प्रयागराज 2025 महाकुंभ की स्मृतियां और अनुभव
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प्रयागराज 2025 महाकुंभ की स्मृतियां और अनुभव

कुंभ मेला भारत की सनातन संस्कृति की अनवरत चली आ रही धार्मिक एवं सांस्कृतिक यात्रा का साक्षी रहा है।

Written byडॉ. रेखा नागरडॉ. रेखा नागर
Mar 3, 2025, 11:39 am IST
inभारत
Maha Kumbh 2025

Maha Kumbh 2025

कुंभ मेला भारत की सनातन संस्कृति की अनवरत चली आ रही धार्मिक एवं सांस्कृतिक यात्रा का साक्षी रहा है। यह भारत के चार धार्मिक नगरों प्रयागराज (इलाहाबाद) हरिद्वार, उज्जैन एवं नासिक में प्रत्येक 12 वर्षों में आयोजित किया जाता है। प्रयागराज में गंगा, यमुना, सरस्वती के त्रिवेणी संगम पर हरिद्वार में गंगा नदी के तट पर उज्जैन में पवित्र शिप्रा के तट पर तथा नासिक में गोदावरी जैसी पवित्र नदियों के पुण्य तटों पर एक विशेष मुहूर्त व नक्षत्रों की विशेष स्थिति तथा विशेष स्नान पर्वों के शुभ अवसर पर आयोजित होने वाला एक अति पवित्र, धार्मिक व आध्यात्मिक स्नान पर्व है। इसके आधार में अनेक पौराणिक कथाएं,मिथक एवं जन श्रुतियां है।

ऐसा ही एक महाकुंभ 14 जनवरी 2025 (मकर संक्रांति) से लेकर 26 फरवरी (महाशिवरात्रि) 2025 तक विश्व इतिहास में अनेक रिकॉर्ड बनाता हुआ प्रयागराज (इलाहाबाद) में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। मेरा यह परम सौभाग्य रहा की अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम द्वारा आयोजित युवाकुंभ के सांस्कृतिक समागम में मध्य भारत की ओर से भगोरिया नृत्य दल के साथ उपस्थित होने का सुअवसर मिला। 18 सदस्यीय युवक, युवतियों के दल ने जब उत्साह पूर्वक प्रयागराज महाकुंभ में जाने की सहमति दी तो हमने पहले ट्रेन में और फिर स्लीपर बस में टिकट करवाने की बहुत कोशिश की लेकिन उस तारीख में वह व्यवस्था नहीं हो पाई, लेकिन महाकुंभ में जाने का उत्साह इतना ज्यादा था कि हम सब तूफान गाड़ी में जाने को तैयार हो गए और 14 सीटर गाड़ी में 18 लोग इंदौर से 5 फरवरी को रात्रि 11:00 बजे रवाना हुए।

सफर के दौरान युवा बच्चों की हंसी ठिठौली,उनकी पसंद के गीत, कुछ भजन कीर्तन आदि का आनंद लेते हुए अविलंब चलते रहे। भूख लगने पर कहीं चाय नाश्ता तो कहीं भोजन करते हुए आगे बढ़ते रहें। सफर के दौरान रोड पर कहीं अनगिनत गाड़ियों का रेल पेल तो कहीं टोल नाको से 02 से 04 किलोमीटर दूर तक लंबे जाम को धीरे-धीरे पर करते हुए 6 फरवरी को रात्रि 12:00 बजे यानी पूरे 25 घंटे की लंबी यात्रा (वह भी एक तूफान गाड़ी में) के बाद प्रयागराज में यमुना तट के पार्किंग तक पहुंचे।

पार्किंग एरिया में एक टपरी में बन रही सब्जी पूरी का भोजन किया और अपने-अपने बैग तथा ढोल मांदल आदि लेकर अपने गंतव्य सेक्टर 6 की ओर रवाना हुए। हमने सोचा कोई गाड़ी, रिक्शा आदि मिल जाएगा लेकिन नहीं मिला। कुछ चल रहे थे लेकिन वह आगे से ही भरे हुए आ रहे थे। किसी में एक या दो सीट खाली होती थी, लेकिन हम 18 लोग थे तो ऐसे टुकड़े-टुकड़े में नहीं जाना चाहते थे और युवा टोली की जिम्मेदारी भी मुझ पर थी तो इसलिए एक साथ पैदल चलना ही ठीक समझा। इस दौरान यमुना का नया ब्रिज पार करके आगे पहुंचे तो रेलवे स्टेशन की तरफ से आने वाले यात्री तथा अन्य रास्तों से हजारों की संख्या में जनसैला त्रिवेणी संगम की ओर चला जा रहा था। अर्ध रात्रि में भी चारों ओर बम बम भोले और हर हर गंगे के जय घोष सुनाई दे रहे थे।जोबट, झाबुआ और अलीराजपुर जैसे ग्रामीण और वन क्षेत्र से आने वाले युवा साथियों के लिए यह अनुभव सचमुच अद्भुत था। रात्रि में भी दिन जैसी रौनक और सुंदर लाइटिंग से जगमगाता प्रयागराज जैसा शहर पहले कभी नहीं देखा। इस प्रकार इलाहाबाद में प्रवेश के समय महाकुंभ की स्मृतियों को सहेजते हुए रात्रि 12:30 बजे से प्रातः 5:30 बजे तक पैदल चलकर सेक्टर 6 में स्थित छत्तीसगढ़ भवन पहुंचे। मेला क्षेत्र में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर पेय ,जलापूर्ति, शौचालय, चिकित्सा सुविधा और पुलिस विभाग द्वारा दिए जा रहे कई प्रकार के सहयोग और सुरक्षाएं वहां के शासन प्रशासन की सुदृढ़ व्यवस्था का परिचय दे रहे थे।

सेक्टर 09 और सेक्टर 18 में अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के पांडालों में चाय नाश्ता, भोजन आदि की सुंदर और भव्य व्यवस्था की गई थी, साथ ही युवा कुंभ में पधारे सभी युवाओं के ठहरने व त्रिवेणी स्नान करने की सामूहिक व्यवस्था भी की गई थी जिससे सभी लाभांवित हुए। महाकुंभ मेला सिर्फ एक धार्मिक आयोजन ही नहीं बल्कि कला, संगीत एवं संस्कृति का अद्भुत समागम दिखाई दिया। इस वर्ष का महाकुंभ 144 वर्ष बाद आने वाले संयोग के कारण भी विशेष महत्व का माना गया है। बताया जाता है कि जब चंद्रमा, शनि और बृहस्पति ग्रह सूर्य के साथ एक रेखा में आते हैं तब 144 साल बाद इस प्रकार के महाकुंभ का संयोग बनता है, और सन 2025 में यह दुर्लभ संयोग बना था जिसके हम साक्षी रहे।

मेला प्रशासन के अनुसार 15 से 20 करोड लोगों के आने की संभावना थी लेकिन मकर संक्रांति से लेकर महाशिवरात्रि तक 45 दिन चलने वाले इस पवित्र स्नान पर्व में 66 करोड़ से भी अधिक लोगों द्वारा स्नान किया जाना अब तक का सबसे बड़ा रिकॉर्ड है। विश्व के सबसे विशाल मेले और सनातन संस्कृति के सबसे बड़े धार्मिक आयोजन में हम भी सहभागी बने यह सचमुच हमारा परम सौभाग्य है। त्रिवेणी में स्नान के दौरान जब पैर पानी में डालें तो पानी बहुत ठंडा था लेकिन हिम्मत करके जब एक डुबकी लगाई तो मां गंगा के आशीर्वाद से ठंड कहां चली गई,पता ही नहीं चला, और सभी बच्चों ने काफी देर तक बार-बार डुबकी लगाई और हर हर गंगे का उद्घोष करते हुए स्नान का आनंद लिया।

मेला क्षेत्र में कुछ डरावने, कुछ भस्मधारी और कुछ अद्भुत जटाधारी साधु महात्माओं के दर्शन भी प्राप्त हुए। कुछ श्रद्धालु 70, 80 साल के माता-पिता को उठाकर तो कोई व्हीलचेयर पर ले जाते हुए दिखाई दिए।जब हमारे युवाओं ने उन्हें ऐसे ले जाते हुए देखा तो पूछा कि इतनी भीड़ और इतने जोखिम में आप इन्हें यहां लेकर क्यों आए तो उनका जवाब था कि जब हम छोटे थे तो ऐसी ही भीड़ में हमें कंधे पर बिठाकर लाते थे। और जब इस महाकुंभ में पवित्र स्नान की उनकी इच्छा थी हम उन्हें लेकर आए हैं। सचमुच, अपने माता-पिता के प्रति सेवा व समर्पण का एक अच्छा उदाहरण हमारे युवाओं ने यहां देखा। कई स्थानों पर निशुल्क भंडारे देखकर भी उनके मन में यह भाव आया कि आम नागरिकों के लिए इतना धन खर्च करने की हिम्मत और बड़ा मन किन लोगों में होता होगा।

मानव सेवा के प्रति किस प्रकार की उनकी सोच और आध्यात्मिक चेतना होती होगी। यह हमारे नवयुवकों ने पहली बार देखा। पुलिस प्रशासन को बिना गाली गलौज के, बिना किसी पर हाथ उठाएं सबसे प्रेम से निवेदन करते हुए, वह भी इतनी बेहिसाब भीड़ में। यह नजारा भी पहली बार देखा कि किस प्रकार श्रद्धालुओं को हर प्रकार से एक अच्छा और सुविधाजनक माहौल देने की उनके द्वारा कोशिश की जा रही थी। अंत में यही कहना चाहूंगी कि अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम द्वारा इस महाकुंभ को युवाकुंभ नाम देकर हजारों की संख्या में युवाओं को प्रयागराज आने का जो जो अवसर दिया है वह आज की नौजवान पीढ़ी को सनातनी संस्कृति और अध्यात्म से जोड़ने का एक सफल और सार्थक दूरगामी परिणाम देने वाला सिद्ध होगा।

भारत के जनजाति समाज को हिंदू व सनातनी ना मानने वाले कुछ विरोधी विचारधारा वाले लोगों के लिए इससे अच्छा प्रत्युत्तर नहीं हो सकता था। जिस नारे को डी लिस्टिंग अभियान के दौरान बोलते थे कि “जो भोलेनाथ का नहीं, वह मेरी जात का नहीं” इसके साक्षात दर्शन जनजाति युवक, युवतियों को यहां प्राप्त हुए। यह अक्षरशः सत्य है कि ऐसा पवित्र एवं अद्भुत संयोग और ऐसा दिव्य आयोजन इस जीवन में कभी दोबारा देखने को नहीं मिलेगा। हम लोग 06 फरवरी की रात्रि को पहुंचकर 07 एवं 08 फरवरी को प्रयागराज में रहे और मेला क्षेत्र का भ्रमण करके चारों ओर आस्था के विशाल महाकुंभ की यादगार स्मृतियों को संजोए 28 घंटों का सफर तय कर 09 फरवरी की रात्रि को वापस इंदौर लौटे। सभी लोग अपने साथ 3 लीटर, 05 लीटर के जलपात्रों में त्रिवेणी का पवित्र जल व प्रसाद आदि लेकर अपने घर गए। और परिवार में जो नहीं आ पाए उन्हें संगम का पवित्र जल देकर उनकी दुआएं और आशीर्वाद का पुण्य प्राप्त किया। मां गंगा का पवित्र जल सबके जीवन में सुख शांति व समृद्धि का आधार बने। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ ओम नमः शिवाय। हर हर गंगे।

Topics: tribal societyअखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रममहाकुंभ 2025maha kumbh 2025प्रयागराज महाकुंभकुंभ मेलात्रिवेणी संगमसनातन संस्कृतिSanatan cultureजनजाति समाज
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