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होम भारत

जाति-विहीन समाज से होगा हिंदुओं का कल्याण

आज वास्तव बड़ा ही गर्व प्रतीत होता है जब बात भारत की और सनातन की हो। सनातनी गर्व से स्वयं को हिंदू कह पाएं तो हम लोगों के लिए गर्व की कोई सीमा नहीं होती और हमारा हौसला आसमान चूमता है। भिक्षा यात्रा मेरे गुरुदेव का विचार था।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Jan 26, 2024, 03:57 pm IST
inभारत, विश्लेषण, धर्म-संस्कृति, दिल्ली
स्वामी दीपांकर सनातनी

स्वामी दीपांकर सनातनी

पाञ्चजन्य के स्थापना दिवस कार्यक्रम को स्वामी दीपांकर सनातनी का भी आशीर्वाद मिला। कुछ समय पहले इन्होंने जातियों में विभाजित हिंदू समाज को जोड़ने के लिए भिक्षा यात्रा निकाली थी। उनका कहना है कि हिंदू जाति से ऊपर उठें

जब बात भारत की होती है तो बहुत ही प्रसन्नता होती है। सबसे खुशी की बात यह है कि 22 जनवरी को हम सब रामलला के दर्शन कर पाएंगे। पहले तुलसी का पत्ता भी वहां तक पहुंचते हुए बासी हो जाता था, अगर तंबू बदलना होता था तो दंडाधिकारी की अनुमति लेनी पड़ती थी। वस्त्र बदलने के लिए चार बार सोचना पड़ता था, लेकिन आज मेरे रामलला टाट से ठाठ में जा रहे हैं।

आज वास्तव बड़ा ही गर्व प्रतीत होता है जब बात भारत की और सनातन की हो। सनातनी गर्व से स्वयं को हिंदू कह पाएं तो हम लोगों के लिए गर्व की कोई सीमा नहीं होती और हमारा हौसला आसमान चूमता है। भिक्षा यात्रा मेरे गुरुदेव का विचार था। मेरे गुरुदेव स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती 109 वर्ष हम लोगों के साथ रहे राम मंदिर आंदोलन में उनकी बड़ी भूमिका रही थी। उन्हीं की प्रेरणा से 23 नवंबर, 2022 को हमने भिक्षा यात्रा शुरू की थी। इस यात्रा में किसी से भी दाल, आटा, चीनी या चावल नहीं मांगा गया, बल्कि लोगों से जातियों में न बंटकर एक हिंदू होने की भिक्षा मांगी गई। समाज ने हमें यह भिक्षा दी भी। आज प्रसन्नता इस बात की है कि आज इस भिक्षा यात्रा से 57,00,000 लोग जुड़ चुके हैं।

यह यात्रा अपनों को जोड़ने की है, क्योंकि मैं समझता हूं कि किसी भी धर्मग्रंथ में जाति का जिक्र नहीं है। इसके बाद भी हमारा समाज जातियों में विभक्त है। आज जब चुनावों का विश्लेषण होता है, तो एकमुश्त बताया जाता है कि मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र इतने हैं, लेकिन वहीं जब हिंदुओं की बात होती है तो ठाकुर, ब्राह्मण, जाट, यादव, गुर्जर आदि जातियों की बात की जाती है। मेरा निवेदन है कि कम से कम हम लोगों को हिंदू ही कह कर संबोधित किया जाए। जातियों में बांटकर न देखा जाए।

जब हम अपने गर्व को दोहराते हैं, उसको जीते हैं तो हम लोग अपने को सशक्त, मजबूत और ताकतवर पाते हैं। एक मात्र हमारी ही संस्कृति है,जो वैज्ञानिक है। यहां से सूर्य की दूरी नापेंगे तो करीब 15 लाख किलोमीटर कुछ मील है और सूर्य के व्यास से इस संख्या को भाग दें तो 108 आता है। चंद्रमा की दूरी को चंद्रमा के व्यास से भाग करें तो भी संख्या 108 निकलती है। सूर्य आत्मा और चंद्रमा मन का प्रतीक है और दोनों को साधने की माला का मनका भी 108 होता है।

हमारी इतनी संपन्न और सुसंस्कृत संस्कृति है। इसे बचाने के लिए हम लोगों को जाति, प्रांत, भाषा और अन्य मतभेदों से ऊपर उठकर केवल और केवल हिंदू के नाते अपने को सशक्त करना होगा। इसी से हमारा और भारत माता का कल्याण होगा।

Topics: Darshan of Ramlalaरामलला के दर्शनराम मंदिर आंदोलनसनातनी गर्वमाला का मनका भी 108Sanatani prideRam temple movementbeads of rosary also 108
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