सनातन परंपरा के संवाहक अखाड़े
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सनातन परंपरा के संवाहक अखाड़े

आद्य शंकराचार्य ने देश की चारों दिशाओं में चार आध्यात्मिक पीठों की स्थापना करने के साथ दशनामी संन्यास परंपरा को दस संन्यासी नामों में विभक्त किया था। उनके द्वारा स्थापित अखाड़े आज भी न केवल मजबूती से खड़े हैं, बल्कि सनातन परंपराओं का निर्वहन कर रहे हैं

Written byडॉ. विवेकानंद तिवारीडॉ. विवेकानंद तिवारी
Jan 25, 2025, 12:19 pm IST
in विश्लेषण, उत्तर प्रदेश, धर्म-संस्कृति
त्रिवेणी संगम में गाजे-बाजे के साथ अमृत स्नान के लिए जाते नागा साधु

त्रिवेणी संगम में गाजे-बाजे के साथ अमृत स्नान के लिए जाते नागा साधु

कुंभ के आयोजन का उद्देश्य था सामूहिक चिंतन अर्थात् व्यष्टि और समष्टि जीवन को धर्मादर्श के उच्च सिंहासन पर सुदृढ़ रूप में प्रतिष्ठित करना। धर्म की मृत संजीवनी से अनुप्रेरित कर समाज और राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक स्तर को संचारित करते हुए उसे शाश्वत कल्याण में विमंडित करना था। एक समय और एक स्थान पर बड़ी संख्या में ऋषि, महर्षि, ब्रह्मर्षि उपस्थित होकर समाज, राष्ट्र और प्रकृति की समस्याओं पर सामूहिक चिंतन करते थे और उससे निकले निष्कर्ष रूपी अमृत से समाज, राष्ट्र और प्रकृति लाभान्वित होती थी।

प्रो. विवेकानंद तिवारी
अध्यक्ष, बी. आर. आंबेडकर पीठ, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला

हिंदू समागम और सामाजिक समरसता की दृष्टि से कुंभ पर्व विश्व में अद्वितीय है, क्योंकि इसके काल और स्थान का निर्धारण प्रकृति स्वयं करती है। इसमें मानवीय हस्तक्षेप के लिए कोई स्थान नहीं है। जब सूर्य और वृहस्पति विशेष राशियों में जाते हैं, तब उससे संबंधित काल में कुंभ पर्व मनाया जाता है। इसे मानव अपनी इच्छानुसार परिवर्तित नहीं कर सकता। इसी प्रकार, राशि विशेष में स्थित होने से स्थान का भी निर्धारण होता है। जैसे वृष राशि में वृहस्पति और मकर में सूर्य हों तो प्रयाग में कुंभ होता है। कुंभ राशि में गुरु तथा मेष राशि मे सूर्य तो हरिद्वार, सिंह में गुरु तथा मेष मे सूर्य हों तो उज्जैन और सिंह राशि में गुरु तथा सिंह राशि में ही सूर्य हों तो गोदावरी (नासिक) में कुंभ का आयोजन होता है। इस प्रकार सूर्य और गुरु के राशि संचार से ही काल एवं स्थान, दोनों का निर्णय होता है। कुंभ पर्व के इन चार स्थानों पर आयोजन का आधारभूत तत्व सूर्य, चंद्र, पृथ्वी, वृहस्पति और वरुण देव हैं।

पौराणिक मान्यताएं

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवासुर संग्राम के बाद जब समुद्र मंथन हुआ, तो भगवान धन्वंतरि स्वर्ण अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। लेकिन अमृत के जरिए अमर होने की चाह सभी देवताओं और दानवों को थी। वे सभी उनके पीछे भागने लगे। इस बीच अमृत कलश से अमृत छलककर 16 जगहों पर गिरा। इनमें से पृथ्वी पर चार पवित्र जगहों पर और बाकी 12 जगहों पर स्वर्ग में गिरा। पृथ्वी पर जिन 4 जगहों पर अमृत गिरा, उनमें सर्वप्रथम हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और हरिद्वार हैं। इन स्थानों पर हर 12वें वर्ष में महाकुंभ स्नान का आयोजन होता है। कुंभ का आयोजन प्रत्येक 12 वर्ष पर और अर्धकुंभ 6 वर्ष पर होता है। अर्धकुंभ केवल प्रयाग और हरिद्वार में आयोजित होता है। महाकुंभ मेले में स्नान करना केवल शरीर को धोने का कार्य नहीं है, बल्कि यह आत्मा और मन की शुद्धि का भी प्रतीक है। महाकुंभ में स्नान करना एक विशेष खगोलीय स्थिति में अमृत जल से स्नान करने के बराबर है। इसलिए इस समय स्नान करने का लाभ बाकी समयों में स्नान करने की तुलना में कई गुना बढ़ जाता है। लेकिन महाकुंभ में सिर्फ स्नान नहीं, बल्कि अमृत स्नान (राजयोग स्नान) भी होता है, जो सबसे प्रमुख और विशेष धार्मिक अनुष्ठान है। यह स्नान महाकुंभ मेले का मुख्य आकर्षण होता है।

अमृत स्नान की महत्ता

महाकुंभ मेले में सबसे खास होता है- अमृत स्नान, जिससे प्राप्त पुण्य को असंख्य यज्ञों, तपस्याओं और दान के बराबर माना जाता है। कुंभ में आकर्षण के सबसे बड़े केंद्र अखाड़े होते हैं। इन अखाड़ों का मुख्य आकर्षण अमृत स्नान होता है। अमृत स्नान के समय विभिन्न अखाड़े और उनके साधु और संन्यासी अपना संपूर्ण शृंगार करते हैं। ये साधु-संन्यासी रथ, हाथी, घोड़े, बैंड-बाजे के साथ अपने शिविर से अमृत स्नान के लिए निर्धारित स्थल पर पहुंचते हैं। बीच-बीच में नागा साधु तलवारबाजी सहित कलाएं दिखाकर आम जनमानस का ध्यान अपनी ओर खींचते हैं। अमृत स्नान के समय सर्वप्रथम विभिन्न अखाड़ों के देवता, उनके ध्वज, आचार्य महामंडलेश्वर, महामंडलेश्वर के स्नान के बाद अखाड़ों के अन्य साधु-संन्यासी स्नान करते हैं। पहले कौन-सा अखाड़ा अमृत स्नान करेगा, इसकी भी नियमावली और विधान है। हरिद्वार और प्रयाग में निरंजनी अखाड़ा पहले अमृत स्नान करता है। उज्जैन में जूनागढ़ अखाड़ा और नासिक में महानिर्वाणी अखाड़े के साधु-संत पहले स्नान करते हैं।

अखाड़ों की स्थापना

भारत में वैदिक सनातन परंपरा की रक्षा, विकास और धर्म के प्रचार-प्रसार में जगतगुरु आद्य शंकराचार्य का योगदान अद्वितीय है। आद्य शंकराचार्य ने देश की चारों दिशाओं में चार आध्यात्मिक पीठों की स्थापना की थी और दशनामी संन्यास परंपरा को दस संन्यासी नामों में विभक्त किया था। प्रत्येक पीठ के साथ इन संन्यासी दशनामों को संबद्ध किया गया। दशनामी संप्रदाय से जुड़े साधु-संत शास्त्र और शस्त्र परंपरा में पारंगत होते हैं। दशनामी संन्यासी अदम्य साहस और कुशल प्रतिभाशाली नेतृत्व के धनी होते हैं। अद्वैत वेदांत के प्रणेता, सनातन धर्म के प्राणधार, कश्मीर से कन्याकुमारी तक संपूर्ण भारत को एक सूत्र में पिरोने वाले आद्य शंकराचार्य ने आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व सनातन धर्म की रक्षा के लिए दशनामी संन्यासी संप्रदाय की नींव डालकर जो परंपराएं स्थापित की थीं। संप्रदाय आज भी उनका पूरी मजबूती और आस्था से निर्वहन कर रहा है।

आद्य शंकराचार्य का योगदान न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यधिक प्रभावशाली है। उनके जीवन का उद्देश्य भारतीय समाज को धर्म, तत्वज्ञान और संस्कृति के सही मार्ग पर चलाना था। उनके समय में हिंदू धर्म में बिखराव और विकृतियां उत्पन्न हो गई थीं। लोग विभिन्न पंथों और आस्थाओं के प्रति आकर्षित हो रहे थे। इनमें से कई आस्थाएं हिंदू धर्म के मूल सिद्धांतों से भटक रही थीं। ऐसे समय में शंकराचार्य ने वेदों की अद्वैत वेदांत (एकात्मकता का सिद्धांत) का उपदेश देना शुरू किया। उन्होंने समाज को एकतंत्र, तात्विक विवेक और वेदांत के गूढ़ तत्वों को प्रस्तुत कर इन विकृतियों से बचने का मार्ग दिखाया।

अखाड़ों का गठन हिंदू धर्म और वैदिक संस्कृति की रक्षा के लिए किया गया था। मूलत: धर्म की रक्षा के लिए नागा साधुओं की एक सेना की तर्ज पर ही अखाड़ों को तैयार किया गया था। इसमें उन्हें योग, अध्यात्म के साथ शस्त्रों की भी शिक्षा दी जाती है। ये अखाड़े आज तक उसी परंपरा का अनुपालन कर रहे हैं। नासिक कुंभ को छोड़कर बाकी कुंभ में सभी अखाड़े एक साथ स्नान करते हैं। नासिक के कुंभ में वैष्णव अखाड़े, जबकि त्र्यंबकेश्वर में शैव अखाड़े स्नान करते हैं। यह व्यवस्था 1772 में पेशवा के समय कायम की गई थी, जो आज तक चली आ रही है। शाही सवारी, हाथी-घोड़ों की सजावट, घंटा-नाद, नागा-अखाड़ों के करतब, तलवार और बंदूक का प्रदर्शन, इन अखाड़ों की पहचान है। अखाड़ों से जुड़े संतों के मुताबिक जो शास्त्र से नहीं मानते, उन्हें शस्त्र से मनाने के लिए अखाड़ों का जन्म हुआ। 1954 के कुंभ में मची भगदड़ के बाद सभी अखाड़ों ने मिलकर अखाड़ा परिषद का गठन किया।

ऐसे मिला अखाड़ा नाम

वैसे तो अखाड़ा कुश्ती से जुड़ा शब्द है। पहले आश्रमों के अखाड़ों को बेड़ा अर्थात् साधुओं का जत्था कहा जाता था। अखाड़ा शब्द का चलन मुगलकाल से शुरू हुआ। कुछ ग्रंथों के अनुसार ‘अखाड़ा’ शब्द की उत्पत्ति अलख शब्द से हुई है। लेकिन धर्म के कुछ जानकारों की मानें तो साधुओं के अक्खड़ स्वभाव के चलते इसे अखाड़ा नाम दिया गया है। कुंभ में शामिल होने वाले अखाड़ों के अपने-अपने नियम और विधान होते हैं। इसमें अपराध करने वाले साधुओं को अखाड़ा परिषद सजा देती है। छोटी चूक करने पर भी संबंधित साधु को अखाड़े के कोतवाल के साथ गंगा में पांच से लेकर 108 डुबकी लगाने के लिए भेजा जाता है। डुबकी के बाद वह भीगे कपड़ों में ही देवस्थान पर आकर अपनी गलती के लिए क्षमा मांगता है। फिर पुजारी पूजा स्थल पर रखा प्रसाद देकर उसे दोषमुक्त करते हैं। विवाह, हत्या जैसे अपराधों में शामिल व्यक्ति को अखाड़े से निष्कासित कर दिया जाता है। अखाड़े से निकाले जाने के बाद ही उस पर भारतीय संविधान में वर्णित कानून लागू होता है।

यदि अखाड़े के दो सदस्य आपस में लड़ें, विवाह कर ले या देवस्थान को अपवित्र करे या वर्जित स्थान पर प्रवेश करे, किसी यात्री, यजमान से अभद्र व्यवहार करे, अखाड़े के मंच पर कोई अपात्र चढ़ जाए तो उसे अखाड़े की अदालत सजा देती है। अखाड़ों के कानून को मानने की शपथ संन्यासी बनने की प्रक्रिया के दौरान दिलाई जाती है। अखाड़े का जो सदस्य इस कानून का पालन नहीं करता, उसे भी निष्कासित कर दिया जाता है। अखाड़ों में साधुओं की प्रवेश आसान नहीं होता। शैव परंपरा में नागा साधु बनने के लिए अखाड़े को काफी समय देना होता है। इसके लिए अखाड़ों की अपनी अलग व्यवस्था है। अगर कोई साधु बनना चाहता है, तो उसे कुछ समय अखाड़े में रह कर अपनी सेवाएं देनी होती हैं। साधुओं के साथ रहकर उनकी सेवा और गुरु चुनना होता है। सेवा का समय 6 महीने से लेकर 6 साल तक भी हो सकता है। इस दौरान अखाड़ा उस व्यक्ति का इतिहास और पारिवारिक पृष्ठभूमि की जांच करता है, उसके चरित्र के बारे में पता लगाता है, फिर किसी कुंभ मेले में उसे दीक्षा दी जाती है। इसके लिए व्यक्ति को सांसारिक जीवन का त्याग कर अपना पिंडदान करना होता है। करीब 36 से 48 घंटे की दीक्षा प्रक्रिया के बाद उसे नए नाम के साथ अखाड़े में प्रवेश दिया जाता है।

विशेष स्नान

 13 जनवरी – पौष पूर्णिमा (कल्पवास प्रारंभ)

 14 जनवरी – मकर संक्रांति

 29 जनवरी – मौनी अमावस्या

 3 फरवरी – वसंत पंचमी

 12 फरवरी – माघी पूर्णिमा (कल्पवास का समापन)

 26 फरवरी – महाशिवरात्रि (महाकुंभ का अंतिम दिन)

महाकुभ

शैव अखाड़े स्थापना

श्री पंचदशनाम आह्वान अखाड़ा 547 ई.
श्री पंच अटल अखाड़ा 646 ई.
श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी 749 ई.
श्री पंचायती अखाड़ा निरंजनी 904 ई.
श्री पंच दशनाम जूना अखाड़ा 1146 ई.
श्री पंचदशनाम पंच अग्नि अखाड़ा 1192 ई.
श्री तपोनिधि आनंद अखाड़ा पंचायत 1856 ई.

वैष्णव अखाड़े

श्री पंच निर्वाणी अनी अखाड़ा हनुमान गढ़ी 1476 ई.
अखिल भारतीय श्री पंच निर्मोही अनी अखाड़ा 1720 ई.
श्री दिगंबर अणि अखाड़ा 1784 ई.

उदासीन अखाड़े

श्री पंचायती बड़ा उदासीन अखाड़ा 1825 ई.
श्री पंचायती नया उदासीन अखाड़ा 1846 ई.
श्री निर्मल पंचायती अखाड़ा 1856 ई.

मकर संक्रांति को पहले अमृत स्नान के लिए जाते जूना अखाड़ा के साधु-संत

शंकराचार्य का उद्देश्य

शंकराचार्य ने अखाड़ों की स्थापना मुख्यत: दो कारणों से की थी- धार्मिक और तात्विक शिक्षा का प्रचार करना तथा हिंदू धर्म के विभिन्न संप्रदायों में एकता लाना। इसके लिए उन्हें एक संगठित ढांचे की आवश्यकता थी, जिसमें अनुयायी और साधु-संत एकत्र होकर धर्म का प्रचार कर सकें। यह सुनिश्चित करने के लिए ही उन्होंने अखाड़े की स्थापना की। अखाड़ा एक प्रकार का धार्मिक केंद्र था, जहां तत्वज्ञान, साधना और पूजा की विधियों पर ध्यान दिया जाता था। चूंकि उनके काल में समाज में विभिन्न पंथ और विचारधाराएं चलन में थीं, जो एक-दूसरे से टकरा रही थीं। उनके द्वारा स्थापित अखाड़ों ने विभिन्न पंथों और विचारधाराओं को एकत्र किया और एक साझा मंच प्रदान किया। शंकराचार्य के दौर में कई साधु स्वतंत्र रूप से साधना कर रहे थे। उनका कोई संगठित रूप नहीं था। उन्हें एकजुट करने के उद्देश्य से ही शंकराचार्य ने अखाड़ों की स्थापना की, ताकि साधु-संत एक साथ आएं और धार्मिक कार्यों व अनुष्ठानों में एक-दूसरे का सहयोग कर सकें। एक तरह से उन्होंने अखाड़ों को धार्मिक और सामाजिक संगठन के तौर पर खड़ा किया था, जो समाज में धार्मिक व सामाजिक सुधारों के लिए भी काम करता था।

अखाड़ों में साधु-संतों के लिए नियमित पूजा, साधना और तात्विक चर्चा का आयोजन किया जाता था। इस तरह से शंकराचार्य ने यह सुनिश्चित किया कि वेदांत और अन्य धार्मिक तत्वज्ञान के बारे में शिक्षा प्राप्त करने के लिए एक संगठित स्थान हो। उनके द्वारा स्थापित अखाड़ों ने भारत भर में धर्म और तत्व ज्ञान का प्रचार किया। शंकराचार्य ने विभिन्न क्षेत्रों में आयोजित धार्मिक मेलों, काव्य, प्रवचन और अन्य गतिविधियों के माध्यम से हिंदू धर्म के सिद्धांतों को जनमानस तक पहुंचाया। साथ ही, उन्होंने अखाड़ों के माध्यम से भारतीय समाज में व्याप्त अंधविश्वास और कर्मकांडों की आलोचना की और लोगों को धार्मिक क्रियाओं व साधनाओं के वास्तविक उद्देश्य से परिचित कराया। उन्होंने धर्म के सामाजिक पहलुओं पर भी ध्यान दिया, जिसमें जातिवाद, भेदभाव और अन्य सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने की आवश्यकता थी।

धर्म ध्वजा अखाड़ों की पहचान

धर्म ध्वजा अखाड़े की पहचान होती है। कुंभ में जहां अखाड़ों का शिविर लगता है, वहां उनकी धर्म ध्वजा लहराती रहती है। इन ध्वजों में अखाड़े के आराध्य का चित्र अथवा धार्मिक चिह्न अंकित होता है, जबकि अखाडेÞ के आराध्य की प्रतिमा शिविर के मुख्य स्थान में स्थापित होती है।

आदिगुरु शंकराचार्य ने अखाड़ों को 10 पद नाम दिए। ये नाम हैं- तीर्थ, आश्रम, वन, अरण्य, पर्वत, सागर, सरस्वती, भारती, गिरि और पुरी। इसलिए इन्हें दशनामी भी कहा गया। बैरागी को रामादल या रामानंदीय साधु भी कहते हैं, जो मुख्यत: राम और हनुमान के उपासक होते हैं। दो उदासीन अखाड़े गुरु नानक के बड़े पुत्र श्रीचंद्र ने स्थापित किए थे।

निर्मल अखाड़े के अनुयायी सिख गुरुओं, गुरु नानक देव से लेकर गुरु गोविंद सिंह और गुरुग्रंथ साहिब के उपासक होते हैं। आचरण की पवित्रता और आत्मशुद्धि निर्मल अखाड़े का मूल मंत्र है। इस अखाड़े के संन्यासी सफेद वस्त्र पहनते हैं और इसके ध्वज का रंग पीला या बासंती होता है। 13 अखाड़ों में निर्मल अखाड़े की स्थापना सबसे बाद में हुई थी।

शुरू में सिर्फ चार अखाड़े थे। संन्यासी, बैरागी व उदासीन अखाड़ों की आंतरिक व्यवस्था मणि, अणि, धूनी और धुआं में विभक्त है। संन्यासियों में मणि का प्रचलन है। संन्यासी अखाड़ों के प्रमुख आचार्य महामंडलेश्वर कहलाते हैं। हर अखाड़े में एक आचार्य महामंडलेश्वर होते हैं, जबकि महामंडलेश्वर की संख्या सैकड़ों हो सकती है। इसी तरह, बैरागी अणियों में अणि प्रमुख अध्यक्ष होते हैं, जबकि उदासीन अखाड़ों में श्रीमहंत। इन्हें अपने अखाड़े या अन्य अखाड़े के साधुओं को महामंडलेश्वर बनाने का अधिकार होता है। यही उन्हें इसके निमित्त दीक्षा और शिक्षा देते हैं।

अथ प्रयाग कुंभ महात्म्य

प्रयाग, जिसे प्रयागराज के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू मान्यताओं और प्राचीन संस्कृत साहित्य में अत्यंत पूजनीय स्थान रखता है। पवित्र नदियों गंगा, यमुना और पौराणिक सरस्वती के संगम पर स्थित होने के कारण इसे ‘तीर्थराज’ यानी तीर्थ स्थलों का राजा भी कहा जाता है। प्रयाग का महत्व प्राचीन वेदों से लेकर पुराणों और महान महाकाव्यों तक कई संस्कृत ग्रंथों में प्रतिध्वनित होता है।
ऋग्वेद परिषद में प्रयाग और उससे जुड़ी तीर्थयात्रा प्रथाओं का सबसे पहला उल्लेख है। इससे पता चलता है कि वैदिक परंपरा के प्रारंभिक चरणों में भी प्रयाग की पवित्रता को मान्यता दी गई थी। पुराण (पौराणिक कथाओं और ब्रह्मांड विज्ञान से परिपूर्ण प्राचीन हिंदू ग्रंथ) प्रयाग के विषय में किंवदंतियों और प्रतीकात्मकता का समृद्ध ताना-बाना प्रस्तुत करते हैं। मत्स्य पुराण में प्रयाग को उस स्थान के रूप में चित्रित किया गया है, जहां सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने महाप्रलय के बाद पहला बलिदान (यज्ञ) दिया था, जिससे यह स्थान पवित्र हो गया।

प्रयागे तु महादेव यज्ञं यज्ञपतिर्यौ।
तत्रापश्यत् स्वयं ब्रह्मा तीर्थराजं जग्गुरुम्॥
अर्थात् प्रयाग में, यज्ञों के स्वामी महेश्वर (शिव) ने एक बार यज्ञ किया था। वहां ब्रह्मा ने स्वयं तीर्थों के राजा, संपूर्ण जगत के गुरु को देखा।
अग्नि पुराण और अन्य पुराण प्रयाग को ऐसा स्थान बताते हैं, जहां तीर्थयात्री, पुजारी और विक्रेता एकत्रित होते हैं। यह आध्यात्मिक साधकों, आनुष्ठानिक कार्यों और रोजमर्रा के जीवन का जीवंत संगम है। संगम पर अनुष्ठान स्नान को कई पुराणों में मुक्ति और शुद्धि के मार्ग के रूप में वर्णित किया गया है। इसी तरह, रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों में भी प्रयाग की कथाएं मिलती हैं। रामायण में प्रयाग का उल्लेख महर्षि भारद्वाज के पौराणिक आश्रम के स्थान के रूप में किया गया है। इसी आश्रम में भगवान राम, सीता और लक्ष्मण ने वनवास के दौरान उनका आशीर्वाद लिया था। महाभारत में भी कई संदर्भों में प्रयाग के महत्व पर प्रकाश डाला गया है। इसमें शुभ समय पर प्रयाग में स्नान करने से अपार आध्यात्मिक पुण्य की प्राप्ति का वर्णन है।

अर्थात तीर्थाणि पुण्यान्यकाशेऽन्तर्दिवि स्थिता।
तानि सर्वाणि गंगायां प्रयागे च विशेषत:॥
अर्थात् यहां तक ​​कि वे पवित्र स्थान जो स्वर्ग में या स्वर्ग और पृथ्वी के बीच मौजूद हैं, वे गंगा में पाए जा सकते हैं, विशेष रूप से प्रयाग में।

8 कुंभ देवों के, 4 मानव के

देवानां द्वादशाहोभिर्मर्त्यै द्वादश वत्सरे:।
जायन्ते कुम्भपर्वाप्रियाग, जिसे प्रयागराज के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू मान्यताओं और प्राचीन संस्कृत साहित्य में अत्यंत पूजनीय स्थान रखता है। पवित्र नदियों गंगा, यमुना और पौराणिक सरस्वती के संगम पर स्थित होने के कारण इसे ‘तीर्थराज’ यानी तीर्थ स्थलों का राजा भी कहा जाता है। प्रयाग का महत्व प्राचीन वेदों से लेकर पुराणों और महान महाकाव्यों तक कई संस्कृत ग्रंथों में प्रतिध्वनित होता है।
ऋग्वेद परिषद में प्रयाग और उससे जुड़ी तीर्थयात्रा प्रथाओं का सबसे पहला उल्लेख है। इससे पता चलता है कि वैदिक परंपरा के प्रारंभिक चरणों में भी प्रयाग की पवित्रता को मान्यता दी गई थी। पुराण (पौराणिक कथाओं और ब्रह्मांड विज्ञान से परिपूर्ण प्राचीन हिंदू ग्रंथ) प्रयाग के विषय में किंवदंतियों और प्रतीकात्मकता का समृद्ध ताना-बाना प्रस्तुत करते हैं। मत्स्य पुराण में प्रयाग को उस स्थान के रूप में चित्रित किया गया है, जहां सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने महाप्रलय के बाद पहला बलिदान (यज्ञ) दिया था, जिससे यह स्थान पवित्र हो गया।
प्रयागे तु महादेव यज्ञं यज्ञपतिर्यौ।
तत्रापश्यत् स्वयं ब्रह्मा तीर्थराजं जग्गुरुम्॥
अर्थात् प्रयाग में, यज्ञों के स्वामी महेश्वर (शिव) ने एक बार यज्ञ किया था। वहां ब्रह्मा ने स्वयं तीर्थों के राजा, संपूर्ण जगत के गुरु को देखा।
अग्नि पुराण और अन्य पुराण प्रयाग को ऐसा स्थान बताते हैं, जहां तीर्थयात्री, पुजारी और विक्रेता एकत्रित होते हैं। यह आध्यात्मिक साधकों, आनुष्ठानिक कार्यों और रोजमर्रा के जीवन का जीवंत संगम है। संगम पर अनुष्ठान स्नान को कई पुराणों में मुक्ति और शुद्धि के मार्ग के रूप में वर्णित किया गया है। इसी तरह, रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों में भी प्रयाग की कथाएं मिलती हैं। रामायण में प्रयाग का उल्लेख महर्षि भारद्वाज के पौराणिक आश्रम के स्थान के रूप में किया गया है। इसी आश्रम में भगवान राम, सीता और लक्ष्मण ने वनवास के दौरान उनका आशीर्वाद लिया था। महाभारत में भी कई संदर्भों में प्रयाग के महत्व पर प्रकाश डाला गया है। इसमें शुभ समय पर प्रयाग में स्नान करने से अपार आध्यात्मिक पुण्य की प्राप्ति का वर्णन है।
अर्थात तीर्थाणि पुण्यान्यकाशेऽन्तर्दिवि स्थिता।
तानि सर्वाणि गंगायां प्रयागे च विशेषत:॥
अर्थात् यहां तक ​​कि वे पवित्र स्थान जो स्वर्ग में या स्वर्ग और पृथ्वी के बीच मौजूद हैं, वे गंगा में पाए जा सकते हैं, विशेष रूप से प्रयाग में।
ण तथा द्वादश संख्यया।।
तत्राध्रुतात्तयेनूपांचत्वरों भुवि भारते।
अष्टौलोकान्तरे प्रोक्तादेवैर्गम्यानचेतरै:।।
पृथिव्यां कुम्भायोगस्य चतुर्धा भेद उच्यते।
विष्णु द्वारे तीर्थराजेवन्त्यां गोदावरी तटे,
सुधा बिंदु विनिक्षेपात् कुम्भपर्वति विश्रुत:।।
अर्थात् देवताओं के 12 दिन और मनुष्यों के 12 वर्ष में कुल 12 कुंभ पर्व होते हैं। लेकिन अमृत की बूंदें गिरने से पृथ्वी पर मनुष्यों के लिए केवल 4 कुंभ ही होंगे। शेष 8 कुंभ पर्व देवताओं के लिए लोकांतर में होते हैं।
सहस्रं कार्तिके स्नानं माघ स्नानशतानि च।
वैशाखे नर्मदास्नानं कुम्भस्नानेन तत्फलम्।।
अर्थात् कार्तिक माह में गंगा में एक हजार बार स्नान करने, माघ में सौ बार गंगा स्नान करने और वैशाख में नर्मदा में करोड़ बार स्नान करने से जो फल प्राप्त होता है, वह प्रयाग में कुंभ पर्व पर केवल एक बार स्नान करने से प्राप्त होता है।

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