पामिण और सिलक्यारा टनल, यह महज एक संयोग नहीं?
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पामिण और सिलक्यारा टनल, यह महज एक संयोग नहीं

आज बाबा बौखनाग देवता की पामिण है और आज ही सिलक्यारा टनल का उद्घाटन भी हो रहा है। इसे महज एक संयोग कहा जाए या फिर बाबा बौखनाग का चमत्कार!

Written byशशि मोहन रवांल्टाशशि मोहन रवांल्टा
Apr 16, 2025, 06:41 pm IST
in उत्तराखंड
सिलक्यारा टनल और उसके पास बना मंदिर

सिलक्यारा टनल और उसके पास बना मंदिर

आज बाबा बौखनाग देवता की पामिण है और आज ही सिलक्यारा टनल का उद्घाटन भी हो रहा है। इसे महज एक संयोग कहा जाए या फिर बाबा बौखनाग का चमत्कार! जो दोनों एक साथ हो रहे हैं। जहां एक ओर बौखटिब्बा नामक शिखर पर बाबा बौखनाग के पुजारी बाबा की पूजा-अर्चना कर रहे होंगे वहीं दूसरी ओर ठीक उसी बौखटिब्बा, राड़ी डांडे के नीचे सुरंग में राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, केंद्रीय सड़क एवं परिवहन राज्य मंत्री अजय टम्टा टनल का उद्धाटन करके गाड़ियों के काफिलों को हरी झंडी दिखा रहे होंगे। इसे महज एक संयोग ही कहा जाए या फिर बाबा का ही कोई चमत्कार माना जाए, जो दोनों एक दिन हो रहे हैं।

क्या है पामिण

बाबा बौखनाग की पामिण प्रत्येक वर्ष संक्रांति (चैत्र मास समाप्ति और बैशाख मास का प्रारंभ) के पहले रविवार अथवा बुधवार को उत्तरकाशी जिले के भाटिया गांव की प्रत्येक बिरादरी से एक व्यक्ति इस पूजा के लिए बाबा बौखनाग के पुजारी और पंडितों के साथ प्रात: स्नान-ध्यान करके बौखटिब्बा के लिए रवाना होते हैं। इस पूजा में गांव के 11 लोग ही शामिल होते हैं, जिनमें 7 यजमान, 3 पुजारी और 1 पुरोहित पंडित होता है। ये लोग रात्रि में भोजन के करने के पश्चात अगले दिन व्रत रखते हैं और प्रात: स्नान करके बाबा बौखनाग के मंदिर में एकत्रित होकर बौखटिब्बा के लिए जाते हैं। सुबह उठने के बाद से दोपहर करीब दो बजे मंदिर में पहुंचने तक ये सभी लोग पानी तक नहीं पीते हैं। इस यात्रा की खास बात यह है ये सभी 11 लोग नंगे पैर यानी बिना जूते-चप्पल के इस यात्रा को करते हैं जो गांव से बौखटिब्बा तक घने जगलों से होकर गुजरती है और लगभग 20 से 30 किमी की यात्रा होती है। मंदिर में पहुंचने के बाद वहां बाबा बौखनाग की पूजा-अर्चना के पश्चात ये लोग वहां बाबा की पिंडी पर चढ़ाया हुआ मक्खन प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं और चाय-पानी पीते हैं।

मंदिर में बाबा बौखनाग के मुख्य पुजारी द्वारा विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और पुरोहित पंडित जी द्वारा हवन वगैरह करके आछरी-मातरियों का आह्वान किया जाता है। मुख्य पुजारी जब इन वनदेवियों की पूजा करते हैं तो वह उनको कार देते हैं यानी एक प्रकार की कसम दिलाते हैं कि मैं और मेरे साथी समस्त गांव-क्षेत्र की तरफ से ताजे फल-फूल और प्रसाद से आपकी पूजा अर्चना कर रहे हैं, इसे आप स्वीकार करें और क्षेत्र में सुख-समृद्धि एवं शांति बनाए रखें।

यह पूजा विशेष रूप से वनदेवियों की होती है, जो क्षेत्र में अतिवृष्टि, ओलावृष्टि, आपदा से रक्षा करने के लिए की जाती है। इसके बाद वे वनदेवियों से वार्तालाप करके अपने क्षेत्र की सीमा रेखा का उनके सामने आह्वान करके बताते हैं जिसे स्थानीय भाषा में ‘थरण काटना’ कहते हैं।

मुख्य पुजारी जब थरण काटना शुरू करते हैं। इसमें वे 12 गांव बड़कोट पट्टी के और 65 गांव मुंगरसंती पट्टी के का उच्चारण करके सीमा रेखा बाताते हैं- जिसमें बौखटिब्बा से शुरू होकर फवाचs (फ्वाचा) टॉप वहां से होते हुए नंदगांव के ऊपर सदरिया टॉप, उसके बाद वहां से नीचे गंगनाणी पाणी जहां गंगनाणी कुंड है वहां से होते हुए नीचे-नीचे च्वाs झालकू पौंटी के नीचे, उसके बाद कोटियाल गांव के ऊपर मलापा डांडा से आगे बढ़ते हुए फिर सुनारा छानी से आगे छीजा डाक (एक बड़ा-सा पत्थर), उसके बाद स्वील के पास अखड़िया मूंठू, उसके बाद दयारा मूंठू (राणाई), उसके बाद बांगू बुरांश से घूमते हुए सिंगाई डांडा (टॉप) उससे आगे बढ़ते हुए फिर घांड्या ओडार, उसके बाद चौंरिया डांडू से होते हुए रूपनौल सौड़ टॉप के बाद वापस बौखटिब्बा पहुंचते हैं। मुख्य पुजारी पूजा में उक्त सीमा रेखाओं का उच्चारण मंत्रो के साथ करके वनदेवियों को कार देते हैं कि इतने क्षेत्र में सुख-समृद्धि और शांति बनाएं रखें। इन्हें अतिवृष्टि, ओलावृष्टि और आपदा आदि से बचाए रखें।

क्या है नियम

इस पूजा में विशेष नियम यह है मुख्य पुजारी ज्येष्ठ मास की संक्रांति तक बहुत नियम एवं धर्म का पालन करते हैं। वे पूजा के पश्चात ज्येष्ठ मास की संक्रांति तक नया अनाज ग्रहण नहीं करते। वह इतने समय तक पुराना अनाज ही ग्रहण करते हैं, साथ ही वह खाना भी खुद ही बनाते हैं और पूजा के बाद से उक्त तिथि तक वह दाड़ी, बाल आदि कुछ नहीं बनाते। यहां तक कि वह अपनी मां के हाथ का बना भोजन भी ग्रहण नहीं करते।

बौखटिब्बा में पूजा-अर्चना व प्रसाद ग्रहण के करने के पश्चात रात्रि 8-9 बजे तक वापस गांव पहुंचते हैं और अगले दिन पूजा अर्चना के बाद ही भोजन ग्रहण करते हैं। अगले दिन ‘पामिणेर’ गांव के प्रत्येक घर में जाते हैं और आशीर्वाद के रूप प्रत्येक परिवार को केदारपत्ती, थूनेर एवं बौखटिब्बा लाए हुए फूल प्रसाद के रूप देते हैं। गांव का प्रत्येक परिवार उनकी आवाभगत के लिए घर को साफ-सुथरा करके उनके आगमन की प्रतीक्षा में रहता है। उनकी सेवा के रूप में उनको दूध-दही और गुड़ आदि खाने लिए दिया जाता है। पामिणेर गांव के प्रत्येक घर में अवश्य जाते हैं और परिवारों को अपना आशीर्वाद देते हैं। पामिणेर का घर में आना बहुत ही शुभ माना जाता है।

शाम 4-5 बजे करीब गांव के बीच में बाबा बौखनाग के अगवानी चेड़ा देवता के मंदिर में देवता अवतरित होकर सबको अशीर्वाद देते हैं और गांव की सुख-शांति का वचन देते हैं। उसके पश्चात ‘छापू’ यानी तिलक (चावल, पीली पिठाईं और गाय के दूध का मिश्रण (पीली पिठाईं देवदार के पेड़ों पर लगने वाले छोटे-छोटे फलों से निकाली जाती है जो एकदम शुद्ध और हर्बल होती है)) लगाकर लोग अपने-अपने घरों में की ओर प्रस्थान करते हैं। वहीं से यजमान लोग अपने पंडित-पुजारियों को भोजन के लिए अपने घर आमंत्रित करते हैं, ऐसी परंपरा वर्षों से चली आ रही है।

कौन हैं बाबा बौखनाग!

बाबा बौखनाग रवांई घाटी के आराध्य देव हैं, यह हमारी आस्था, परंपरा और सामुदायिक चेतना के जीवंत स्वरूप हैं। यह ग्राम देवता के रूप में प्रसिद्ध हैं- गांव में कोई भी दैवीय कार्य उनके आह्वान के बिना सम्पन्न नहीं होते। स्थानीय लोगों का मानना है कि बाबा बौखनाग बासुकी नाग के अवतार हैं। साथ ही कुछ लोग बाबा बौखनाग को शंकर भगवान का अवतार भी मानते हैं। बाबा जब अवतरित होते हैं तो कहते हैं कि मैं तो फकीर हूं।
बाबा बौखनाग के चार मूल थान हैं- भाटिया, कफनौल, कंसेरू और नंदगांव। हाल ही में उपराड़ी में बाबा बौखनाग का भव्य मंदिर बनकर तैयार हुआ है। इस बार बाबा वहीं विराजमान हैं। बाबा बौखनाग के चत्मकार की सैकड़ों कथाएं हैं जिनका जिक्र आगे अवश्य करेंगे।

 

बाबा बौखनाग और सिलक्यारा टनल

बाबा की आस्था, चमत्कार और आधुनिकता की कहानी से आप और हम सभी भली-भांति परिचित हैं। अभी हाल ही में 12 नवंबर 2023 को सिलक्यारा टनल का एक हिस्सा अचानक ढह गया था, जिसमें 41 मजदूर टनल के अंदर फंस गए थे। यह हादसा न केवल तकनीकी चुनौतियों के कारण बल्कि मजदूरों की जान बचाने की दृष्टि से भी एक गंभीर संकट बन गया। रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू हुआ, जिसमें वर्टिकल ड्रिलिंग, हॉरिजॉंटल ड्रिलिंग और रैट होल माइनिंग जैसे विभिन्न तरीकों का उपयोग किया गया। यहां तक कि विदेशों से भी टनल विशेषज्ञ एवं विशेष मशीनें मंगवाई गई लेकिन मजदूरों को बाहर नहीं निकाला जा सका। उसके बाद स्थानीय लोगों के जब टनल के अधिकारी बाबा बौखनाग के मुख्य थान भाटिया गांव में पहुंचे। वहां उन्होंने बाबा के मुख्य पूजारी (हैं जिसे स्थानीय भाषा में माली या पश्वा कहा जाता है) श्री संजय डिमरी जिन पर बाबा अवतिरत होते हैं से आशीर्वाद लिया। बाबा ने अवतिरत होकर बताया कि ठीक तीन बाद सभी मजूदर सकुशल बाहर निकल आएंगे और ऐसा ही हुआ। अंतत: लगातार प्रयासों और बाबा बौखनाग के आशीर्वाद और उनके प्रति श्रद्धा के साथ, रेस्क्यू ऑपरेशन सफल हुआ। 28 नवंबर 2023 को सभी 41 मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया, जिसे “उत्तराखंड टनल मिरेकल” के रूप में जाना गया। इस सफलता का श्रेय न केवल तकनीकी विशेषज्ञों और रेस्क्यू टीमों को दिया गया, बल्कि इसमें संदेह ही नहीं है कि यह बाबा बौखनाग की कृपा और चमत्कार से सफल हुआ।

Topics: उत्तरकाशी धार्मिक स्थलबौखटिब्बा यात्रापामिण पर्व उत्तराखंडUttarakhand Newsसिलक्यारा टनल रेस्क्यू ऑपरेशनबाबा बौखनाग मंदिरबाबा बौखनाग चमत्कारउत्तराखंड टनल मिरेकलबाबा बौखनाग पूजा परंपरा
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