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सट्टे की लत बन रही आफत

आनलाइन गेमिंग कंपनियां कानून में खामी का लाभ उठाकर ‘ओपिनियन ट्रेडिंग’ के नाम पर कर रहीं सट्टे का कारोबार। सरकार द्वारा 28 प्रतिशत जीएसटी लगाने के बावजूद इनका कारोबार बढ़ा

Written byदीपक उपाध्यायदीपक उपाध्याय
Jan 16, 2025, 08:21 am IST
in भारत, विश्लेषण, दिल्ली, सोशल मीडिया

‘ओपिनियन ट्रेडिंग’ की आड़ में इन दिनों देश में आनलाइन सट्टेबाजी का धंधा तेजी से फल-फूल रहा है। ओपिनियन ट्रेडिंग कंपनियां गेमिंग की आड़ में आनलाइन सट्टेबाजी को बढ़ावा दे रही हैं, जिसमें फंसकर लोग अपनी जमा-पूंजी गंवा रहे हैं। आनलाइन गेमिंग एप पर क्रिकेट मैच से लेकर चुनाव, मौसम की भविष्यवाणी तक पर सट्टा लगाया जाता है। ऐसे सैकड़ों देशी-विदेशी एप हैं, जिन पर केसिनो, फुटबॉल, ताश, लूडो, घुड़दौड़ जैसे खेल अब मनोरंजन से इतर सट्टेबाजी का जरिया बन चुके हैं।

दिल्ली के कल्याणपुरी इलाके में रहने वाला राजू अपने परिवार में इकलौता कमाने वाला सदस्य था। वह आॅटो चलाकर अपने परिवार का भरण-पोषण करता था। कुछ माह पहले उस पर जल्दी अमीर बनने का ऐसा नशा चढ़ा कि वह अपने आटो से भी हाथ धो बैठा। राजू और उसके कुछ दोस्त ज्यादा पैसे कमाने के लालच में आनलाइन सट्टा लगाते थे। शुरुआत में वे क्रिकेट मैच के दौरान क्रिकेटरों पर सट्टा लगाते थे। धीरे-धीरे मौसम से लेकर चुनावों तक पर सट्टा लगाने लगे। शुरुआत में क्रिकेट मैच और चुनावों में की गई उनकी भविष्यवाणी सही साबित हुई और उन्होंने अच्छी-खासी रकम भी जीती। इसके बाद यह लत बन गई।

पहले वे ओपिनियन ट्रेडिंग में एक दिन में 200-300 रुपये ही लगाते थे, लेकिन बाद में पूरे दिन की कमाई इसमें लगाने लगे। फिर एक दिन ऐसा भी आया कि राजू और उसके दोस्तों ने अपना आटो गिरवी रखकर पूरा पैसा सट्टे में लगा दिया और हार गए। अब राजू का परिवार दाने-दाने को मुहताज है। यह कहानी केवल राजू की नहीं है। देश में लाखों लोग आनलाइन जुए के चक्कर में फंसे हुए हैं, खासकर युवा वर्ग जल्दी अमीर बनने के लालच में ओपिनियन ट्रेडिंग में फंस जाता है।

तुक्के में कौशल!

रियल मनी गेमिंग यानी जिस गेमिंग में पैसे लगाए जाते हैं, उसमें ओपिनियन ट्रेडिंग सबसे नया गेम है। ओपिनियन ट्रेडिंग में प्रोबो सबसे प्रमुख कंपनी है, जो स्वयं को ओपिनियन ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म ही कहती है। इसी तरह, एक अन्य एप ‘बिग कैश’ खुद को कौशल यानी स्किल आधारित रियल टाइम एप बताता है। प्रश्न है कि महज तुक्का या अनुमान लगाने में कौन-सा कौशल लगता है? लेकिन आज लगभग सभी रियल मनी गेमिंग कंपनियां ओपिनियन ट्रेडिंग कर रही हैं। कॉपीराइट की वजह से ये कंपनियां ओपिनियन ट्रेडिंग को अलग-अलग नामों से बाजार में उतारती हैं।

जैसे-स्पोट्स बाजी नाम की कंपनी पे्रडिक्टर के नाम से ओपिनियन ट्रेडिंग करती है। यह एक आनलाइन गेमिंग है, जिसे खेलना बहुत आसान है। मान लीजिए कि दो क्रिकेट टीमों के बीच कोई मैच खेला जा रहा है, तो उसमें कौन सी टीम जीतेगी और कौन-सी टीम कितने रन बनाएगी, इस अनुमान पर दांव लगाने होते हैं। इसमें दो ही विकल्प दिए जाते हैं- हां या ना। बीते दिनों भारत और आस्ट्रेलिया के बीच खेली गई बॉर्डर-गावस्कर टेस्ट सीरीज के दौरान प्रोबो की साइट पर भारत की जीत पर ‘हां’ में दांव लगाने वाले को एक रुपये के बदले ढाई रुपये दिए जा रहे थे। वहीं, आस्ट्रेलिया की जीत पर दांव लगाने वाले को एक रुपये पर 7:30 रुपये दिए जा रहे थे।

गहराई से पड़ताल करने पर पता चला कि भारत-आस्ट्रेलिया मैच को लेकर प्रोबो की साइट पर 16,000 से अधिक लोगों ने पैसे लगाए थे। आनलाइन सट्टा कैसे लगाया जाए, इसकी पूरी जानकारी कंपनी की वेबसाइट पर दी जाती है। अभी खेले गई टेस्ट सीरीज की ही बात करें तो, वेबसाइट पर दोनों टीमों की पूरी जानकारी होती है। जैसे-अभी तक भारत-आस्ट्रेलिया के बीच खेली गई सीरीज, क्रिकेटरों से जुड़े आंकड़े उपलब्ध होते हैं।

स्पष्ट कानून नहीं

आनलाइन गेमिंग के जाने-माने वकील सिद्धांत अय्यर के मुताबिक, हर राज्य का कानून अलग है। लेकिन इसका आधारभूत कानून 1897 का गैंबलिंग एक्ट है। लगभग सभी राज्यों ने अपने यहां जुए को लेकर कानून तो 1950-60 में ही बना लिए थे। उनके हिसाब से देखा जाए तो जुआ खेलना और खिलाना, दोनों पर प्रतिबंध है। लेकिन राज्यों ने अपने यहां कानून में बदलाव नहीं किया है। जिस समय इन राज्यों में कानून बने, उस समय सट्टेबाजी क्लबों में चलती थी या जुआ खेलने के लिए भूमिगत अड्डे होते थे। तब से अब तक जमाना पूरी तरह बदल चुका है। इंटरनेट के आने के बाद अब आॅनलाइन जुआ खेला जा रहा है। कई राज्यों में आनलाइन गेमिंग को लेकर कोई कानून ही नहीं बना है। वहीं, गोवा, पश्चिम बंगाल, नागालैंड जैसे राज्यों में आनलाइन और आॅपलाइन जुआ खेलने की अनुमति है। इसके लिए राज्य प्राधिकरण लाइसेंस जारी करता है।

अय्यर कहते हैं कि आनलाइन गेमिंग या जुए को लेकर अदालतों ने भी राज्य सरकारों को स्पष्ट कानून बनाने के निर्देश दिए हैं। साथ ही, कहा है कि अगर ओपिनियन ट्रेडिंग और अन्य वेजरिंग (दांव या बाजी) वाले गेम्स को जुआ मानते हैं तो इन्हें बंद करें। देखा जाए तो यह ‘ग्रे इलाका’ है यानी इसे लेकर कोई स्पष्ट कानून नहीं है। दरअसल, सट्टे का आकलन दो तरह से (संयोग और कौशल) किया जा सकता है। यदि संयोग (चांस) अधिक है, तो उसको जुआ या गैम्बलिंग माना जाता है, लेकिन ‘स्किल’ (कौशल) अधिक होने पर इसे सट्टा नहीं माना जाता।

क्या है ओपिनियन ट्रेडिंग?

देश में वैसे तो ढेरों आनलाइन गेमिंग एप चल रहे हैं। इनमें से कुछ एप लोगों को कमाई करने के मौके भी देते हैं। लेकिन ओपिनियन ट्रेडिंग एक नया चलन है, जिसमें व्यक्ति को केवल हां या ना में जवाब देना होता है। इसी से कई गेमिंग कंपनियां करोड़ों रुपये कमा रही हैं। दरअसल, ओपिनियन ट्रेडिंग एप लोगों को यह भरोसा देते हैं कि वे केवल हां या ना में अनुमान लगाकर लाखों रुपये कमा सकते हैं। जैसे- क्या आज बारिश होगी? चुनाव में अमुक पार्टी या उसका प्रत्याशी जीतेगा? क्या विराट कोहली 50 रन बनाएंगे आदि-इत्यादि। इस के जवाब किसी व्यक्ति को सिर्फ हां या ना में देने होते हैं। शुरुआत में ओपिनियन ट्रेडिंग एप पर बोनस के तौर पर कुछ नकद पैसा दिया जाता है। लोग उसी पैसे से और कमाने के लालच में पड़ जाते हैं और फिर अपना सब कुछ गंवाने के बाद आत्महत्या तक कर लेते हैं।

प्रोबो, एमपीएल, ट्रेडेक्स, रियल 11, स्पोट्स बाजी-पे्रडिक्टर, प्लेयर्जपॉट, बैटबॉल11, फैंटेसी क्रिकेट एप, बिग कैश गेमिंग कंपनियां आपिनियन ट्रेडिंग के कारोबार में हैं। इन कंपनियों को बीते वर्ष देश-विदेश से 4200 करोड़ रुपये से अधिक की फंडिंग हुई है। एक आंकड़े के अनुसार, केवल ओपिनियन ट्रेडिंग में ही एक वर्ष में 50,000 करोड़ रुपये से अधिक का लेन-देन हुआ है। इससे रियल मनी गेमिंग कंपनियों ने 1,000 करोड़ रुपये से अधिक कमाए हैं।

आनलाइन गेमिंग बाजार

भारत में आनलाइन गेमिंग उद्योग ने तेजी से विकास किया है। इसमें मोबाइल गेमिंग की स्थिति बहुत मजबूत है और आनलाइन गेमिंग से होने वाली आय में इसकी हिस्सेदारी 90 प्रतिशत है। 2023 में आनलाइन गेमिंग का बाजार 33,000 करोड़ रुपये था। इसमें रियल मनी गेमिंग 16,500 करोड़ रू. का योगदान देकर सबसे बड़ा राजस्व चालक बना हुआ है। 2028 तक देश में आनलाइन गेमिंग उद्योग की14.5 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) से बढ़कर 66,000 करोड़ होने की उम्मीद है। गेमिंग केंद्रित उद्यम पूंजी फर्म लुमिकाई की रिपोर्ट के अनुसार, आनलाइन गेमिंग पर 28 प्रतिशत जीएसटी लगाने के बावजूद इसका बाजार 2023-24 में सालाना राजस्व 23 प्रतिशत की दर से बढ़कर 3.8 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया। अगले 5 वर्ष में यानी 2029 तक 20 प्रतिशत की सालाना वृद्धि दर से इसके 9.2 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। कुछ अनुमान बताते हैं कि भारतीय खिलाड़ियों में से मात्र 17 प्रतिशत ही भारतीय मंचों पर खर्च करते हैं।

आनलाइन सट्टा बाजार

एप डाउनलोड के मामले में भारत सबसे बड़ा मोबाइल गेमिंग बाजार है। देश में 45 करोड़ से ज्यादा गेमर्स हैं। 2025 तक इनकी संख्या के 50 करोड़ पहुंचने की उम्मीद है। भारत में आनलाइन सट्टा बाजार 2025 में बढ़कर 3.20 अरब अमेरिकी डॉलर होने का अनुमान है। अगले 5 वर्ष के दौरान इसमें 4.94 प्रतिशत की सालाना वृद्धि होने की उम्मीद है। इस हिसाब से 2029 तक आनलाइन सट्टा बाजार 3.88 अरब डॉलर होने की संभावना है। लोग आनलाइन सट्टे में जमा-पूंजी गंवा कर कर्ज के दलदल में ही नहीं फंस रहे हैं, बल्कि जान भी दे रहे हैं।

इसके अलावा आनलाइन गेमिंग के और भी नुकसान हैं। इसमें उपयोगकर्ताओं को डराने-धमकाने की भी गुंजाइश रहती है। अक्सर गेम डाउनलोड करने के लिए लिंक ई-मेल या मैसेज के जरिए भेजे जाते हैं, जिनमें मालवेयर या वायरस भी हो सकते हैं, जिनका उपयोग निजी जानकारी चुराने में किया जा सकता है। दूसरी बात, आनलाइन गेम्स डाउनलोड करने के बाद अकाउंट बनाने के लिए निजी जानकारी, जैसे- नाम, मोबाइल नंबर आदि मांगा जाता है, जिनका दुरुपयोग किया जा सकता है।

आनलाइन गेमिंग के दौरान किसी तरह की ठगी या डेटा चोरी की शिकायत साइबर अपराध क्राइम हेल्पलाइन 1930 पर दी जा सकती है या साइबरक्राइमडॉटजी ओवीडॉट पर शिकायत दर्ज की जा सकती है। गेमिंग एप के जरिए बढ़ते फर्जीवाड़े को देखते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय की साइबर विंग ने गेमर्स को सतर्कता बरतने को कहा था। साथ ही, 15 दिसंबर, 2023 तक 581 एप्स को ब्लॉक किया गया था, जिनमें 174 सट्टेबाजी से जुड़े थे।

यह अभियान पर्यावरण को सुरक्षित रखने का संदेश देने के साथ ही लोगों को विश्व के सबसे बड़े मेले से किसी न किसी रूप में जुड़ने का अवसर दे रहा है। यही कारण है कि ‘पर्यावरण संरक्षण गतिविधि’ के इस कार्य की प्रशंसा पूरे देश में हो रही है। 

ओपिनियन ट्रेडिंग की शिकायत

जुए के खिलाफ काम करने वाली संस्था ‘सोसाइटी अगेन्स्ट गैम्बलिंग’ की प्रमुख नेहा वर्मा सवाल उठाती हैं कि किसी तरह की ओपिनियन में ‘स्किल’ कहां होती है? यह तो सीधे-सीधे सट्टा है। आनलाइन कंपनियां ‘स्किल’ के नाम पर लोगों को जुए की लत लगा रही हैं। वे लोगों को अमीर बनाने का सब्जबाग दिखा कर जुए के दलदल में धकेल रही हैं। चूंकि कई राज्यों में इसे लेकर स्पष्ट कानून नहीं है, जिसका लाभ ये कंपनियां उठा रही हैं। हालांकि, राज्य चाहे तो आनलाइन गेमिंग कंपनियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता से लेकर अन्य धाराओं में केस दर्ज कर सकता है। भारतीय न्याय संहिता की धारा 112 और 318 में आनलाइन सट्टा अपराध है। आईटी एक्ट की धारा 66डी में भी यह अपराध है।

नेहा का कहना है कि उनकी संस्था ने आनलाइन सट्टेबाजी मामले में ढेरों गेमिंग कंपनियों के खिलाफ सरकार से शिकायत की है। कुछ मामलों में मुकदमे भी दर्ज हुए हैं। ओपिनियन ट्रेडिंग को लेकर हाल ही में प्रोबो नामक कंपनी के खिलाफ मुंबई में प्राथमिकी दर्ज की गई है। जांच एजेंसियों को पता है कि एप के जरिये किसी मैच या खिलाड़ी या टीम पर पैसा लगाने का मतलब है सट्टा। लेकिन इस बारे में कोई भी आनलाइन गेमिंग कंपनी साफ-साफ कुछ नहीं कहती। लेकिन सोशल मीडिया पर इस आपिनियन ट्रेडिंग को लेकर काफी कुछ कहा जा रहा है। इसलिए सरकार को इस पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।

मोटी कमाई

प्रश्न है कि गेमिंग कंपनियां ओपिनियन ट्रेडिंग क्यों करा रही हैं? गेमिंग उद्योग से जुड़े एक व्यक्ति ने बताया कि पिछले वर्ष अक्तूबर से जीएसटी के 28 प्रतिशत होने के बाद से रियल मनी गेमिंग काफी मुश्किल दौर से गुजर रही है। इन कंपनियों को विदेशों से मिलने वाली फंडिंग तो कम हो ही गई है, अवैध गैम्बलिंग भी इन कंपनियों के कारोबार पर चोट कर रही है। लिहाजा, आनलाइन गेमिंग कंपनियां आपिनियन ट्रेडिंग में उतर गईं। इससे उन्हें न केवल मोटी कमाई हो रही है, बल्कि विदेशों से कुछ कंपनियों को इसके लिए पैसे भी मिल रहे हैं।

Topics: ओपिनियन ट्रेडिंग कंपनियां गेमिंगIndia-Australia matchonline bettingopinion trading platformopinion trading companies gamingपाञ्चजन्य विशेषभारत-आस्ट्रेलिया मैचआनलाइन सट्टाओपिनियन ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म
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