राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस : सफेद लैब कोट में देवदूत के समान हैं डॉक्टर
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राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस : सफेद लैब कोट में देवदूत के समान हैं डॉक्टर

चिकित्सकों के समाज के प्रति समर्पण एवं प्रतिबद्धता के लिए कृतज्ञता और आभार व्यक्त करने तथा मेडिकल छात्रों को प्रेरित करने के लिए प्रतिवर्ष एक जुलाई को ‘राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस’ मनाया जाता है।

Written byयोगेश कुमार गोयलयोगेश कुमार गोयल
Jul 1, 2024, 12:30 pm IST
inभारत

चिकित्सकों के समाज के प्रति समर्पण एवं प्रतिबद्धता के लिए कृतज्ञता और आभार व्यक्त करने तथा मेडिकल छात्रों को प्रेरित करने के लिए प्रतिवर्ष एक जुलाई को ‘राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस’ मनाया जाता है। इस साल राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस ‘उपचार करने वाले हाथ, देखभाल करने वाले हृदय’ (Healing hands, caring hearts) विषय के साथ मनाया जा रहा है। यह विषय अपने कार्य के प्रति चिकित्सकों के समर्पण की सराहना करते हुए मानव जीवन में उनकी भूमिका का सम्मान करता है, जो अपने जीवनकाल में लाखों लोगों की जान बचाने में अहम भूमिका निभाते हैं।

चिकित्सक दिवस मनाने का मूल उद्देश्य चिकित्सकों की बहुमूल्य सेवा, भूमिका और महत्व के संबंध में आमजन को जागरूक करना, चिकित्सकों का सम्मान करना और साथ ही चिकित्सकों को भी उनके पेशे के प्रति जागरूक करना है। दरअसल कुछ चिकित्सक ऐसे भी देखे जाते हैं, जो अपने इस सम्मानित पेशे के प्रति ईमानदार नहीं होते लेकिन ऐसे चिकित्सकों की भी कमी नहीं, जिनमें अपने पेशे के प्रति समर्पण की कमी नहीं होती। बिना चिकित्सा व्यवस्था के इंसान की जिंदगी कैसी होती, इसकी कल्पना मात्र से ही रोम-रोम सिहर जाता है। यही कारण है कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में चिकित्सकों का महत्व सदा से रहा है और हमेशा रहेगा।

भारतीय समाज में चिकित्सकों को भगवान के समान दर्जा दिया गया है। हालांकि यह अलग बात है कि निजी अस्पतालों में डॉक्टरों और अन्य स्टाफ की भूमिका पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं लेकिन यह भी सच है कि चिकित्सक लोगों को विभिन्न प्रकार की घातक बीमारियों से निजात दिलाने में पूरी ताकत लगा देते हैं। भारत में चिकित्सक दिवस की स्थापना वर्ष 1991 में हुई थी। पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री और जाने-माने चिकित्सक डा. बिधान चंद्र रॉय के सम्मान में चिकित्सकों की उपलब्धियों तथा चिकित्सा क्षेत्र में नए आयाम हासिल करने वाले डॉक्टरों के सम्मान के लिए इसका आयोजन होता है। वे एक जाने-माने चिकित्सक, प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और वर्ष 1948 से 1962 में जीवन के अंतिम क्षणों तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे। उन्होंने पश्चिम बंगाल में दुर्गापुर, बिधाननगर, अशोकनगर, कल्याणी तथा हबरा नामक पांच शहरों की स्थापना की थी। संभवतः इसीलिए उन्हें पश्चिम बंगाल का महान वास्तुकार भी कहा जाता है। कलकत्ता विश्वविद्यालय से मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने वर्ष 1911 में एमआरसीपी और एफआरसीएस की डिग्री लंदन से ली। उन्होंने एक साथ फिजिशयन और सर्जन की रॉयल कॉलेज की सदस्यता हासिल कर हर किसी को अपनी प्रतिभा से हतप्रभ कर दिया था। वर्ष 1911 में भारत में ही एक चिकित्सक के रूप में उन्होंने अपने चिकित्सा कैरियर की शुरूआत की। वे कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में शिक्षक नियुक्त हुए। वर्ष 1922 में वे कलकत्ता मेडिकल जनरल के सम्पादक और बोर्ड के सदस्य बने। 1926 में उन्होंने अपना पहला राजनीतिक भाषण दिया और 1928 में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सदस्य भी चुने गए।

डा. बिधान चंद्र रॉय ने 1928 में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के गठन और भारत की मेडिकल काउंसिल (एमसीआई) की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कई बड़े-बड़े पदों पर रहने के बाद भी वे प्रतिदिन गरीब मरीजों का मुफ्त इलाज किया करते थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् उन्होंने अपना समस्त जीवन चिकित्सा सेवा को समर्पित कर दिया। बेहतरीन स्वास्थ्य सुविधाओं को आम जनता की पहुंच के भीतर लाने के लिए वे जीवन पर्यन्त प्रयासरत रहे। 4 फरवरी 1961 को उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया। 1967 में दिल्ली में उनके सम्मान में डा. बी.सी. रॉय स्मारक पुस्तकालय की स्थापना हुई और 1976 में उनकी स्मृति में केन्द्र सरकार द्वारा डा. बी.सी. रॉय राष्ट्रीय पुरस्कार की स्थापना की गई। संयोगवश डा. रॉय का जन्म और मृत्यु एक जुलाई को ही हुई थी। उनका जन्म 1 जुलाई 1882 को पटना में हुआ था और मृत्यु 1 जुलाई 1962 को हृदयाघात से कोलकाता में हुई थी।
भारत के अलावा दूसरे देशों में भी चिकित्सकों के सम्मान में ऐसे ही दिवस मनाए जाते हैं किन्तु वहां उनका आयोजन अलग-अलग तारीखों में होता है। वैसे चिकित्सक दिवस की शुरूआत सबसे पहले अमेरिका के जॉर्जिया में हुई थी। वहां चिकित्सकों के सम्मान के लिए एक दिन निश्चित करने का सुझाव जॉर्जिया निवासी डा. चार्ल्स बी एलमंड की पत्नी यूडोरा ब्राउन एलमंड ने 30 मार्च 1933 को दिया था। 30 मार्च 1958 को यूएस के हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव्स ने उनके उस सुझाव को स्वीकार करते हुए यह दिवस मनाना शुरू किया। वहां इसके लिए 30 मार्च की तारीख इसलिए रखी गई क्योंकि जॉर्जिया में इसी दिन डा. क्राफोर्ड डब्ल्यू लोंग ने पहली बार ऑपरेशन के लिए एनेस्थीसिया का उपयोग किया था। जहां अमेरिका में 30 मार्च को चिकित्सक दिवस मनाया जाता है, वहीं वियतनाम में इसकी स्थापना 28 फरवरी 1955 को हुई थी और वहां तभी से 28 फरवरी को या उसके आसपास वाले किसी दिन यह दिवस मनाया जाता है। ब्राजील में महान चिकित्सक रहे कैथोलिक चर्च के सेंट ल्यूक के जन्मदिवस के अवसर पर 18 अक्तूबर को जबकि क्यूबा में पीले बुखार पर शोध करने वाले चिकित्सक कार्लोस जुआन फिनले के जन्मदिवस 3 दिसम्बर को यह दिवस मनाया जाता है। नेपाल में यह दिवस नेपाल मेडिकल एसोसिएशन की स्थापना के बाद 4 मार्च को तथा ईरान में महान चिकित्सक एविसेना के जन्मदिवस के अवसर पर 23 अगस्त को मनाया जाता है।

बहरहाल, चूंकि चिकित्सकों को पृथ्वी पर भगवान का रूप माना गया है, इसलिए समाज की भी उनसे यही अपेक्षा रहती है कि वे अपना कर्त्तव्य ईमानदारी और पूरी निष्ठा के साथ निभाएं। हालांकि निजी अस्पतालों के कुछ चिकित्सकों पर मरीजों और उनके परिजनों के साथ लापरवाही और लूट के गंभीर आरोप लगते रहे हैं। दरअसल निजी चिकित्सा तंत्र मुनाफाखोरी के व्यवसाय में परिवर्तित हो चुका है लेकिन फिर भी इस दीगर सच को भी नकारा नहीं जा सकता कि कोरोना हो या कैंसर, हृदय रोग, एड्स, मधुमेह इत्यादि कोई भी बीमारी, छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी बीमारियों से चिकित्सक ही करोड़ों लोगों को उबारते हैं। चूंकि चिकित्सक प्रायः मरीज को मौत के मुंह से भी बचाकर ले आते हैं, इसीलिए चिकित्सकों को भगवान का रूप माना जाता रहा है। चिकित्सा केवल पैसा कमाने के लिए एक पेशा मात्र नहीं है बल्कि समाज के कल्याण और उत्थान का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। इसीलिए चिकित्सक को सदैव सम्मान की नजर से देखने वाले समाज के प्रति उनसे भी समर्पण की उम्मीद की जाती है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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