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सार्वभौमिक हैं श्रीकृष्ण

कर्म के प्रति श्रीकृष्ण का उपदेश सभी मत-पंथों के लोगों के लिए एक वरदान है। वर्ल्ड हिंदू कांग्रेस के उपरांत विश्व को उसके कर्तव्य के संदेश के बारे में शिक्षित करना आवश्यक है

Written byसाल्वाटोर बबोन्ससाल्वाटोर बबोन्स
Dec 7, 2023, 02:18 pm IST
in धर्म-संस्कृति

इस्कॉन की स्थापना न्यूयॉर्क में हुई थी, जहां स्वामी प्रभुपाद ने 1966 में अंग्रेजी भाषी विश्व के लिए अपना मिशन शुरू किया था। इतनी ही विडंबना की बात यह है कि इस्कॉन की उपस्थिति अब पश्चिम की तुलना में भारत में बहुत अधिक है।

साल्वाटोर बबोन्स

संयुक्त राज्य अमेरिका नवंबर के तीसरे गुरुवार को वार्षिक थैंक्सगिविंग अवकाश मनाता है। मैसाचुसेट्स के आरंभिक तीर्थयात्रियों और उनके मूल अमेरिकी पड़ोसियों के बीच 1622 में हुए मेल-मिलाप को चिह्नित करने के लिए इसे डिजाइन किया गया था। पहली बार 1863 में अमेरिकी गृहयुद्ध के दौरान राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन द्वारा पहली बार इसकी घोषणा की गई थी। भले ही थैंक्सगिविंग का स्पष्ट अर्थ ऐतिहासिक रहा हो, वास्तव में इसका अंतर्निहित वादा यह था कि राज्यों के बीच युद्ध के बाद उत्तर और दक्षिण भी शांति से एक साथ रहने का रास्ता खोज लेंगे।

इस बार जब थैंक्सगिविंग चल रहा था, तब मैं वर्ल्ड हिंदू कांग्रेस में भाग लेने के लिए अपने घर सिडनी (आस्ट्रेलिया) से उड़ान भर रहा था। एक अमेरिकी (पूर्णत: शाकाहारी) होने के नाते मैं बहुत समय से पारंपरिक थैंक्सगिविंग भोजन के तौर पर भुना हुआ टर्की खाना-खिलाना छोड़ चुका हूं। वर्ल्ड हिंदू कांग्रेस (डब्ल्यूएचसी) में थैंक्सगिविंग पर्व पर मैंने इस्कॉन के एक कृष्ण भक्त के साथ आलू, दाल और घी खाया। भारतीय (हमें डब्ल्यूएचसी में इंडिया, इंडियन या इंडियंस शब्दों के उपयोग की अनुमति नहीं थी) इस्कॉन से अच्छी तरह परिचित होंगे। विडंबना है कि अधिकांश अमेरिकी इससे परिचित नहीं हैं। इस्कॉन की स्थापना न्यूयॉर्क में हुई थी, जहां स्वामी प्रभुपाद ने 1966 में अंग्रेजी भाषी विश्व के लिए अपना मिशन शुरू किया था। इतनी ही विडंबना की बात यह है कि इस्कॉन की उपस्थिति अब पश्चिम की तुलना में भारत में बहुत अधिक है।

वर्ल्ड हिंदू कांग्रेस (डब्ल्यूएचसी) में थैंक्सगिविंग पर्व पर मैंने इस्कॉन के एक कृष्ण भक्त के साथ आलू, दाल और घी खाया। भारतीय (हमें डब्ल्यूएचसी में इंडिया, इंडियन या इंडियंस शब्दों के उपयोग की अनुमति नहीं थी) इस्कॉन से अच्छी तरह परिचित होंगे। विडंबना है कि अधिकांश अमेरिकी इससे परिचित नहीं हैं। इस्कॉन की स्थापना न्यूयॉर्क में हुई थी, जहां स्वामी प्रभुपाद ने 1966 में अंग्रेजी भाषी विश्व के लिए अपना मिशन शुरू किया था। इतनी ही विडंबना की बात यह है कि इस्कॉन की उपस्थिति अब पश्चिम की तुलना में भारत में बहुत अधिक है।

अमेरिका में इस्कॉन के सदस्यों को उपहासजनक ढंग से ‘हरे कृष्णा’ पुकारा जाता है। हालांकि कोई भी भारतीय इसे अपमानजनक नहीं मानेगा। बहुत थोड़े अमेरिकियों को इस वाक्यांश के अर्थ की समझ है, लेकिन उसे भी वे हिंदू भिक्षुओं से अधिक पश्चिमी हिप्पियों के साथ जोड़कर देखते हैं। स्वास्तिक, गो पूजा और जाति व्यवस्था की तरह कृष्ण चेतना भी अमेरिकी मस्तिष्कों के लिए एक रहस्य है। यह स्थिति बदलनी चाहिए और डब्ल्यूएचसी में आए प्रतिनिधियों के अच्छे कार्यों के माध्यम से यह स्थिति बदल जाएगी। पश्चिमी लोगों को कृष्ण चेतना से लाभ उठाने के लिए हिंदू बनने की जरूरत नहीं है।

कर्म के प्रति कृष्ण का उपदेश किसी एक के लिए नहीं, सभी मत-पंथों के लोगों के लिए एक वरदान है। भगवद्गीता में कर्म ही कृष्ण की शिक्षाओं का मर्म है। हिंदू इसे पवित्र ग्रंथ के रूप में पढ़ सकते हैं, लेकिन अन्य कोई भी इसे जीवन के लिए एक शिक्षाप्रद और प्रेरक मार्गदर्शिका के रूप में पढ़ सकता है। डब्ल्यूएचसी में मुझे तीन भगवद्गीताएं दी गईं- पहली (मुझे लगता है) हिंदी में, दूसरी समानांतर अनुवादित पाठ और तीसरी अंग्रेजी भाषा में नया अनुवाद। मैंने तीसरी गीता रख ली है। मैं इसे पढ़ूंगा। यह ओन्टारियो (कनाडा) के डॉ. राजेश भाटिया द्वारा दिया गया एक उपहार था, जो स्वयं अनुवादक हैं। वर्ल्ड हिंदू कांग्रेस में कर्म के प्रति समर्पण की भावना प्रबल थी। कई साधु-संतों ने इसमें भाग लिया और हर कोई देख सकता था कि वे अपने जीवन के हर पहलू में कर्म का पालन कैसे करते हैं।

वर्ल्ड हिंदू कांग्रेस का आयोजन हिंदू समाज के उस वर्ग द्वारा किया गया था, जो विश्व हिंदू परिषद में सन्निहित है, लेकिन विहिप तो लौकिक हिमशैल का केवल सतह पर नजर आने वाला छोर है। संगठित हिंदू समाज जीवन के सभी क्षेत्रों में सक्रिय है, वर्ल्ड हिंदू कांग्रेस में जीवन के सभी क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व था। विश्व को श्रीकृष्ण के कर्म के संदेश तथा सनातन धर्म के बारे में अधिक व्यापक रूप से शिक्षित करने के लिए एक बड़ी टीम की आवश्यकता होगी। मुख्य लक्ष्य यह होना चाहिए कि भगवद्गीता को न केवल प्रवासी समुदायों में, बल्कि सभी के लिए मानक स्कूल पाठ्यक्रम में जोड़ा जाए। अपने धार्मिक अर्थों से परे यह एक ऐसा मौलिक पाठ है, जिससे प्रत्येक साक्षर व्यक्ति को परिचित होना चाहिए। यहां तक कि एक नास्तिक भी कृष्ण द्वारा अर्जुन को दी गई शिक्षा से सीख सकता है, प्रेरणा ले सकता है।
(लेखक सिडनी विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर और इंडियन सेंचुरी राउंडटेबल के कार्यकारी निदेशक हैं)

Topics: सनातन धर्मविश्व हिंदू परिषदश्रीकृष्णभगवद्गीतावर्ल्ड हिंदू कांग्रेसहरे कृष्णा
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