आपातकाल : लोक-तंत्र-विधान की शत्रु कांग्रेस
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होम भारत

आपातकाल : लोक-तंत्र-विधान की शत्रु कांग्रेस

राहुल गांधी जिस परिवार से आते हैं उसने न कभी भारत को जाना, न कभी यहां के जन के मन की थाह ली। राष्टÑ के मानबिंदुओं पर हमेशा कुठाराघात ही किया। भारत के लोकतंत्र और संविधान की धज्जियां उड़ाने के दोषी नेहरू-गांधी खानदान के कारनामे इतिहास में दर्ज हैं। इसलिए राहुल का ‘संविधान खतरे में है’ नारा कोरे ढकोसले से अधिक नहीं

Written byशिवेन्द्र राणाशिवेन्द्र राणा
Jul 12, 2024, 05:30 pm IST
in भारत, विश्लेषण

कांग्रेस के ‘शहजादे’ राहुल गांधी और उनके उकसावे पर सेकुलर विपक्ष लगभग दो वर्ष से अधिक समय से ‘संविधान संकट में’ का आरोप लगाता आ रहा है। हाल में सम्पन्न हुए 2024 के आम चुनाव में विपक्ष ने इसे लेकर पूरा दुष्प्रचार अभियान चलाया था। अब जनादेश के अनुरूप मोदी सरकार ने तीसरी बाद काम संभाल लिया इसलिए अब यह सवाल अनिवार्य रूप से विचारणीय है कि राहुल द्वारा बारम्बार लगाए गए उक्त आरोप में सत्यता कितनी है। क्या विपक्ष के कहे अनुसार, वास्तव में संविधान खतरे में है?

गौर करने की बात है कि जिस समय राहुल गांधी संविधान में बदलाव का नारा लगाते हुए देश में चुनावी रैलियां कर रहे थे, उसी समय दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में जेपी आंदोलन के तपे-परखे छात्र नेता रहे पद्मश्री से सम्मानित प्रतिष्ठित पत्रकार तथा संविधानविद् रामबहादुर राय संविधान पर संभाषण कर रहे थे। उनके अनुसार, न्यायशास्त्र में आधारहीन या अप्रमाणिक आरोप को ‘वितंडा’ कहते हैं। इसलिए राहुल और उनके इंडी गठबंधन के नेता ‘वितंडावादी’ हैं।
1975 में भारत पर इंदिरा शासन द्वारा थोपे गए आपातकाल के पूर्व और उसके बाद रामबहादुर जी के संघर्ष का एक लंबा इतिहास रहा है। आपातकाल के वक्त रामबहादुर राय अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय सचिव और बिहार के प्रभारी थे।

1970 में इंदिरा गांधी सरकार के अहंकारी रवैये के विरुद्ध काला झंडा दिखाते हुए रामबहादुर जी पहली बार गिरफ्तार हुए थे। 1971 में जब जयप्रकाश नारायण मुक्ति वाहिनी के प्रति जनजागरण करते हुए वाराणसी पहुंचे तब उन्होंने शेख मुजीबुर्र्रहमान के संघर्ष का अध्ययन करने के लिए रामबहादुर राय को 40 दिन के लिए ढाका भेजा था, जहां उन्होंने मुक्ति वाहिनी के संघर्ष पर नोट तैयार किया जो ‘आज’ अखबार में तीन किस्तों में छपा था। वह फरवरी, 1974 को पटना में आयोजित बिहार राज्य छात्र सम्मेलन में 12 सूत्रीय मांग को लेकर बनाई गई छात्र समिति के सदस्य होने के साथ ही 18 मार्च, 1974 को बिहार विधानसभा के घेराव की योजना बनाने वाली टीम का भी हिस्सा रहे।

9 अप्रैल 1974 को पटना से गिरफ्तार किए गए रामबहादुर राय सबसे पहले मीसा बंदी थे जो 11 नवंबर 1974 तक बांकीपुर जेल में कैद रहे थे। आपातकाल लागू होने के दौरान वह बनारस में थे, जब कांग्रेस के एम.पी. सुधाकर पांडे की मुखबिरी के आधार पर पुलिस ने उन्हें विश्वेश्वरगंज से राजघाट जाते हुए गिरफ्तार कर लिया था। वे मध्य नवंबर, 1976 तक शिवपुरी जेल में डी.आई.आर.धारा में बंद रहे थे। बाद में 1977 के आम चुनाव में उन्होंने एक बड़ी भूमिका निभाई।

अत: यह स्पष्ट है कि आततायी सर्वाधिकारवादी सत्ता के वंशवादी प्रतिनिधि के दुष्प्रचार के विरुद्ध रामबहादुर राय प्रश्न करने का पूर्ण सामर्थ्य रखते हैं, ना सिर्फ देश के एक सम्मानित नागरिक की हैसियत से बल्कि इसलिए
भी क्योंकि वे इस अधिनायकवादी परिवार के क्रूर षड्यंत्र के प्रत्यक्षदर्र्शी तथा भुक्तभोगी हैं।

वे तीन सवाल

रामबहादुर जी ने अपने उस सम्बोधन में राहुल गांधी से तीन सवाल किये थे। पहला, देश का संविधान यदि कांग्रेस, सोनिया एवं राहुल गांधी समेत पूरे विपक्ष के अनुसार खतरे में है तो वह खतरा किस बात का है? यानी इस आक्षेप का आधार क्या है? दूसरा, क्या इसका कोई स्पष्ट उदाहरण है कि पिछले 10 साल में भाजपा सरकार ने संविधान की कोई अवहेलना की है, जैसी कि नेहरू, इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी तथा मनमोहन सिंह तक के कायर्काल में हुई थी?

नेहरू ने बोलने की आजादी छीनी तो इंदिरा ने जीने की आजादी। राजीव गांधी ने डाकघर (संशोधन) विधेयक के रूप में प्रेस एवं अभिव्यक्ति की आजादी छीनी तो वहीं मनमोहन सिंह ने एक कदम आगे बढ़ते हुए सच्चर कमेटी के आधार पर संविधान की मूल अवधारणा का ही ध्वंस कर दिया। उन्होंने अल्पसंख्यकों (मुस्लिमों) को मजहबी आधार पर आरक्षण देने का फैसला किया। रामबहादुर जी का तीसरा प्रश्न कांग्रेस एवं राहुल गांधी से यह है कि वे बताएं कि संविधान क्या केवल ‘माइनॉरिटीज’ का है या सबका है? कांग्रेस सरकार में जामिया मिल्लिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी समेत बहुतेरे संस्थानों से दलितों-पिछड़ों का आरक्षण छीनकर मुसलमानों को दे दिया गया।

राहुल गांधी के आरोपों की निरर्थकता के विरुद्ध रामबहादुर जी एक उदाहरण देते हुए कहते हैं, वतर्मान सरकार ने 2014 में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम पारित करवाया जिसे दोनों सदनों ने भारी बहुमत से स्वीकार किया। लेकिन तब इसे सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ‘मूल ढांचे का उल्लंघन’ बताते हुए रद्द कर दिया गया। इसके बावजूद भाजपा सरकार ने संयत रुख अपनाते हुए न्यायालय की मर्यादा को कायम रखा। हालांकि विधि मंत्री के रूप में किरण रिजीजू ने विभिन्न मंचों पर न्यायालय के रुख का विरोध किया था। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भी राज्यसभा में इस बात को उठाया, लेकिन सरकार ने इस पर न्यायपालिका का सम्मान बनाये रखा।

आधुनिक इतिहास से अनभिज्ञ राहुल

पता नहीं राहुल गांधी कितने शिक्षित हैं, परन्तु एक बात तो तय है कि वह देश के आधुनिक इतिहास से परिचित नहीं हैं। और बस वही क्यों, वंशवाद-परिवारवाद की उपज विपक्ष के अधिकांश नेताओं का भी इतिहास बोध निम्न स्तर का है। इसलिए उन्हें संविधान को अपमानित करने, संवैधानिक मूल्यों का हनन करने वालों का इतिहास जानने की नितांत आवश्यकता है। संविधान को छिन्न-भिन्न करने का प्रमाणित भाव तो राहुल के दल कांग्रेस एवं नेहरू परिवार के डी.एन.ए.में मौजूद रहा है। इसे कुछ उदाहरणों से समझा जा सकता है।

नेहरू से हुई शुरुआत

सर्वप्रथम जवाहरलाल नेहरू की बात। उन्होंने शुरू से ही संवैधानिक आदर्शों के प्रति तिरस्कार का भाव रखा। इसका विवरण रामबहादुर राय ने अपनी किताब ‘संविधान: अनकही कहानी’ में दिया है। 16 मई, 1951 को प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू प्रेस और न्यायपालिका की मुखरता से कुपित होकर लोकतंत्र का गला दबाने की आतुरता में संविधान संशोधन का प्रस्ताव लाये।

यह पहला संशोधन मूल संविधान के पुनर्लेखन का प्रस्ताव था। तमाम विरोध के बावजूद अपने अधिनायकवादी रवैये और षड्यंत्रों के माध्यम से अंतत: नेहरू जनमत की आवाज दबाने में सफल रहे, जिसके परिणामस्वरुप 18 जून, 1951 को संविधान संशोधन लागू हुआ। इसके अनुसार अनुच्छेद 15, 19, 85, 87, 174, 176, 341, 342, 376 अत:स्थापित अनु.-31 (क), 31 (ख) और 9वीं अनुसूची संविधान में जोड़ी गई। अनुच्छेद 19 को संशोधित करते हुए उसमें ‘युक्तियुक्त’ शब्द जोड़ा गया। साथ ही भारतीय दंड संहिता की धारा-124 और 153 (ए) वापस अस्तित्व में आ गई थी।

इस असंवैधानिक कृत्य के माध्यम से तानाशाह नेहरू ने न्यायपालिका के निर्णय को पलटने की शुरुआत की। बाद में उनके उत्तराधिकारियों ने इसे नए आयाम तक पहुंचाया। वैसे भी 9वीं अनुसूची के माध्यम से सरकार के रूप में उन्हें हर तरह के संवैधानिक निर्णय को लागू करवाने का अधिकार मिल ही चुका था उसी पर आगे उनकी पुत्री संविधान के मूल ढांचे को ध्वस्त करने वाली थीं।

इस कृत्य के पीछे की मूल वजह पर रामबहादुर राय लिखते हैं, ‘‘सरदार पटेल का निधन होना, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और केसी नियोगी का नेहरू-लियाकत समझौते के विरोध में मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देना, अर्थशास्त्री डॉ. मथाई का आर्थिक नीतियों पर मतभेद के कारण मंत्रिमंडल से बाहर आना आदि घटनाओं के कारण नेहरू सरकार और कांग्रेस पार्टी में निरंकुश हो गए थे। ब्रिटिश शासन के काले कानून को अदालत में निरंतर चुनौतियां मिलने लगी थीं।’’ ऐसे में नेहरू कैसे चुप रह जाते! संशोधनों पर जनसंघ के नेता डॉ. मुखर्जी ने लोकसभा में कहा था, ‘नेहरू सरकार ने संविधान के मौलिक सिद्धांतों को पलट दिया है, जिससे नागरिक स्वतंत्रता में सरकार का हस्तक्षेप बढ़ेगा। अलोकतांत्रिक कदम उठाए जाएंगे।’ नेहरू उन मौलिक अधिकारों की हत्या कर रहे थे जिनके लिए 1895 से ही भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों ने लड़ाई लड़ी थी। राय साहब लिखते हैं, ‘अनेक पीढ़ियों की आकांक्षा जिस संविधान में साकार हुई थी, संविधान के पहले संशोधन से नेहरू उसकी हत्या कर रहे थे।’

नेहरू लोकतंत्र की गरिमा का भी सम्मान नहीं करते थे। 1963 में अमरोहा लोकसभा उपचुनाव में आचार्य कृपलानी को हराने के लिए उतारे गये हाफिज मोहम्मद इब्राहिम का नामांकन पत्र तय समय बीत जाने के बाद भी स्वीकार किया गया,इसके लिए जिलाधिकारी ने घड़ी की सुइयां पीछे करवा दी थीं। इस घटना की रिपोर्ट अंग्रेजी साप्ताहिक ‘करन्ट’ (28-30 अप्रैल 1963) में प्रमुखता से छपी थी। बाद में उनकी पुत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में लखनऊ विधानसभा क्षेत्र के आम चुनाव (1974) में चन्द्रभान गुप्त (कांग्रेस-निजलिंगप्पा के प्रत्याशी) की जमानत जब्त हो गई। बाद में इन्दिरा कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा ने स्वीकार किया कि उनकी जमानत जब्त कराने के लिए मतों में हेराफेरी की गई थी।

खुद को ‘एक्सीडेंटल हिंदू’ मानने वाले नेहरू के सनातन धर्म विरोध का एक लंबा इतिहास रहा है। स्वतंत्रता के पश्चात सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार के बाद नेहरू सरकारी खर्च से अयोध्या में बाबरी ढांचे का पुनर्निर्माण करवाना चाहते थे। तब सरदार पटेल ने इसका कठोर विरोध किया। 22 फरवरी 1949 को जब बी. टी. रणदिवे के नेतृत्व में कम्युनिस्टों ने भारत पर कब्जा करने के लिए हथियारबंद विद्रोह प्रारंभ किया तो गृहमंत्री सरदार पटेल ने कठोर कार्रवाई की जबकि नेहरू कम्युनिस्ट षड्यंत्र की वकालत करते हुए उन्हें नैतिक समर्थन देने के प्रयास में लगे थे। यही नहीं, सरदार पटेल के निधन के बाद गिरफ्तार कर जेल में डाले गए इन कम्युनिस्ट विद्रोहियों को सम्मान सहित बाहर लाया गया, जैसे वे कोई क्रांतिकारी हों।

सर्वविदित है कि भारत के लिए नासूर बन चुके कश्मीरी अलगाववाद के लिए नेहरू ही जिम्मेदार थे, लेकिन उनमें नैतिक गिरावट ऐसी थी कि जब जम्मू-कश्मीर की स्थिति बिगड़ने लगी तब 24 जुलाई 1952 को लोकसभा में झूठा बयान देते हुए उन्होंने सारी समस्या का ठीकरा सरदार पटेल के माथे फोड़ने की कोशिश की, कहा कि, ‘सरदार पटेल ही जम्मू-कश्मीर का सब काम देख रहे थे।’

इंदिरा राज बना आतंक का पर्याय

अब जरा 20वीं सदी की पहली महिला तानाशाह इंदिरा गांधी के ‘संविधान-सम्मान’ पर एक दृष्टि। राहुल गांधी अक़्सर भाजपा पर ‘दलित-आदिवासी विरोधी’ होने का आरोप लगाते हैं। लेकिन बता दें कि मध्यप्रदेश में ‘आदिवासियों’ के हितरक्षक राजा प्रवीर चंद्र भंजदेव की 25 मार्च, 1966 की रात इंदिरा गांधी द्वारा प्रश्रय प्राप्त द्वारका प्रसाद मिश्र के नेतृत्व वाली कांग्रेसी सरकार के निर्देश पर हुई पुलिस फायरिंग में मृत्यु हुई थी। रामबहादुर जी इसे विशुद्ध रूप से कांग्रेस सरकार द्वारा प्रायोजित हत्या बताते हैं।

बांग्लादेश युद्ध के पश्चात 1972 तक इंदिरा भारतीय राजनीति पर छा गई थीं। विपक्ष में कोई ऐसा नहीं था जो उन्हें चुनौती दे सके। दिल्ली की केन्द्रीय सत्ता से लेकर कई राज्यों में अभी भी कांग्रेस की सत्ता थी। इंदिरा के मन में इस अहंकार ने घर कर लिया था कि वे देश को जैसे चाहे वैसे चला सकती हैं।

1969 के राष्ट्रपति चुनाव में वी. वी. गिरी को जिताने के लिए दल-बदल और पार्टी को धोखा देकर जनप्रतिनिधियों की ‘आत्मा की आवाज़’ पर मतदान की जो घृणित परंपरा प्रारम्भ हुई उसकी जनक इंदिरा गांधी ही थीं। उन्होंने प्रधानमंत्री एवं पार्टी अध्यक्ष, दोनों पदों पर कब्ज़ा जमा लिया। पूर्व गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी मानते हैं कि, ‘1969 में कांग्रेस पार्टी का विभाजन कर अपना वर्चस्व स्थापित करने के निर्णय के पीछे इंदिरा के मन में बैठा असुरक्षा का भाव था। वे स्वयं को जवाबदेह तथा विवेक के सामान्य मानदंडों से भी ऊपर मानती थीं।

इंदिरा गाधी की संविधान और लोकतंत्र विरोधी मानसिकता का सबसे विकृत रूप आपातकाल में परिलक्षित हुआ। 26 जून, 1975 से लेकर 23 मार्च, 1977 तक का कालखंड भारतीय लोकतंत्र का सबसे वीभत्स कालखंड माना जाता है। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर लिखते हैं, ‘‘उस वक्त कुछ शक्तियां थीं जो नया सिद्धांत लागू करके धीरे-धीरे सरकारी तंत्र का उपयोग करके इस देश में कम्युनिज्म को लाना चाहती थीं। उन्होंने ही इंदिरा जी को आपातकाल लगाने की सलाह दी और उनका साथ दिया।’’ वैसे भी संविधान की प्रस्तावना में संशोधन करके इंदिरा अपने इरादे जाहिर कर ही चुकी थीं। बीजू पटनायक से इंदिरा गांधी ने स्वयं कहा था कि उन्हें वैसे ही अधिकार चाहिए जैसे मार्शल टीटो (युगोस्लाविया) और नासिर( मिस्र) को मिले हुए थे।

व्यक्ति पूजा की चरम सीमा को छूते हुए दिल्ली में 23 जून 1975 को आयोजित एक रैली में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने ‘इंदिरा तेरी सुबह की जय, इंदिरा तेरी शाम की जय, इंदिरा तेरे काम की जय, इंदिरा तेरे नाम की जय’ का गायन किया।

सोनिया की मनमानी

पद एवं गोपनीयता की संवैधानिक मर्यादा को भंग करके सरकारी तंत्र को परिवार की जागीर बनाने की परंपरा भी इंदिरा गांधी ने ही प्रारम्भ की जिसका निर्वहन मनमोहन सरकार में सोनिया गांधी करती रही थीं। इंदिरा के वफादार बी.एन. टंडन (जो पी.एम.ओ. में संयुक्त सचिव थे) के अनुसार, प्रधानमंत्री कार्यालय का कार्य संजय गांधी देखते थे। गुप्त आयोग की रिपोर्ट के अनुसार भी आपातकाल के बहुत पहले ही प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का आदेश था कि सभी फाइलें संजय गांधी के आदेश के बाद ही जाएं।

सरकारी दस्तावेजों के अनुसार आपातकाल के दौरान मीसा धारा, जिसे ‘इंदिरा-संजय सुरक्षा कानून’ कहा जाता था, के अंतर्गत 34,988 तथा डी.आई.एस.आई.आर. धारा के अंतर्गत 75,818 व्यक्ति गिरफ्तार किए गए। कुख्यात नसबंदी अभियान के दौरान देशभर में 1975-76 में 26,24,755 लोग प्रभावित हुए, वहीं 1976-77 में यह संख्या तीन गुना बढ़कर 81,32,209 हो गई। नसबंदी के कारण कुल 1,774 मौतें हुईं।

इस दौरान प्रशासनिक व्यवस्था में निरंकुशता के कारण 25,000 सरकारी कमर्चारियों को जबरन सेवामुक्त किया गया। सरदार स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश पर 2 नवंबर,1975 को संविधान के 42वें संशोधन के जरिए 59 प्रावधानों को परिवर्तित करते हुए न्यायपालिका की समीक्षा के अधिकार से बाहर कर दिया गया। इसी समय संविधान की प्रस्तावना को अपमानित करते हुए उसमें जबरन ‘समाजवाद’ तथा ‘पंथनिरपेक्ष’ जैसी गैर-भारतीय अवधारणाएं जोड़ी गईं।

संविधान की धारा 19 को स्थगित करके नागरिकों को धारा 14, 21 और 22 द्वारा प्राप्त सभी संवैधानिक अधिकार निरस्त कर दिए गए। 39वें संविधान संशोधन के जरिए जन-प्रतिनिधित्व कानून-1951 को बदल दिया गया। गुजरात और तमिलनाडु की गैर-कांग्रेसी सरकारों को बर्खास्त कर राष्टÑपति शासन लगाया गया। नगरों के सौंदर्यीकरण के नाम पर 4,000 से अधिक गरीब बस्तियों को उजाड़ दिया गया। प्रेस को ‘दुरुस्त’ करने का हुक्म दिया गया, जिसे ना मानने पर आई.के. गुजराल को हटाकर सूचना और प्रसारण मंत्री पद से हटाकर उनकी जगह विद्याचरण शुक्ल को बिठाया गया जिन्होंने विद्युत आपूर्ति बाधित करने से लेकर सेंसरशिप तक के नियम कड़े किए। प्रेस की कमर तोड़नी शुरू की। ओपिनियन, सेमिनार, जनता, इंडियन ओपिनियन, हिम्मत, पॉइंट आफ़ व्यू, पाञ्चजन्य और मदरलैंड जैसी कई पत्र-पत्रिकाएं बंद कर दी गईं। सरकार ने लगभग 40 प्रेस संवाददाताओं के मान्यता-पत्र रद्द कर दिए।

आम जनता में भय पैदा करने के लिए पुलिस के साथ-साथ युवक कांग्रेस के गुंडा तत्वों द्वारा हथियारों एवं गोलीबारी का प्रयोग किया गया। जेपी जैसे लोकनायक भी नहीं बख्शे गये। 5 जून, 1974 को पटना में गांधी मैदान से राजभवन के लिए निकाले गए जलूस पर फायरिंग की गई जिसका निशान जयप्रकाश नारायण थे। जांच में पता चला कि जिस फ्लैट से गोलियां चलाई गईं वह कांग्रेस विधायक फुलेना राय का सरकारी आवास था जहां से इंदिरा बिग्रेड का काम का चलता था। रामबहादुर राय लिखते हैं, ‘यह सच है कि जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस में अपनी बयानबाजी के लिए कुख्यात थे। मौलाना अबुल कलाम आजाद ने भी उनके एक बयान को भारत विभाजन का कारण माना था।’

आज खुद को न्यायपालिका की ‘रक्षक’ बनकर दिखा रही ‘राहुल बाबा एंड कंपनी’ को ज्ञात होना चाहिए कि आपातकाल में न्यायपालिका की कमर तोड़ दी गई थी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के तत्कालीन न्यायाधीश न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा कोे, जिन्होंने समाजवादी नेता राजनारायण द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए 12 जून 1975 को अपने फैसले में इंदिरा गांधी की लोकसभा सदस्यता को रद्द करते हुए 6 वर्ष के लिए किसी भी संवैधानिक पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया था, को ‘ठीक करने’ का संदेश भेजा गया। उनके तब तक के कॅरियर से जुड़े सभी कागजातों की बड़ी बारीकी से जांच की गई। उनके सगे-संबंधियों को परेशान किया गया और चौबीसों घंटे उनकी जासूसी की गई। इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी की मांगों पर खरा ना उतरने वाले 16 न्यायाधीशों का तबादला कर दिया था।

न्यायमूर्ति एस.रंगराजन और न्यायमूर्ति आर.एन.अग्रवाल जैसे कुछ ही न्यायाधीश थे जिन्होंने कुलदीप नैयर की गिरफ्तारी को गलत बताते हुए उन्हें रिहा कर दिया। इसके बाद इंदिरा गांधी ने प्रतिशोध लेते हुए उन दोनों न्यायाधीशों को ‘कर्तव्य पालन’ का दंड दिया। रंगराजन का सुदूर गुवाहाटी में तबादला किया गया तथा अग्रवाल को वापस सेशन जज बना दिया गया।

इन संविधान एवं जनतंत्र विरोधी कारनामों के अगुआ जवाहरलाल नेहरू एवं उनकी पुत्री इंदिरा गांधी, दोनों ने अपनी अध्यक्षता में गठित कमेटी के माध्यम से खुद को ही ‘भारत रत्न’ से (क्रमश: 1955 तथा 1971 में) पुरस्कृत कर लिया। यह नेहरू परिवार की संवैधानिक मूल्यों के प्रति क्षुद्र समझ का प्रमाण है। सितंबर 1973 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने ठीक ही लिखा था, ‘‘देश की नाजुक दशा को देखकर यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं है कि यह सब गिरते नैतिक मूल्यों का नतीजा है। सार्वजनिक जीवन का कोई भी क्षेत्र, चाहे वह राजनीति हो या सरकार या शिक्षा या कार्यालय, व्यापारिक संगठन या सामाजिक संगठन, ऐसा नहीं है जो गिरते मूल्यों से अछूता हो।’’

आज उसी तानाशाह परिवार का शहजादा सरकार के विरुद्ध छद्म तानाशाही विरोधी मोर्चे लगाकर लोकतांत्रिक मूल्यों की दुहाई दे रहा है। यह वही है जिसने अपनी ही यूपीए सरकार के जनप्रतिनिधि संशोधन अध्यादेश 2013 की सार्वजनिक रूप से प्रतियां फाड़ी थीं।

सिख नरसंहार के दोषी राजीव और कांग्रेस

पायलट की नौकरी से सीधे देश की सत्ता पर लाद दिये जाने वाले उनके पिता राजीव गांधी ने एम. फोतेदार, पी. शिवशंकर, पी.सी. एलेक्जेंडर, अरुण नेहरू, कमलनाथ आदि सदस्यों वाले ‘1,अकबर रोड’ गैंग की कमान संभाल ली थी। यही गैंग पंजाब में हिन्दू-सिख विवाद एवं खालिस्तान षड्यंत्र का मुख्य प्रवर्तक था। आपरेशन ब्लू स्टार से लेकर 1984 के सिख नरसंहार तक के सुनियोजित षड्यंत्र के बारे में राहुल गांधी को पता ही होगीा। उन्हें यह भी याद होगा कि राजीव गांधी ने 19 नवम्बर, 1984 को देश के प्रतिष्ठित सिख समुदाय का तिरस्कार करते हुए कहा था कि, ‘जब कोई विशाल वृक्ष गिरता है तो उसके आसपास की जमीन स्वाभाविक रूप से हिलती ही है।’ तब हुए सिख-विरोधी दंगों में दिल्ली में लगभग 2,800 एवं पूरे देश में कुल 3,350 सिखों की हत्या हुई।

खालिस्तान आंदोलन, जिसके दंश से आज भी राष्ट्रीय एकता पीड़ित है, उसके प्रारम्भ से लेकर सिख नरसंहार की पटकथा तक का लेखक भी यही नेहरू-गांधी परिवार है। 1947 से ही कांग्रेसियों ने सिखों को छोटे-छोटे मसलों पर भड़काया। इतना ही नहीं, गांधी परिवार में हमेशा से सेना समेत किसी भी राष्ट्रीय संस्था के प्रति सम्मान का भाव शून्य रहा है। 1987 में राजीव गांधी ने अपने परिवार को पिकनिक पर ले जाने के लिए भारतीय नौसेना के युद्धपोत आईएनएस विराट का इस्तेमाल किया। साथ में सोनिया गांधी के इतावली मूल के रिश्तेदार भी शामिल थे।

यही नहीं, दिसंबर,1984 में जिस भोपाल गैस त्रासदी में हजारों भारतीयों की अकाल मृत्यु हुई, उसके मुख्य आरोपी वारेन एंडरसन को देश से भगाने सहित 1986 में मानकों की अनदेखी करते हुए स्वीडिश कंपनी से हॉवित्जर तोपों की खरीद में करोड़ों की दलाली खाने के आरोपी राजीव गांधी की ‘क्लीननेस’ के किस्सों की लम्बी-चौड़ी सूची है। राहुल के यही ‘संविधान रक्षक’ पिता 1986 में इंडियन पोस्ट आफिस (एमेंडमेंट) बिल लेकर आये जिसके कारण प्रेस की स्वतंत्रता ही बाधित नहीं होती थी बल्कि आम आदमी की जबान पर भी सरकारी निगरानी की तैयारी थी। इसे तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने पॉकेट वीटो का इस्तेमाल कर रोक लिया था।

2004 से 2014 तक राहुल गांधी की मां सोनिया गांधी ने सभी संवैधानिक मर्यादाओं को ताक पर रखकर अपना अलग राज चलाया। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने मीडिया सलाहकार संजय बारू के समक्ष ख़ुद स्वीकार किया था कि कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती गांधी के पास सत्ता का केंद्र है और उनकी सरकार पार्टी के प्रति जवाबदेह है। तत्कालीन संयुक्त सचिव पुलक चटर्जी को सोनिया के कहने पर प्रधानमंत्री कार्यालय में नियुक्त किया गया था, जो प्रतिदिन सोनिया को पीएमओ में हो रहे कार्यकलापों की जानकारी देते थे और उनसे निर्देश भी लेते थे। इसके अतिरिक्त अहमद पटेल, दिग्विजय सिंह जैसे दरबारी थे ही जो 10, जनपथ की परिक्रमा से केंद्र सरकार को पार्श्व रूप से प्रभावित करने की मुहिम का हिस्सा रहे थे।

संजय बारू भी मानते हैं कि मनमोहन सिंह से गलतियां तभी हुईं जब सोनिया और कांग्रेस ने उनके फैसलों में हस्तक्षेप करना शुरू किया। ऐसे उदाहरणों की एक लंबी सूची है कि कैसे पूरे एक दशक (2004-2014) तक 10, जनपथ के सरकारी आवास में इतावली मूल की महिला ‘एंतोनियो माइनो’ (बाद में सोनिया गांधी) के निर्देशन में भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों एवं संवैधानिक आदर्श का ‘चीरहरण’ होता रहा और देश एकता-भाईचारे एवं झूठी पंथनिपेक्षता की नींद सोता रहा। आज उसी राजीव-सोनिया गांधी का पुत्र, जिसकी भारतीय नागरिकता को संदिग्ध मानकर कई बार सवाल उठा है, संविधान बचाने की भ्रामक घोषणाएं एवं आंदोलन कर रहा है।

डॉ. आंबेडकर अपनी पुस्तक ‘थॉट्स आन पाकिस्तान’ (1940) में ‘ग्रावामिन पॉलिटिक’ शब्दावली का प्रयोग करते हैं, जिसका तात्पर्य है, ‘मुख्य रणनीति यह हो कि शिकायतें पैदा करके सत्ता हथियाई जाए।’ उन्होंने अपनी किताब में मुस्लिम राजनीति को ‘ग्रावामिन पॉलिटिक’ कहा है जो निरंतर शिकायतें करते हुए कपटपूर्वक एक दबाव बनाती है, जो दिखावे के लिए ‘निर्बल’ का रूप बनाती हैं, किंतु वास्तव में वह एक ताकतवर, संगठित समुदाय की राजनीति रणनीति है। इस्लामी कट्टरपंथ एवं ईसाइयों के राष्ट्रीय एकता विरोधी गठजोड़ की गोद में बैठे कांग्रेस नेता राहुल गांधी ग्रावामिन पॉलिटिक की राह पर हैं।

आरोप अकसर आधार के बिना पर लगते हैं तभी सामाजिक रूप से स्वीकृत होते हैं। यदि वे निराधार हों तो आरोप लगाने वाला समाज के समक्ष अविश्वसनीय एवं हास्यास्पद हो जाता है। यही कारण है कि अविवेकी-अविचारी भाषणों के लिए कुख्यात राहुल गांधी उपहास के पात्र बने हैं। वह असत्य में जीते रहे हैं। यदि उन्हें वास्तव में लोकतांत्रिक आदर्शों एवं संवैधानिक मूल्यों में आस्था जगानी है तो सर्वप्रथम अपने परिवार के संविधान विरोधी कृत्यों के लिए देश से क्षमायाचना करें और आम जन-तंत्र के वास्तविक संघर्ष से नाता जोड़ें।

परदे पर छाया इमर्जेंसी का साया

 

‘बेटा झुकना मत’

राजनाथ सिंह
रक्षा मंत्री,भारत

लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ यानी मीडिया का गला घोंट दिया गया। जिन मीडिया संस्थानों ने इसका विरोध किया, उसका उन्हें खामियाजा भी भुगतना पड़ा था। मीडिया पर पूरी तरह से ‘सेंसरशिप’ लगा दी गई थी। अगर कुछ भी छापना होता तो उसे भी पहले सेंसर किया जाता था। मैं सचाई जानता हूं कि इस देश में लोकतंत्र की ताकत को कोई कमजोर नहीं कर सकता। आपातकाल जिस तरीके से रातोंरात लगाया गया, वह तानाशाही का जीता-जागता प्रमाण था।

12 जुलाई,1975 को मेरी गिरफ्तारी हुई थी। तब मैं जेपी आंदोलन में मिर्जापुर में संयोजक के रूप में काम कर रहा था। मुझे रात 12 बजे गिरफ्तार किया गया और एकांत कोठरी में लगभग दो महीने रखा गया। फिर केंद्रीय कारागार, नैनी में 8 जनवरी, 1977 तक रखा गया। जब मेरी गिरफ्तारी का एक साल पूरा हुआ तो माताजी ने मेरे चचेरे भाई दिग्विजय सिंह से पूछा था कि राजनाथ कब छूटेंगे।

उन्होंने कहा कि अभी लगभग एक साल और नहीं। यह सुनते ही उनको मस्तिष्क आघात हुआ और उनका स्वर्गवास हो गया। इंदिरा गांधी ने उस समय सिर्फ अपनी कुर्सी बचाए रखने के लिए आपातकाल लगाया था। निस्संदेह यह बहुत ही गलत फैसला था। राजनीति सत्ता-सुख भोगने के लिए नहीं की जानी चाहिए। राजनीति समाज बनाने के लिए की जानी चाहिए। देश के लिए की जानी चाहिए। यही राष्ट्र धर्म है।

मुझे याद है कि जब मुझे प्रयागराज के केंद्रीय कारागार में ले जाया जा रहा था, उस वक्त मेरी मां मुझसे मिलने आई थीं। उन्होंने कहा था कि बेटा चाहे कुछ भी हो जाए, लेकिन झुकना मत। मेरी माता जी के कहे शब्द आज भी मेरे मन-मस्तिष्क पर अंकित हैं। इन शब्दों ने मुझे बहुत शक्ति दी।
पाञ्चजन्य के अंक (2 जुलाई,2023) से संपादित अंश

Topics: Indira Gandhi's freedom to liveConstitution: The untold storyपाञ्चजन्य विशेषAccidental Hinduसंविधानविद् रामबहादुर राय संविधानNehru's opposition to Sanatana Dharmaराजीव गांधी ने डाकघर (संशोधन) विधेयकएंतोनियो माइनोइंदिरा ने जीने की आजादीसंविधान: अनकही कहानीएक्सीडेंटल हिंदूनेहरू के सनातन धर्म विरोधConstitutionalist Ram Bahadur Rai ConstitutionRajiv Gandhi Post Office (Amendment) Bill
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