जी-20 सम्मेलन में मित्र देशों को भारत ने दिया सम्मान, निभाया मित्र धर्म
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होम भारत

जी-20 सम्मेलन में मित्र देशों को भारत ने दिया सम्मान, निभाया मित्र धर्म

शेख हसीना का भारत के प्रति बहुत कृतज्ञता का भी भाव है। उन्हें भारत ने 1975-1981 के दरम्यान शरण दी थी। वे तब राजधानी में अपने पति और दोनों बच्चों के साथ निर्वासित जीवन बिता रही थीं।

Written byआर.के. सिन्हाआर.के. सिन्हा
Sep 11, 2023, 09:35 am IST
in भारत
जी-20 शिखर सम्मेलन में शामिल देशों के प्रमुखों के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फाइल फोटो)

जी-20 शिखर सम्मेलन में शामिल देशों के प्रमुखों के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फाइल फोटो)

भारत ने जी-20 शिखर सम्मेलन में अपने करीबी मित्र देशों जैसे बांग्लादेश, मॉरीशस, संयुक्त अरब अमीरत आदि को विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित करके मित्र धर्म का निर्वाह किया। भारत-बांग्लादेश के बीच संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं, हालांकि कभी-कभी सीमा विवाद तो होते ही हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद के बीच मधुर संबंधों के चलते दोनों देशों के संबंधों को नई दिशा मिल रही है।

भारत और बांग्लादेश सार्क, बिम्सटेक, हिंद महासागर तटीय क्षेत्रीय सहयोग संघ और राष्ट्रकुल के सदस्य भी हैं। विशेष रूप से, बांग्लादेश और पूर्व भारतीय राज्य जैसे पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा बांग्ला भाषा बोलने वाले प्रांत हैं। 1971 में पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान के बीच बांग्लादेश मुक्ति युद्ध शुरू हुआ और भारत ने पूर्वी पाकिस्तान की ओर से दिसंबर 1971 में हस्तक्षेप किया। फलस्वरूप बांग्लादेश राज्य के रूप में पाकिस्तान से पूर्वी पाकिस्तान की स्वतंत्रता को सुरक्षित करने में भारत ने मदद की। शेख हसीना का भारत के प्रति बहुत कृतज्ञता का भी भाव है। उन्हें भारत ने 1975-1981 के दरम्यान शरण दी थी। वे तब राजधानी में अपने पति और दोनों बच्चों के साथ निर्वासित जीवन बिता रही थीं। उनके पिता और बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीब-उर-रहमान, मां और तीन भाइयों का 15 अगस्त, 1975 को कत्ल कर दिया गया था। उस भयावह हत्याकांड के दौर में शेख हसीना अपने पति एम.ए.वाजिद मियां और दो बच्चों के साथ जर्मनी में थीं। वाजिद मियां न्यूक्लियर साइंटिस्ट थे। इतनी बड़ी त्रासदी ने शेख हसीना को बुरी तरह से झंझोड़ कर रख दिया था। वे टूट चुकी थीं। तब भारत सरकार ने उन्हें उनके परिवार के साथ भारत में शरण दी थी। उस वक्त उनका बांग्लादेश वापस जाने का सवाल ही नहीं था। तब शेख हसीना सपरिवार भारत आ गईं। उन छह बरसों के दौरान शेख हसीना कमोबेश गैर-राजनीतिक थींI बावजूद इसके कि वे शेख मुजीब जैसे धाकड़ नेता की पुत्री थीं। वे जब भारत में आईं तब भारत में इमरजेंसी लग चुकी थी।

इस बीच, जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रविंद कुमार जगन्नाथ के साथ भी आपसी और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर चर्चा की। मॉरीशस को लघु भारत या भारत से बाहर भारत कहा जाता है। वहां पर भारतवंशी बहुमत में हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने वर्ष 2015 में अपनी मॉरीशस यात्रा के दौरान महत्त्वाकांक्षी नीति सागर की शुरुआत की। यह पिछले कई दशकों में भारत द्वारा हिंद महासागर में किया गया एक महत्त्वपूर्ण प्रयास था। भारत के लिये मॉरीशस में सामरिक दृष्टिकोण से अपार संभावनाएँ निहित हैं तथा दोनों देशों की साझेदारी गन्ने के बागान, वित्तीय सेवाएँ तथा तकनीकी नवाचारों से कहीं आगे जा सकती है। मॉरीशस भी भारत को लेकर बहुत आदर और स्नेह का भाव रखता है। मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रविंद कुमार जगन्नाथ का भारत से एक पारिवारिक संबंध भी है। उनकी बहन शालिनी जगन्नाथ का विवाह राजधानी दिल्ली के ही एक मल्होत्रा परिवार के डॉ. कृष्ण मल्होत्रा से हुआ है। दरअसल शालिनी जगन्नाथ और ड़ॉ. कृष्ण कुमार मल्होत्रा के बीच लंदन में शिक्षा ग्रहण करने के दौरान मैत्री हो गई थी। यह 1980 के दशक के शुरुआती वर्षों की बातें हैं। उसके बाद दोनों ने विवाह करने का फैसला किया था।

इस बीच, प्रधानमंत्री मोदी जी-20 शिखर सम्मेलन के समय व्यस्त होने के बावजूद संयुक्त अरब अमीरत (यूएई) के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की। बेशक, दोनों करीबी देश तो हैं पर इनके बीच कई मसले भी हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और यूएई के नेताओं में बातचीत से वहां पर काम करने वाले लाखों कुशल-अकुशल भारतीय श्रमिकों की जिंदगी में सुधार आएगा। आप दुबई या अबूधाबी एयरपोर्ट पर जैसे ही उतरते हैं तो आपको समझ आ जाता है कि इस देश में कितनी अधिक तादाद में भारतीय हैं। ये चप्पे-चप्पे पर काम कर रहे होते हैं। इनके सामने कई मसले भी हैं। वहां पर न्यूनतम वेतन और दूसरी सुविधाओं के मसले हैं। वहां पर काम करने गए हमारे मेहनतकशों को खराब मौसम, पोषणयुक्त आहार की कमी, रहने के लिए पर्याप्त जगह के अभाव वगैरह के चलते बहुत कठिनाइयों को झेलना पड़ता है। इनके पासपोर्ट कई बार ठेकेदार कंपनियां अपने पास रख लेती हैं। जिसके चलते इन्हें बंधुआ मजदूर के रूप में ही काम करना होता है।

यूपीए सरकार ने खाड़ी में काम करने वाले मजदूरों की बहुत बेकर्दी की थी। तब विदेश राज्य मंत्री ई.अहमद से खाड़ी देशों में काम करने वाले भारतीय श्रमिकों के शोषण के संबंध में संसद में एक बार सवाल पूछा गया था। तब अहमद साहब ने कहा था, “अनुमान है कि लगभग 6 मिलियन भारतीय खाड़ी क्षेत्र में रहते हैं एवं वहां पर कार्य करते हैं। भारत सरकार को खाड़ी देशों में भारतीय कामगारों द्वारा सामना की जा रही समस्याओं से संबंधित शिकायतें प्राप्त होती रहती है। भारत सरकार ने खाड़ी देशों में अपने मिशनों के माध्यम से भारतीय कामगारों के अधिकारों की रक्षा करने एवं कामगारों के शोषण संबंधी समस्याओं का निराकरण करने हेतु कई उपाय एवं पहल की हैं। जब भी शिकायतें प्राप्त होती है, तो उनका सौहार्दपूर्ण हल निकालने पर सहमति बनाने की दृष्टि से मिशन द्वारा प्राथमिकता आधार पर संबंधित नियोक्ताओं और अथवा स्थानीय प्राधिकारियों के साथ इस मुद्दे को उठाया जाता है।” इस घनघोर असंवेदनशील सरकारी उत्तर को पढ़कर आपको समझ आ जाएगा कि सरकार की तरफ से क्या पहल होती रही है खाड़ी में बसे भारतीयों के लिए।

अगर बात जी-20 से हटकर करें तो मलेशिया में भी भारतीयों की हालत बहुत ही खराब है। मलेशिया में करीब 25 लाख भारतीय बसे हुए हैं। एक अनुमान के मुताबिक, भारत से बाहर सर्वाधिक भारतीय खाड़ी के देशों में मलेशिया और साउथ अफ्रीका में बसे हैं। मलेशिया के भारतवंशी भी खासी संख्या में हैं। इनके अलावा हाल के वर्षों में भारत से गए श्रमिक भी कम नहीं हैं। इन दोनों की हालत खराब है। वहां पर उनके साथ दूसरे दर्जे के नागरिक के रूप में व्यवहार किया जा रहा है। खाड़ी के प्रमुख देश कतर गए भारतीय मजदूरों की बदहाली की खबरें लगातार आती रहती हैं। भारत सरकार को विदेश में रहने वाले अपने नागरिकों और भारतवंशियों के हितों के लिए काम करना होगा। यह अच्छे आपसी संबंधों से ही होगा जिसके लिये प्रधानमंत्री मोदी सतत प्रयत्नशील हैं I

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं)

Topics: संयुक्त अरब अमीरतपीएम मोदीबांग्लादेशशेख हसीनाजी-20 शिखर सम्मेलनजी-20 समिटमॉरीशस
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