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भाजपा का बढ़ता कद

महाराष्ट्र ग्राम पंचायत चुनाव के परिणाम ग्रामीण क्षेत्र में भाजपा के बढ़ते दबदबे को साबित करते हैं। इस चुनाव में अजित पवार गुट और एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने न केवल शरद पवार-उद्धव ठाकरे गुट को हाशिये पर धकेला है, बल्कि इनके अस्तित्व को ही संकट में डाल दिया है

Written byसुमीत मेहतासुमीत मेहता
Nov 20, 2023, 06:15 pm IST
in भारत, विश्लेषण, महाराष्ट्र

चुनाव परिणाम प्रदेश में जहां मजबूत होती भाजपा को दर्शा रहे हैं, वहीं कांग्रेस के फिर से पनपने की ओर भी संकेत कर रहे हैं। हो सकता है कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस शरद पवार के इशारों पर चलने से इनकार कर दे।

हाल ही में महाराष्ट्र की 2,359 सीटों पर हुए ग्राम पंचायत चुनाव में भाजपा और इसके नेतृत्व वाले गठबंधन में सहयोगी शिवसेना व राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (अजित पवार गुट) ने क्रमश: 717 सीटें, 273 सीटें और 382 सीटें जीतीं। दूसरी ओर, महाविकास अघाड़ी, जिसमें कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) और शिवसेना (उबाथा-उद्धव ठाकरे गुट) शामिल हैं, ने क्रमश: 293 सीटें, 205 सीटें और 140 सीटें जीतीं। माकपा ने लगभग 100 सीटें जीतीं और यहां तक कि तेलंगाना की पार्टी भारतीय राष्ट्रीय समिति ने भी 10 सीटों के साथ अपना खाता खोला।

यह चुनाव महाराष्ट्र, भाजपा और राज्य में जाति की राजनीति की धारणा बदलने वाला रहा है। भाजपा को हमेशा शहरी, भटजी (ब्राह्मण) व शेटजी (गुजराती बनिया) की पार्टी माना जाता था, जिसकी समाज के ग्रामीण और गैर-ब्राह्मण मराठी वर्गों में ज्यादा उपस्थिति नहीं थी। लेकिन इस चुनाव ने साबित कर दिया कि यह धारणा मिथक और वास्तविकता परे है। इस चुनाव में कुल सीटों में से लगभग एक तिहाई सीटें जीतना और सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरना साबित करता है कि भाजपा अब महाराष्ट्र की शहरी पार्टी नहीं रही। यह एक विस्तृत और परिपक्व राजनीतिक पार्टी बन गई है, जिसका मजबूत ग्रामीण आधार है। भाजपा के बाद इसके गठबंधन सहयोगियों-शिवसेना और राकांपा (अजित पवार गुट) ने सामूहिक रूप से कुल सीटों में से लगभग आधी सीटें जीतीं। दूसरी ओर, महाविकास अघाड़ी सामूहिक रूप से लगभग एक चौथाई सीटें ही जीत सकी, जो व्यक्गित रूप से भाजपा द्वारा जीती गई सीटों से कम है।

भाजपा इतना अच्छा प्रदर्शन करने में कैसे कामयाब रही? भाजपा की सफलता के पांच प्रमुख कारक हैं-
1. ग्रामीण क्षेत्रों में केंद्र एवं राज्य सरकार की योजनाओं का अत्यंत सूक्ष्मता से क्रियान्वयन।
2. ग्रामीण आबादी को योजनाओं के बारे में शिक्षित करने, इनका लाभ कैसे उठाया जाता है
और ग्रामीण आबादी पर इसके प्रभाव के बारे में व्यापक सहभागिता।

3. जमीनी स्तर पर पार्टी कैडर एकत्रित करना और बड़े पैमाने पर समाज (प्रबुद्ध वर्ग) के साथ निरंतर बातचीत।
4. शरद पवार का षड्यंत्रकारी मराठा आरक्षण आंदोलन का दांव उल्टा पड़ना।
5. मुसलमानों के प्रति महाविकास अघाड़ी का अत्यधिक अनुचित झुकाव, जिससे हिंदू इससे विमुख हो गए।

इस जीत के पीछे महत्वपूर्ण बात यह है कि केंद्र और राज्य सरकार ने ग्रामीण आबादी के कल्याण के लिए विभिन्न योजनाओं की घोषणा की, चाहे वे किसान हों, मजदूर हों, महिलाएं हों, बच्चे आदि हों, राज्य की गठबंधन सरकार ने न केवल इन योजनाओं को बहुत अच्छे ढंग से क्रियान्वित किया, बल्कि तीनों दलों ने यह सुनिश्चित किया कि योजनाएं गांवों में अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। इसमें सरकार के कुशल कामकाज के साथ सरकार व पार्टी के बीच भी बेहतरीन समन्वय दिखा। महाराष्ट्र भाजपा अध्यक्ष चंद्रकांत बावनकुले व उनकी टीम ने, जिसमें शिवसेना और राकांपा (अजित पवार गुट) के सदस्य शामिल थे, ‘सरकार आपल्या दारी’ यानी सरकार आपके द्वार कार्यक्रम सफलतापूर्वक चलाया। तीनों दलों ने जनता को योजनाओं का लाभ उठाने में मदद भी की। इसने गठबंधन दलों को भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा दिए गए सुशासन को उभारने में भी सक्षम बनाया। महाविकास अघाड़ी के ढाई साल के कुशासन व पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के असफल कार्यकाल के बाद इस तरह का सक्रिय परिणामोन्मुख शासन राज्य के लोगों के लिए एक बड़ा बदलाव था। यही नहीं, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ने बीते 6 माह में राज्य के हर जिला व तालुका का दौरा किया। उन्होंने खासतौर से पार्टी कार्यकर्ताओं से बात की और उनमें जोश भरा। उन्होेंने कैडर की शिकायतें सुनीं और उनका समाधान किया। इसका परिणाम यह हुआ कि कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा का संचार हुआ।

चुनाव परिणाम प्रदेश में जहां मजबूत होती भाजपा को दर्शा रहे हैं, वहीं कांग्रेस के फिर से पनपने की ओर भी संकेत कर रहे हैं। शरद पवार की कनिष्ठ साझीदार होने से यह अब तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। इससे पता चलता है कि कांग्रेस अब शरद पवार के नियंत्रण में नहीं रहेगी। इस चुनाव परिणाम से यह सवाल भी उठ रहे हैं कि क्या मुसलमान राकांपा (शरद पवार गुट) और उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना का समर्थन करेंगे या केवल कांग्रेस का समर्थन करेंगे। हालांकि एक संभावना यह भी हो सकती है कि कांग्रेस आगामी आम चुनावों में शरद पवार की राकांपा के साथ सीट बंटवारे पर समझौता करने से इनकार कर दे। वहीं, उद्धव ठाकरे गुट पूरी तरह से अपनी हैसियत खो चुका है। आगामी नगरपालिका चुनाव, आम चुनाव और विधानसभा चुनावों में इसका व्यापक असर दिखेगा।

रोचक बात यह है कि चंद्रकांत बावनकुले को जानकारी मिली कि एक जिले के युवा कार्यकर्ताओं का एक वर्ग निराश है। हालांकि उस जिले के दौरे की उनकी कोई योजना नहीं थी। फिर भी जब उनकी ट्रेन उक्त जिले से होकर गुजर रही थी, तब उन्होंने नाराज कार्यकर्ताओं को मिलने के लिए बुलाया। उनसे बावनकुले के साथ अगले स्टेशन तक यात्रा करने व अपनी शिकायतें साझा करने के लिए कहा गया। इस तरह न केवल उनकी समस्याओं का समाधान हुआ, बल्कि नाराज कार्यकर्ताओं को पार्टी के लिए काम करने के लिए भी प्रेरित किया। उन्होंने पार्टी कैडर के साथ-साथ समाज के विभिन्न वर्गों के प्रमुख लोगों के साथ भी व्यापक बातचीत की तथा उनकी प्रतिक्रिया व सुझाव एकत्र किए। इस तरह पार्टी को चुनावी रणनीति तैयार करने में काफी मदद मिली।

जहां भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ने शासन पर ध्यान केंद्रित किया, वहीं महाविकास अघाड़ी और शरद पवार ने विभाजनकारी राजनीति पर ध्यान केंद्रित किया। इन्होंने मराठों के एक वर्ग को भाजपा से अलग करने के लिए फिर से मराठा आरक्षण आंदोलन को हवा दी। हालांकि यह चाल असफल रही, क्योंकि मराठों ने इसके प्रति उत्साह ही नहीं दिखाया। इसका परिणाम यह हुआ कि महाविकास अघाड़ी खासकर, शरद पवार की राकांपा और कांग्रेस ने मराठा वोट बैंक का अच्छा खासा हिस्सा गंवा दिया, जिससे भाजपा और अजित पवार गुट को फायदा हुआ। रही सही कसर मुस्लिम तुष्टिकरण, डॉ. उमेश कोल्हे हत्याकांड तथा हिंदू त्योहारों पर दंगे और मुसलमानों द्वारा पथराव जैसे मुद्दों पर चुप्पी ने पूरी कर दी। इससे हिंदू महाविकास अघाड़ी से दूर हो गए, जिसका लाभ भाजपा और इसके गठबंधन को मिला। इन सब कारणों से अजित पवार की रांकापा ने शरद पवार का गढ़ माने जाने वाले पश्चिमी महाराष्ट्र में न केवल चुनाव में बढ़िया प्रदर्शन किया, बल्कि शरद पवार की राकांपा को लगभग पूरी तरह परिदृश्य से बाहर कर दिया।

ग्राम पंचायत चुनाव अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले सेमीफाइनल की तरह था, जिसमें भाजपा ने निर्णायक जीत हासिल की है। इस जीत ने भाजपा को राज्य में अंतिम लड़ाई लड़ने के लिए बेहद जरूरी बूस्टर डोज दे दिया है। इससे उत्साहित उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने आगामी लोकसभा चुनाव में राज्य की 48 में से 40 से अधिक लोकसभा सीटें जीतने का खम ठोका है। 

चुनाव परिणाम प्रदेश में जहां मजबूत होती भाजपा को दर्शा रहे हैं, वहीं कांग्रेस के फिर से पनपने की ओर भी संकेत कर रहे हैं। शरद पवार की कनिष्ठ साझीदार होने से यह अब तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। इससे पता चलता है कि कांग्रेस अब शरद पवार के नियंत्रण में नहीं रहेगी। इस चुनाव परिणाम से यह सवाल भी उठ रहे हैं कि क्या मुसलमान राकांपा (शरद पवार गुट) और उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना का समर्थन करेंगे या केवल कांग्रेस का समर्थन करेंगे। हालांकि एक संभावना यह भी हो सकती है कि कांग्रेस आगामी आम चुनावों में शरद पवार की राकांपा के साथ सीट बंटवारे पर समझौता करने से इनकार कर दे। वहीं, उद्धव ठाकरे गुट पूरी तरह से अपनी हैसियत खो चुका है। आगामी नगरपालिका चुनाव, आम चुनाव और विधानसभा चुनावों में इसका व्यापक असर दिखेगा।

कुल मिलाकर ग्राम पंचायत चुनाव अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले सेमीफाइनल की तरह था, जिसमें भाजपा ने निर्णायक जीत हासिल की है। इस जीत ने भाजपा को राज्य में अंतिम लड़ाई लड़ने के लिए बेहद जरूरी बूस्टर डोज दे दिया है। इससे उत्साहित उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने आगामी लोकसभा चुनाव में राज्य की 48 में से 40 से अधिक लोकसभा सीटें जीतने का खम ठोका है।

Topics: लोकसभा सीटें जीतनेwelfare of rural populationwinning Lok Sabha seatsMahavikas Aghadiमहाविकास अघाड़ीग्रामीण आबादी के कल्याण
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