विवाह, लिव इन रिलेशन और इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला
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विवाह, लिव इन रिलेशन और इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला

फिल्म और ओटीटी पर भी इस समय दिखाई जा रही फिल्में और टीवी धारावाहिक विवाह संस्था को ख़त्म करने में योगदान दे रहे हैं

Written byPanchjanyaPanchjanya
Sep 8, 2023, 09:25 pm IST
in मत अभिमत
इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट

  • सोनाली मिश्रा

लिव इन अर्थात बिना किसी वैवाहिक संबंध के बिना ही विवाह जैसे संबंध में एक पुरुष और महिला के साथ रहने को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने सहारनपुर के एक व्यक्ति को जमानत देते हुए यह टिप्पणी की। यह व्यक्ति 18 अप्रैल से जेल में था और निर्णय के अनुसार उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं था।

उक्त पुरुष के विरुद्ध आईपीसी की धारा 316 के अंतर्गत अपराध किए जाने के कोई चिकित्सीय प्रमाण भी नहीं हैं। इस पुरुष के विरुद्ध पॉक्सो अधिनियम की धाराएं भी लगाई गईं थीं, परन्तु जब पीड़िता की आयु की जांच की गयी तो उसी उम्र 19 वर्ष निकली थी, अत: न्यायालय के आदेश के अनुसार पुरुष पर यह धाराएं लागू नहीं होती हैं। निर्णय में यह लिखा है कि लड़की ने यह आरोप लगाया कि पीड़िता के साथ उक्त पुरुष ने एक वर्ष तक दोस्ती की और फिर उसने लिव इन में एक साल तक रहते हुए बलात्कार किया। उसने शादी के झूठे वादे भी किये थे। जब पीड़िता गर्भवती हुई तो उसने आरोपी से विवाह के लिए कहा। परन्तु उसने विवाह से इंकार कर दिया। पीड़िता का आरोप था कि उसने उसका अश्लील वीडियो बनाया और फिर उसके आधार पर बलात्कार किया।

वहीं उस पुरुष के वकील ने कहा कि पीड़िता ने अपने वक्तव्य में यह स्वीकार किया था कि वह अपनी मर्जी से उक्त व्यक्ति के साथ लिव इन में रह रहती थी और वह एक वर्ष तक उसके साथ थी और अपनी मर्जी से ही शारीरिक संबंध बनाए थे। फिर जब वह गर्भवती हुई तो उसने शादी करने के लिए कहा और उस व्यक्ति ने इंकार कर दिया। फिर पीड़िता ने उसके खिलाफ शिकायत की और यह भी कहा कि दो और लोगों ने उसके साथ बलात्कार किया। परन्तु पीड़िता की शारीरिक जांच के बाद किसी भी प्रकार की जोर जबर्दस्ती की बात निकलकर नहीं आई है। यद्यपि लड़की के वकील ने जमानत का विरोध किया और कहा कि आरोपी को लड़की के साथ विवाह करने का निर्देश दिया जाए, क्योंकि उसने उसकी ज़िंदगी बर्बाद कर दी है। इस पर पुरुष के वकील ने विरोध करते हुए कहा कि चूंकि पीड़िता पहले ही किसी और से विवाह कर चुकी है, ऐसे में आरोपी के साथ विवाह की बात नहीं आती है।

न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि एक बार फिर वही मामला सामने निकलकर आया जिसमें लड़की पहले तो अपनी मर्जी से लिव इन में जाती है और फिर जब बात बिगड़ती है तो सामाजिक मान्यता लेने के लिए विवाह करना चाहती है। न्यायालय ने कहा कि विवाह की कमी के चलते उन्हें यह लगता है कि पूर्णता नहीं प्राप्त होगी और उनके बच्चों के साथ सामाजिक रूप से भेदभाव होगा, तो वह विवाह की सोचते हैं। कुछ लोग भाग्यशाली होते हैं, जो उसी व्यक्ति के साथ विवाह सूत्र में बंधते हैं, परन्तु अधिकांशत: ऐसा होता नहीं है और फिर लड़की एफआईआर दर्ज करती है। मध्यवर्गीय समाज में ऐसी लड़कियों को ब्रेकअप के बाद स्वीकारा नहीं जाता है। ऐसी लड़कियों के घरवाले चाहते हैं कि उनकी बेटी की शादी किसी भी प्रकार से उसी लड़के के साथ हो जाए।

माननीय न्यायालय ने अपने आदेश में भारत की आत्मा को जैसे स्पर्श करते हुए लिखा कि हमारे देश में मध्य वर्ग की नैतिकता को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। हमारे देश में मध्यवर्गीय समाज बहुतायत में है। किसी भी देश की सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक स्थिरता उसके मध्यवर्ग के आकार पर निर्भर करती है। फिर उन्होंने निर्णय में कहा कि किसी व्यक्ति को विवाह संस्था जो सुरक्षा, सामाजिक स्वीकृति, प्रगति और स्थिरता प्रदान करती है वह लिव-इन-रिलेशनशिप कभी नहीं प्रदान करती है। उन्होंने निर्णय में यह भी कहा कि हमारे सामने भविष्य में बहुत समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं क्योंकि लिव इन और कुछ नहीं बल्कि विवाह संस्था को बर्बाद करने की डिजाइन है। साथ ही उन्होंने इस समस्या को लेकर फिल्म और ओटीटी पर भी निशाना साधते हुए कहा कि इस समय दिखाई जा रही फिल्में और टीवी धारावाहिक विवाह संस्था को ख़त्म करने में योगदान दे रहे हैं। वैवाहिक रिश्ते में पार्टनर से बेवफाई और उन्मुक्त लिव-इन-रिलेशनशिप को प्रगतिशील समाज की निशानी के तौर पर दिखाया जा रहा है। युवा वर्ग दीर्घकालिक परिणामों से अनभिज्ञ होकर ऐसे दर्शन की ओर आकर्षित होता है।

उन्होंने ऐसे संबंधों के कारण उत्पन्न हुई संतानों के भविष्य के प्रति भी चिंता व्यक्त की। तथा उस व्यक्ति को जमानत प्रदान कर दी। लिव इन संबंधों को लेकर यद्यपि क़ानून में कोई परिभाषा नहीं है, परन्तु यह प्राय: देखा गया है कि एक फैशन या दूषित विचार के प्रति आकर्षण के चलते लड़कियां बिना विवाह के ऐसे संबंधों में प्रवेश तो कर लेती हैं, जिनमें कथित रूप से विवाह का शोषण नहीं है अर्थात लड़का और लड़की बराबर रूप से हर जिम्मेदारी निभा रहे हैं और उस कथित समानता के सिद्धांत पर है, जिसकी लकीर वामपंथी फेमिनिस्म पीटता है, परन्तु फिर उन्हें इस सपने का झूठ दिखाई देता है और वह उस सामाजिक मान्यता के लिए तरसती हैं, जिसे तोड़कर वह इस पथ पर चली आई थीं। जब लड़का उनकी विवाह की मांग को नहीं मानता है तो फिर बात बिगड़ती है और अब न्यायालय द्वारा यह कई मामलों में कहा गया है कि लिव इन में बात बिगड़ने वाले मामलों को बलात्कार का मामला न माना जाए !
परन्तु माननीय न्यायालय का यह कथन कि लिव इन विवाह संस्था को सुनियोजित रूप से बर्बाद करने का षड्यंत्र है, कहीं न कहीं उचित ही प्रतीत होता है, क्योंकि आज लिव इन के सब्ज़बागों के चलते कई युवा अपने जीवन के लक्ष्यों से भटक चुके हैं, तो श्रद्धा जैसी लड़कियां जो लिव इन में रहने के लिए आफताब जैसों के साथ चली आई थीं, वह जीवन से भी हाथ धो बैठती हैं। यह देश की युवा शक्ति की भी क्षति है।

(सोनाली मिश्रा जी साहित्यक विषयों और महिला विमर्श समेत कई मुद्दों पर लिखती हैं । लव जिहाद पर उनका उपन्यास नेहा की लव स्टोरी काफी चर्चित है।)

Topics: लिव-इन-रिलेशनलिव-इन-रिलेशन पर हाई कोर्टलिव इन रिलेशन पर टिप्पणीलिव इन हाई कोर्ट का बयानcomment on live in relationhigh court on live in relationlive in high court statementAllahabad High Courtइलाहाबाद उच्च न्यायालयlive-in relation
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