फ्रांस में प्रधानमंत्री की नियुक्ति होते ही हुड़दंगई पर उतरे वामपंथी, कहा-चुनावों को चुरा लिया, सड़क पर उतरने का आह्वान
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फ्रांस में प्रधानमंत्री की नियुक्ति होते ही हुड़दंगई पर उतरे वामपंथी, कहा-चुनावों को चुरा लिया, सड़क पर उतरने का आह्वान

नेशनल असेंबली की 577 सीटों में किसी भी दल को बहुमत न मिलने के कारण प्रधानमंत्री भी नियुक्त नहीं हो सके थे।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Sep 10, 2024, 09:14 am IST
in विश्लेषण
France Leftist protesting against Macron government

फ्रांस में आम चुनाव हुए काफी महीने हो गए हैं। चूंकि, इन चुनावों में किसी भी दल को या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिल था, इसलिए सरकार का गठन कैसे हो और किस विचार का प्रधानमंत्री बने, इस पर तमाम विवाद हो रहे थे। बार–बार लेफ्ट दलों के गठबंधन का यह जोर था कि उनके मत के व्यक्ति को प्रधानमंत्री पद दिया जाए, क्योंकि सबसे अधिक सीटें उनके गठबंधन को मिली हैं।

राष्ट्रपति मैक्रॉन की पार्टी दूसरे स्थान पर रही थी तथा दक्षिणपंथी दलों का गठबंधन तीसरे स्थान पर रहा था। नेशनल असेंबली की 577 सीटों में किसी भी दल को बहुमत न मिलने के कारण प्रधानमंत्री भी नियुक्त नहीं हो सके थे। यह भी बहुत हैरानी की बात थी कि प्रथम दौर में जब दक्षिण पंथी दल नेशनल रैली को बढ़त मिली थी, तो दूसरे चरण से पहले मैक्रॉन की पार्टी और कम्युनिस्ट दलों ने यह अपील की थी कि किसी भी स्थिति में नेशनल रैली के गठबंधन को बहुमत न मिले और सैकड़ों लोगों ने अपने नामांकन वापस ले लिए थे।

उसके बाद ओलंपिक्स के आयोजन के कारण संभवतया यह चयन टलता हुआ आ रहा था। अब ओलंपिक्स के आयोजन के बाद फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रॉन ने महीनों की राजनीतिक उठापटक पर विराम लगाते हुए 73 वर्षीय पूर्व ब्रेक्जिट वार्ताकार मिशेल बर्नियर को फ्रांस का प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया है। मिशेल बर्नियर एक अनुभवी राजनेता हैं और बीबीसी के अनुसार राष्ट्रपति मैक्रॉन ने प्रधानमंत्री पद के लिए संभावित कई प्रत्याशियों के साथ बातचीत के एथी, परंतु उन्हें ऐसा नाम चाहिए था, जो नेशनल एसेंबली की जटिल संख्यात्मक स्थितियों से पार पा सकें। मिशेल बर्नियर को एक ऐसी सरकार को एक साथ लाने का दायित्व दिया गया है जो देश और फ्रांसीसी लोगों की सेवा कर सके।

इसे भी पढ़ें: पिछले एक साल में पर्यावरण की रक्षा करने कोशिश में करीब 200 लोगों की हत्या: रिपोर्ट

मिशेल  बर्नियर को फ्रांसीसी और यूरोपीय राजनीति का 40 वर्षों का अनुभव है और वे फ्रांस के विदेश, कृषि और पर्यावरण मंत्री के साथ ही दो बार यूरोपीय संघ के आयुक्त भी रह चुके हैं। मिशेल जब 27 वर्ष के थे, तब पहली बार सांसद बने थे। अब यह देखना होगा कि मिशेल बर्नियर फ्रांस की इस सरकार को सफलतापूर्वक चला पाते हैं या नहीं? क्योंकि यह तो निश्चित है कि उनके नाम का विरोध होगा और यह विरोध आरंभ हो गया है।

कम्युनिस्टों का आरोप ‘चुनाव चोरी हो गए हैं!’

कम्युनिस्ट दलों के गठबंधन एनएफपी मे सबसे बड़े दल एलएफआई के नेता जीन-ल्यूक मेलेशो ने कहा कि चुनावों को फ्रांसीसी लोगों से चुरा लिया गया है। एलएफआई के नेता Mathilde Panot ने एक्स पर मैक्रॉन के इस निर्णय के विरुद्ध हुए विरोध प्रदर्शन की तस्वीरें साझा करते हुए कहा कि पेरिस में 160,000 लोग, पूरे देश में 300,000 लोगों ने मैक्रॉन के इस सत्तावादी तख्तापलट के खिलाफ विद्रोह किया है।

160 000 personnes à Paris, 300 000 à travers le pays : mobilisation absolument massive pour la #MarcheDestitution.

Contre le coup de force autoritaire de Macron, la révolte de la jeunesse est le ferment qui lève la France.

Quelle fierté !#7septembre pic.twitter.com/mkLkBTzyuX

— Mathilde Panot (@MathildePanot) September 7, 2024

एलएफआई के नेता जीन-ल्यूक मेलेशो ने लोगों से आह्वान किया कि मैक्रॉन के इस अलोकतांत्रिक निर्णय के खिलाफ लोग सड़कों पर उतरें क्योंकि इस तरह से चुनावों को चुराया नहीं जा सकता है। उन्होनें शनिवार को लोगों से अपील की कि वे शांत न रहें, वे चुप न रहें और संघर्ष के लिए तैयार रहें। उन्होंने पेरिस में विरोध प्रदर्शन के दौरान कहा कि लोकतंत्र केवल यह स्वीकारने की कला ही नहीं है कि आप जीत गए हैं, बल्कि यह विनम्रता से अपनी हार स्वीकारने की कला भी है।

दरअसल मैक्रॉन द्वारा मिशेल के चयन को एक दक्षिणपंथी विचारों वाले नेता के चयन के रूप में देखा जा रहा है। अल जजीरा के अनुसार कम्युनिस्ट दलों के नेताओं का कहना है कि उनके कम्युनिस्ट गठबंधन ने चुनावों में सबसे ज्यादा सीटें जीतीं हैं, इसलिए प्रधानमंत्री पद पर उनका अधिकार है, जो परिणामों को प्रतिबिंबित कर सके। अलजजीरा के अनुसार, फ्रांस के नए प्रधानमंत्री मिशेल बार्नियर ने फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रॉन की कुछ नीतियों को बनाए रखने की बात की और यह भी कहा कि वे आप्रवासियों पर सरकार के कदम को और सख्त करेंगे। इसके अनुसार, शुक्रवार को बर्नियर ने कहा कि संसद में त्रिशंकु की स्थिति में कन्सर्वटिव और मैक्रॉन के गुट के भी सदस्य सम्मिलित होंगे।

इसे भी पढ़ें: 3 इजरायलियों की हत्या का जश्न मना रहे जॉर्डन के लोग, हत्यारे माहेर जियाब अल जाजी का नायक के तौर पर स्वागत

बर्नियर ने कम्युनिस्ट सदस्यों का भी स्वागत करते हुए कहा कि कोई भी लाल रेखा नहीं है और यह भी कहा कि उन्हें सरकार में हर विचार के लिए अपने दरवाजे खुले रखने हैं। हालांकि बर्नियर के लिए चुनौतियाँ कम नहीं हैं, सबसे बड़ी चुनौती तो कम्युनिस्ट दलों के विरोध प्रदर्शनों से पार पाना है तो वहीं बजट भी प्रस्तुत करना है। बर्नियर ने देश में आने वाले शरणार्थियों को सीमित करने वालाई नीतियों को कड़ा करने की वकालत की। अलजजीरा के अनुसार बर्नियर ने कहा कि अभी भी यह भावना है कि हमारी सीमाएं सुरक्षित नहीं हैं और लोग अनियंत्रित रूप से देश मे अवैध रूप से प्रवेश कर रहे हैं। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि नेशनल रैली के साथ उनका वैचारिक समर्थन नहीं है, परंतु वे आदर करते हैं।

नेशनल रैली फ्रांस की वह दक्षिणपंथी पार्टी है, जिसकी पहले दौर में बढ़त के बाद मैक्रॉन की पार्टी और कम्यूनिस्ट पार्टी दोनों ही भड़क गई थीं और उसे हराने के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार हो गई थीं, जिनमें प्रत्याशियों का नाम वापस लेना तक शामिल था।

Topics: वामपंथफ्रांस न्यूजवर्ल्ड न्यूजइमैनुएल मैक्रोनWorld NewsFrance NewsEmmanuel Macronफ्रांसFranceLeft
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