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वामपंथी और सोशलिस्ट संविधान सभा के विरोधी

कम्युनिस्टों और सोशलिस्टों ने संविधान सभा का विरोध किया था। बाद में वे इसमें शामिल होना चाहते थे तो नेहरू ने पल्ला झाड़ लिया

Written byरामबहादुर रायरामबहादुर राय
Jan 5, 2025, 02:45 pm IST
in भारत, विश्लेषण
भारतीय संविधान सभा का प्रथम दिन 9 दिसम्बर, 1946)। (दाएं से) बीजी खेर, सरदार वल्लभ भाई पटेल एवं उनके पीछे केएम मुंशी

भारतीय संविधान सभा का प्रथम दिन 9 दिसम्बर, 1946)। (दाएं से) बीजी खेर, सरदार वल्लभ भाई पटेल एवं उनके पीछे केएम मुंशी

कम्युनिस्टों को खासकर, भारत में इसकी उम्मीद नहीं थी कि संसदीय राजनीति में उनकी कोई खास भूमिका रहेगी। इसलिए संविधान, जिसका मूल 1935 का है, वह संसदीय राजनीति के ढर्रे पर है। यानी ब्रिटेन में जो प्रणाली है, वही हमारे यहां भी कुछ खास परिवर्तन से चलेगी। इसलिए जब संविधान सभा का गठन हुआ, तो कम्युनिस्टों ने उसका बहिष्कार किया। उस समय कम्युनिस्ट पार्टी का नेतृत्व तीन लोगों के हाथ में था- बीटी रणदिवे, पीसी जोशी और श्रीपाद अमृत डांगे। पीसी जोशी अपेक्षाकृत डेमोक्रेटिक थे, जबकि रणदिवे स्टालिनवादी। तब कम्युनिस्ट पार्टी लंदन से निर्देशित होती थी।

राम बहादुर राय
अध्यक्ष, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र

राज थापर लंदन जाकर भारत के कम्युनिस्टों के झगड़े सुलझाती थीं। उनकी पुस्तक All these years : a memoirl में इसका उल्लेख है। राज थापर मासिक पत्रिका ‘सेमिनार’ की संस्थापक-संपादक थीं। संविधान के प्रति कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं का रवैया सामान्य तौर पर तो विरोध में था। लेकिन इनके बीच भी आपसी मतभेद थे। पीसी जोशी संविधान में कम्युनिस्ट पार्टी का प्रतिनिधित्व चाहते थे, जबकि बीटी रणदिवे ऐसा नहीं चाहते थे। बाद में यही रणदिवे थे, जिन्होंने तेलंगाना की लाइन ली और तेलंगाना विद्रोह हुआ। उस समय कम्युनिस्ट पार्टी उसी तरह अंदरूनी झगड़े से जूझ रही थी, जैसे कभी रूस (सोवियत संघ) में मेन्शेविक और बोल्शेविक जूझ रहे थे। राज थॉपर की पुस्तक में इन सब बातों का उल्लेख है। चूंकि वामपंथी संविधान सभा के खिलाफ थे, इसलिए पश्चिम बंगाल से कम्युनिस्ट पार्टी (लेनिनवादी) के केवल एक नेता को इसमें शामिल किया गया, वह भी नेहरू और पीसी जोशी के आपसी संबंधों के कारण।

दरअसल, संविधान एक बहती हुई गंगा है, जो राजनीतिक विचारधाराओं के लिए नहर का काम करती है। सिंचाई तो नहर से ही होनी है, गंगा से नहीं। मतलब, संविधान एक व्यवस्था देता है। वामपंथी जिस भारत को जिस व्यवस्था में ले जाना चाहते थे, वह मॉस्को की लाइन थी, जो संविधान के विपरीत थी। इसलिए वे इसके खिलाफ थे। इसी तरह, कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के जितने भी नेता मार्क्सवादी प्रभाव में थे, वे भी संविधान सभा के खिलाफ थे। इसलिए कम्युनिस्टों और सोशलिस्टों ने घोषित तौर पर संविधान सभा का बहिष्कार किया। 1948 में कानपुर अधिवेशन से कांग्रेस सोशलिस्ट नाम का फोरम कांग्रेस से अलग हुआ और सोशलिस्ट पार्टी का गठन हुआ। उसी में संविधान सभा के विरोध का निर्णय भी लिया गया। संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव तो पहले ही हो गया था। इसलिए इन लोगों ने तय कर लिया था कि उसका बहिष्कार करना है। जैसे-जैसे संविधान सभा का काम शुरू हुआ, कम्युनिस्ट पार्टी और सोशलिस्ट पार्टी के अंदर एक बहस शुरू हुई कि उन्हें भी संविधान सभा में शामिल होना चाहिए, ताकि वहां अपनी बात रख सके। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी।

जवाहर लाल नेहरू का जो पत्र व्यवहार है, उसमें जेपी और कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं के साथ उनका पत्र व्यवहार भी है। इसमें उन्होंने साफ लिखा है कि वे चाह कर भी सोशलिस्टों और कम्युनिस्टों के लिए संविधान सभा में जगह नहीं बना सकते। संविधान सभा ने लगभग तीन वर्ष काम किया और कुल 165 दिनों तक चर्चा हुई। इनमें संविधान के मसौदे पर 114 दिन की चर्चा भी शामिल है। उधर, संविधान सभा में बहस हो रही थी और इधर कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट पार्टी के नेता उस बहस को ध्वस्त करने, उसकी आलोचना करने में लगे हुए थे। उनके एकाध अपवाद थे। यही नहीं, कांग्रेस पार्टी के सोशलिस्ट जो संविधान सभा के बाहर थे, वे भी आलोचना कर रहे थे। इनके विरोध का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि आगरा में एक कार्यक्रम में गोविंद बल्लभ पंत के एक मंत्री संविधान सभा पर टिप्पणी कर रहे थे। संविधान सभा में आगरा से चुने हुए सदस्य पंडित रघुनाथ विनायक धुलेकर ने यह सवाल भी उठाया था कि पंत जी का मंत्रि (कांग्रेस के मंत्री) संविधान सभा पर बहुत ही तीखी टिप्पणी कर रहे थे। हालांकि उस पर चर्चा नहीं हुई।

इसी तरह, संविधान सभा के बाहर एक व्यक्ति, जो संविधान सभा के काम-काज को ठीक संदर्भ में देख रहे थे, उस पर टिप्पणी कर रहे थे। वे थे- पंडित दीनदयाल उपाध्याय। संविधान सभा की बहसों पर उनके चार लेख हैं। अंतिम लेख में उन्होंने लिखा है कि संविधान बन गया है। इस लेख में वे यह सलाह देते हैं कि संविधान जैसा बन गया है, उसे सभी को स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि इसे हमारे लोगों ने बनाया है। बाद में जहां-जहां इसमें सुधार की आवश्यकता होगी, उसमें समय-समय पर सुधार किया जाना चाहिए। इसका परिष्कार किया जाना चाहिए।

दरअसल, 1916-17 से लेकर 1947 तक नेहरू की पूरी राजनीति वामपंथियों और समाजवादियों को अपने पक्ष में करने की रही। 1947 के बाद नेहरू यह चाहते थे कि वे उनके हरावल दस्ते का काम करें, जैसा वे 1947 के पहले करते थे। लेकिन उन लोगों ने 1947 के बाद समानांतर लाइन पकड़ी, जो जगह-जगह टकरा रही थी। वास्तव में नेहरू कांग्रेस के नेता नहीं थे, वे सरकार के नेता थे। कांग्रेस की कमान तो 1946 से ही सरदार पटेल के हाथ में थी। कांग्रेस संगठन के फैसले सरदार पटेल के निर्णय पर हो रहे थे, जबकि सरकार के फैसले दोनों की सहमति से हो रहे थे। हालांकि, यह जरूरी नहीं था कि सरदार की सारी बातें मान ली जाएं, लेकिन जो भी फैसले लिए जा रहे थे, वे समाजवादियों और वामपंथियों के के अनुरूप नहीं थे, इसलिए टकराव दिखता था। इसी टकराव ने अंत में नेहरू को संविधान में संशोधन के लिए मजबूर किया।

जिस तरह से अंग्रेजी पत्रिका ‘आर्गनाइजर’ के संपादक केआर मलकानी पर मुकदमा दर्ज हुआ, उसी तरह थापर पर भी मुकदमा दर्ज हुआ। इस प्रकार 1948 में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर तीन पत्रकारों का मामला सर्वोच्च न्यायालय में गया, जिनमें दो कम्युनिस्टों के थे। सर्वोच्च न्यायालय ने जब पत्रकारों के पक्ष में निर्णय दिया तो नेहरू बौखला गए। नेहरू की नाराजगी नीतिगत नहीं थी। उनकी नाराजगी इस बात को लेकर थी कि ‘जब हम यहां हैं तो आप विरोध क्यों कर रहे हैं?

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