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अब भी छलक आती हैं आंखें

’84 के सिख विरोधी दंगों के पीड़ितों का दर्द 40 वर्ष बाद भी कम नहीं हुआ है। तिलक विहार में विधवा महिलाओं की सिसकियां आज भी सुनाई देती हैं। उनका कहना है कि जिन लोगों ने निर्दोषों को मारा उन्हें जीने का कोई हक नहीं

Written byअरुण कुमार सिंहअरुण कुमार सिंह
Mar 10, 2025, 07:59 pm IST
in विश्लेषण, दिल्ली, पंजाब

नई दिल्ली में तिलक नगर के पास तिलक विहार है। यहां 1984 के सिख विरोधी दंगे के पीड़ितों को बसाया गया है। नरसंहार में अधिकतर पुरुषों को मार दिया गया। जो लोग बचे, उनमें ज्यादातर विधवा महिलाएं और बच्चे थे। इसलिए स्थानीय लोग इस मुहल्ले को ‘विधवा कॉलोनी’ के नाम से पुकारते हैं। यहां इन पीड़ित परिवारों के 944 फ्लैट्स हैं।

ये परिवार आज तक 31 अक्तूबर, 1984 की उस शाम को नहीं भूल पाए हैं, जब सिखों को चुन-चुन कर कांग्रेसी गुंडों ने बर्बरता के साथ मारा था। पीड़िता लक्ष्मी कौर का दर्द इतना गहरा है कि आज भी उनसे इस संबंध में कोई बात करता है, तो वह सुबकने लगती हैं। 70 वर्षीया लक्ष्मी ने बताया, ‘‘1984 में मेरे पति सुल्तानपुरी में एक गुरुद्वारे में सेवक थे। गुरुद्वारे में ही हम लोग रहते थे। दो लड़के और तीन लड़कियां थीं। सबसे बड़ा बच्चा 12 साल का और सबसे छोटा एक साल का था।

31 अक्तूबर की शाम को गुरुद्वारे पर हमला हुआ और भीड़ ने मेरे पति को मार दिया। दूसरे दिन पता चला कि मेरे परिवार के अनेक लोगों को मार दिया गया। मरने वालों में मेरे देवर, जीजा जी और उनके चार भाई, उनका दामाद, मेरा भांजा, नंदोई और उनका बेटा शामिल है। कांग्रेस के गुंडों ने दो दिन तक खून की होली खेली। उन्हें कोई रोकने वाला नहीं था। जहां भी सिख मिले, उन्हें वहीं मार दिया गया। सबसे तकलीफ की बात तो यह रही कि प्रशासन और सरकार ने कुछ नहीं किया।’’

उन्होंने यह भी बताया, ‘‘पति के न रहने से मेरे लिए बच्चों की परवरिश बड़ी मुश्किल हो गई। कई-कई दिन भूखे रहे। बदन पर कपड़े नहीं। ऐसे में कुछ लोगों ने मदद की, लेकिन सरकार की ओर से कुछ नहीं दिया गया। शायद सरकार को लगता था कि इंदिरा गांधी की हत्या में पूरी सिख कौम शामिल है। नरसंहार के करीब दो साल बाद 1986 में सरकार ने 10,000 रु. की मदद दी। ऐसे में पीड़ितों का गुस्सा और बढ़ गया।

हम लोगों ने महीनों धरना-प्रदर्शन किया। दोषियों को सजा देने की मांग के साथ ही घर और नौकरी की मांग की। इसके बाद एक कमरे का घर और चतुर्थ श्रेणी की नौकरी मिली। तनख्वाह 700 रु. थी। मुश्किल से घर चलता था। इस कारण बच्चे पढ़-लिख नहीं पाए। हालांकि अब सभी का परिवार है। जैसे-तैसे गुजारा हो रहा है।’’ सज्जन कुमार को मिली सजा पर लक्ष्मी कौर कहती हैं, ‘‘भला हो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का, जिन्होंने नरसंहार से जुड़े मुकदमों को फिर से खुलवाया और सज्जन कुमार को सजा हुई। कांग्रेसी सरकारों ने हत्यारों को बचाने के लिए सारी हदें पार कर दी थीं।’’

एक दूसरी पीड़िता हैं अत्तर कौर। 1984 में ये अपने भरे-पूरे परिवार के साथ त्रिलोकपुरी में रहती थीं। इनके पति कारोबारी थे। अच्छा काम चलता था। उनकी दुकान से कई लोगों को रोजगार मिलता था। हत्यारों ने इनके पति के साथ ही परिवार के 11 लोगों को मारा और घर-दुकान को आग के हवाले कर दिया। उस वक्त अत्तर कौर की गोद में केवल चार दिन की बेटी थी।

पड़ोसी ने अत्तर और उनकी बेटी को अपने घर पर छुपाया, तब जाकर उनकी जान बची। अत्तर कहती हैं, ‘‘मेरे घर नौकर-चाकर हुआ थे, लेकिन कांग्रेसी गुंडों ने मेरी हालत ऐसी कर दी कि अपने बच्चों को पालने के लिए मुझे नौकरानी का काम करना पड़ा। जब भी शाम होती है, तब मैं 31 अक्तूबर, 1984 की उस मनहूस शाम को न चाहते हुए भी याद करती हूं। बच्चों के लिए वाहे गुरु ने मेरी जान बचा दी, वरना जो हालात थे, उसमें बचना मुश्किल था।’’ लक्ष्मी कौर की तरह अत्तर कौर को भी एक छोटी नौकरी मिली थी। केवल 11 वर्ष नौकरी करने के बाद वे सेवानिवृत्त हो गईं। अब अपने बेटे के साथ रहती हैं।

अत्तर कौर के बेटे वजीर सिंह 1984 में सिर्फ नौ साल के थे। अब वे आटो चलाकर गुजर-बसर कर रहे हैं। उन्होंने बताया, ‘‘मेरी और मेरे चचेरे भाई की जान एक परिचित व्यक्ति की वजह से बची। हुआ यूं कि जब मेरे घर पर भीड़ ने हमला किया, तब हम दोनों घर से निकले और भटक गए। चारों ओर जलने की गंध थी और खून बह रहा था।

ऐसे में हम दोनों बदहवास होकर इधर-उधर भाग रहे थे। इतने में हम दोनों को उन्होंने देख लिया। वे फट से हमें अपने घर ले गए और एक चारपाई के नीचे लेटा दिया। ऊपर गद्दे और चादर बिछा दी गई। दो दिन चारपाई के नीचे ही रहे। डर के मारे भूख नहीं लगी और इसलिए उनके कहने के बाद भी खाना नहीं खाया। फिर उन्होंने हम दोनों की जान बचाने के लिए बाल कटवा दिए। दो दिन बाद सेना पहुंची तब हम दोनों को बाहर निकाला गया और राहत कैंप में छोड़ दिया गया।’’

वजीर का यह भी मानना है आज कांग्रेस की हालत खराब होने की एक वजह है सिखों का नरसंहार। वे कहते हैं, ‘‘किसी की भी हत्या गलत है, लेकिन किसी एक की हत्या के लिए पूरी कौम को खत्म करने की कोशिश की गई। 1984 के हत्यारों को सरकारी हत्यारे कह सकते हैं।’’

सही मुआवजा तक नहीं मिला

1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में लगभग हजारों सिखों की हत्या की गई। कांग्रेसी राज में पीड़ितों को मुआवजा पाने के लिए भी सड़कों पर उतरना पड़ा। इस कारण 1986 में हर परिवार को केवल 10,000 रु. की राशि दी गई। फिर कई वर्ष बाद इन परिवारों को 3,30,000 रु. दिए गए। 2014 में केंद्र में सरकार बदलने के बाद इन्हें फिर से 5,00,000 रु. मिले।

दिल्ली में मारे गए थे 2,733 सिख

आहूजा आयोग के अनुसार 1984 में दिल्ली में 2,733 सिख मारे गए। (हालांकि पीड़ित मानते हैं कि मरने वालों की संख्या 5,000 से अधिक थी) पीड़ितों के अनुसार पुलिस ने सभी घटनाओं की एफ.आई.आर. नहीं लिखी। इस कारण दिल्ली में 650 एफ.आर. आई. ही दर्ज हो पाई। संयुक्त बिहार में 97 सिख मारे गए और 535 एफ.आई.आर. दर्ज हुई। हरियाणा में 125 लोगों को मारा गया। वहां 86 एफ.आई.आर. दर्ज हुई थी।

हिमाचल प्रदेश में 90 एफ.आई.आर. दर्ज हुई और एक मारा गया। जम्मू-कश्मीर में 18 सिखों को मारा गया और 66 मामले दर्ज हुए। ओडिशा में तीन लोग मारे गए और 149 मामले दर्ज हुए। संयुक्त उत्तर प्रदेश में 266 सिखों को मारा गया और मामले दर्ज हुए 2,999। इस नरसंहार के बाद विभिन्न राज्यों से लगभग 22,000 सिख परिवार पंजाब चले गए थे।

 

 

Topics: पाञ्चजन्य विशेष1984 के सिख विरोधी दंगेदिल्ली में मारे गए थे सिखसिख परिवारविधवा कॉलोनीइंदिरा गांधी की हत्यासिखों की हत्या
अरुण कुमार सिंह
अरुण कुमार सिंह
समाचार संपादक, पाञ्चजन्य | अरुण कुमार सिंह लगभग 25 वर्ष से पत्रकारिता में हैं। वर्तमान में साप्ताहिक पाञ्चजन्य के समाचार संपादक हैं। [Read more]
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