भारत की वैदिक मनीषा के अनुसार भारत के संस्कृति पुरुष मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु राम की आराध्या शक्ति सीता माता का बाह्य व्यक्तित्व जितना आकर्षक और चुंबकीय है; आंतरिक व्यक्तित्व उससे हजार गुणा निर्मल और पवित्र। माता सीता की जीवन यात्रा एक आदर्श नारी, पतिव्रता पत्नी, संस्कार संपन्न मातृत्व एवं अनूठे प्रेम व बलिदान की महागाथा है जिसमें आज की आधुनिक नारी के लिए दिव्य जीवन के अनमोल सूत्र समाये हुए हैं। यही वजह है कि भारत की आध्यात्मिक ज्ञान परम्परा के महामनीषी स्वामी विवेकानंद ने माता सीता को भारत की राष्ट्रीय देवी की पदवी से विभूषित किया था। स्वामी विवेकानन्द के इन शब्दों में सीता माता की महत्ता स्वत: प्रमाणित हो जाती है-‘’भारतीय पुरा साहित्य में दूसरा राम भले ही मिल जाए पर दूसरी सीता कभी नहीं मिल सकती।‘’
पश्चिमी दुनिया में माता सीता का गुणगान
माता सीता और प्रभु श्रीराम का गुणगान कर पश्चिमी दुनिया को भारत की युग प्राचीन सनातन संस्कृति के अनमोल जीवन मूल्यों से परिचित कराने वाले स्वामी विवेकानंद की माँ भुवनेश्वरी देवी ने ही राम कथा से उनका प्रथम परिचय कराया था। स्वामीजी के बाल्यकाल में उनकी माँ उनको रामायण की कहानियां सुनाती थीं। उन कहानियों में सीता माता का चरित्र स्वामी जी को बहुत गहराई से प्रेरित करता था। विवेकानंद साहित्य के अध्ययन से ज्ञात होता है कि बालक नरेंद्र का राम कथा के प्रति इतना गहरा लगाव था कि बचपन में वह अपने घर के आस पास होने वाले हर रामायण पाठ में बहुत ही आनंद से सहभागिता करते थे। यहाँ तक कि रामायण पाठ सुनने के लिए स्वामीजी अपने प्रिय खेल भी छोड़ देते थे और प्रभु राम की जीवन गाथा सुनते हुए वे दिन-रात का अंतर भी भूल जाते थे। गौरतलब हो कि अपने अमेरिका प्रवास के दौरान स्वामी जी ने 31 जनवरी 1900 को शेक्सपियर क्लब, पेसिडिना (कैलिफ़ोर्निया) में “रामायण” शीर्षक पर दिये गये व्याख्यान में कहा था कि “रामायण” भारत का महान आदिकाव्य है। राम और सीता भारतीय राष्ट्र के महानतम आदर्श हैं। भारत की नारियां, विशेष रूप से कुमारी कन्याएं सीता माता की पूजा करती हैं क्यूंकि माता सीता के चिंतन, संभाषण, आचरण, पतिव्रत धर्म, मातृत्व, सेवाभाव आदि सद्गुणों की प्रकाश किरणें भारत की सनातन संस्कृति को सदियों से अनुप्राणित करती आ रही हैं। भारतीय नारी की उच्चतम महत्त्वाकांक्षा यही होती है कि वह सीता के समान शुद्ध, पतिपरायणा और सर्वसहा बने। दुनिया के लगभग एक दर्जन देशों का प्रवास करने वाले स्वामी जी ने अपने विदेशी संभाषणों में माता सीता को ‘राष्ट्रीय देवी’ की संज्ञा देते हुए कहा था, ‘’तुम संसार के समस्त प्राचीन साहित्य को छान डालो, मैं तुमसे निःसंकोच कहता हूँ कि तुम सीता के समान दूसरा चरित्र नहीं निकाल सकोगे। सीता का चरित्र अद्वितीय है। भारतीय स्त्रियों को जैसा होना चाहिए, सीता उनके लिए आदर्श हैं। स्त्री चरित्र के जितने भारतीय आदर्श हैं, वे सब सीता के ही चरित्र से उत्पन्न हुए हैं। प्रत्येक हिन्दू नर-नारी के रक्त में सीता विराजमान हैं, हम सभी सीता की सन्तान हैं। महा महिमामयी सीता माता शुद्धता से भी शुद्ध तथा धैर्य तथा सहिष्णुता की सर्वोच्चतम आदर्श हैं।‘’
वैशाख शुक्ल नवमी को हुआ था अवतरण
‘वाल्मीकि रामायण’ के अनुसार श्रीराम के जन्म के सात वर्ष, एक माह बाद वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को इस धरा धाम पर माँ जानकी का अवतरण हुआ था। शास्त्रीय कथानक के अनुसार मिथिला को भीषण अकाल से बचाने के लिए वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि के दिन पुष्य नक्षत्र में जब महाराजा जनक जब यज्ञ भूमि को हल से जोत रहे थे, उसी समय भूमि से निकले मिट्टी के एक कलश में माता सीता शिशु उन्हें अवस्था में प्राप्त हुई थीं। चूंकि हल की नोंक को ‘सीत’ कहा जाता है, इसलिए राजा जनक ने उस बालिका का नाम ‘सीता’ रख दिया। चूँकि माँ सीता का प्राकट्य भारत की पवित्र मिट्टी से हुआ था, इसलिए वे ‘भूमिजा’ व ‘भूमिसुता’ भी कहलाती हैं। विदेहराज जनक की अतिशय दुलारी होने के कारण वे ‘जानकी’ व ‘जनकनंदिनी’ तथा मिथिलावासियों को अकाल की विभीषिका से मुक्ति दिलाने के कारण ‘मिथिलेश कुमारी’ के नाम से भी लोक विख्यात हुई।
प्रकृति द्वारा पोषित आध्यात्मिकता से परिपूर्ण बचपन
मिथिला के आदर्श राज्य में पली-बढ़ी माता सीता हरे-भरे उद्यानों, हरित वनों और धरती माता के कोमल आलिंगन से घिर कर पली बढ़ी थीं इसलिए उनके व्यक्तित्व में प्रकृति से मिलने वाला अंतर्ज्ञान और शांति गहरी रची बसी थी। ऐसा लगता था जैसे प्रकृति का सार उनके अस्तित्व में बुना गया था, जिसने उन्हें करुणा, शक्ति और दृढ़ता का अनन्य प्रतीक बना दिया था। जिस तरह प्रकृति के साथ उनका सहज संबंध उनके हर कार्य में स्पष्ट परिलक्षित होता था, ठीक वैसे ही मिथिला के बुद्धिमान ऋषियों और विद्वान पंडितों के मार्गदर्शन ने माता सीता के अंतस को गहन आध्यात्मिक ज्ञान सम्पदा से परिपूर्ण कर दिया था। पवित्र धर्मग्रंथों की उनकी गहरी समझ तदयुग के बड़े बड़े धर्मगुरुओं तथा शास्त्र मर्मज्ञों को भी विस्मय विमुग्ध कर देती थी।
जानिए माता सीता के दिव्य नामों की महिमा
रामकथा में माता सीता को भूमिजा, जानकी, वैदेही, मैथिली, मृणमयी, लक्ष्मी, सिया व वानिका आदि नामों से संबोधित किया गया है। माता सीता का प्राकट्य भूमि से हुआ था, इसलिए उनका एक नाम भूमिजा पड़ गया। पिता को जनक भी कहा जाता है और अपने पिता के अत्यंत समीप और अत्यंत लाडली होने के कारण माता सीता को जानकी भी कहा जाता है। माता सीता के पिता जिस राज्य के राजा थे उसका नाम था मिथिला। इसी कारण से मिथिला राज्य के लोग अपनी प्रिय राजकुमारी को स्नेह से मैथिली नाम से पुकारते थे। मृणमयी शब्द का अर्थ होता है मिट्टी से बना हुआ। माता सीता न सिर्फ मिट्टी से जन्मी थीं बल्कि उनकी देह भी मिट्टी की भांति पवित्र थी, इसी कारण से उन्हें मृणमयी के नाम से भी पुकारा जाता है। अप्रतिम ब्रह्मज्ञान संपन्न होने के कारण मिथिला के राजा जनक विदेहराज कहलाते थे और उनकी प्राणप्रिय पुत्री होने के कारण माता सीता को वैदेही नाम मिला था। माता सीता को माँ लक्ष्मी का अवतार माना जाता है। इसीलिए अयोध्या की प्रजा माता सीता को लक्ष्मी नाम से सबसे ज्यादा संबोधित करती थी। सिया शब्द सीता से ही बना है लेकिन इसका मूल अर्थ है चंद्र कला की भांति खूबसूरत और शीतल। माता सीता का व्यक्तित्व सौम्य शांत था और सुंदरता चंद्र से भी कही अधिक; इसलिए वह सिया कहलाती हैं। माता सीता का एक नाम वानिका भी है, जिसका का अर्थ है वन-वन भ्रमण करने वाली। माता सीता ने श्री राम के साथ 14 वर्षा का वनवास काटा था। इसी कारण से उनका एक नाम वानिका विख्यात हुआ।
माता सीता के जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण स्थल
बिहार राज्य के मिथिला क्षेत्र के सीतामढ़ी जिले का पुनौरा गांव माता सीता की जन्मस्थली माना जाता है। धर्मग्रंथों के अनुसार त्रेता युग में राजा जनक मिथिला के राजा थे। पौराणिक कथानक के अनुसार राज्य को अकाल की विभीषिका से बचाने के लिए ऋषि-मुनियों के कहने पर राजा जनक द्वारा सीतामढ़ी के पुनौरा गाँव में खेत में हल चलाने के दौरान माता सीता कलश से प्रकट हुई थीं। वर्तमान समय में इस स्थान पर देवी सीता का एक सुन्दर मंदिर बना हुआ है जिसमें देवी के प्राकट्य के दृश्य को दर्शाया गया है।
राजा जनक की राजधानी जनकपुर वर्तमान समय में पड़ोसी देश नेपाल में स्थित है। यहां माता सीता की स्मृति में निर्मित जानकी मंदिर नेपाल प्रमुख दर्शनीय स्थल माना जाता है। यह वह स्थान है जहाँ देवी सीता का भगवान राम के साथ मंगल परिणय हुआ था। कहा जाता है कि 1911 में टीकमगढ़ की महारानी वृषभानु कुमारी ने नौ लाख रुपये खर्च कर इस जानकी मंदिर का निर्माण करवाया था। इसलिए यह मंदिर नौलखा मंदिर के नाम से भी विख्यात है।
अयोध्या में स्थित कनक भवन माता सीता का वह महल है जिसे महरानी कैकेयी ने श्रीराम से विवाह के पश्चात सीता जी को उपहार में दिया था। इसे देवी सीता का अंतःपुर माना जाता है। सीता रसोई अयोध्या में भगवान राम की जन्मभूमि के समीप स्थित सीता रसोई वह स्थान है जहाँ सीता माता राजपरिवार के लिए रसोई बनाती थीं।
महाराष्ट्र के नासिक जिले में स्थित पंचवटी वह स्थान है, जहां से रावण ने छल से माता सीता का अपहरण किया था। जानना दिलचस्प हो कि इस स्थान पर पांच वट वृक्ष एक साथ होने के कारण ही इस स्थान का नाम पंचवटी पड़ा था।
श्रीलंका स्थित अशोक वाटिका वह स्थान है, जहां रावण ने माता सीता को उनका अपहरण करने के बाद बंदी बनाकर रखा था। मान्यता है कि यहां पर अशोक के वृक्ष बड़ी संख्या में होने के कारण इस उद्यान को अशोक वाटिका के नाम से जाना जाता था।
वर्तमान समय में नैनीताल के जिम कॉर्बेट पार्क के निकट स्थित सीतावनी वन क्षेत्र बर्ड वॉचिंग के लिए प्रसिद्ध स्थल माना जाता है। माना जाता है कि इसी स्थान पर त्रेता युग में महर्षि वाल्मीकि का आश्रम था; जहाँ पर अयोध्या से निर्वासित होने के बाद सीता माता ने आश्रय ली थी और इसी सीताबनी में माता सीता ने अपने जुड़वां पुत्रों लव कुश को जन्म दिया था।
















