कुंभ: महिला व किन्नर अखाड़ों की स्वीकार्यता सनातन संस्कृति की उदात्तता की द्योतक
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कुंभ: महिला व किन्नर अखाड़ों की स्वीकार्यता सनातन संस्कृति की उदात्तता की द्योतक

एक समय था जब अखाड़ों के दरवाजे सिर्फ पुरुषों के लिए ही खुलते थे लेकिन आज विभिन्न अखाड़ों से हजारों की संख्या में महिला साध्वियां-संन्यासिनें और किन्नर समाज के साधक भी भी जुड़े हुए हैं।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी
Jan 17, 2025, 01:53 pm IST
inभारत, धर्म-संस्कृति

हर प्रबुद्ध सनातनधर्मी भलीभांति जानता है कि कुंभ पर्व के दौरान में विभिन्न अखाड़ों की शोभायात्राओं और अमृतस्नान का अलग ही आकर्षण होता है। वर्तमान में शैव, वैष्णव और उदासीन पंथ के संन्यासियों के मान्यता प्राप्त 13 अखाड़े हैं। सात शैव- जूना, निरंजनी, महानिर्वाणी, अटल, आह्वान, आनंद और अग्नि। तीन वैष्णव-दिगंबर, निर्वाणी और निर्मोही तथा तीन उदासीन अखाड़े- बड़ा उदासीन, नया उदासीन और निर्मल। ये अखाड़े हमारे सनातन धर्म की रीढ़ हैं। इनकी बुनियाद सैकड़ों वर्ष पूर्व आदिगुरु शंकराचार्य ने वैदिक संस्कृति के प्रचार प्रसार के लिए रखी थी। हर्ष व गर्व का विषय है कि विगत दो दशकों में विभिन्न तीर्थस्थलों में आयोजित होने वाले कुम्भ पर्वों के दौरान महिला और किन्नर अखाड़ों के पृथक अस्तित्व भी मजबूती से अपनी दस्तक दे रहे हैं।

यह बदलाव भारतीय संस्कृति की उदात्तता का ही परिचायक है। एक समय था जब अखाड़ों के दरवाजे सिर्फ पुरुषों के लिए ही खुलते थे लेकिन आज विभिन्न अखाड़ों से हजारों की संख्या में महिला साध्वियां-संन्यासिनें और किन्नर समाज के साधक भी भी जुड़े हुए हैं। हमारी सनातन भारतीय संस्कृति की गौरव गरिमा को दिव्य व भव्य स्वरूप में समूची दुनिया में उजागर करने वाले प्रयाग कुम्भ के वर्तमान महापर्व के सुअवसर प्रस्तुत हैं महिला व किन्नर अखाड़ों से जुड़ी विभिन्न रुचिकर जानकारियां-

प्रमुख महिला अखाड़े- दशनाम संन्यासिनी अखाड़ा और परी अखाड़ा

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रवीन्द्र पुरी कहते हैं कि आज दुनियाभर में हर मोर्चे पर महिलायें बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं। सनातन धर्म की ध्वजा फहराने में भी वह किसी से पीछे नहीं हैं। इसीलिए प्रयागराज के वर्तमान महाकुम्भ में भी नारी सशक्तीकरण पर पूरा जोर है। वर्तमान समय में महिलाओं के प्रमुख अखाड़े हैं -दशनाम संन्यासिनी अखाड़ा,और परी अखाड़ा। ये अखाड़े इस बार 50 से अधिक महिलाओं को महंत और महामंडलेश्वर बनाने की योजना बना रहे हैं। इस दौरान विदेशी महिला संतों को भी पद दिए जाएंगे। यह बदलाव प्रमाणित करता है कि इक्कीसवीं सदी के अत्याधुनिक युग में अन्य क्षेत्रों की तरह धर्मक्षेत्र में भी महिला शक्ति अपनी विजय पताका फहरा रही है। जूना अखाड़े की महामंडलेश्वर चेतना माता कहती हैं कि बीते कुछ सालों अखाड़ों में महिला संन्यासियों की संख्या में तेजी से इजाफा होना इस बात का संकेत है कि हमारी मातृशक्ति अपने वैदिक कालीन गौरव को पुनर्जीवित करने की दिशा में तेजी से सक्रिय हो रही है। भारत भूमि की नारी शक्ति हमेशा महान रही है।

हमारे वैदिक वांग्मय में जिस आर्य संस्कृति का गुणगान मिलता है, वह मूलत: मातृसत्तात्मक ही थी। वेदों में स्त्री यज्ञीय है। वेद नारी को अत्यंत महत्वपूर्ण, गरिमामय, उच्च स्थान प्रदान करते हैं। भारतीय धर्म को छोड़कर विश्व का कोई भी धर्म स्त्री को इतनी अधिक प्रधानता नहीं देता। वे कहती हैं कि पुरुष साधु-संन्यासियों की भांति हम साध्वियों-संन्यासिनों का भी मकसद जनकल्याण की भावना से समाज में फैली विकृतियों को दूर करना है।

काबिलेगौर हो कि जूना अखाड़े की महिला साध्वियों की लंबे अरसे से चली आ रही पृथक महिला अखाड़े की मांग को स्वीकार करते हुए विगत दिनों जूना पीठाधीश्वर ने अपने अखाड़े से जुड़ी महिला साध्वियों के “माई बाड़ा” को “दशनाम संन्यासिनी अखाड़ा” की स्वतंत्र मान्यता दे दी थी। इस संन्यासिनी अखाड़े की अध्यक्ष लखनऊ के मनकामनेश्वर मंदिर की प्रमुख महंत दिव्या गिरी कहती हैं कि महिला साध्वियों की पृष्ठभूमि अत्यंत गौरवशाली है। वे कहती हैं कि महिला जब साध्वी बन जाती है तो उसकी ताकत और बढ़ जाती है। उनके अनुसार संत के नाम पर आकर स्त्री और पुरुष का भेद खत्म हो जाता है। जब हम साधु संन्यासी या संत के रूप में बोल रहे होते हैं तो स्त्री और पुरुष का भेद अपने आप ही टूट रहा होता है। यानी संत या संन्यासी के रूप में वो न स्त्री रह जाता है न ही पुरुष। वे बताती हैं कि 2003-04 के बीच उज्जैन कुंभ के दौरान उनकी दीक्षा हुई थी। वे कहती हैं कि एक स्त्री के शरीर को लेकर जो दृष्टि और झिझक होती है वह दीक्षा होने के बाद टूट जाती है। भारतीयता में संन्यास का जो मूल विचार है वो है बिना भेदभाव के समान रूप आत्म व जग कल्याण का है।

इसी तरह वर्ष 2013 में महिलाओं के पृथक परी अखाड़े की स्थापना करने वाली प्रमुख साध्वी त्रिकाल भवंता का कहना है कि वेदों में नारी को ज्ञान देने वाली, सुख समृद्धि लाने वाली, विशेष तेज वाली देवी, विदुषी, सरस्वती, इन्द्राणी व उषा इत्यादि आदर सूचक नाम दिये गये हैं। उसे सदा विजयिनी कहा गया है। अपाला, घोषा, सरस्वती, सर्पराज्ञी, सूर्या, सावित्री, अदिति- दाक्षायनी, लोपामुद्रा, विश्ववारा, आत्रेयी जैसी वेद मंत्रों की ऋषिकाएं हमारी आदर्श व प्रेरणास्रोत हैं। वैदिक काल में नारियां स्वतंत्र रूप से ब्रह्मचर्चाओं, शास्त्रार्थों व यज्ञों में भाग लेती थीं। वेदों में स्त्री शिक्षा की पर्याप्त व्यवस्था दृष्टिगोचर होती है। तमाम वैदिक उद्धरण बताते हैं कि बालकों के समान ही बालिकाओं का भी यज्ञोपवीत होता था। वे भी मेखला धारण करती थीं। उपनयन संस्कार के बाद शिष्य और शिष्याएं दोनों वेद और शास्त्रों का अध्ययन करते थे तथा शिक्षा पूर्ण होने पर सामान्य छात्र-छात्राएं विवाह कर कर गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर लेते थे जबकि कुछ आजीवन तपोमय जीवन व्यतीत करते थे। इनमें ब्रह्मवेत्ताओं के साथ ब्रह्मवादिनियां भी होती थीं।

साध्वी त्रिकाल भवंता का कहना है कि उनका अखाड़ा महाकुंभ में राष्ट्र निर्माण अखंड भारत वैदिक परंपरा और सनातन धर्म को मजबूत करने का संदेश देगा। इसके साथ ही अखाड़े का विस्तार नेपाल और अमेरिका समेत अन्य दूसरे देशों में भी किया जाएगा। परी अखाड़े की आचार्य महामंडलेश्वर डॉ रेखामणि का कहना है कि 2025 के महाकुम्भ में परी अखाड़े में देश भर से 25 हजार से अधिक महिला संत शिरकत करेंगी।

बेहद कठिन होती है महिला संन्यासियों की तपश्चर्या

दशनामी संन्यासिनी अखाड़े की महामंडलेश्वर श्रद्धा माता कहती हैं कि महिलाओं के सन्यासी बनने की राह आसान नहीं होती। महिला संन्यासिनों को अखाड़े में माता की पदवी पाने के लिए 12 से 15 वर्ष तक कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है। दीक्षा से पूर्व महिला संन्यासिनों को खुद अपना पिंड तर्पण व मुंडन करना पड़ता है। ताकि यह साबित किया जा सके कि अब उसका अपने परिवार और समाज से कोई संबंध व मोह नहीं है। उसके जीवन का एक मात्र लक्ष्य सिर्फ भगवान की भक्ति व जनकल्याण है। इस कठिन तपश्चर्या के बाद जब गुरु को बोध हो जाता है कि साधिका इस पथ पर चलने की पात्रता खुद में विकसित कर चुकी है, तभी उसे संन्यास की दीक्षा दी जाती है। संन्यासिन बनाने से पहले अखाड़े के साधु-संत महिला के घर परिवार और पिछले जीवन की जांच-पड़ताल भी करते हैं। पुरुषों की तरह ही अखाड़ों की महिला संन्यासिनों के लिए भी अखाड़े के नियम निर्धारित हैं, जिनका पालन करना अनिवार्य होता है। महिला साधुओं को माई, अवधूतानी, या नागिन कहा जाता है। महिला साधुओं को बस एक ही कपड़ा पहनने की अनुमति होती है, इसे गंती कहते हैं। महिला संन्यासिनों को सिर्फ एक भगवा वस्त्र व मस्तक पर तिलक धारण करना होता है। सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नित्य कर्मो के बाद इष्ट का भजन पूजन व जप तथा दोपहर में एक समय भोजन। भोजनोपरान्त पुन: जप ध्यान व संध्याकाल में आरती ध्यान के उपरांत शयन। जब महिला संन्यासिन बन जाती है तो अखाड़े के सभी साधु-संत उसे माता कहकर सम्बोधित करते हैं।

श्रीमहंत के पद पर चुनी जाने वाली महिलाएं कुम्भ स्नान के दौरान पालकी में चलती हैं। महिला नागा साधु शाही स्नान के बाद तुरंत जंगलों में तप करने के लिए चली जाती हैं।

कुंभ पर्व में सर्वाधिक आकर्षण का केंद्र होता है किन्नर अखाड़ा

कुंभ पर्व के दौरान सबसे अधिक आकर्षण का केंद्र होता है किन्नर अखाड़ा। यह अखाड़ा, जूना अखाड़ा के साथ जुड़ा हुआ है। इस अखाड़े की प्रमुख आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी के अनुसार अमृत पर्व कुंभ सच में अद्भुत है। यह भारत की अनेकता में एकता, लैंगिक समानता और सनातन धर्म की बहुरंगी संस्कृति का मनमोहक दिग्दर्शन कराता है। किन्नर अखाड़े का लक्ष्य धार्मिक आडंबरों को खत्म करके आम लोगों को सनातन धर्म से जोड़ने की मुहिम चलाने का है। प्रयाग कुंभ के जरिये उनकी योजना देश-दुनिया में सनातन धर्म संस्कृति का प्रचार-प्रसार और विस्तार करने की है।

बताते चलें कि किन्नर अखाड़ा 2018 में स्थापित एक अखाड़ा है। इस अखाड़े ने सर्व प्रथम साल 2019 के प्रयागराज कुंभ मेले में गाजे बाजे के साथ भव्य देवत्व यात्रा निकाली थी। अखाड़े की आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मी नरायण के अनुसार उनका वर्ग देवश्रेणी में आता है। वे कहती हैं, ‘’हम पैदाइशी संन्यासी हैं। हमें सूतक भी नहीं लगता। गोस्वामी तुलसीदास से लेकर महाभारत व तमाम पौराणिक कथानक किन्नर समुदाय की महत्ता को प्रमाणित करते हैं। महाभारत काल में पांडवों के अज्ञातवास के दौरान महान धनुर्धर अर्जुन ने किन्नर “बृहन्नला” और भीष्म से बदला लेने हेतु अंबिका ने किन्नर “शिखंडी” का रूप धारण किया था। महाभारत ही नहीं रामायणकाल में इनका महत्व कम नहीं था। रामायण काल की एक जनश्रुति है कि जब श्रीराम अपने 14 वर्ष के वनवास को अयोध्या से निकले तो उन्होंने अपने साथ आ रही प्रजा को वापस अयोध्या लौटने तक इंतजार करने को कहा और वनवास पूराकर जब वे गृह जनपद वापस लौटे तो राज्य की सीमा पर उन्होंने अपने राज्य के किन्नरों को इंतजार करते पाया। उनकी भक्ति से राम ने खुश हो किन्नरों को वरदान दिया कि उनका आशीर्वाद हमेशा फलित होगा। तब से बच्चे के जन्म और शादी जैसे शुभ अवसरों के दौरान लोग हम किन्नरों का आशीर्वाद प्राप्त करना शुभ मानते हैं।

ज्ञात हो कि किन्नर अखाड़े की आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी उच्च शिक्षित सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उन्होंने मुंबई के सिंघानिया कॉलेज से ग्रेजुएशन किया है तथा उसके बाद इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ प्लानिंग एंड मैनेजमेंट (मुंबई ) से पोस्ट ग्रेजुएशन। साथ ही वे टीवी कलाकार व भरतनाट्यम की कुशल नृत्यांगना भी हैं। उन्होंने किन्नर समाज के अधिकार के लिए काफी काम किया है। महामंडलेश्वर लक्ष्मी नरायण के अलावा प्रयाग कुंभ में शिरकत करने वाली अखाड़े की पीठाधीश्वर प्रभारी उज्जैन की पवित्रा माई, उत्तर भारत की महामंडलेश्वर भवानी मां, महामंडलेश्वर हेमांगी सखी, अन्तर्राष्ट्रीय महामंडलेश्वर डॉक्टर राज राजेश्वरी, जयपुर की मंडलेश्वर पुष्पा माई, दिल्ली की महामंडलेश्वर कामिनी कोहली और पश्चिम बंगाल की मंडलेश्वर गायत्री माई, महाराष्ट्र नासिक की मंडलेश्वर संजना माई जैसी तमाम वरिष्ठ किन्नर संन्यासिनियों का कहना है कि प्रयाग कुंभ में अपना शिविर लगाने के पीछे उनका मूल मकसद किन्नर समाज को सनातन धर्म की मूल विचारधारा से परिचित कराना है। कुंभ पर्व के बाद काशी, प्रयाग, हरिद्वार और नासिक में आश्रम स्थापित करने की तैयारियां जोरों पर हैं। इसके अलावा जिन क्षेत्रों और देशों में किन्नर अखाड़े का गठन नही हुआ है, वहां पदाधिकारी बनाये जाएंगे और वहां उनके मठ-मंदिर, गौशाला, वृद्धाश्रम और विधवाश्रम भी खोले जाएंगे।

आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी कहना है कि अर्जुन और उलूपी के पुत्र अरावन को किन्नरों के अराध्य देव माना जाता है। उनके अनुसार भगवान कृष्ण ने मोहिनी रूप में किन्नरों के अराध्य अरावन से विवाह रचाया था। वे बताती हैं कि द्वापर युग में महाभारत काल के दौरान एक बार अर्जुन ने युधिष्ठिर और द्रौपदी को एकांत में देखकर वैवाहिक नियम भंग किया ओैर दंडस्वरूप उन्हें एक वर्ष के देशाटन की सजा मिली थी। अपनी यात्रा के दौरान वे उत्तर-पूर्व भारत में गये। वहां उनकी भेंट विधवा नाग राजकुमारी उलूपी से हुई और दोनों ने एक दूसरे के प्रेम में पड़कर विवाह कर लिया। अर्जुन से उलूपी को अरावन नाम के एक पुत्र की प्राप्ति हुई। पुत्र जन्म के कुछ समय बाद अर्जुन अपनी आगे की यात्रा पर निकल गये। अरावन की परवरिश नागलोक में अपनी मां के साथ हुई। युवा होने पर महाभारत युद्ध दौरान वे अपने पिता अर्जुन से मिले और उनकी आज्ञा से युद्ध में अपनी वीरता का प्रदर्शन किया। किंवदती है कि पांडवों को महाभारत विजय के लिए एक बलि की जरूरत थी। अरावन इसके लिये तैयार हो गये पर बलि से पहले उन्होंने रात के लिए एक सुंदर स्त्री से विवाह करने की शर्त रखी। कोई विकल्प न होने पर अंततः कृष्ण ने मोहिनी रूप धारण कर अरावन से एक रात का विवाह रचाया और अगले दिन इरावन ने अपने पितृ पक्ष की जीत के लिए अपनी बलि दे दी। इसीलिए किन्नर समाज अरावन को अपना आराध्य मानता है। कहते हैं कि अपने पति अरावन की मृत्यु पर मोहिनी रूपी श्रीकृष्ण ने भारी विलाप किया था। इसीलिए महाभारत कालीन उस घटना की स्मृति में किन्नर समाज आज भी अपने आराध्य अरावन से एक रात की शादी रचाकर उत्सव मनाता है। कूवगम (तमिलनाडु) के विल्लुपुरम में स्थित भगवान अरावन के मंदिर में प्रतिवर्ष तमिल नववर्ष की पहली पूर्णिमा से 18 दिनों तक चलने वाले उत्सव की शुरुआत होती है। इस उत्सव में पूरे भारत वर्ष और आस पास के देशों से किन्नर इकठ्ठा होते हैं और इस उत्सव के दौरान भगवान कृष्ण और अरावन की शादी व उनके बलिदान की कहानी दोहराई जाती है।

Topics: सनातन संस्कृतिMahakumbh 2025अखिल भारतीय अखाड़ा परिषदMahakumbhकुंभ पर्वभारतीय संस्कृति
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