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हल्द्वानी में कट्टरपंथी अराजक तत्वों की हिंसा को लेकर विदेशी मीडिया का प्रपंच आरम्भ

हल्द्वानी में जो कुछ भी हुआ, वह पूरे विश्व ने देखा, अराजक तत्वों ने आतंक का राज स्थापित करने का कुप्रयास किया

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Feb 10, 2024, 07:53 pm IST
in विश्लेषण

उत्तराखंड में हल्द्वानी में जो कुछ भी हुआ, वह पूरे विश्व ने देखा और कैसे शासन को निशाना बनाकर सरकार को चुनौती दी गयी और आतंक का राज स्थापित करने का कुप्रयास किया गया। जिन्होंने हिंसा की, उन्होंने महिला-पुरुषों आदि किसी को नहीं देखा। जो सामने आया उसे अपने विष का शिकार बनाया। उन्होंने पत्थर बरसाए और अब तो तमाम लोग सामने आ गए हैं कि आखिर वह इस सुनियोजित हिंसा से बचे।

 

तमाम लोग घायल हैं और सबसे अधिक घायल है देवभूमि की आत्मा। वह भूमि, जिसे हिन्दू धर्म में देव भूमि कहकर पूजा योग्य माना गया है। भारत में तो जन्मभूमि एवं कर्मभूमि दोनों को ही माँ की संज्ञा दी गयी है और भारत का आम जनमानस कभी भी अपनी जन्मभूमि एवं कर्मभूमि पर आंच नहीं देता है। परन्तु फिर भी देवभूमि दहल गयी।

 

कैसे अवैध अतिक्रमण को लेकर उपद्रवियों ने थाना जलाया और महिला पुलिसकर्मियों को भी जिंदा जलाने का प्रयास किया, वह भयावह है और आम लोगों ने एक स्वर में मांग उठाई की कि उपद्रवियों को दण्डित किया जाए। ऐसा दंड दिया जाए जो एक मिसाल बने, एक उदाहरण बने और उपद्रवी ऐसा करने से बचें। परन्तु जैसे ही कट्टरपंथी अराजक तत्वों के खिलाफ भारत की जनता ने आवाज उठानी शुरू की क्योंकि उसके दिल में अभी तक फरवरी में हुए दिल्ली दंगों के ही घाव ताजा हैं। भारत की जनता को पता है कि कैसे उपद्रवी कट्टरपंथी पहले हिंसा करते हैं और फिर बाद में पीड़ित होने की शिकायत करते हैं और एक खलनायक खोजते हैं, कि उस पर अपनी हिंसा का ठीकरा फोड़ सकें।

 

जैसे दिल्ली दंगों में उन्होंने कपिल मिश्रा के एक वक्तव्य को खलनायक बना दिया था और इसमें सबसे बड़ा टूल होते हैं, पश्चिमी मीडिया में हिंसा की कवरेज करने वाले लोग। हल्द्वानी में अब्दुल मलिक द्वारा सरकारी जमीन पर किए गए अवैध कब्जे को हटाने गयी प्रशासन की टीम एवं पुलिस दलों को विदेशी मीडिया का एक बड़ा वर्ग खलनायक बताने में जुट गया है, और यह भी जाहिर है कि उसका अंतत: निशाना नरेंद्र मोदी ही हैं।

 

न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे पोर्टल, जिनके स्वभाव में ही हिन्दू द्वेष है, यह विमर्श बनाने में लग गए हैं कि दरअसल जिस संपत्ति से अतिक्रमण हटाया जा रहा था, वह मुस्लिम संपत्ति थी। उसने अपनी रिपोर्ट में हल्द्वानी हिंसा के विषय में कवरेज करते हुए लिखा है कि मुस्लिम संपत्तियों को हटाने से हल्द्वानी में हिंसा हुई।

 

समीर यासिर नामक पत्रकार ने न्यूयॉर्क टाइम्स के लिए यह रिपोर्ट बनाते समय लिखा है कि यह हिंसा भारत में हिंदुत्व की बढ़ती हुई राष्ट्रीय पहचान की पृष्ठभूमि में हुई है, जिसकी स्थापना एक सेक्युलर गणराज्य के रूप में हुई थी, मगर यह पिछले एक दशक से नरेंद्र मोदी एवं भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में इससे दूर हटता जा रहा है।

 

समीर यासिर की इस रिपोर्ट के अनुसार गुरुवार को जो भी हुआ, वह उस वृहद सरकारी प्रयास का हिस्सा है, जिसके बारे में भारत के विपक्षी दल यह कहते हैं कि मुस्लिमों पर निशाना सादा जा रहा है। यहां पर यासिर एक बार फिर से भ्रम फैलाते हुए लिखता है कि वर्ष 2022 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने हल्द्वानी में 4000 घरों को ढहाए जाने का आदेश दिया था, जिनमें अधिकतर मुस्लिमों के थे और वह उस भूमि पर बने थे, जो न्यायालय ने कहा कि रेलवे की थी।

 

अर्थात वह एक ऐसा भ्रम स्थापित करने का प्रयास कर रहा है कि जैसे कि बनभूलपुरा की जिस जमीन से गुरूवार को अतिक्रमण हटाया गया है, वह वही जमीन है जिस पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई चल रही है। जबकि यह भूमि एकदम अलग भूमि है और इसे उच्च न्यायालय से तनिक भी राहत नहीं मिली थी और साथ ही यह भी साबित हुआ था कि कैसे अब्दुल फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सरकारी जमीन बेच रहा था।

 

मगर पश्चिम का औपनिवेशिक मीडिया उन हिन्दुओं को कट्टरपंथी ठहराता है, जो अपने मंदिरों की भूमि को न्यायालय के माध्यम से और ऐतिहासिक प्रमाणों के चलते वापस मांग रहे हैं, सदियों से न्याय की प्रतीक्षा में हैं, मगर जब अब्दुल जैसे लोग, जो सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा करके कोई ढांचा बना लेते हैं तो उसे मजहबी अधिकार की संज्ञा दे देते हैं। भारतीयों या कहें हिन्दू भारत की पहचान रखने वाले भारतीयों से इस मीडिया की घृणा का स्तर बहुत ही अजीब है एवं यह कल्पना ही भयावह है कि कैसे एक बड़ा वर्ग अवैध गतिविधियों को केवल इस कारण समर्थन करे कि देश और प्रदेश की जो सरकार है वह उसके राजनीतिक मत की नहीं है।

 

वहीं, बीबीसी ने भी अपनी पुरानी नीति पर चलते हुए एक शासकीय कदम को मुस्लिम विरोधी बताते हुए लिखा कि यह हिंसा उत्तराखंड में तब हुई, जब उत्तराखंड सरकार ने प्रदेश में सभी नागरिकों के लिए एक समान क़ानून पारित किया और जहां प्रशासन उस ढाँचे के विषय में बार-बार यही कह रहा है कि वह ढांचा किसी भी मजहबी इमारत के रूप में दर्ज नहीं था और वह भूमि प्रशासन की थी, बीबीसी ने इसे मस्जिद ढहाने जैसा लिखा है।

 

एबीसी न्यूज ने भी इसे मस्जिद निर्माण के साथ जोड़ते हुए मुस्लिम समूहों की ही बात की है और लिखा है कि मुस्लिम समूह और अधिकार संगठनों के अनुसार भारत में पिछले कुछ वर्षों में उनकी मस्जिदों और घरों को तोड़ा जा रहा है।

 

इसमें एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट का उल्लेख किया गया है, मगर एमनेस्टी इंटरनेश्नल के भारत सरकार और हिन्दुओं के प्रति दृष्टिकोण के विषय में जानकारी भारत में प्रत्येक जागरूक नागरिक को है। यह देखना बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि अवैध निर्माण एवं अतिक्रमण पर सरकार के क़दमों को कैसे एक वर्ग का विरोधी बताकर देश के विरुद्ध माहौल बनाया जाता है और ऐसा विमर्श बनाया जाता है कि जैसे भारत में मुस्लिमों पर अत्याचार हो रहा है, उनका जीना मुश्किल हो रहा है। परन्तु इस बहाने अतिक्रमण करने वाली शक्तियों को और संसाधनों का दुरूपयोग करने वालों को क्लीन चिट दी जाती है। यह एक बहुत ही घातक चलन है, जिसमें मजहबी रुझान के चलते दोषियों को निर्दोष प्रमाणित करके उन तमाम लोगों के प्रति अन्याय किया जाता है जो क़ानून व्यवस्था का आदर करते हैं, पालन करते हैं, देश का आदर करते हैं और देश के लिए मर मिटने के लिए तैयार रहते हैं। 

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