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कांग्रेस को ले डूबा ‘परिवार’

चुनाव परिणाम यदि कांग्रेस की अपेक्षा के अनुसार न हो तो वह ईवीएम राग अलापना शुरू कर देती है। अपनी खामियों को दूर करने की बजाए अपनी हार का ठीकरा दूसरों पर फोड़ना कांग्रेस की पुरानी आदत है

Written byPanchjanyaPanchjanya
Dec 12, 2024, 08:02 am IST
in विश्लेषण, महाराष्ट्र
कांग्रेस हार के बाद निर्वाचन आयोग की निष्पक्ष्ता पर सवाल उठाती रही है

कांग्रेस हार के बाद निर्वाचन आयोग की निष्पक्ष्ता पर सवाल उठाती रही है

कोई भी चुनाव परिणाम यदि कांग्रेस के अनुकूल न हो तो वह चुनाव की निष्पक्षता पर आरोप लगाने से बाज नहीं आती। महाराष्ट्र चुनाव के बाद कांग्रेस ने एक बार फिर चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाया लेकिन इस बार उसने सारी परंपराओं और संवैधानिक मर्यादाओं को ताक पर रख दिया।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और महाराष्ट्र विधान परिषद में विपक्ष के उपनेता अशोक जगताप उर्फ भाई जगताप ने देश की प्रमुख संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल किया। लेकिन कांग्रेस ने जगताप के इस बयान की निंदा करने की बजाय पार्टी की वर्किंग कमेटी की बैठक बुलाकर चुनाव आयोग पर धांधलियों का आरोप लगाते हुए सड़कों पर उतरने का ऐलान कर दिया है।

हर बार लगाया जाता है आरोप

कांग्रेस ने चुनाव आयोग पर पहली बार हमला नहीं किया है। वह इससे पहले भी पराजित होने के बाद ईवीएम मशीनों दुरुपयोग कर भाजपा को जिताने का आरोप लगाकर चुनाव आयोग पर निशाना साधती रही है और उसे मोदी सरकार की कठपुतली बताती रही है। पर,अब कांग्रेस का यह रवैया जिस तरह सारी मर्यादाओं को ताक पर रख देने पर पहुंच गया है, उससे यही लगता है कि कांग्रेस न अतीत से कुछ सीखना चाहती है और न वर्तमान से ।

वह संविधान की रक्षा की चाहे जितनी दुहाई दे लेकिन वास्तव में उसके हृदय में न लोकतंत्र और लोकतांत्रिक तौर-तरीकों के लिए कोई आदर है, न जनमत के लिए कोई सम्मान है। उसका शीर्ष नेतृत्व आज तक यह सच स्वीकार नहीं कर पाया है कि उसने अपनी नीति और नीयत से जनता का भरोसा खो दिया है।

कांग्रेस इस तरह का आचरण तब कर रही है जब चुनाव आयोग उसकी ही नहीं बल्कि किसी भी राजनीतिक दल की तरफ से उठने वाले सारे सवालों का तर्कों और तथ्यों के साथ जवाब देकर उनके संदेह को दूर करने तथा संतुष्ट करने की कोशिश करता चला आ रहा है।

अब सर्वोच्च न्यायालय तक ने ईवीएम की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठाने वाली याचिका को यह कहकर खारिज कर दिया है कि ‘जब आप जीतते हो तो ईवीएम ठीक और हारते हो तो वह दोषी।’ वह इसके लिए फटकार लगा चुका है कि ऐसा रवैया ठीक नहीं है।

कांग्रेस का दोहरा रवैया

महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव से पहले इसी वर्ष लोकसभा के भी चुनाव हुए हैं, जिसमें कांग्रेस ने पिछले चुनावों से बेहतर प्रदर्शन किया था। हरियाणा के साथ जम्मू-कश्मीर और महाराष्ट्र के साथ झारखंड विधानसभा के भी चुनाव हुए। इनमें जम्मू-कश्मीर और झारखंड में कांग्रेस गठबंधन की ही सरकार बनी है, बावजूद इसके अगर कांग्रेस ईवीएम और चुनाव आयोग की नीयत पर प्रश्न खड़ा करती है तो फिर उसके तर्क जमीन पर टिकते नहीं दिखते।

कांग्रेस इस सवाल का अब तक संतोषजनक जवाब नहीं दे पाई है कि अगर भाजपा ईवीएम के जरिये ही चुनाव जीत रही है तो उसने जम्मू-कश्मीर और झारखंड विधानसभा का चुनाव जीतकर भी इन दोनों राज्यों में अपनी सरकारें क्यों नहीं बना लीं? उप चुनाव में पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस विधानसभा के सभी छह सीटों का उपचुनाव जीत गई।

यहां तक कि आम चुनाव में भाजपा को मिली मदारीहाट सीट भी तृणमूल कांग्रेस ने जीत ली। भाजपा ने जान-बूझकर रणनीति के तहत जम्मू-कश्मीर और झारखंड विधानसभा चुनाव हारा ताकि किसी को ईवीएम मशीनों के दुरुपयोग के आरोपों पर भरोसा न हो, ऐसे तर्क देने वालों की बुद्धि पर तरस ही खाया जा सकता है।

अगर कांग्रेस के इन आरोपों को सही मान भी लिया जाए कि महाराष्ट्र और हरियाणा में भाजपा की सरकारें होने के कारण उसे प्रशासनिक मशीनरी के दुरुपयोग की सुविधा थी जो दूसरी जगह नहीं थी, तब कांग्रेस को बताना चाहिए कि भाजपा हिमाचल और कर्नाटक क्यों हार गई थी?

खामियां छिपाने की कोशिश

कांग्रेस चाहे जो आरोप लगा रही है, वे तर्कों की कसौटी पर नहीं टिकते। राजनीतिक विश्लेषक प्रो. ए.पी. तिवारी कहते हैं कि हारने पर संवैधानिक व्यवस्था पर प्रहार और आंदोलन की बात कांग्रेस की इसी प्रवृत्ति का प्रमाण है। यह उसकी न सुधरने वाली आदत बन गई है। कांग्रेस शायद यह भूल गई है कि इतिहास में ढेरों ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं जब उसने संवैधानिक संस्थाओं को नीचा दिखाने की कोशिश की और इनके निर्देशों और आदेशों को मानने से इनकार कर दिया। आपातकाल कांग्रेस की इसी तरह की मानसिकता का एक निकृष्टतम उदाहरण है।

न्यायालय का आदेश ताक पर

1971 की बात है। बड़े समाजवादी नेता राजनारायण ने इंदिरा गांधी के खिलाफ रायबरेली से लोकसभा का चुनाव लड़ा। राजनारायण चुनाव हार गए। उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में इंदिरा गांधी के निर्वाचन को याचिका के जरिये चुनौती दी, उन्होंने इंदिरा गांधी पर सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कर चुनाव जीतने का आरोप लगाया। इसी बीच, देश में इंदिरा गांधी के शासन की नीतियों के विरुद्ध छिड़ा आंदोलन लगातार जोर पकड़ता जा रहा था। राजनारायण की याचिका पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 12 जून, 1975 को फैसला सुनाते हुए इंदिरा गांधी को सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल कर धांधली से चुनाव जीतने का दोषी माना।

न्यायालय ने इंदिरा गांधी का निर्वाचन रद्द कर दिया और उन्हें 6 साल तक चुनाव लड़ने के अयोग्य भी घोषित कर दिया। पर, इंदिरा गांधी ने न्यायालय का फैसला स्वीकार करने के बजाय देश में आपातकाल लगाकर लगभग संपूर्ण विपक्ष को जेल में डाल दिया। यही नहीं, इंदिरा गांधी ने संविधान को अंगूठा दिखाते हुए लोकसभा का एक-एक वर्ष कर दो बार कार्यकाल भी बढ़ा लिया। इस तरह 1971 में गठित लोकसभा का कार्यकाल 7 वर्ष का रहा।

मजेदार बात यह है कि भाजपा पर तमाम आरोप लगाने वाली कांग्रेस को आज याद तक नहीं है कि उसने आपातकाल के दौरान एक तरह से विपक्ष विहीन लोकसभा और राज्यसभा का मनमाने तरीके से इस्तेमाल किया। कांग्रेस को याद रखना चाहिए कि इंदिरा गांधी के विरुद्ध फैसला देने वाले इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की वरिष्ठता की अनदेखी करके उन्हें देश का मुख्य न्यायाधीश नहीं बनने दिया गया ।

अलग-थलग पड़ती कांग्रेस

इस प्रसंग को याद दिलाने का उद्देश्य सिर्फ यह है कि किसी संवैधानिक संस्था और व्यवस्था पर आरोप लगाने से पहले कांग्रेस को उन्हें तथ्यों और तर्कों की कसौटी पर भी कस लेना चाहिए और अपने साथियों और पार्टी के भीतर से उठने वाली आवाजों को भी सुन लेना चाहिए। आरोप लगाने से पहले उसे महाराष्ट्र को लेकर उस कथित आंतरिक सर्वेक्षण के तथ्यों का विश्लेषण कर लेना चाहिए जो अब सार्वजनिक हो रहे हैं, जिनका कांग्रेस की तरफ से अभी तक कोई खंडन भी नहीं किया गया है, जिनके अनुसार कांग्रेस को ही नहीं महाविकास अघाड़ी के सभी प्रमुख नेताओं को बता दिया गया था कि लोकसभा चुनाव में मिला समर्थन तेजी से गिर रहा है।

मुस्लिम वोटों के अलावा शेष सभी वर्गों का वोट उससे दूर जा रहा है। आरोप लगाने से पहले कांग्रेस को अपनी सहयोगी पार्टी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की नेता सुप्रिया सुले और अपनी ही पार्टी के नेता पूर्व मंत्री पी. चिदंबरम तथा उनके पुत्र कार्ति चिदंबरम की बातों को भी सुन लेना चाहिए, जिनमें ये ईवीएम मशीनों में हेराफेरी के तर्क से सहमत नहीं दिखते। यही नहीं, इंडी गठबंधन के अन्य कई घटक दलों की तरफ से इस मुद्दे पर कांग्रेस के साथ खड़े होने में संकोच दिखाया गया है। कांग्रेस के लिए यह आत्ममंथन का प्रश्न होना चाहिए पर, उससे इसकी ज्यादा उम्मीद नहीं है।

दिक्कत है राजशाही मानसिकता

वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल कहते हैं कि सारी दिक्कत सोच और मानसिकता की है। नेहरू-गांधी परिवार आज नहीं, शुरू से ही राजशाही मानसिकता से काम करता रहा है। इंदिरा गांधी ने अपनी गलतियों को स्वीकार करने के बजाय पार्टी का विभाजन करा दिया। इस परिवार के मन-मस्तिष्क से यह सोच शायद आज भी नहीं निकल पा रही है कि वे सर्वश्रेष्ठ हैं। उन्हें तो चुनाव जीतना ही चाहिए।

अगर कांग्रेस हारी है तो गलती उनकी नहीं बल्कि दूसरों की है। इसीलिए कांग्रेस की तरफ से पराजय के वास्तविक कारणों को समझकर उसमें सुधार करने के बजाय हार का सारा ठीकरा चुनाव आयोग और ईवीएम मशीनों पर फोड़ सड़क पर उतरने और चुनाव आयोग के खिलाफ आंदोलन का ऐलान हो रहा है, जिससे नेहरू परिवार विशेषतौर से राहुल गांधी की क्षमता पर कोई सवाल न उठे। पर, इससे कांग्रेस का कोई भला नहीं होने वाला।

उलटे वह अपने सहयोगियों का भरोसा और बचा-खुचा समर्थन भी खो देगी। लाल का तर्क सही है। ईवीएम और चुनाव आयोग पर कांग्रेस के हमलों से जिस तरह उसके सहयोगियों ने दूरी बनानी शुरू की है उसने उमर अब्दुल्ला से लेकर हेमंत सोरेन तक को केंद्र से मधुर रिश्तों की बात करने को मजबूर कर दिया है।

ममता बनर्जी को इंडी गठबंधन का नेता बनाना और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाने की मांग तकनीकी और व्यावहारिक रूप से भले ही अभी जमीन पर उतरती न दिख रही हो लेकिन तृणमूल कांग्रेस की तरफ से जिस तरह कांग्रेस व राहुल गांधी पर निशाना साधा गया है, वह यह बताने को पर्याप्त है कि कांग्रेस की अतीतजीवी मानसिकता और राहुल गांधी के नेतृत्व को लेकर उसके सहयोगी भी अब ऊब रहे हैं ।

वरिष्ठ पत्रकार वीरेन्द्र भट्ट भी कहते हैं कि इस बार चुनाव आयोग पर निशाना साधने के पीछे सारा जतन राहुल गांधी की अक्षमता और असफलता पर परदा डालने का ही दिख रहा है। वे कहते हैं कि राहुल की अगुआई में एक के बाद एक 89 चुनाव हार चुकी कांग्रेस अगर चुनाव आयोग पर निशाना साधकर यह सोच रही है कि जनता उसके तर्कों को मान लेगी तो वह गलतफहमी में है।

उलटे कांग्रेस के बेतुके तर्कों और हर हाल में खुद को जीतता हुआ दिखाने की जिद से जनता के मन में कांग्रेस को लेकर यह भाव आने लगा है कि इस पार्टी की लोकतंत्र और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर ही नहीं, जनता के निर्णय पर भी आस्था नहीं रही है।

आरोपों से इतर हकीकत

लोकसभा चुनाव में भाजपा की सीटें घटने और कांग्रेस के हिस्से में 99 सीटें आने पर कांग्रेस में दंभ आ गया था। कांग्रेस को लग रहा था कि अब यह जारी रहेगा। हरियाणा, जम्मू-कश्मीर से लेकर महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा के चुनाव तो औपचारिकता मात्र हैं। उसने आदत के मुताबिक इस तथ्य पर विचार ही नहीं किया कि महाराष्ट्र में उसके गठबंधन को मिले वोटों का अंतर भाजपा गठबंधन से बहुत ज्यादा नहीं है।

वह आत्मविश्वास में डूबी रही। उधर, भाजपा ने लोकसभा चुनाव नतीजों से सबक लिया और अपनी कमियों को पहचान कर उन्हें दूर किया, पर अतिआत्मविश्वास में डूबे कांग्रेस नेतृत्व ने हरियाणा से लेकर महाराष्ट्र तक अपने खास चेहरों को ही महत्व दिया। इससे कांग्रेस के भीतर ही क्षोभ बढ़ा।

हरियाणा चुनाव के बाद कांग्रेस के ईवीएम की बैटरी कमजोर होने जैसे आरोपों का आयोग की तरफ से जिस तरह 1600 पन्नों की विस्तृत जांच रिपोर्ट में ब्योरेवार जवाब दिया जा चुका है, इसके बाद भी कांग्रेस यदि यह सोच रही है कि वह आयोग के खिलाफ आंदोलन करके लोगों का भरोसा हासिल कर लेगी तो वह भ्रम में है। देश को अपनी पैतृक संपत्ति मानने का भ्रम पाल चुकी कांग्रेस के ‘परिवार’ से गलतियों से कुछ सीख लेने की उम्मीद करना बेकार है।

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