विश्व के सबसे विशाल और संख्या में सबसे बड़े संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नींव आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने 1925 में विजयादशमी के दिन रखी थी। प्यार से स्वयंसेवक उन्हें डॉक्टर जी कहा करते थे। डॉक्टर जी ने जब संघ की स्थापना की थी तब उनकी आयु मात्र 36 वर्ष थी। वह काल ऐसा था जब अंग्रेजों की दासता में भारतीय संस्कृति को अपमानित किया जा रहा था। असल में तो इसी से व्यथित होकर डॉ. हेडगेवार ने संघ की स्थापना की थी। नि:संदेह उनमें समाज सेवा तथा देशभक्ति की भावना कूट-कूटकर भरी थी। बाल्यावस्था में ही उन्होंने अपने मित्रों के साथ सीताबर्डी के दुर्ग से अंग्रेजों का यूनियन जैक उतारने की योजना को आकार देने के लिए एक सुरंग बनाने की तैयारी की थी। इस घटना से पता चलता है कि देश की दासता से वे कितने आहत थे और गुलामी को हमेशा के लिए मिटा देना चाहते थे।
इस वर्ष यानी 2024 में सम्पन्न संघ की प्रतिनिधि सभा में आए विवरण के अनुसार, वर्तमान में संघ की देश के 922 जिलों, 6597 खंडों और 27,720 मंडलों में 73,117 दैनिक शाखाएं हैं। प्रत्येक मंडल में 12 से 15 गांव आते हैं। समाज के हर क्षेत्र में संघ की प्रेरणा से अनेक संगठन चल रहे हैं जो राष्ट्र निर्माण तथा हिंदू समाज को संगठित करने में अपना योगदान दे रहे हैं।

दूर हुए सब अवरोध
अब तक संघ पर तीन बार प्रतिबंध लगाया गया है। हिन्दुत्व विरोधी सेकुलर दलों ने षड्यंत्रपूर्वक संघ की गतिविधियों को हमेशा के लिए रोक देने के कुचक्र चलाए हैं। पहला प्रतिबंध गांधी जी की हत्या के बहाने 1948 में, दूसरा तत्कालीन इंदिरा सरकार ने आपातकाल लगाकर 1975 में एवं तीसरी बार अयोध्या में विवादित बाबरी ढांचे के गिराने पर 1992 में संघ की शाखाओं और अन्य गतिविधियों को प्रतिबंधित किया गया था। लेकिन तीनों बार संघ पहले से भी अधिक मजबूत होकर उभरा। सर्वोच्च न्यायालय तक ने अनेक निर्णयों में माना है कि संघ एक सामाजिक—सांस्कृतिक संगठन है। अदालत में विरोधियों ने हर बार हार का मुंह देखा है।
संघ ‘हिन्दू’ शब्द की व्याख्या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के संदर्भ में करता है जो किसी भी तरह से (पश्चिमी) पांथिक अवधारणा के समान नहीं है। इसकी विचारधारा और मिशन का सम्बन्ध स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरविन्द, बाल गंगाधर तिलक और बी. सी. पाल जैसे हिन्दू विचारकों के दर्शन से है। विवेकानंद ने यह महसूस किया था कि ‘सही अर्थों में एक हिन्दू संगठन अत्यंत आवश्यक है, जो हिन्दुओं को परस्पर सहयोग और सराहना का भाव सिखाए’।
स्वामी विवेकानंद के इस विचार को डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने व्यावहारिक रूप दिया। उनका मानना था कि हिन्दुओं को एक ऐसे कार्य-दर्शन की आवश्यकता है जो इतिहास और संस्कृति पर आधारित हो, जो उनके अतीत का हिस्सा हो और जिसके बारे में उन्हें कुछ जानकारी हो। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाएं ‘स्व’ के भाव को परिशुद्ध कर एक बड़े सामाजिक और राष्ट्रीय हित की भावना में सम्मिलित कर देती हैं। वस्तुत: हम यह कह सकते हैं कि हिन्दू राष्ट्र को स्वतंत्र करने व हिन्दू समाज, हिन्दू धर्म और संस्कृति की रक्षा कर राष्ट्र को परम वैभव तक पहुंचाने के उद्देश्य से ही डॉक्टर जी ने संघ की स्थापना की थी।
महान भारत का संकल्प
संघ क्योंकि एक सामाजिक संगठन है अत: इसकी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं है, और न ही यह राजनीतिक परिणामों के लिए काम करता है। हालांकि राष्ट्रीय राजनीतिक जीवन पर इसका प्रभाव परिलक्षित होता है, तो भी यह राजनीति से दूर रहता है। इसकी शाखा पद्धति में जरूर ऐसे स्वयंसेवक तैयार हुए हैं, जो आज राजनीतिक क्षेत्र में उच्च स्थान पर हैं। संघ का सिद्धांत यह है कि संघ शाखा चलाने के सिवाय कुछ नहीं करेगा और स्वयंसेवक कोई कार्यक्षेत्र अछूता नहीं छोड़ेगा। स्वयंसेवक समाज के सभी क्षेत्रों यथा-शिक्षा, राजनीति, अथर्शास्त्र, सुरक्षा व संस्कृति इत्यादि में काम करते हैं। संघ का केवल एक ध्येय है-भारत को महान बनाना; एक सशक्त हिन्दू समाज के निर्माण के लिए सभी जाति-वर्ग के लोगों को एक करना।
महात्मा गांधी की जिज्ञासा
गांधी जी का एक प्रश्न था कि डॉक्टर जी ने अपना संगठन कांग्रेस जैसी लोकप्रिय संस्था की छाया में ही क्यों नहीं प्रारंभ किया? क्या कांग्रेस ने आर्थिक समर्थन देने से इनकार किया था? उदारमना लोगों की क्या कांग्रेस में कमी थी? इन प्रश्नों पर डॉक्टर जी का उत्तर था, ‘‘ कांग्रेस का कार्य करते समय उसकी छाया में स्थायी स्वयंसेवक संगठन खड़ा करने का ही उन्होंने प्रथमत: प्रयास किया था, किंतु सफलता नहीं मिली। प्रश्न पैसों का नहीं था। पैसों के बल पर सभी कुछ नहीं किया जा सकता। प्रश्न था स्वयंसेवक संगठन की ओर देखने की दृष्टि का। कांग्रेस में कार्य करने वाले भले लोगों की संख्या काफी तो थी, किंतु उन लोगों का ध्यान हमेशा राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति की ओर ही लगा रहता है। सामयिक राजनीतिक हितों के परे उनकी दृष्टि आमतौर पर जाती ही नहीं। उन लोगों की राय में स्वयंसेवक संगठन का उपयोग यही है कि स्वयंसेवक उनके अपने कामों के लिए भाग-दौड़ करें।
राष्ट्र के लिए स्व प्रेरणा से कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं का निर्माण करने वाला सामर्थ्यशाली संगठन उनकी विचारशक्ति के बूते से बाहर है। फिर देश के नवनिर्माण की आशा उनसे कैसे की जा सकती है! इसलिए संघ की स्थापना एवं संगठन देश के नवनिर्माण का एक प्रयास है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में सब समान हैं। यहां किसी भेदभाव को प्रश्रय नहीं दिया जाता। ‘आदशर्वादी स्वयंसेवक’ ही उन सबकी भूमिका है और इसी में संघ के बढ़ते सामर्थ्य का रहस्य है।’’
जब देश में कांग्रेस का कार्य जारी है, तब संघ की क्या आवश्यकता है? इस बात का जवाब डॉक्टर जी की उक्त टिप्पणी में मिल जाता है। यहां विशेष बात यह है कि यह टिप्पणी उन्होंने आज से लगभग 46 वर्ष पूर्व तथा संघ की स्थापना के पांच वर्ष के अन्दर ही की थी। इसमें वे लिखते हैं, ‘‘हिन्दू-संस्कृति हिन्दुस्थान का प्राण तत्व है। अत: हिन्दुस्थान का संरक्षण करना हो तो हिन्दू-संस्कृति का संरक्षण हमारा पहला कर्तव्य हो जाता है। हिन्दुस्थान की हिन्दू-संस्कृति ही नष्ट होने वाली हो, हिन्दू समाज का नामोनिशान हिन्दुस्थान से मिटने वाला हो, तो फिर शेष जमीन के टुकड़े को हिन्दुस्थान या हिन्दूराष्ट्र कैसे कहा जा सकता है? क्योंकि राष्ट्र जमीन के टुकड़े का नाम तो नहीं है…यह बात एकदम सत्य है। फिर भी हिन्दू-धर्म तथा हिन्दू-संस्कृति की सुरक्षा एवं प्रतिदिन विधर्मियों द्वारा हिन्दू समाज पर हो रहे विनाशकारी हमलों को कांग्रेस द्वारा दुर्लक्षित किया जा रहा है, इसलिए इस अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की आवश्यकता है। फिर भी यह संघ कांग्रेस का कदापि विरोधी नहीं है। हमारी राष्ट्रीय संस्कृति के मार्ग में बाधा न बनने वाले स्वतंत्रता प्राप्ति के कार्यक्रमों में संघ कांग्रेस के साथ सहयोग करेगा और आज तक करता भी आया है।’’

भारत का स्वाधीनता संग्राम
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भारत के स्वाधीनता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका रही, जिसे डॉक्टर जी के अथक प्रयासों के संदर्भ में समझा जा सकता है। कलकत्ता (अब कोलकाता) में श्याम सुन्दर चक्रवर्ती और मौलवी लियाकत हुसैन से डॉक्टर जी की घनिष्ठ मित्रता थी। उनके स्वाधीनता संग्राम के साथी मौलवी लियाकत हुसैन अपने जीवन-कर्म में सच्चे भारतीय थे। उन्होंने स्वदेशी आन्दोलन में सक्रिय रहते हुए तुर्की टोपी पहनना सदा के लिए छोड़ दिया था। उन्हीं दिनों कलकत्ता में क्रांतिकारियों के बीच रत्नागिरी का आठले नाम का एक बम निर्माता क्रांतिकारी युवक आया, जिसने कलकत्ता के पास एक ग्राम में क्रांतिकारियों को बम बनाना सिखाया। डॉक्टर जी ने भी उससे बम बनाना सीखा, परन्तु उसी बीच आठले की मृत्यु हो गई, जिसका अंतिम संस्कार डॉ. हेडगेवार तथा श्याम सुन्दर चक्रवर्ती ने गुप्त रूप से किया। क्रांतिकारी रहकर ही डॉक्टर जी ने कभी विवाह न करने का संकल्प लिया था।
संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख रहे बाबासाहब आप्टे बताते थे, ‘‘जब 1939 का वर्ष समाप्ति की ओर था और यूरोप में महायुद्ध जारी था, उन दिनों डॉ. हेडगेवार को रात-दिन एक ही चिंता रहती थी कि महायुद्ध की इस स्थिति में अंग्रेजों को भारत से जड़-मूल से उखाड़ फेंकने के लिए उतना प्रभावी, उग्र और शक्तिशाली संगठन भी जल्दी ही खड़ा कर लेना है-अत: उन दिनों जब कभी कोई स्वयंसेवक उनसे जोर देकर कहता कि, ‘डॉक्टर साहब! अपने संगठन कार्य के लिए एक बड़े कार्यालय की जरूरत है। संघ का वैसा कार्यालय नहीं है, आप उसे बनवाने का विचार करिए।’ तो डॉक्टर जी कह दिया करते थे कि, ‘अरे, इस समय जरूरत है संघ का कार्य बढ़ाने की, सब उसी में शक्ति लगाओ, वर्ना तुम जो विशाल कार्यालय बनाओगे, अंग्रेज उसी में ठाठ से अपनी कचहरी लगाकर बैठेंगे।’’ स्पष्ट ही, ब्रिटिश दासता डॉक्टर जी की नजरों से कभी ओझल नहीं हो पाई थी। संघ के कायर्वाह रह चुके भैयाजी दाणी भी लिखते हैं, ‘‘अंग्रेज सरकार के रोष तथा निषेध की परवाह न करते हुए अपने विद्यालय में डॉक्टर जी ने ‘वंदेमातरम्’ का उद्घोष गुंजाया, भले इसके लिए उन्हें वह विद्यालय छोड़ देना पड़ा।’’
अपने क्रांतिकारी जीवन में डॉक्टर जी ने स्वयं शस्त्रों का प्रयोग किया, वह भी इतनी सावधानी से कि तत्कालीन अंग्रेज सरकार संदेह होते हुए भी उन्हें पकड़ न सकी। उनके इस सशस्त्र आन्दोलन ने अंग्रेज शासकों में आतंक उत्पन्न किया और जनता में सरकार के प्रति असंतोष पैदा किया। डॉक्टर जी को मातृभूमि का स्वातंत्र्य सौभाग्य चाहिए था और अपने जीवन में ही देश का स्वातंत्र्य देखना उनका अभीष्ट था। उसी दिशा में उन्हें निश्चित कदम उठाने थे। प्रखर क्रांतिकारी विनायक दामोदर सावरकर, उनके बड़े भाई गणेश दामोदर सावरकर और छोटे भाई डॉ. नारायण दामोदर सावरकर, वामनराव जोशी, बैरिस्टर अभ्यंकर तथा सुभाष चन्द्र बोस उनके स्नेही थे।
1922-23 में पुलगांव में वर्धा तालुका परिषद आयोजित हुई। परिषद के सामने जब स्वराज्य का प्रस्ताव रखा गया तो उसमें अमदाबाद कांग्रेस द्वारा स्वीकृत ‘स्वराज्य’ शब्द का अर्थ कुछ लोग ‘ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत स्वराज’ से करते थे, परन्तु डॉक्टर जी को यह कदापि मान्य न था। वह तो ब्रिटिश राज्य रहित स्वराज्य को ही वास्तविक स्वराज्य मानते थे, क्योंकि वह प्रखर स्वातंत्र्यवादी थे। अत: डॉक्टर जी ने परिषद में जब स्वराज्य का प्रस्ताव रखा तो उसमें ‘ब्रिटिश राज्य रहित’ स्वराज्य, यह संशोधन सुझाया।
डॉ. हेडगेवार और संघ एक-दूसरे के पर्याय थे। जब कभी किसी प्रभावशाली व्यक्ति का निधन होता है तो उससे जुड़ी संस्था को अपूरणीय क्षति का सामना करना ही पड़ता है। संघ के बारे में भी इसके मित्र और ईर्ष्यालु भाव रखने वाले, दोनों प्रकार के लोग ऐसा ही सोचते थे। परन्तु सार्थक उद्देश्य के लिए समर्पित इस सारथी ने संघ को कालजयी बना दिया। तभी तो लोकमान्य तिलक द्वारा स्थापित अंग्रेजी समाचार पत्र ‘मराठा’ ने 23 अगस्त, 1940 को अपने प्रथम पृष्ठ पर जो पहला बड़ा समाचार प्रकाशित किया, उसका शीर्षक था-‘डॉ. हेडगेवार्स संघ स्टिल गोइंग स्ट्रांग’।


कांग्रेस का मुस्लिम तुष्टीकरण
जिस काल कालखंड में डॉ. हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की, वह मुस्लिम तुष्टीकरण का काल था। 1920 में देश में खिलाफत आन्दोलन शुरू हुआ था। मुसलमानों का नेतृत्व मुल्ला-मौलवियों के हाथों में था। इस काल खंड में मुसलमानों ने देश में अनेक दंगे किए। केरल में मोपला मुसलमानों ने विद्रोह किया। उसमें हजारों हिन्दू मारे गये। मुस्लिम आक्रान्ताओं के आक्रमण के कारण हिन्दुओं में असुरक्षा की भावना गहरे तक समाई थी। हमारे संगठित हुए बिना हम मुस्लिम आक्रान्ताओं के सामने टिक नहीं सकेंगे, यह विचार अनेक लोगों ने प्रस्तुत किया। मुसलमानों का प्रतिकार करने के लिए हिंदुओं का संगठन करना चाहिए, यह अर्थ लोगों के ध्यान में तुरंत आता था।
उस समय के नेता मुसलमान समाज को मतांध समझते थे और यही सारे झगड़े की जड़ होने के कारण, उस समाज में शिक्षा का प्रसार करना, एक प्रमुख भाग मानते थे। डॉक्टर जी इस बात से सहमत न थे। वे उस समाज की मतान्धता तथा अशिक्षा को तो स्वीकार करते थे, किंतु उसे संघर्ष का कारण नहीं मानते थे। वे तो उसका कारण उनके शिक्षित नेताओं में ढूंढते थे जिनके मन में अपने गत राज्य और वैभव को प्राप्त करने की इच्छाएं प्रस्फुटित थीं और जिसको अंग्रेजों ने ‘ऐतिहासिक अल्पसंख्यक’ कहकर बढ़ावा दिया था।
कांग्रेस द्वारा चलाया गया खिलाफत आन्दोलन डॉ. साहब को पसंद न था। वे उसे सदा ‘अखिल आफत’ ही कहा करते थे। इसी समय से कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति अपनाई और भारतवर्ष की राजनीति में जमातवाद घुस आया, जो कि डॉक्टर जी को कतई पसंद नहीं था। आखिर उस समय के बड़े-बड़े नेताओं ने मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति क्यों अपनाई? इसका पहला और प्रमुख कारण यह दिखता है कि अंग्रेज शासक मुसलमान जमातवाद को बढ़ावा देकर उनको ‘ऐतिहासिक अल्पसंख्यक’ कहते हुए राजकीय जीवन में अधिक सहूलियतें देकर सामान्य जन-जीवन से भी पृथक कर रहे थे।
डॉक्टर साहब को अपने समाज की धीर वृत्ति पर पूरा भरोसा था। वे उसे भीरू मानने के लिए कदापि तैयार नहीं थे। उन्हें अपनी प्राचीन परंपरा तथा जीवन-ध्येय पर भी पूर्ण निष्ठा थी। हां, वे इस बात को मानते थे कि हिन्दू समाज अपनी परंपरा भूल गया है। अंग्रेजों ने जाति व्यवस्था के स्थान पर जातिभेद शब्द का उपयोग कर जाति-जाति में भेद डालकर, जाति-जाति में ही संघर्ष का निर्माण किया था। इस कारण यहां का समाज छोटे-छोटे हिस्सों में बंट गया था और आपस में संघर्षरत भी था। यही कारण था कि जिससे विशाल समाज अपने को दुर्बल पाता था और इसी कारण से वह अन्य समाजों के आक्रमणों का शिकार बनता जा रहा था।
परन्तु कुछ नेताओं को यह तुष्टीकरण पसंद नहीं था। इसलिए वे हिन्दू समाज को बलशाली करना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने हिन्दू समाज के लिए हिन्दू महासभा बनाई। डॉक्टर साहब उसमें भी रहे, परन्तु उससे संतुष्ट नहीं हुए। अत: यह कहा जा सकता है कि इस देश में चलने वाले करीब-करीब सभी आन्दोलनों में न केवल उनका सक्रिय सहयोग रहा, अपितु उनमें वे अग्रसर भी रहे।

हिन्दू पुनर्जागरण
10वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में हिन्दुओं को अपने गौरवशाली अतीत की महानता का बोध होना शुरू हुआ और विस्मृत राष्ट्रभाव का पुनर्जागरण प्रारम्भ हुआ। स्वामी विवेकानन्द ने वेदान्त के आधार पर सार्वभौम हिन्दुत्व का प्रचार किया। उन्हें आधुनिक भारत के ‘अन्तरराष्ट्रीय शंकराचार्य’ के रूप में प्रतिष्ठित किया जा सकता है। उनके प्रयासों से हिन्दू धर्म का न केवल उद्धार हुआ, अपितु हिन्दू समाज को उन्होंने अन्तरराष्ट्रीय मंच पर प्रतिष्ठित भी किया। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, राजनारायण बोस, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, महर्षि अरविन्द, डा. केशव बलिराम हेडगेवार जैसे हिन्दू-हित चिंतकों ने विश्व के समक्ष यह संदेश दिया कि हिन्दुस्थान में राष्ट्रीय एकता का आधार हिन्दू धर्म है और हिन्दू स्वयं में एक धर्म प्रधान एवं प्रकृति के सार्वभौमिक सिद्धान्तों पर आधारित जीवन पद्धति है।
आधुनिक सन्दर्भ में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि हिन्दू हित-चिंतक कौन है? अन्तरराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर कौन-कौन हिन्दू हित-चिंतक हुए हैं और उनके प्रयासों की प्राथमिकताएं क्या रही हैं? यदि 20वीं शताब्दी के प्रारंभिक काल के घटनाक्रमों से इन प्रश्नों का उत्तर प्राप्त करने का प्रयास किया जाए तो यह स्पष्ट होता है कि पश्चिमी देशों में जीवन के लक्ष्य का सदैव अभाव रहा। भौतिक सुख-समृद्धि ही जीवन का मानक बन गया। इसलिए पश्चिमी देश संवेदनशून्य हो गए थे। साम्राज्यवाद एवं उपनिवेशवाद जैसी वैचारिकी इस भौतिकवादी पृष्ठभूमि की उपज रही है। स्वामी विवेकानन्द जैसे हिन्दू चिंतकों द्वारा पश्चिमी देशों में हिन्दुत्व के आदर्शों को प्रस्थापित कर उन्हें अंधकार से दूर करने का प्रयास भी किया गया था। लेकिन भौतिकता की अंधी दौड़ ने अंतत: नाजीवाद, फांसीवाद एवं साम्यवाद जैसे विचारों को जन्म देकर पश्चिमी देशों को महायुद्धों की विनाशलीला में झोंक दिया था। इस संदर्भ में हिन्दू आदर्शों का यदि अनुपालन किया जाता तो सम्भवत: मानवीय विनाश के उन दृश्यों को रोका जा सकता था जो विश्व-मानव की छाती पर एक भीषण दुर्घटना के चिह्न रूप में विद्यमान हैं।
स्वामी विवेकानन्द ने जीवन जीने का लक्ष्य एवं मानव संस्कृति के मूल रहस्यों को पश्चिमी समाज के समक्ष उद्घाटित किया था। स्वामी विवेकानन्द के प्रयासों से पश्चिमी समाज में हिंदुत्व के प्रति एक नया दृष्टिकोण विकसित हुआ था और लोग हिन्दू संस्कृति के मूल रहस्यों को जानने के लिए आकर्षित हुए। स्वामी विवेकानंद को हिन्दू राष्ट्रीयता का विश्व में प्रथम उद्घोषक कहा जा सकता है। उन्होंने विश्व के समक्ष भारत की मूल्यवान आध्यात्मिक धरोहर को प्रतिष्ठित किया तथा हिन्दू धर्म के मूल रहस्यों से विश्व को अवगत कराया।
राष्ट्रीय संदर्भ में स्वामी रामतीर्थ, महर्षि दयानन्द, डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार, महात्मा गांधी, डॉ. आंबेडकर, माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर, पं. दीनदयाल उपाध्याय, दत्तोपंत ठेंगडी जैसे चिंतकों ने हिन्दुओं को चिन्तन की एक नयी शैली एवं विधा से सुसज्जित कर हिन्दुत्व के पुनरुत्थान का सार्थक प्रयास किया। 20वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में अन्तरराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय परिदृश्य में कई ऐसे संगठन प्रभाव में आये जिन्होंने हिन्दू धर्म की सनातन मर्यादा को प्रस्थापित करने का प्रयास किया। अमेरिका जैसे विकसित भौतिकतावादी देश में हिन्दुत्व के प्रति आकर्षण 1960 के दशक में तथा उसके बाद निरन्तर बना हुआ है। स्वामी प्रभुपाद, महर्षि महेश योगी, ओशो रजनीश आदि संतों ने हिन्दू दर्शन के कुछ रहस्यों को विश्व के समक्ष प्रकट कर भौतिक जगत को आश्चर्य में डाल दिया।
पूर्व वैदिक लोक जीवन के सम्बन्ध में प्राप्त तथ्य इंगित करते हैं कि सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं राजनैतिक संरचना में प्रत्येक व्यक्ति के अधिकार समान थे। राजसत्ता के प्रारम्भ होने के पूर्व भूमि पर कुटुम्ब का स्वामित्व ही प्रभावी था। ग्राम नदियों के किनारे, विरल जंगलों से घिरे हुए तथा कृषि भूमि की उर्वरता के आधार पर बसे हुए थे। ग्रामों की संरचना कुल अथवा वंश द्वारा निर्धारित होती थी। उर्वरा भूमि की उपलब्धता एवं प्रकृतिपरक जीवनयापन करने वाला हिन्दू समाज शान्तिप्रिय एवं धर्मानुरागी प्रकृति का था। उत्तर वैदिक काल में सत्ता संघर्ष की स्थितियां धीरे-धीरे जटिल हो रही थीं। नगर अस्तित्व में आने लगे थे। पत्थरों के साथ-साथ लोहे के सुदृढ़ किले भी अस्तित्व में थे। काम्पिल्य (पांचालों की राजधानी), आसन्दीवन्त (कुरु राजधानी) तथा कौशाम्बी नगरों का उल्लेख प्रधानता से मिलता है। ग्रामीण एवं नगरीय जीवन सुख-समृद्धि से परिपूर्ण था।
वैदिक कालीन हिन्दू समाज सुव्यवस्थित तथा सुसंगठित था। कृषि तथा पशुपालन आजीविका का प्रमुख आधार था। पृथु ही प्रथम राजा थे, जिन्होंने पथरीली भूमि को जोतकर कृषि योग्य समतल बनाया था और इसलिए उनका पृथ्वी नाम पड़ा। खेत के लिए उर्वर या क्षेत्र शब्द प्रयोग में आया है जिसका स्वामी व्यक्ति अथवा उसका कुटुम्ब होता था। बढ़ई, कुम्हार, रथकार, बुनकर, निषाद आदि का उल्लेख बताता है कि कृषि के अतिरिक्त अन्य आवश्यक व्यवसाय भी प्रचलन में थे। व्यापार हेतु गाय के अतिरिक्त स्वर्ण एवं चांदी की मुद्राएं प्रचलन में थीं। प्रत्येक व्यक्ति समान अधिकारों से युक्त था।

बौद्ध धर्म के माध्यम से हिन्दू धर्म के आध्यात्मिक रहस्य अन्य देशों के निवासियों द्वारा व्यवहृत किए जाने लगे। गुप्त एवं मौर्य वंश में भी सद्भावना का चित्रण प्राप्त होता है। मुगलकाल एवं ब्रिटिश शासन के अंतर्गत हिन्दू लोक जीवन विखंडित हो गया। हिन्दू धर्म के मूल रहस्यों से अनभिज्ञ आक्रांताओं ने न केवल वैयक्तिक अधिकारों का हनन किया अपितु हिन्दू धर्म के मूल ग्रंथों को भी नष्ट कर दिया। 1000 वर्ष तक सनातन संस्कृति विधर्मियों के प्रहार झेलती हुई लगभग मृतप्राय बना दी गई थी। आज आवश्यकता है मूल्य परक हिन्दू जीवन पद्धति, जिससे न केवल मानव अपितु प्रकृति एवं जीव-जन्तु जगत का भी उत्थान सम्भव है, को पुन: प्रतिष्ठित किया जाए।
हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति है, जो अपनी प्रकृति में सनातन है। ‘सनातन’ शब्द उन जीवन मूल्यों और सिद्धांतों का द्योतक है, जो शाश्वत हैं। यह उस ज्ञान की अभिवृद्धि करने वाला है, जिसने समय के आघातों और ऐतिहासिक उठापटक को पीछे छोड़ दिया है। जीवन का यह दर्शन व्यापक, परिपूर्ण और मानवीय है। वस्तुत: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का लक्ष्य हिन्दुओं को जाति, क्षेत्र और भाषा के कृत्रिम विभाजन के चलते उत्पन्न सामाजिक-सांस्कृतिक विरोधाभासों से उबारना है। इसकी आकांक्षा है कि भारत को अपने कर्तृत्व, दर्शन और सांस्कृतिक प्रभाव से पुन: विश्व गुरु का स्थान मिले।
















