पितृ वंदन की सनातन परंपरा
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पितृ वंदन की सनातन परंपरा

इस वर्ष 29 सितंबर से 14 अक्तूबर तक पितृपक्ष है। मान्यता है कि पितृपक्ष में पितरों का तर्पण करने से उनका आशीर्वाद बरसता है और परिवार सुखी रहता है

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी
Sep 30, 2023, 08:04 am IST
inभारत, धर्म-संस्कृति
पितरों का तर्पण करते लोग (प्रतीकात्मक चित्र)

पितरों का तर्पण करते लोग (प्रतीकात्मक चित्र)

सनातन संस्कृति की प्रत्येक वैदिक परंपरा में उनके द्वारा विकसित ज्ञान-विज्ञान स्पष्ट अनुभव किया जा सकता है। मानवीय चेतना को उसके पूर्ण विकास तक ले जाना हमारी ऋषि संस्कृति का प्रधान उद्देश्य रहा है। इसी वैदिक विचारधारा को पोषित करती है पितरों के श्राद्ध-तर्पण की पुरातन परंपरा।

हमारे वैदिक मनीषी बाह्य प्रकृति के ही नहीं, मानवीय चेतना के भी गहन मर्मज्ञ थे। सनातन संस्कृति की प्रत्येक वैदिक परंपरा में उनके द्वारा विकसित ज्ञान-विज्ञान स्पष्ट अनुभव किया जा सकता है। मानवीय चेतना को उसके पूर्ण विकास तक ले जाना हमारी ऋषि संस्कृति का प्रधान उद्देश्य रहा है। इसी वैदिक विचारधारा को पोषित करती है पितरों के श्राद्ध-तर्पण की पुरातन परंपरा। सनातन धर्म में पितृपक्ष के 15 दिन विशेष तौर पर पितरों की दिव्य ऊर्जा के प्रति श्रद्धा अर्पित करने के लिए नियत किए गए हैं। विश्व के किसी अन्य पंथ-संस्कृति में दिवंगत स्वजन के पूजन-वंदन की ऐसी पुनीत परंपरा नहीं है। वैदिक तत्वज्ञानियों द्वारा विकसित इस श्राद्ध परंपरा में एक समग्र जीवन-पद्धति के दिग्दर्शन होते हैं।

सनातन धर्म के इस दिव्य ज्ञान-विज्ञान से अनभिज्ञ महानगरीय सभ्यता में जीने वाला तथाकथित आधुनिक वर्ग यह तर्क देता है कि जो चला गया उसके लिए यह कर्मकांड करना कोरा अंधविश्वास है, परंतु , उनका यह अविश्वास सनातन ज्ञान के प्रति उनकी अज्ञानता ही है। अब से कुछ दशक पूर्व तक देश में ऐसा परिदृश्य नहीं था। तब देश का बहुसंख्य हिंदू समाज पूरी आस्था से पितृ-पूजन की इस सनातन परंपरा का पालन करता था मगर आजादी के बाद से पाश्चात्य जीवन-मूल्यों से पोषित उत्तर आधुनिक जीवनशैली और मैकाले प्रणीत देश के शैक्षिक ढांचे ने सुनियोजित षड्यंत्र के अंतर्गत भारतीयों को धीरे-धीरे उनकी जड़ों से काटना शुरू कर दिया। फलत: हम अपने पुरातन ज्ञान से दूर होते चले गए, लेकिन कहते हैं न कि सनातन सत्य को लंबे समय तक नकारा नहीं जा सकता। यही कारण है कि इस परंपरा के तत्वदर्शन को जान-समझ कर आज पूरी दुनिया हमारी श्राद्ध परंपरा की ओर आकर्षित हो रही है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है पितृपक्ष के दौरान गया, उज्जैन, काशी व हरिद्वार जैसे तीर्थों पर पितृ-तर्पण के लिए जुटने वाली विदेशी श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या।

क्यों किया जाता है श्राद्ध तर्पण

हिंदू धर्मशास्त्रों में तीन प्रकार के ऋण का उल्लेख मिलता है— देव-ऋण, ऋषि-ऋण और पितृ-ऋण। इन ऋणों से मुक्ति के लिए ही हमारे पूर्वजों ने श्राद्ध का विधान किया था। जिस तरह सीधे खड़े होने के लिए रीढ़ की हड्डी का मजूबत होना जरूरी होता है; ठीक उसी तरह हम सभी लोग अपने पूर्वजों के अंश हैं, उन्हीं से हमारी पहचान है। इसलिए ऋषियों ने पितृपक्ष में हर सनातनधर्मी को पूर्वजों का श्राद्ध तर्पण करने का निर्देश दिया है।

श्राद्धकर्म का शास्त्रीय विधान

श्राद्धकर्म की तात्विक व्याख्या करते हुए गरुड़ पुराण में तीन पीढ़ियों का श्राद्ध करने का विधान बताया गया है। ऋषि मनीषा कहती है कि पितृपक्ष की निर्धारित अवधि में हमारे पितर सूक्ष्म रूप में पृथ्वी पर आते हैं तथा अपने वंशजों द्वारा उचित तरीके से किए गए श्राद्ध-तर्पण को प्रेमपूर्वक ग्रहण कर तृप्त होकर उन्हें सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। इस प्रक्रिया के तहत जौ या चावल के आटे में गोदुग्ध, गोघृत, शक्कर, शहद मिलाकर इसे गूंथकर गोलाकार पिंड बनाकर इन पिंडों को शास्त्रोक्त विधि से दक्षिणाभिमुख हो श्रद्धाभाव से मंत्रों के साथ पितरों को समर्पित किया जाता है। तदुपरांत हाथों में कुशा धारण कर दुग्ध, काले तिल, जौ व पुष्प मिश्रित गंगाजल से विधिपूर्वक तीन पीढ़ियों के पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है। इसके उपरांत यह पितृभोज गाय, कुत्ता, कौआ और चींटियों को दिया जाता है। शास्त्रीय मान्यता है कि गोमाता, श्वान, कौवे व चींटियों द्वारा यह भोजन ग्रहण करने पर पितरों को भोजन प्राप्त हो जाता है। पक्षियों को पितरों का दूत तथा कौवे को उनका प्रतिनिधि माना जाता है। इसके बाद सुपात्र ब्राह्मणों को यथा सामर्थ्य भोजन तथा वस्त्रादि भेंट कर आशीर्वाद लिया जाता है। शास्त्र कहते हैं कि इस अवसर पर पूर्वजों के सम्मान में उनके नाम से प्याऊ, विद्यालय, धर्मशाला, चिकित्सालय, गोशाला व मंदिर आदि के निर्माण तथा वृक्षारोपण करने से पूर्वज प्रसन्न व तृप्त होकर अपनी कृपा बनाए रखते हैं।

कुश के प्रयोग का कारण

सनातन धर्म के शुभ व धार्मिक कार्यों में कुश को विशेष महत्व दिया जाता है। श्राद्ध-तर्पण के कर्मकांड में तो कुश का प्रयोग अनिवार्य रूप से किया जाता है। मत्स्य पुराण में कुश की उत्पत्ति से जुड़ी एक रोचक कथा आती है। इस कथा के अनुसार जब भगवान विष्णु ने वराह रूप धारण कर हिरण्याक्ष नामक राक्षस का वध कर धरती को समुद्र से निकालकर सभी प्राणियों की रक्षा की। तब इन्होंने अपने शरीर पर लगे पानी को झटका जिससे इनके शरीर के कुछ बाल पृथ्वी पर आकर गिर गए, जिन्होंने कुश का रूप धारण कर लिया। तभी से कुश को पवित्र मानकर पूजन कार्य में प्रयुक्त किया जाने लगा। अथर्ववेद के अनुसार कुश क्रोध को नियंत्रित करने में सहायक होता है। वहीं कुश के प्रयोग के पीछे कई वैज्ञानिक कारण भी हैं। शोध कहते हैं कि कुश घास में शुद्धिकरण का गुण होता है। साथ ही इसमें दर्दनिवारक और ‘एंटीआक्सीडेंट’ तत्व भी होते हैं।

श्राद्ध परंपरा का शुभारंभ

शास्त्र कहते हैं कि श्राद्ध की परंपरा वैदिक काल के बाद से आरंभ हुई। महाभारत के ‘अनुशासन पर्व’ में उल्लेख है कि सर्वप्रथम श्राद्ध महर्षि निमि ने महातपस्वी अत्रि के उपदेश पर किया था। समय के साथ इसे अन्य ऋषि-मुनियों ने अपनाया और धीरे-धीरे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र चारों वर्णों के लोग श्राद्ध परंपरा का निर्वहन करने लगे। शास्त्रज्ञ कहते हैं कि पितर चाहे किसी भी योनि में हों, वे अपने वंशजों द्वारा किए गए श्राद्ध को स्वीकार कर पुष्ट होते हैं और उन्हें नीच योनियों से मुक्ति मिलती है। श्राद्धकर्म की महिमा एवं विधि-विधान ब्रह्म, गरुड़, विष्णु, वायु, वराह, मत्स्य आदि पुराणों एवं महाभारत, मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्रों में विस्तार से वर्णित है। भविष्य पुराण में 12 प्रकार के श्राद्ध का उल्लेख है- 1. नित्य 2. नैमित्तिक 3. काम्य 4. वृद्धि, 5. सपिंडन, 6. यार्वण, 7. गोष्ठी, 8. शुद्धर्थ, 9. कमारा 10. दैविक 11.यावार्थ 12. पुष्ट्यर्थ। याज्ञवल्क्य ऋषि नित्य व नैमित्तिक श्राद्धों की अनिवार्यता को रेखांकित करते हुए कहते हैं कि पूर्ण श्रद्धाभाव से तीन पीढ़ियों के पूर्वजों का श्राद्ध करने वाला मनुष्य तीनों तरह के ऋण से मुक्त हो जाता है तथा उसके पितर सुखी व संतुष्ट हो पूर्ण मन से उस पर आशीर्वाद बरसाते हैं। ‘मनुस्मृति’ कहती है-
‘‘आयु: पूजां धनं विद्यां स्वर्ग मोक्ष सुखानि च।
प्रयच्छति तथा राज्यं पितर: श्राद्ध तर्पिता।।’’
अर्थात् जो लोग अपने पितरों का श्राद्ध श्रद्धापूर्वक करते हैं, उनके पितर संतुष्ट होकर उन्हें आयु, संतान, धन, स्वर्ग, राज्य, मोक्ष व अन्य सौभाग्य प्रदान करते हैं। वहीं जो पितरों का श्राद्ध तर्पण नहीं करते, वे उनके कोप व श्राप के भागी बनते हैं। विष्णु पुराण कहता है कि पितर धन से नहीं, बल्कि भावना से प्रसन्न होते हैं। निर्धन व्यक्ति अपने पितरों को तिल मिश्रित जल से तर्पण कर और गाय को हरा चारा खिलाकर भी अपने पितरों को श्रद्धा अर्पित कर सकता है।

ऐसे करते हैं पितर ग्रहण

प्राय: लोगों के मन में यह जिज्ञासा होती है कि श्राद्ध में समर्पित वस्तुओं को पितर आखिर कैसे ग्रहण करते हैं? इस शंका का समाधान करते हुए गायत्री महाविद्या के महामनीषी पंडित श्रीराम शर्मा अपनी पुस्तक ‘पितर हमारे अदृश्य सहायक’ में लिखते हैं कि कर्मों की भिन्नता के कारण संसार से विदा होने के बाद प्रत्येक जीव की गति भिन्न-भिन्न होती है। कोई देवता, कोई पितर, कोई प्रेत, कोई हाथी, कोई चींटी, कोई वृक्ष और कोई तृण बन जाता है। तब मन में यह शंका होती है कि छोटे से पिंड से अलग-अलग योनियों में पितरों को तृप्ति कैसे मिलती होगी? स्कंद पुराण में इस शंका का सुंदर समाधान मिलता है। राजा करंधम ने महायोगी महाकाल से पूछा, ‘मनुष्यों द्वारा पितरों के लिए जो तर्पण या पिंडदान किया जाता है तो वह जल, पिंड आदि तो यहीं रह जाता है फिर पितरों के पास वे वस्तुएं कैसे पहुंचती हैं और पितरों को तृप्ति कैसे होती है?’ प्रत्युत्तर में भगवान महाकाल ने बताया कि विश्व नियंता ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि श्राद्ध की सामग्री पितरों के अनुरूप होकर उनके पास पहुंचती है।

पितरों और देवताओं की योनि ऐसी होती है कि वे दूर से कही हुई बातें आसानी से से सुन लेते हैं और दूर की पूजा भी सहजता से ग्रहण कर लेते हैं। वे सभी जगह पहुंच सकते हैं, क्योंकि उनका शरीर पांच तन्मात्राओं तथा मन, बुद्धि, अहंकार और प्रकृति- इन नौ तत्वों से बना होता है और इसके भीतर 10वें तत्व के रूप में साक्षात् भगवान पुरुषोत्तम निवास करते हैं। इसलिए वे गंध व रस तत्व से सहज ही तृप्त हो जाते हैं। जैसे मनुष्यों का आहार अन्न और पशुओं का आहार तृण है, वैसे ही पितरों का आहार इनका सारतत्व (गंध और रस) है। नाम व गोत्र के उच्चारण के साथ जो अन्न-जल आदि पितरों को दिया जाता है; विश्वदेव एवं अग्निष्वात नामक दिव्य पितर उसको सभी योनि के पितरों तक पहुंचा देते हैं।

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार जिस प्रकार वर्षा का जल सीप में गिरने से मोती, कदली में गिरने से कर्पूर, खेत में गिरने से अन्न और धूल में गिरने से कीचड़ बन जाता है, उसी प्रकार तर्पण के जल से सूक्ष्म वाष्प कण देव योनि के पितर को अमृत, मनुष्य योनि के पितर को अन्न, पशु योनि के पितर को चारा व अन्य योनियों के पितरों को उनके अनुरूप भोजन से संतुष्टि प्राप्त होती है। शास्त्रज्ञ कहते हैं कि जिस प्रकार गाय का बछड़ा सैकड़ों के झुंड में भी अपनी मां को सहजता से ढूंढ लेता है, ठीक उसी प्रकार जीव चाहे किसी भी योनि में क्यों न पहुंच गया हो, वंशजों द्वारा श्रद्धा भाव से किया गया तर्पण उन्हें तृप्त कर ही देता है।

Topics: दिव्य ज्ञान-विज्ञानबहुसंख्य हिंदू समाजपितृ-तर्पणदेव-ऋणऋषि-ऋण और पितृ-ऋण।श्राद्ध परंपरासनातनधर्मी
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