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आबू के अचलगढ़ में ‘छना’ पानी

भारत के अनेक गांवोंं की तरह अचलगढ़ में भी पानी की बेहद किल्लत रही है। यहां महिलाएं और बच्चे पानी के लिए रोज औसतन 5-7 किलोमीटर का चक्कर लगाते थे

Written byडॉ. क्षिप्रा माथुरडॉ. क्षिप्रा माथुर
Mar 4, 2024, 09:56 am IST
in भारत, राजस्थान
गांव में पानी का एकमात्र स्रोत कर्पूरी तालाब

गांव में पानी का एकमात्र स्रोत कर्पूरी तालाब

महर्षि वसिष्ठ के गुरुकुल में राम और उनके सभी भाइयों ने आरंभिक शिक्षा पाई थी। सिरोही जिले में आने वाले इस इलाके की पिंडवाड़ा तहसील ही अयोध्या के राम मंदिर में लगे नक्काशीदार पत्थरों का केंद्र है। आबू पर्वत की ओरिया पंचायत में सात गांव आते हैं।

डॉ. क्षिप्रा माथुर

राजस्थान की गुजरात सीमा से सटा माउंट आबू काफी जद्दोजहद के बाद रियासतों के एकीकरण के दौरान प्रदेश का हिस्सा बन पाया था। नक्की और मंदाकिनी झीलों सहित राम कुंड और अन्य जल राशियों से भरापूरा यह वह इलाका है जहां महर्षि वसिष्ठ के गुरुकुल में राम और उनके सभी भाइयों ने आरंभिक शिक्षा पाई थी। सिरोही जिले में आने वाले इस इलाके की पिंडवाड़ा तहसील ही अयोध्या के राम मंदिर में लगे नक्काशीदार पत्थरों का केंद्र है। आबू पर्वत की ओरिया पंचायत में सात गांव आते हैं।

ये अचलगढ़ किले के आस-पास बसे हैं, जिसे मेवाड़ के राणा कुंभा ने आक्रमणकारियों से बचाव के लिये बनवाया था। यहीं अचलगढ़ मंदिर है, जहां शिवलिंग को नहीं, शिव के अंगूठे को पूजा जाता है। वसिष्ठ ऋषि की गाय नंदिनी के खाई में गिरने और उसे ढूंढते हुए पर्वत हिला देने पर, शिव ने अपने अंगूठे से पर्वत को थाम कर अचल रखा, इससे यह अचलगढ़ कहलाया। आस्था, मिथक, इतिहास और पर्यटन, सबके इसके हिस्से होने के बावजूद यहां पानी की बेहद किल्लत है। जहां पानी उपलब्ध है, वहां इतना मैला है कि पीने के पानी के लिए तो टैंकर का खर्चा ही करना पड़ता है। गर्मियों में झील-तालाब सूखने से परेशानी बढ़ जाती है।

गर्मी के महीने में जब वहां जाना हुआ तो सरपंच, उपसरपंच और वार्ड पंच के साथ पंचायत क्षेत्र का दौरा कर पानी के हालात जाने। अचलगढ़ में चर्म रोगों की शिकायत वाले 55 परिवारों के लिए वहां के कर्पूरी तालाब और बगल के कुएं का पानी ही एकमात्र स्रोत है। पानी इतना मैला था कि हाथ लगाने में भी हिचकें और यही पानी काम में लेने की मजबूरी इसलिए क्योंकि जलकुंभी से अटे हुए तालाब और काई से भरे कुएं की सफाई का कोई और तरीका नहीं है।

मन्दिर की बगल से गुजरता गांव जाने का रास्ता इतना संकरा है कि अंदर जेसीबी जैसी मशीन जाना संभव ही नहीं। इसी गांव के निवासी वार्ड पंच भूरा ने पूरा मामला समझाया और उसी ने सरपंच को साथ लेकर, समाधान निकालने के लिए जगह-जगह अर्जियां भी लगाईं। तालाब और कुएं का पानी मोटर से सामुदायिक टंकी में भरता है जहां से हर घर ने पाइप लगा रखे हैं। घर ऊंचाई पर हैं और बारिश के दिनों में फिसलन की वजह से मुश्किलें और बढ़ जाती हैं।

समाधान की ओर

पाञ्चजन्य के ही जल आन्दोलन में शामिल किए आईआईटी जोधपुर के काम को ध्यान में रखते हुए, वहां की टीम से संपर्क साधा गया। पानी की तकनीक पर काम कर रहे शिक्षकगण आनंद पिल्लै, निर्मल गहलोत और रामसिंह की टीम के साथ बैठक हुई और समाधान के लिए विस्तृत चर्चा हुई। तय हुआ कि उन्नत भारत अभियान की परियोजना के तहत फिल्टर लगाया जाएगा। टीम ने दौरा किया और यूएफ फिल्टर लगाने के लिये जमीनी हालात का जायजा लिया। इसके लिए टंकी और लोहे के स्टैंड की व्यवस्था टीम की बताई नापजोख के अनुसार पंचायत ने अपने स्तर पर कर ली। सरल स्वभाव और संतोष वाला यह गांव, पानी की किल्लत से निजात पाने के लिए लिखा-पढ़ी तो पहले भी कर चुका था। मगर कागज, अफसरों के हाथों अब तक इधर-उधर ही घूम रहा है।

नौकरशाही अभी भी सबके बूते से बाहर है या अपनी बंदिशों में कैद है। किस्मत ही होती है ऐसे गांवों-शहरों की जहां सरकारी अफसर और नेता आगे बढ़कर समस्याओं को निपटाते हैं। ज्यादातर इलाकों के लिए सुशासन अब भी परिकल्पना ही है, यथार्थ नहीं। यह गांव तो अपने लिए बोरवैल की मांग भी कर रहा है, क्योंकि यही आखिरी समाधान नजर आता है इसे। लेकिन यह इस क्षेत्र के पर्यावरण संरक्षित क्षेत्र में आने से पिछले सालों में यहां खुदाई और निर्माण के काम पर रोक है। बोरवैल को लेकर भले ही सरकारी नीतियां सख़्त हुई हैं लेकिन इसका खामियाजा सिर्फ वही भुगत रहे हैं जिनकी जरूरतें असल हैं और विकल्प सीमित।

प्यासे गांव की चाह ‘मोक्षधाम’

जीवन भर की प्यास लेकर, आखिरकार इंसान ईश्वर की चौखट पर ही आकर हाथ फैलाता है, शीश नवाता है। माउंट आबू के पहाड़ों के बीच अचलेश्वर महादेव को धोक लगाते हम पहुंचे आधा सैकड़ा परिवारों की परवरिश वाले गांव अचलगढ़, जहां दिखा एक कुआं, एक सरोवर, एक टंकी। आधा गांव पहाड़ पर, आधा नीचे। हालचाल लिया कुंए का। फिर तो ऐसी बात छिड़ी कि खत्म ही नहीं हुई। एक ने कहा, जल-कुंभी से अटे कर्पूरी तालाब से भी हालचाल पूछते जाना, सांस नहीं ले पाता वह अब। लोग मरते भी हैं यहां, तो इस घाट नहीं आते तरने।

यहां शव जलाने के लिए जंगल तो हैं मगर श्मशान नहीं है। दाह करते वक्त भय बना रहता हैकि सूखे पत्ते कहीं चिंगारी ना पकड़ लें। एक सपना देखा है यहां के कुएं ने कि जब साफ होगा, तो बारिश के पानी को गंगाजल की तरह संभाल कर रखेगा, गहरा होगा तो कर्पूरी तालाब की शिराओं से फिर जुड़ जायेगा, और कहीं यहां के वार्ड पंच भूरा की फाइलें उड़ चलीं तो एक नौजवान साथी बोरवैल भी साथ आ जाएगा। फिलहाल फाइल अफसरों के पास है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की हिदायत भी है कि पहाड़ों में खनन न हो, खुदाई ना हो, निर्माण न हो। अफसर भी फंसे हैं। एक ओर प्यास तो दूसरी ओर कुदरत से छेड़छाड़ का अपराध। फिर भी, ठीक से जीने-मरने का इंतजाम यहीं हो जाए, इस उम्मीद में दिन-रात जागे हैं। रही तुम्हारी प्यास की बात….तो वह तुम जानो!

छनने लगा पानी, मगर…

वार्ड पंच भूरा

भारत के अनेक गांवोंं की तरह यह इलाका उनमें से है, जहां महिलाएं और बच्चे पानी के लिए रोज दो-चार चक्कर लगाते दिख जाएंगे। यानी हर दिन औसतन 5-7 किलोमीटर पानी लाने ले-जाने के लिए सामुदायिक टंकियों तक आना ही पड़ता है। टीम फिल्टर लगाकर लौटी और इसके रखरखाव का जिम्मा भी उपसरपंच तरुण ने तय कर दिया। जांचने के लिये पाञ्चजन्य की टीम हाल ही फिर अचलगढ़ पहुंची तो पाया कि सामुदायिक टंकी की बजाय फिल्टर अलग एक टंकी लगाकर नई जगह लगाया गया है। लोग सुबह-शाम पानी आकर भरने तो लगे हैं मगर जो काम तालाब के किनारे बनी सीमेंट की सामुदायिक टंकी के पानी को साफ कर हो सकता था, उसकी बजाय नई व्यवस्था में लोग सहज नहीं हैं।

कायदे की बात भी यही है कि जिस टंकी से हर घर तक पाइप जुड़ा हुआ है, पानी तो वहीं, उसी जगह फिल्टर हो तो असल फायदा हो। टंकी का पानी हर घर तक पाइप से पहुंचता है, इसलिए शासन के स्तर पर घर घर साफ पानी पहुंचाने की फिक्र तो है ही नहीं।

जनप्रतिनिधि भी सामाजिक संस्थाओं और शैक्षणिक संस्थाओं के पूछताछ करने पर ही खुल कर बता पाते हैं। मन्दिर और किले के कारण पर्यटन स्थल होने के बावजूद, महिलाओं के लिए एक अदद शौचालय की भी कमी खलती है। इसकी शिकायत भी गांव से बाहर निकलते ही मंदिर की पार्किंग के ठेकेदार ने पंचायत प्रतिनिधियों से की। कहने लगा, शर्म आती है कि बेटियों के लिए यह मूल सुविधा तक नहीं है।

फिलहाल यह तो तय हुआ है कि पर्यटकों को साफ पानी मिल पाये, इसके लिए गांव की गली में लगी फिल्टर वाली टंकी पंचायत भवन के पास ले आएंगे और अचलगढ़ गांव की मूल समस्या के समाधान के लिए फिर से विशेषज्ञों की टीम दौरा करेगी। पानी की जांच तो वे कर चुके हैं, इस बार वहां नया फिल्टर लगाकर मसला हल होगा। इस बीच गांव के वार्ड पांच और जागरूक नागरिक पास के गांव की दशा दिखाने भी साथ ले गये। इसी पंचायत के सालगांव के किसान कानसिंह और वार्ड पंच जमना ने यहां का कष्ट साझा किया। एक तालाब, एक बोरिंग, गंदा पानी और पानी के पाइप का पैसा जमा कराने के डेढ़ साल बाद भी पाइपलाइन का इंतजार है। उन्नत भारत अभियान ने इस गांव की तकलीफ दूर करने का भी बीड़ा उठाया है, जल्द ही यहां के बदलाव की कहानी भी सुनाई देगी।

भारत के गांवों की यही खूबी है कि वे जानते हैं, साझेदारी में जो काम होगा, उसका नतीजा होगा सबकी खुशहाली, समृद्धि, उन्नति। नये साल में, अचलगढ़ ही नहीं, आस-पास के गांवों की सुनवाई भी होगी। यह आभास यहां के गांवों में रहने वालों की जुझारू प्रवृत्ति को देखकर और पुख्ता होता है।

Topics: आबू पर्वतआईआईटी जोधपुरराम मंदिरपाञ्चजन्य विशेषमाउंट आबू काफी जद्दोजहद
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