मुस्लिम व्यक्ति कर सकते हैं एक से अधिक शादियों का पंजीकरण: बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले से इस्लामिक कुरीति पर फिर उठा सवाल
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मुस्लिम व्यक्ति कर सकते हैं एक से अधिक शादियों का पंजीकरण: बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले से इस्लामिक कुरीति पर फिर उठा सवाल

जहां एक तरफ महिलाओं के अधिकारों और समानता की बात हो रही है, वहीं दूसरी तरफ ऐसे फैसले उन सामाजिक परंपराओं को बनाए रखते हैं जो महिलाओं के साथ भेदभाव को बढ़ावा देती हैं।

Written byShivam DixitShivam Dixit
Oct 22, 2024, 06:29 pm IST
inभारत, मत अभिमत, महाराष्ट्र

बॉम्बे हाई कोर्ट ने मंगलवार को एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत एक से अधिक शादियों को पंजीकृत करवाने की अनुमति दी जा सकती है। कोर्ट ने साफ किया कि मुस्लिम व्यक्ति अपनी दूसरी या तीसरी शादी का भी पंजीकरण करवा सकते हैं, क्योंकि मुस्लिम पर्सनल लॉ कई विवाहों की अनुमति देता है। यह फैसला कोर्ट के सामने एक याचिका के दौरान आया, जिसमें एक मुस्लिम व्यक्ति ने अपनी तीसरी शादी के पंजीकरण की मांग की थी।

फैसले की पृष्ठभूमि

मामला तब सामने आया जब एक मुस्लिम व्यक्ति ने अपनी तीसरी पत्नी के साथ शादी पंजीकृत करने के लिए ठाणे नगर निगम के विवाह पंजीकरण कार्यालय में आवेदन दिया, जिसे अधिकारियों ने यह कहकर खारिज कर दिया कि महाराष्ट्र विवाह ब्यूरो विनियमन और विवाह पंजीकरण अधिनियम के तहत एक समय में केवल एक विवाह को पंजीकृत किया जा सकता है। याचिकाकर्ता ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और इस मामले पर न्याय की मांग की।

कोर्ट में न्यायमूर्ति बी.पी. कोलाबावाला और न्यायमूर्ति सोमशेखर सुंदरसन की पीठ ने सुनवाई के बाद निर्णय लिया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार, एक व्यक्ति को चार शादियां करने का अधिकार है और इस पर किसी प्रकार का कोई कानूनी प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है। कोर्ट ने अधिकारियों के इस तर्क को अस्वीकार कर दिया कि महाराष्ट्र विवाह पंजीकरण अधिनियम केवल एक विवाह को मान्यता देता है।

कुरीति के सवाल

हालांकि यह फैसला मुस्लिम पर्सनल लॉ के अंतर्गत आता है, लेकिन इसने समाज में एक बार फिर से बहुविवाह जैसी कुरीतियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जहां एक तरफ महिलाओं के अधिकारों और समानता की बात हो रही है, वहीं दूसरी तरफ ऐसे फैसले उन सामाजिक परंपराओं को बनाए रखते हैं जो महिलाओं के साथ भेदभाव को बढ़ावा देती हैं।

समाज के विभिन्न वर्गों का मानना है कि एक समय में एक से अधिक शादियों की प्रथा महिलाओं के अधिकारों और उनकी स्वतंत्रता पर चोट करती है। आधुनिक समाज में जहां महिलाओं के अधिकारों और उनकी शिक्षा पर जोर दिया जा रहा है, ऐसे फैसलों से उनके अधिकारों को कमतर आंकने का जोखिम होता है। बहुविवाह की प्रथा को महिलाओं के अधिकारों और उनके प्रति हो रहे अन्याय के रूप में देखा जा सकता है, और इसे एक सामाजिक कुरीति के रूप में खत्म करने की जरूरत है।

अधिकारियों के तर्क

ठाणे नगर निगम के अधिकारियों ने याचिकाकर्ता के आवेदन को यह कहकर खारिज किया था कि उन्होंने अपनी तीसरी शादी के पंजीकरण के लिए सभी आवश्यक दस्तावेज जमा नहीं किए हैं। हालांकि, अदालत ने निर्देश दिया कि दंपति सभी आवश्यक दस्तावेजों को दो सप्ताह के भीतर प्रस्तुत करें, जिसके बाद अधिकारी व्यक्तिगत सुनवाई करेंगे और दस दिनों के भीतर विवाह पंजीकरण को मंजूरी देने या अस्वीकार करने का निर्णय देंगे।

आगे का रास्ता

हालांकि, बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस मुद्दे पर फैसला सुनाकर मुस्लिम पर्सनल लॉ का सम्मान किया है, लेकिन यह जरूरी है कि बहुविवाह जैसी कुरीतियों पर समाज और न्यायपालिका को गहराई से विचार करने की जरूरत है। समय के साथ ऐसे कानूनों और परंपराओं की समीक्षा की जानी चाहिए ताकि समाज में लैंगिक समानता और महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

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Shivam Dixit
Shivam Dixit
अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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