भी बताता है।

20 वीं सदी के विपरीत 21 वीं सदी में युद्ध ने नए आयाम हासिल कर लिए हैं और दुश्मन से लड़ने की पद्धति पहले की तुलना में अधिक जटिल हो गई है। आतंकवाद नए रूप में सामने आ रहा है। युद्ध के आयाम बदल गए हैं, जैसा कि हाल के दिनों में दिखा है। कूटनीति की भूमिका के साथ-साथ समकालीन संघर्षों में युद्ध की तकनीकी, संकर प्रकृति और धारणा प्रबंधन युद्ध को कला और विज्ञान दोनों बनाता है। व्यापक राष्ट्रीय शक्ति का तत्व भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि युद्ध वर्षों तक चलते हैं। इसलिए, जब ऑपरेशन सिंदूर में चार दिनों से भी कम समय में भारत द्वारा पाकिस्तान पर एक शानदार सैन्य जीत हासिल की गई, तो इस शानदार सफलता पर भी राजनीतिक वर्ग के कुछ तत्वों द्वारा सवाल उठाए जा रहे हैं।

यह भी समझना जरूरी है कि युद्ध बहुत हिंसक रूप ले सकते हैं जहां दुर्भाग्य से सैनिकों और नागरिकों की जान जाती है। युद्ध में हथियार और साजो-सामान का भी नुकसान होता है। यही कारण है कि युद्ध को राष्ट्रीय, राजनीतिक और सैन्य उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए अंतिम उपाय माना जाता है।

22 अप्रैल को पहलगाम में पाक प्रायोजित आतंकवादियों द्वारा 26 पर्यटकों की बर्बर हत्या के बाद, भारत के पास पाकिस्तान के अंदर बुनियादी आतंकी ढांचे पर हमला करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। इसलिए, भारतीय सशस्त्र सेनाओं ने नौ प्रमुख आतंकी ठिकानों को नष्ट करके सटीक हमले की क्षमता का प्रदर्शन किया। 7 मई को किए गए इस हमले में 100 से अधिक आतंकवादियों को मार गिराया गया जब पाकिस्तान ने संघर्ष को बढ़ाया, तो भारत ने 12 पाकिस्तानी हवाई क्षेत्रों, रडार साइटों और वायु रक्षा सुविधाओं को भी नष्ट कर दिया। इसमे भी पाकिस्तान के तकरीबन 50 सैनिक मारे गए।

जब पाकिस्तान ने संघर्ष को और बढ़ाया, तब भारत ने पाकिस्तान के ड्रोन और मिसाइल हमले को सफलतापूर्वक विफल कर दिया। यह संभव है कि भारतीय सैन्य सुविधाओं को कुछ नुकसान हुआ हो, लेकिन यह इतना कम था कि इसने हमारी युद्ध क्षमता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं डाला। इसके विपरीत, पाकिस्तान को 10 मई तक इतना भारी नुकसान हुआ कि उन्हें भारत के साथ युद्धविराम की गुहार लगानी पड़ी। ऐसा खुद पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ ने स्वीकार किया है।

इसे भी पढ़ें: ऑपरेशन ‘सिंदूर’ में एयरलॉस नहीं : CDS ने कहा- हमने रणनीति बदली और बिना नुकसान के 300KM अंदर तक हमला किया

भारतीय सशस्त्र सेनाओं ने पाकिस्तान पर हमारी सैन्य सफलता को साबित करने के लिए जितने आवश्यक थे, उतने सबूत पेश किए। इसलिए, ऑपरेशन सिंदूर में भारत के कितने राफेल लड़ाकू जेट खो गए, इसका विवरण मांगने वाले विपक्ष की आवाजें पूरी तरह से अवांछित हैं। सैन्य दृष्टिकोण से, ऑपरेशन सिंदूर शानदार योजना और असाधारण निष्पादन का एक उदाहरण है। ऑपरेशन का नाम सिंदूर रखना भी उपयुक्त था क्योंकि इस आतंकी कार्यवाही ने हमारी कई बहनों को विधवा बना दिया था। पर्यटकों की नृशंस चयनात्मक हत्या का बदला लेने के लिए ‘पूरे राष्ट्र’ के दृष्टिकोण को प्रदर्शित करने के लिए सबइसे से यह नाम बिल्कुल सही है।

एक और नवीनता दो महिला अधिकारियों, कर्नल सोफिया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका सिंह द्वारा सैन्य ब्रीफिंग करना था, ताकि प्रतीकात्मक रूप से भारत की नारी शक्ति का प्रदर्शन किया जा सके। अब कुछ राजनीतिक वर्ग यह नहीं समझ पा रहा है कि इन पेशेवर रूप से सक्षम महिला अधिकारियों को सैन्य अभियानों का विवरण देने के लिए चुना गया था। लेकिन कुछ राजनीतिक वर्ग ने मान लिया कि वे खुद वास्तविक रूप से ऑपरेशन लड़ रहे थे। यह राजनीतिक स्तर पर सैन्य कार्यवाही के बारे में कम जानकारी को इंगित करता है।

ऑपरेशन सिंदूर की विस्तृत ब्रीफिंग 11 मई और 12 मई को भारतीय सेना, भारतीय वायु सेना और भारतीय नौसेना के सैन्य संचालन महानिदेशक (DGMOs) द्वारा की गई थी। युद्ध के मैदान के बारे में इस तरह की पारदर्शिता और विस्तृत फोटो साक्ष्य भारतीय संदर्भ में दुर्लभ है। इसलिए, इस तरह की ब्रीफिंग प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में हमारी बेहतर सैन्य संस्कृति का प्रदर्शन है। साथ ही, चूंकि ऑपरेशन सिंदूर को केवल अस्थायी रूप से निलंबित किया गया है, इसलिए कुछ युद्ध विवरणों का खुलासा केवल तभी किया जा सकता है जब भारत सभी निर्धारित राष्ट्रीय और रणनीतिक उद्देश्यों को प्राप्त कर ले। इसलिए हम सब को संयम से काम लेना होगा।

राजनीतिक वर्ग को यह भी समझना होगा कि उनके कुछ बयानों में सशस्त्र बलों का मनोबल गिराने की क्षमता है। अब यह सवाल किया जा रहा है कि हमने 22 अप्रैल को पहलगाम में जघन्य चुनिंदा हत्याओं के लिए जिम्मेदार तीन आतंकवादियों को क्यों नहीं पकड़ा या मार क्यों नहीं दिया। इस तरह के बयान वास्तव में हजारों सैनिकों को निराश कर सकते हैं, जो जम्मू-कश्मीर में दिन-रात काम कर रहे हैं। अनावश्यक पूछताछ भारतीय सशस्त्र बलों के नेतृत्व को जोखिम लेने से रोक सकती है। हमें अपने प्रशिक्षण में सिखाया जाता है कि सोचा-समझा जोखिम लेना सैन्य योजना का हिस्सा है। इसी तरह, हर सैन्य हमले के लिए फोटोग्राफिक और वीडियो सबूत मांगने की संस्कृति भी अनावश्यक है।

राजनीतिक वर्ग में एक और बड़ी कमजोरी कूटनीति की कला में देखी गई है। संक्षेप में कूटनीति में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के साथ राष्ट्रीय उद्देश्यों और नीतिगत लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कुशल संचार किया जाता है। पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के बारे में भारत के दृष्टिकोण से अवगत कराने के लिए सात सर्वदलीय शिष्टमंडल विश्व की यात्रा कर रहे हैं। सांसदों के बीच उपलब्ध सर्वोत्तम प्रतिभा का उपयोग करने के लिए इन प्रतिनिधिमंडलों का सावधानीपूर्वक चयन किया गया है। यहां तक कि इस तरह के एक महत्वपूर्ण राजनयिक प्रयास की भी आलोचना हुई है। हमें फिर से राजनीतिक वर्ग की कूटनीति की बारीकियों को समझने की क्षमता को बढ़ाना होगा।

भारत का राजनीतिक वर्ग और राष्ट्र बड़े पैमाने पर भारतीय सशस्त्र सेनाओं को सर्वोच्च सम्मान में रखता है। शायद इसी वजह से सामरिक जानकारी कम होती है। इसका एक कारण यह है कि सैन्य संवाद को सरल भाषा में संप्रेषित नहीं किया जाता है। लेकिन भारत और नेतृत्व के लिए रणनीतिक और राजनयिक संस्कृति विकसित करना भी महत्वपूर्ण है। कूटनीति की बारीकियां भी अधिकांश निर्वाचित प्रतिनिधियों को नहीं सिखाई जाती हैं। क्या कहना है, कब कहना है और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि संघर्ष की घड़ी में क्या नहीं कहना है, अत्यंत आवश्यक है। भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम सुनिश्चित करने में राष्ट्रपति ट्रम्प की भूमिका पर सवाल करना इसका एक उदाहरण है। ऐसे लोगों को सूचित किया जाना चाहिए कि राष्ट्रपति ट्रम्प इजरायल और हमास के बीच और रूस और यूक्रेन के बीच संघर्ष विराम लागू करने में विफल रहे हैं।

मेरी राय में, सशस्त्र सेनाओं और पैरा मिलिटरी बलों, उनकी कार्य संस्कृति और लोकाचार के बारे में राजनीतिक वर्ग की संवेदनशीलता पूरे देश में फैलनी चाहिए। सशस्त्र बल राजनीतिक और निर्वाचित प्रतिनिधियों के साथ बातचीत कर सकते हैं और उन्हें युद्ध और शांतिकाल के संघर्षों पर आवश्यक जानकारी अपडेट कर सकते हैं। प्रमुख थिंक टैंकों और रक्षा विश्वविद्यालयों के माध्यम से सामरिक संस्कृति विकसित की जा सकती है। राजनीतिक वर्ग को सशक्त बनाने के लिए सशस्त्र बलों को खुद नए तरीके ढूँढने होंगे। ऑपरेशन सिंदूर पर टीवी और मीडिया चैनलों पर होने वाली बहसों को परिपक्वता का प्रदर्शन करना चाहिए और राजनीतिक लाभ उठाने वाला मंच नहीं बनना चाहिए।

भारत में समृद्ध सभ्यतागत रणनीतिक संस्कृति है, जो चाणक्य और अन्य प्राचीन सैन्य विचारकों की शिक्षाओं से विरासत में मिली है। भारतीयों की वर्तमान पीढ़ी, विशेष रूप से राजनीतिक वर्ग और निर्वाचित प्रतिनिधियों को यह दिखाना होगा कि वे युद्ध और संघर्ष की स्थितियों की बारीकियों को समझते हैं। यहां किसी भी कमजोरी या एक ढीली टिप्पणी का हमारे विरोधियों द्वारा फायदा उठाया जाएगा। हमारे विरोधियों के खिलाफ युद्ध जीतने के लिए रणनीतिक रूप से स्मार्ट और कूटनीतिक रूप से समझदार होने की आवश्यकता है। हमें काफी समय तक ऑपरेशन सिंदूर को जारी रखना है। इसलिए फिलहाल सभी राजनीतिक दलों को अनावश्यक बयानबाजी को विराम देना होगा। भविष्य में यह आशा की जाती है कि हमारा राजनीतिक वर्ग और हमारे निर्वाचित प्रतिनिधि राष्ट्रीय हित में कहीं बेहतर रणनीतिक ज्ञान का प्रदर्शन करेंगे और सर्वोत्तम राजनयिक संस्कृति का अनुसरण करेंगे। जय भारत!

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