पुस्तक समीक्षा: एक बोनसाई का आत्मभंजन
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होम कला-साहित्य पुस्तक समीक्षा

एक बोनसाई का आत्मभंजन

वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी की आत्मकथा है-’मैं बोनसाई अपने समय का।' किताब के कवर पर ही लिखा है-’ कथा आत्मभंजन की।' राजकमल प्रकाशन से 436 पेज का यह आत्मभंजन 2018 में पहली बार छपा

Written byविजय मनोहर तिवारीविजय मनोहर तिवारी
May 15, 2025, 12:38 pm IST
in पुस्तक समीक्षा, पुस्तकें, कला-साहित्य

रामशरण जोशी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। जब मैंने इंदौर में ‘नई दुनिया’ में पत्रकारिता शुरू की थी तब वे दिल्ली के ब्यूरो चीफ हुआ करते थे और साल में दो-तीन बार कभी राष्ट्रपति तो कभी प्रधानमंत्री के साथ विदेश यात्राओं पर जाने की सचित्र सूचना नई दुनिया में पहले पेज पर छपती। उस समय किसी पत्रकार का ऐसी हस्तियों के साथ विदेश कवरेज के लिए जाना नोबल पुरस्कार जैसी उपलब्धि हुआ करती थी। सिंगल कॉलम खबर में हाफ कॉलम फोटो के शीर्षक होते थे- ‘प्रधानमंत्री के साथ नई दुनिया के रामशरण जोशी भी यूरोप जाएंगे।’

मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के समय 1999 में रामशरण जोशी को माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय में कार्यपालन निदेशक नियुक्त किया गया था। करीब पचास पेज उन्होंने चार साल के इसी पड़ाव पर लिखे हैं। लेकिन इसके पहले की उनकी जीवन यात्रा नक्सल और वामपंथ के साथ काफी करीबी रिश्ते में रही है। बड़ी बेबाकी से उन्होंने नक्सल विचारधारा और वामपंथी संगठनों के साथ अपने प्रगाढ़ संबंधों, वैचारिक समर्पण और सक्रिय योगदान पर लिखा है। वे अर्जुनसिंह के विश्वासपात्र पत्रकार थे, जिन्होंने पत्रकारिता से विदाई के बाद उन्हें अनेक महत्वपूर्ण संस्थानों में ऊंचे पद दिए।

जोशी जी की योग्यता और अनुभव, परिश्रम और धैर्य, अध्ययन और शोध संदेह के परे है। यह किताब राजस्थान के एक दूरदराज गांव की बेहद निर्धन पृष्ठभूमि से निकले और कई तरह की नौकरियां करते हुए अपने बूते बने एक संघर्षशील पत्रकार का दिल खोलकर लिखा गया पठनीय रोजनामचा है। इस किताब के एक बड़े हिस्से में वे एक पत्रकार के रूप में सामने आए हैं, जो अपने संघर्ष के दिनों में नक्सल और वामपंथ के किचन में दाल-रोटी का इंतजाम करते हुए प्रगतिशीलता के पथ पर हर फिक्र को धुएं में उड़ाता रहा।

रा. स्व. संघ के स्वयंसेवक देवेंद्र शुक्ल के साथ रहते हुए उनका वैचारिक टकराव इन शब्दों में सामने आता है-वे मुझे भी आरएसएस का सक्रिय सदस्य बनाना चाहते थे। उनके दबाव में मैं जनसंघ का सदस्य बना भी था। लेकिन आज मार्क्सवाद ने मेरे लिए वैकल्पिक जीवन व्यवस्था के द्वार खोल दिए हैं। मेरी वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ संघ की विचारधारा का टकराव अपरिहार्य है।

जब उत्तरभारत में नक्सलवादियों का प्रभाव बढ़ा, तब इस पर्यावरण के पुरोधाओं के बीच सक्रिय रहे जोशी जबलपुर के एक फौजी परिवार की पृष्ठभूमि के अपने सहयोगी अनिल चक्रवर्ती का जिक्र करते हैं, जो दिल्ली में उनके साथ थे और एक दिन दिल्ली को हिला देने की तैयारी के साथ मिलते हैं। ‘जीवन में यह पहला अवसर है, जब मेरे हाथों में बम है। पूरा जिस्म थिरक उठता है, मस्तिष्क आंदोलित हो जाता है। हम लोग ऐसी जगह धमाका करना चाहते हैं जिसे सरकार ही नहीं लंपट व हिप्पीवादी पीढ़ी भी सुने।’ आज के अर्बन नक्सलों को याद करते हुए देखिए कि अपने समय में जोशीजी नक्सल और मार्क्सवाद के बीच झूलते हुए केवल वैचारिक योद्धा ही नहीं हैं, बल्कि दिल्ली के कनाटप्लेस में धूमधड़ाका करने के जोश से सराबोर हैं। वे 32 हजार नक्सलवादियों की रिहाई के लिए देश भर में जारी मुहिम में सक्रिय हैं।

1971 में स्वतंत्र पत्रकार के रूप में कार्य करते हुए वे डेढ़ सौ रुपए के मासिक वेतन पर एक पूर्णकालिक मार्क्सवादी राजनीतिक कार्यकर्ता बनने का निर्णय लेते हैं। तब वे स्वीकार करते हैं कि ‘मार्क्सवाद और क्रांति के प्रति मेरी मूलत: रोमांटिक दृष्टि है, अकादमिक समझ अधकचरी है। मार्क्सवाद, क्रांति, व्यवस्था परिवर्तन को लेकर यह रोमांस, ये जुनून मेरे जीवनानुभवों से जन्मे हैं, न कि पोथियों और संगोष्ठियों से। समाज एवं जीवन में मौजूद शोषण, उत्पीड़न, अन्याय, संघर्ष, गैर बराबरी और मुक्ति की छटपटाहट जैसी स्थितियां ही मार्क्सवाद की प्रारंभिक पाठशाला हैं। मैंने इसी पाठशाला से मार्क्सवाद की बारहखड़ी सीखी है।’

‘कभी-कभी लगता है वामपंथ अति बौद्धिकता और सैद्धांतिकता की गठरी बन गया है। इसके बोझ तले यह इतना दब जाता है कि वस्तुस्थिति से भी कट जाता है। अति बौद्धिकता एवं सैद्धांतिकता व्यक्ति को संवेदनशील मार्क्सवादी बनाने की बजाए संकीर्ण व व्यक्तिवादी बना देती है। वह अहं का अनायास शिकार हो जाता है।’ जोशी का अंतर्द्वंद्व आखिर में श्रम मंत्रालय के अधीन नेशनल लेबर इंस्टीट्यूट में एक हजार रुपए की पगार वाली रिसर्चर की नौकरी तक ले आता है। संसद मार्ग स्थित योजना भवन में वाम वैचारिक लहर पर सवार नौकरशाह आधे दिन में उनका नियुक्ति पत्र तैयार करा देते हैं। जोशीजी कहते हैं- ‘इन प्रतिबद्ध नौकरशाहों को ‘नक्सलपंथी’ कहना इनके प्रति अन्याय करना होगा। मेरी दृष्टि में ये मूलत: ‘रेडिकल मानवतावादी’ हैं।’

इस भूमिका में आकर वे दक्षिण और पश्चिम भारत के पिछड़े जिलों में खेत मजूदरों के बीच शिविर शृंखला लगाते रहे और दिनमान, नवभारत टाइम्स, हिंदुस्तान, धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी पत्र-पत्रिकाओं में लिखते भी रहे, मार्क्सवाद की स्टडी क्लास भी लेते रहे और लाल झंडा यूनियन से जुड़े होने के कारण गेट मीटिंग, धरना-प्रदर्शन-रैलियों के ‘परम पवित्र वामपंथी अनुष्ठानों’ में भी श्रद्धापूर्वक आहुतियां अर्पित करते रहे।

मोरारजी देसाई की जनता पार्टी सरकार के समय एक चर्चित सेक्स स्कैंडल सामने आया। इसमें एक नेता और पत्रकार की महत्वपूर्ण भूमिका थी, जिनके जरिए बाबू जगजीवन राम के बेटे सुरेश राम और उनकी प्रेमिका का अपहरण कर उन्हें मेरठ ले जाया गया, उनकी नग्न तस्वीरें ली गईं, जो बाद में मेनका गांधी की पत्रिका ‘सन’ और ‘सूर्य’ में छपीं और हंगामा मच गया। इस कारनामे में शामिल नेता और पत्रकार जोशीजी के परिचित थे। तीन पैग शराब के बाद पत्रकार महोदय द्वारा जोशीजी को सुनाए गए इस ‘वीरतापूर्ण’ कारनामे से कांग्रेसकाल की कुत्सित राजनीति का एक काला अध्याय उजागर होता है।

एक दिन इंदिरा गांधी और संजय गांधी चौधरी चरण सिंह को जाल में फांसकर मोरारजी देसाई सरकार में भगदड़ मचवा देते हैं। चौधरी साहब भी ज्यादा दिन प्रधानमंत्री नहीं रहते। सत्ता की उथलपुथल के इसी मौसम में रामशरण जोशी खेत मजदूरों के बीच अपनी रिसर्च समेटते नजर आते हैं। अज्ञेय ने उनका चयन नवभारत टाइम्स में कर लिया है, लेकिन वे भोपाल में राजेंद्र माथुर से मिलते हैं। नईदुनिया के दिल्ली ब्यूरो चीफ बनकर वे पत्रकारिता में लौट तो आते हैं मगर स्वीकार करते हैं कि एक्टीविज्म और रिसर्च का हैंगओवर बरकरार है।

आपातकाल के बाद पूरी ताकत से सत्ता में लौटीं इंदिरा गांधी के सम्मान में दिल्ली के एमपी भवन में एक समारोह होता है। नईदुनिया की चुनावी कवरेज को लेकर जोशीजी से युवा कमलनाथ भिड़ जाते हैं। वे लिखते हैं-‘यह विवाद मेरी नौकरी ले सकता था लेकिन मुझमें बैठा वामपंथी एक्टीविस्ट हार मानने के लिए तैयार नहीं था।’ इससे यह भी पता चलता है कि पत्रकारिता में वामपंथी विचार कैसे जड़ों तक फैला, फला, फूला और कांग्रेस के सेक्युलर पर्यावरण में प्रगतिशीलता की पैकेजिंग पाकर सब कुछ सहज स्वीकार था। आज कोई रा. स्व. संघ के प्रति जरा सी सहानुभूति रख ले तो वह बड़े आराम से सांप्रदायिक और दकियानूसी करार दिया जा सकता है।

2004 में राजेंद्र यादव के उकसावे पर हंस में ‘मेरे विश्वासघात’ की दो किस्तें छपीं तो रामशरण जोशी पहली बार अपनों के बीच प्रायोजित झंझटों से घिर गए। किताब में यह एपिसोड वामपंथियों के माइंडसेट और मास्टरमाइंडों का शानदार विश्लेषण करता है।

2015 में जोशी नौ माह के विदेश प्रवास से दिल्ली लौटने को हुए, तब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के नाते सत्ता में आए एक साल हो रहा था। उनके मित्रों ने सलाह दी थी कि ‘जोशी, दिल्ली लौटने के बजाए बेहतर होगा कि कनाडा या अमेरिका में राजनीतिक शरण की जुगाड़ कर लो। ओबामा साहब को पटाओ। वरना यहां तो तुम्हें तिहाड़ में सरकारी किराएदार बनना हाेगा। चोम्स्की का इंटरव्यू लेकर तुमने केसरिया सरकार की नाराजगी मोल ले ली है।’

उस बात को भी दस साल बीत गए। मोदीजी प्रधानमंत्री के रूप में तीसरी पारी पार कर रहे हैं। मैं दिल्ली जाकर किसी से पूछूंगा कि रामशरण जोशी तिहाड़ जेल की किस बैरक में बंद हैं और उनसे कैसे भेंट हो सकती है?

Topics: रामशरण जोशीरामशरण जोशी की पुस्तकपुस्तक समीक्षापाञ्चजन्य विशेषमोदीजी प्रधानमंत्रीमैं बोनसाई अपने समय कानई दुनियानक्सल विचारधारावामपंथी संगठननक्सलपंथीरेडिकल मानवतावादी
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