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सत्य के लिए भी सामर्थ्य चाहिए

आज जब भारत की बात होती है, तो स्वाभाविक रूप से विकृत इतिहास की ओर ध्यान जाता है। इतिहास को विकृत करने वाले आज राम के अस्तित्व को भी नकारते हैं। अभी तक हमें आर्य-आक्रमण सिद्धांत के बारे में जो पढ़ाया गया है, वह पूरी तरह अप्रमाणिक है। यह इतिहास की विकृति है।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Jan 26, 2024, 12:54 pm IST
in भारत, धर्म-संस्कृति, दिल्ली
पतंजलि आयुर्वेद प्रा लि. के सीईओ आचार्य बालकृष्ण का सम्मान करते (बाएं से) पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर और भारत प्रकाशन के प्रबंध निदेशक भारत भूषण

पतंजलि आयुर्वेद प्रा लि. के सीईओ आचार्य बालकृष्ण का सम्मान करते (बाएं से) पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर और भारत प्रकाशन के प्रबंध निदेशक भारत भूषण

पाञ्चजन्य के स्थापना दिवस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए पतंजलि आयुर्वेद प्रा लि. के मुख्य कार्यकारी अधिकारी आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि हमें अपना अतीत जानने के लिए इतिहास के स्वर्णिम पन्नों को पलटना चाहिए

भगवान श्रीराम का भव्य मंदिर हमारे रहते, हमारे कालखंड में बन रहा है। यह क्षण वास्तव में अविस्मरणीय है। इतिहास वैभवशाली अतीत को वर्तमान में गौरव की तरफ ले जाने के लिए अंगड़ाई ले रहा है। जिन्होंने भी राम मंदिर के लिए अपनी आहुति दी है, उन सभी के प्रति हम सबको कृतज्ञता का भाव रखना चाहिए।

आज जब भारत की बात होती है, तो स्वाभाविक रूप से विकृत इतिहास की ओर ध्यान जाता है। इतिहास को विकृत करने वाले आज राम के अस्तित्व को भी नकारते हैं। अभी तक हमें आर्य-आक्रमण सिद्धांत के बारे में जो पढ़ाया गया है, वह पूरी तरह अप्रमाणिक है। यह इतिहास की विकृति है। यहां परंपरागत और आध्यात्मिक इतिहास की नहीं, उस इतिहास की बात हो रही है, जिसके आधार पर भारत को कमतर आंकने का प्रयास किया जाता है। कुछ लोग कहते हैं कि सुमेरियन संस्कृति लिखित में सर्वाधिक और प्राचीन है और लगभग 11,000 साल पुरानी परंपरा है। 5,000 वर्ष पहले तक उनके पास 11 लिपियां थीं।

जब भारतवर्ष की बात की जाती है तो 5,000 वर्ष पहले इसको इंडस लिपि या सिंधु लिपि कहते थे। इसके अलावा एक ब्राह्मी लिपि और थी। पता चलता है कि 2000 वर्ष पहले तो पूरी दुनिया में लगभग 200 लिपियां हो गई थीं। वहीं दूसरी ओर कहा जाता है कि मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की संस्कृति लगभग 3,000 साल पुरानी है। यह भी तथ्यों से परे है। जबकि राखीगढ़ी में हुई खुदाई से प्रमाण मिले हैं कि हमारी संस्कृति 10,000 वर्ष से भी अधिक पुरानी है। आर्य आक्रमण की बात करने वाले कहते हैं कि आर्य लगभग 3,800 वर्ष पहले भारत आए थे। यह प्रमाणों और तथ्यों से परे है। आज हमारी संस्कृति के जो साक्ष्य मिले हैं, वे हमें 13,000 साल पीछे लेकर जाते हैं।

हमारी संस्कृति, परंपरा गौरवशाली है। इस परंपरा को यदि हम गौरव नहीं देंगे, तो दुनिया गौरव नहीं देगी। इसके लिए जिनको बोध नहीं उनको बोध कराना भी हमारा काम है। दुनिया में इस संस्कृति को गुंजायमान कराना भी हमारा काम है।

मेसोपोटामिया के लगभग 400 स्थानों पर खुदाई की गई है। इन सबका कुल क्षेत्रफल 300 से 400 वर्ग किलोमीटर बनता है। वहीं सिंधु घाटी सभ्यता के 1,400 स्थानों पर खुदाई हुई है। इनमें से 925 क्षेत्र भारत में और लगभग 475 क्षेत्र पाकिस्तान में हैं। इसका कुल क्षेत्रफल लगभग 10,00,000 वर्ग किलोमीटर है। अब समझने वाली बात है कि जो लोग 300 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में रहते थे, वे 10,00,000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में कैसे फैल सकते हैं। इसी से आर्य सिद्धांत की हवा निकल जाती है। इसको समझने के लिए हमारे पुराण, इतिहास बहुत बड़े प्रमाण हैं। ययाति ने पुरु से कहा कि मुझे अपनी जवानी दे दो।

यानी भारत के बाहर जाकर राज करो, लोगों की सेवा करो। अफ्रीका के अंदर मिस्र के जो शिलालेख हैं, उनमें पुरु और ययाति की चर्चा है। ययाति का कालखंड साढ़े आठ हजार साल पुराना बनता है। ययाति के 18वें वंश में महाभारत वाला कालखंड शुरू होता है। ऐसे में आर्य आक्रमण सिद्धांत, जिसका समय लगभग 3,800 वर्ष बताया जाता है, कहीं टिकता नहीं, यह हमारे माथे पर कलंक लगाया गया है। इस कलंक को धोने के लिए काम करने की आवश्यकता है। पतंजलि इस क्षेत्र में पूरी प्रामाणिकता के साथ काम कर रही है। हम इतिहास के क्षेत्र में तथ्यों और सत्यों को खोजने के लिए सर्वथा प्रयासरत हैं। यूरोप, ग्रीक से आकर सिकंदर ने मिस्र पर आक्रमण किया था। इसके बाद एलेक्जेंड्रिया नामक शहर बसाया गया।

सिकंदर ने चिकित्सा विधा को भी शुरू किया। वहीं पर नायल नदी थी। इसको पार करने वालों को उसने आदेश दिया था कि वे ‘कर’ के रूप में यहां अपनी परंपरागत विद्याओं, पुस्तकों और ज्ञान की जानकारी दें। इस तरह उसने चिकित्सा विधा को बहुत प्रामाणिकता से खड़ा करने का प्रयास किया। वहां पर भारतीय चिकित्सा विद्या और परंपराओं से भी संबंधित पुस्तकें हैं। इनमें से अधिकांश संस्कृत भाषा में हैं। पुरु और ययाति का वर्णन आयुर्वेद के ग्रंथों में भी है। यानी आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान भी लगभग 6,500 वर्ष पहले भारत से बाहर चला गया था।

भारत को समझना है तो विश्व के इतिहास को समझना होगा। जब विश्व के इतिहास को खंगालेंगे तो कहीं न कहीं भारत नजर जाएगा। उनके पूर्वजों में भी हम ही मिलेंगे, उनकी जड़ में भी हम ही मिलेंगे। उनकी सभ्यता, संस्कृति, परंपरा में भी हम ही मिलेंगे। कोरिया में मां को अम्मा बोलते हैं। हम कहते हैं कि सभी भाषाओं की जननी संस्कृत है। संस्कृत भाषा का बोलबाला दुनिया में है। 2000 साल पहले तक पूरी दुनिया में 200 लिपियां प्रचलन में थीं, लेकिन हमारे हिस्से में सिर्फ सिंधु लिपि को डाला गया। इसके पीछे बहुत बड़ा एक षड्यंत्र काम कर रहा है। हमारे वेद आदि जो शास्त्र हैं, वे वस्तुत: वैदिक भाषा हैं। वैदिक भाषा का परिष्कृत रूप ही संस्कृत है।

दुनिया में कमजोरों की कोई सहायता नहीं करता। सत्य के लिए भी सामर्थ्य चाहिए। लोग कहते हैं कि चीनी पद्धति को दुनिया में 90 प्रतिशत लोग मान रहे हैं। यदि हमें कोई नहीं मानता तो इसको मनाने के लिए कार्य करना चाहिए। दुनिया के ग्रंथों में आयुर्वेद की लगभग 1,000 जड़ी-बूटी और वनस्पतियों का वर्णन है, जबकि भारतवर्ष में लगभग 50,000 वनस्पतियां हैं। हमने सभी वनस्पतियों की सूची बनायी है। भारतीय वनस्पतियों के अतिरिक्त हम विदेशी पौधों पर भी काम करेंगे। पूरी दुनिया में लगभग 3,60,000 वनस्पतियां हैं। आने वाले समय में कोई आयुर्वेद को लेकर कुछ नहीं कह सकेगा।

कुछ लोग कहते हैं कि हमारी सारी चीजें विदेशी लूट कर ले गए। पर समय-समय पर हमको यह भी प्रयास करना चाहिए कि हम भी उनसे कुछ ले लें। हमने इसका प्रयास किया है। जब मोर्नो टॉक्सोनॉमी की बात आती है तो यह लैटिन और ग्रीक भाषा में 3,50,000 वनस्पतियों का नाम है। जब हमने संस्कृत में ढूंढना शुरू किया तो कुल 20,000 पौधों के नाम मिले। शोध के क्षेत्र में काम तो हो रहा है परंतु कुछ नया करने की आवश्यकता है। हमारी संस्कृति, परंपरा गौरवशाली है। इस परंपरा को यदि हम गौरव नहीं देंगे, तो दुनिया गौरव नहीं देगी। इसके लिए जिनको बोध नहीं उनको बोध कराना भी हमारा काम है। दुनिया में इस संस्कृति को गुंजायमान कराना भी हमारा काम है।

आज दुनिया में योग शब्द को सभी जानते हैं। धर्म आचरण का विषय है, इसलिए जो आचरण सिखाता है वह धर्म है। हमें धर्म में स्थित होने के लिए लोगों को प्रेरित भी करना है। समय अब अंगड़ाई लेकर हमारी संस्कृति, परंपरा की ओर जाने के लिए कहीं न कहीं आज हमें निहार रहा है। हमें ऐसे में हमारा कर्तव्य, दायित्व ज्यादा बनता है। यह देश हमारा है तो इसकी चिंता एवं सुरक्षा हमें ही करनी है। बनते हुए इतिहास में हम अपनी आहुति न दे सके तो यह हमारा दुर्भाग्य होगा। हम अपने सौभाग्य को बनाए रखेंगे, यही हमारा संकल्प है।

Topics: मोर्नो टॉक्सोनॉमीDistortion of HistoryIndus Script or Indus ScriptHarappan CultureMesopotamiaहमारी संस्कृतिMorno TaxonomyOur Cultureइतिहास की विकृतिइंडस लिपि या सिंधु लिपिहड़प्पा की संस्कृतिमेसोपोटामिया
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