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होम भारत

भारत में अपनी ही जमीन पर शरणार्थी बनने का दर्द

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में वक्फ कानून के विरोध की आड़ में हिंदुओं पर हुआ हमला। मुर्शिदाबाद में अपना गांव छोड़कर झारखंड-मालदा पहुंचे हिन्दू परिवार। महिलाओं की चीखें, शवों की अनदेखी और प्रशासन की चुप्पी ने पैदा किया भय का माहौल।

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी
Apr 15, 2025, 11:05 pm IST
in भारत, विश्लेषण, पश्चिम बंगाल

अपने और अपनों को जिंदा बनाए रखने की जद्दोजहद क्‍या होती है? यह कोई पश्‍चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद से पलायन करनेवाले उन तमाम हिन्‍दुओं से पूछे, जिनका सिर्फ एक ही कसूर है कि वे जन्‍म से हिन्‍दू हैं और सनातन धर्म का पालन करते हैं। शायद ही भारत आज दुनिया का वह पहला देश होगा जिसके यहां उसके देश के लोग अपने ही घर में पलायन करने के लिए मजबूर हुए हैं, और वह भी बहुसंख्‍यक होने के बाद।

कट्टरपंथी  जब चाहें, जहां चाहें, मजहब का आधार लेकर आग लगा देते हैं। मस्‍जिदों और घरों से पत्‍थर, पेट्रोल बम फेंक सकते हैं, यह बहाना लेकर कि मस्‍जिद के बाहर जो हिन्‍दुओं की धार्म‍िक यात्रा निकल रही थी, उसमें संगीत था, जोकि इस्‍लाम में हराम है। वह अल्‍लाह के नाम पर कहीं भी ‘गुस्ताख-ए-रसूल की एक ही सज़ा, सर तन से जुदा’ का नारा लगाते हुए जिहादी बन जाते हैं और जब चाहें तब किसी भी गैर मुसलमानों को मौत के घाट उतार देते हैं। यहां के हिंदुओं ने तो 1946-47 में डायरेक्‍ट एक्‍शन भी झेला। वह आज भी अपने को बचाए रखने की जद्दोजहद के बीच एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान पर पलायन करने को मजबूर नजर आता है।

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में नए वक्फ (संशोधन) कानून के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन एक तरफा हिंसा में बदल गया। कट्टरपंथी संगठित हुए और हमला किया। कई मकान, दुकान, मंदिर, वाहन जो हिन्‍दुओं के थे तोड़ दिए गए, लूट लिए गए और आग के हवाले कर दिए गए। हिन्‍दू बेबस, पिट रहा था, महिलाओं की चीखें हवा में गुम हो जा रही थीं, कोई सुननेवाला नहीं, कहीं कोई दर्द के विरोध में प्रतिक्रिया नहीं, न कोई पुलिस, न प्रशासन, रहा तो सिर्फ कोहराम, हिन्‍दुओं के अपार दर्द में छलकते हुए आंसू और उकनी मौतों पर शुरू होनेवाली राजनीति पीछे रह गई थी! मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर करना, इस लाइन पर चलने वाले उदारवादी मुस्लिमों ने भी कट्टरपंथियों का विरोध नहीं किया।

पिंकी की आंखों के सामने बेरहमी से मार दिए गए पति और ससुर

पिंकी के बहते आंसू अब तक रुके नहीं, हिंसा के बाद से आंखें सूखनें का नाम नहीं ले रहीं। उसने सिर्फ अपने पति को नहीं खोया है, उसके ससुर को भी इस्‍लामिक भीड़ ने धारदार हथियारों से बहुत बेरहमी से मार दिया, फिर भी जब इस इस्‍लामिक भीड़ का मन नहीं भरा तो आंखें निकाल ली गईं। हत्या के घंटों बाद भी दोनों के शव पड़े रहे, कोई मदद करनेवाला नहीं था।

देखते ही देखते 32 साल की पिंकी दास ने अपना सब कुछ खो दिया…। पिंकी ने जैसा कि बताया- जब उनके मोहल्‍ले पर हमला हुआ, तब वे बार-बार फोन लगाते रहे, पर कोई सहायता आना तो दूर ममता सरकार की पुलिस ने थाने में फोन तक नहीं उठाया…मेरे पति चंदन दास और ससुर हरगोबिंद दास को बहुत बेरहमी से तड़पा-तड़पा कर हमलावरों ने मार दिया। जो झुंड आया, उसके हाथों में तलवारों और अन्‍य हथियार तो थे ही, वे पत्‍थर और हिन्‍दू घरों पर कच्‍चे बम फेंक रहे थे। उसके घर पर इन हमलावरों ने चार बार हमला किया, तीन बार वे लकड़ी का दरवाजा नहीं तोड़ पाए लेकिन चौथी बार वे दरवाजे को तोड़ने में कामयाब हो गए। हम बेबस थे, छत पर छिपे थे….।

अपने जवान बेटे चंदन और पति हरगोबिंद को खो चुकी पारुल दास का भी रो-रोकर बुरा हाल है, वह कहती हैं, हमने किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा, थोड़ी सी जमीन है, पति किसानी कर लेते और उससे अपना गुजारा करते। बेटा राजमिस्‍त्री का काम करके कमाता और अपना घर चलाता, किसी से हमारी कोई दुश्‍मनी नहीं, लेकिन फिर भी मेरे बेटे और पति को उन लोगों….ने बेरहमी से मार डाला। भर्राती हुई आवाज और आंखों से बहते आंसू लिए चंदन की मां बोली…मजबूरी में मैं क्‍या करती! मैं बच्चों को लेकर छत पर छिप गई थी, नहीं तो ये भीड़ उन्‍हें भी मार देती…।

मुर्शिदाबाद से पलायन कर अनेक हिन्‍दू परिवार पहुंचे झारखण्‍ड

यहां पिंकी और पारुल अकेले नहीं हैं, जिन्‍होंने अपना सब कुछ खोया है, मुर्शिदाबाद की इस हिंसा की आग में अनेकों ने अपना बहुत कुछ खोया है, बड़ी संख्‍या में लोग अपना घर, दुकान, संपत्‍त‍ि सब कुछ छोड़कर पलायन करने पर मजबूर हुए हैं। वक्फ संशोधन कानून को लेकर हिंसा फैलने के बाद इस मुर्शिदाबाद के जाफराबाद गांव से ही लगभग 190 हिंदू परिवारों ने अपना सब कुछ छोड़कर जिंदा रहने के लिए भाग जाना मुनासिब समझा। गांव पूरी तरह से हिन्‍दू विहीन हो चुका है। कुछ परिवार यहां से भागकर झारखंड के साहिबगंज जिले में पहुंचे हैं। इन्‍हीं में से एक हृदय दास हैं, जोकि पिंकी दास के परिवार से ही ताल्‍लुक रखते हैं, वे अपनी व्‍यथा कहते-कहते फूट-फूट कर रो पड़ते हैं, हृदय दास की धुलियान के जाफराबाद में नाश्ते की दुकान है, यही उनके जीवन-यापक का सहारा है, पर अब वह बंद है। आय का साधन छिन चुका है। वह अपनी 86 वर्ष की मां को बीमार बताकर एक एम्‍बुलेंस के सहारे जाफराबाद से किसी तरह हिंसा के बीच बचते-बचाते निकले, उन्‍होंने इस एंबुलेंस में अपने परिवार के अन्‍य 11 सदस्‍यों को भी किसी तरह बैठा रखा था, इस तरह कुल ये 13 लोग वहां से जैसे-तैसे भाग पाए।

जुमे की नमाज के बाद मस्‍जिदों से निकले थे हिंसा फैलाने वाले

उन्होंने बताया कि जुमे की नमाज के बाद मस्‍जिदों से निकलते लोग दंगा करने लगे, वे चुन-चुन कर हिन्‍दुओं की दुकानों, घर एवं वाहनों को निशाना बना रहे थे। पहले दिन किसी तरह से वे और उनके मोहल्‍ले वाले अपने आप को इन दंगाइयों से बचा पाए, लेकिन दूसरे दिन शनिवार को इन मुसलमानों ने बम और धारदार हथियारों के साथ बड़ी संख्‍या में उनके घरों पर हमला बोला और ये हमारे एक घर के दरवाजे को तोड़ने में सफल हो गए और भाई हरगोविंद दास और भतीजा चंदन दास को इन मुसलमानों ने मौत के घाट उतार दिया। पुलिस घटना के चार घंटे बाद पहुंची, ऐसे में बंगाल की पुलिस पर लोगों का भरोसा नहीं रहा…यदि बीएसएफ और सीआरपीएफ के जवान नहीं आते तो उन्‍हें भी मार दिया जाता।

पश्चिम बंगाल में हिन्‍दू है असुरक्षित, कब कहां से होगा हमला कुछ पता नहीं

मुर्शिदाबाद जिले के शमशेर गंज थाना क्षेत्र में रहनेवाले जयदेव सरकार अपनी पत्नी पूजा सरकार, छोटे बच्चे को लेकर किसी तरह से जान बचाकर हृदय दास की ही तरह झारखंड के साहिबगंज जिले के राजमहल पहुंच पाने में कामयाब रहे हैं। जयदेव कहते हैं, हिंसा का वो मंजर भूले नहीं भूलता, कैसे अपने परिवार को लेकर मैं भागा हूं, ये मैं ही जानता हूं। पश्चिम बंगाल के कई इलाकों में हिन्‍दू असुरक्षित हो चुका है, कब कौन कहां से उन पर धावा बोलेगा, कुछ पता नहीं! ऐसे में जिंदा रहने के लिए अपने घरों से पलायन करना आज कई हिन्‍दू परिवारों की मजबूरी हो चुकी है।

पश्चिम बंगाल में धुलियान से भागकर मोहन मंडल अपने परिवार को सुरक्षित लेकर पाकुड़ पहुंचे। मोहन ने बताया कि उनकी आंखों के सामने भयंकर मंजर था। कई दुकानों को आग के हवाले कर दिया गया, लूटपाट और हिन्‍दू घरों पर हमले हो रहे थे। सब अपने को बेबस महसूस कर रहे थे। कहीं पुलिस का पता नहीं था। मुस्‍लिम हिंसा से प्रभावित 24 वर्षीय स्रबोनी दास ने अपनी आपबीती में बताया कि मुसलमानों की एक भीड़ अचानक से आई, और घर में घुसने की कोशिश करने लगी, जब वह सामने से अंदर नहीं आ सकी तो उसने पीछे से घर में अंदर आने का प्रयास किया, जहां तक ये भीड़ घुस पाई, वहां का सामान उठाकर ले गई, जो नहीं ले जा सकती थी, उसे तोड़ दिया और कई सामानों में आग लगा दी । इन दंगाइयों ने हमारे घर के अलावा अन्‍य हिन्‍दू घरों में आगजनी की। जो गांड़ि‍यां खड़ी थीं, उन्‍हें तोड़ा गया और आग के हवाले कर दिया गया ।

ज्‍यादातर हिन्‍दू पीड़‍ितों का सब कुछ लुट गया

पंश्‍चिम बंगाल में देखा जाए तो सबसे ज्‍यादा मुर्शिदाबाद के जाफराबाद, धूलियान, शमशेरगंज, सुती, और काशिमनगर, जंगीपुर के पूरे इलाके में बड़े स्तर इन मुस्‍लिम जिहादियों ने लूटपाट और तोड़फोड़ की है। भीड़ जो उठाकर ले जा सकती थी ले गई। सुती के एक दवा दुकानदार ने नाम नहीं छापने का निवेदन करते हुए कहा- कुछ समझ नहीं आ रहा है, ये क्‍या हुआ! हाथों में हथियार, डंडे और देशी बम लिए एक भीड़ अचानक से सामने से आई, हम कुछ समझते उससे पहले ये हिंसक-उम्‍मादी भीड़ मुझे और मेरे साथियों को घेर कर पीटने लगी। हम गिड़गिड़ा रहे थे, तभी उनमें से कई मेरी दुकान में घुसकर तोड़फोड़ करने लगे, जो उन्‍हें जरूरी लगा उसे उठाकर ले गए। हम लोग किसी तरह से अपनी जान बचाकर वहां से भागे, जब लौटकर आए तो सब कुछ लुट चुका था…।

मालदा शरणार्थी शिविर : संकट अभी टला नहीं

मुर्शिदाबाद में हुई हिंसा के बाद धुलियान इलाके में दंगाइयों का खौफ इस कदर है कि लोग अब भी घरों से बाहर नहीं निकल रहे हैं। धुलियान में दंगाईयों ने किसी को नहीं छोड़ा। क्या घर, क्या मंदिर और क्या दुकानें, हर जगह तोड़फोड़ की। दुकानों को लाइन से फूंक दिया। हिंसा पीड़ितों की आपबीती दिल दहला देती है। हिंदू दुकानदारों का आरोप है कि दुकानों के शटर तोड़कर घुसी भीड़ ने जमकर लूट-पाट और आगजनी की। हालात ऐसे है कि यहां रह रहे करीब एक हजार लोग अपने घरों को छोड़ कर मालदा पहुंच गए हैं। हिंदुओं में कई ने मालदा के लालपुर हाईस्कूल में शरण ली है ।

भाजपा अध्यक्ष सुकांत मजूमदार सोमवार को यहां लगे राहत शिविर में हिंदू परिवारों से मिलने पहुंचे थे। इनके दर्द को सुनकर मजूमदार भयंकर गुस्‍से में दिखे और ममता सरकार को खूब खरी-खोटी सुनाई। लेकिन यहां भी इन लोगों की परेशानी खत्म नहीं हुई है। पुलिस ने बाहर जाने पर पाबंदी लगा दी है, जो बिमार हैं, वे दवाओं के लिए तरस रहे हैं। स्थानीय अधिकारियों के अनुसार, मालदा में लगभग 640 लोगों ने शरण ली है, जिनमें से 550 लोग वर्तमान में इस हाईस्कूल शिविर में हैं, जबकि बाकी लोग अपने रिश्तेदारों के साथ निकटवर्ती गांवों में रह रहे हैं।

पश्चिमी बंगाल में तैनात बीएसएफ के डीआईजी ने बयां की उपद्रवियों की हरकत

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के शमशेरगंज इलाके में भड़की हिंसा के बाद हालात अब भी तनावपूर्ण बने हुए हैं।बीएसएफ के दक्षिण बंगाल फ्रंटियर के डीआईजी और पीआरओ नीलोत्पल कुमार पांडे ने कहा कि जवानों के पहुंचने पर अराजक तत्वों ने हमारे खिलाफ जैसे युद्ध छेड़ दिया। हमारी पेट्रोलिंग पार्टी पर ईंट-पत्थरों के साथ पेट्रोल बम फेंके गए। हमला करने वाले वही लोग हैं, जो इलाके में लगातार कानून व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं। भारी पथराव में कुछ जवानों को मामूली चोटें आई हैं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए बीएसएफ ने सुसूतिया और शमशेरगंज पुलिस थाना क्षेत्र सहित आसपास के संवेदनशील इलाकों में अपनी उपस्थिति बढ़ा दी है। बीएसएफ ने माना है कि स्थानीय लोग डरे हुए हैं। इस डर को दूर करने और विश्वास बहाल करने के लिए जवान लगातार इलाके में फ्लैग मार्च कर रहे हैं।

पश्चिम बंगाल के नेता प्रतिपक्ष और भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी का कहना है, ‘‘ममता बनर्जी तुष्टिकरण की राजनीति कर रही हैं। बंगाल में हिंदू सुरक्षित नहीं हैं, स्थिति बहुत गंभीर, नाजुक है।’’ ये हकीकत है उस पश्चिम बंगाल की जहां की मु्ख्यमंत्री ममता बनर्जी हिंदू मुस्लिम भाई चारे की बात कई बार करती हुई नजर आती रही हैं लेकिन हकीकत ये हैं कि एक समुदाय विशेष सड़क पर उत्पात मचा रहा है और हिंदू अपने घरों और शरणार्थी कैंपों में कैद है या फिर जिंदा रहने के लिए पलायन और विस्‍थापन को मजबूर है।

किसी कवि ने इस स्‍थ‍िति के लिए सही कहा है कि बेदर्दी से नोच फेंकने की पीड़ा है विस्थापन, जहाँ दुहाई, या इल्तिजा कारगर नहीं होती। जहाँ कोई सुनवाई नहीं होती, जहाँ आँसू खोओं में सूख जाते हैं। जहाँ चीखों को खुरचकर थपेड़ों के सुपुर्द कर दिया जाता है…। पीढ़ियों से बसा आशियानापलों में ध्वस्त हो जाता है, जड़ों से उखाड़ आँधियों में छोड़ दिया जाता है। जहाँ कई दंश एक साथ चुभ, आत्मा लहूलुहान कर देते हैं…। दंगों का विस्थापन होता है विभत्स, जहाँ मनुष्यता शर्मसार होती है। जहाँ ईश्वर स्वयं ग्लानि से भर जाता है। जहाँ मुट्ठियाँ भींच वह अपने ही सृजन को कोसता है…। विस्थापन छीन लेता है दुधमुँहे से माँ का आँचल, युवाओं से उनका भविष्य, अभिभावकों से उनकी नींद और स्त्री से उसका सर्वस्व…।

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डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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