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‘मस्जिदें’ निगल रहीं सरकारी संपदा

नई दिल्ली स्थित उन 123 कथित वक्फ संपत्तियों की एक बार फिर से चर्चा हो रही है, जिन्हें भारत सरकार ने इसी वर्ष फरवरी में अपने अधीन लेने की घोषणा की थी। यह चर्चा 21 अगस्त को संसद के पास स्थित जामा मस्जिद के सर्वेक्षण के बाद शुरू हुई है।

Written byअरुण कुमार सिंहअरुण कुमार सिंह
Aug 30, 2023, 02:03 pm IST
in विश्लेषण, दिल्ली
संसद के पास स्थित जामा मस्जिद। इसका सर्वेक्षण हो चुका है।

संसद के पास स्थित जामा मस्जिद। इसका सर्वेक्षण हो चुका है।

21 अगस्त को संसद के पास स्थित जामा मस्जिद का सर्वेक्षण हुआ। भूमि और विकास कार्यालय के अधिकारी और कर्मचारियों ने मस्जिद के क्षेत्रफल को मापा साथ ही मस्जिद से जुड़े कागजात भी मांगे। दिल्ली में ऐसी 123 संपत्तियां जांची जानी हैं।

इन दिनों नई दिल्ली स्थित उन 123 कथित वक्फ संपत्तियों की एक बार फिर से चर्चा हो रही है, जिन्हें भारत सरकार ने इसी वर्ष फरवरी में अपने अधीन लेने की घोषणा की थी। यह चर्चा 21 अगस्त को संसद के पास स्थित जामा मस्जिद के सर्वेक्षण के बाद शुरू हुई है। बता दें कि केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय से जुड़े भूमि और विकास कार्यालय (एल.डी.ओ.) के अधिकारी और कर्मचारी सर्वेक्षण के लिए वहां पहुंचे। इन लोगों ने मस्जिद के क्षेत्रफल को मापा।

इसके साथ ही मस्जिद से जुड़े कागजात भी मांगे। इससे पहले भूमि एवं विकास विभाग ने इस मस्जिद की दीवार पर 18 अगस्त को ही एक नोटिस चिपकाया था। इसमें लिखा है, ‘‘601, जामा मस्जिद, रेड क्रास रोड, संसद भवन के समीप, उच्च न्यायालय द्वारा इसी वर्ष 23 अप्रैल को दिए गए निर्देशानुसार इस मस्जिद का सर्वेक्षण 21 अगस्त को होगा।’’

यह मस्जिद दिल्ली की उन 123 संपत्तियों में शामिल है, जिन्हें केंद्र सरकार ने वक्फ बोर्ड से बाहर कर अपने अधीन ले लिया है। हालांकि यह मामला दिल्ली उच्च न्यायालय में चल रहा है। वर्तमान में इन 123 संपत्तियों में से 61 का स्वामित्व भूमि और विकास कार्यालय के पास है, जबकि शेष दिल्ली विकास प्राधिकरण (डी.डी.ए.) के पास हैं। इनमें से अधिकतर संपत्तियां कनॉट प्लेस, मथुरा रोड, लोधी रोड, मान सिंह रोड, पंडारा रोड, अशोका रोड, जनपथ, संसद भवन, करोलबाग, सदर बाजार, दरियागंज और जंगपुरा के आसपास हैं। इनकी कीमत अरबों रु. है।

इनमें से कुछ सपत्तियां तो अति संवेदनशील स्थानों पर हैं। अधिकतर संपत्तियां व्यावसायिक क्षेत्रों में हैं। देखा जाए तो ये सारी संपत्तियां सरकारी हैं, लेकिन इन संपत्तियों पर कुछ प्रभावशाली लोगों ने कब्जा कर रखा है और वे लोग इनसे जमकर पैसा बना रहे हैं। इसलिए केंद्र सरकार ने इन संपत्तियों को उनके कब्जे से छुड़Þाने का निर्णय लिया है।

उल्लेखनीय है कि केंद्रीय आवास एवं शहरी विकास मंत्रालय से जुड़े उप भूमि और विकास अधिकारी (डी.एल.डी.ओ.) ने 8 फरवरी, 2023 को दिल्ली वक्फ बोर्ड को एक पत्र लिखकर उपरोक्त जानकारी दी थी। डी.एल.डी.ओ. ने पत्र में कहा था कि सेवानिवृत्त न्यायाधीश एस.पी. गर्ग की अध्यक्षता वाली दो सदस्यीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि उसे गैर-अधिसूचित वक्फ संपत्तियों को लेकर दिल्ली वक्फ बोर्ड की ओर से कोई आपत्ति नहीं मिली है।

उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने इस समिति का गठन दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश पर किया था। इस समिति को यह विवाद सुलझाना था कि ये संपत्तियां किसकी हैं? वास्तव में यह विवाद बहुत पुराना है। एक जानकारी के अनुसार इन सारी संपत्तियों को 1911-15 के बीच सरकार ने अपने अधीन ले लिया था। इसके लिए आवश्यक प्रक्रिया अपनाई गई थी, लेकिन बाद में इन संपत्तियों पर वक्फ बोर्ड ने दावा कर दिया।

यही नहीं, 1970 में दिल्ली वक्फ बोर्ड ने इन संपत्तियों को एकतरफा वक्फ संपत्ति घोषित कर दिया। पर दिल्ली वक्फ बोर्ड की इस हरकत का तत्कालीन भारत सरकार ने विरोध किया। इसके विरुद्ध सरकार ने दिल्ली उच्च न्यायालय में एक मुकदमा भी दायर किया। न्यायालय में सरकार ने बताया कि ये संपत्तियां उसके द्वारा 1911-15 में अधिग्रहीत की गई थीं। बाद में कुछ संपत्तियों को डी.डी.ए. को हस्तांतरित कर दिया गया था, लेकिन ये कभी भी दिल्ली वक्फ बोर्ड से संबंधित नहीं रही हैं।

भारत सरकार ने बर्नी समिति की सिफारिश को मान भी लिया और ये सारी संपत्तियां दिल्ली वक्फ बोर्ड को पट्टे पर दे दीं। 27 मार्च, 1984 को भारत सरकार ने एक आदेश, जे 20011/4/74-1-2 जारी किया। उसमें कहा गया कि ये सारी संपत्तियां सालाना एक रुपए प्रति एकड़ की दर से वक्फ बोर्ड को पट्टे पर दी जाती हैं। इंद्रप्रस्थ विश्व हिंदू परिषद ने सरकार के इस निर्णय का जबरदस्त विरोध किया। उसी वर्ष विश्व हिंदू परिषद ने दिल्ली उच्च न्यायालय में एक याचिका (1512) दायर कर कहा कि भारत सरकार ने गलत ढंग से अरबों की संपत्ति दिल्ली वक्फ बोर्ड को दी है। याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने सरकार के निर्णय पर रोक लगा दी। यह मामला कई वर्ष तक उच्च न्यायालय में चला।

कहा जाता है कि सरकार के इस रुख से उस समय के मुस्लिम नेता परेशान होने लगे और उन्होंने सरकार से कहा कि इससे मुस्लिम समाज में कांग्रेस के प्रति गुस्सा बढ़ रहा है। इससे वह सरकार डर गई, जो उच्च न्यायालय में इन संपत्तियों को ‘अपना’ बता रही थी। इसके बाद मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने के लिए 1974 में भारत सरकार ने इन संपत्तियों के लिए एक उच्चाधिकार समिति बना दी। दिल्ली वक्फ बोर्ड के तत्कालीन अध्यक्ष एस.एम.एच. बर्नी को इस समिति अध्यक्ष बनाया गया। यहां दिलचस्प बात यह है कि जो दिल्ली वक्फ बोर्ड इन संपत्तियों पर अपना दावा जताता था, उसके अध्यक्ष को ही यह तय करने का अधिकार दिया गया कि ये संपत्तियां किसकी हैं। इस समिति ने वही किया, जिसकी उम्मीद थी। उसने अपनी रिपोर्ट में 123 संपत्तियों को वक्फ संपत्ति घोषित करने की सिफारिश की।

भारत सरकार ने बर्नी समिति की सिफारिश को मान भी लिया और ये सारी संपत्तियां दिल्ली वक्फ बोर्ड को पट्टे पर दे दीं। 27 मार्च, 1984 को भारत सरकार ने एक आदेश, जे 20011/4/74-1-2 जारी किया। उसमें कहा गया कि ये सारी संपत्तियां सालाना एक रुपए प्रति एकड़ की दर से वक्फ बोर्ड को पट्टे पर दी जाती हैं। इंद्रप्रस्थ विश्व हिंदू परिषद ने सरकार के इस निर्णय का जबरदस्त विरोध किया।

उसी वर्ष विश्व हिंदू परिषद ने दिल्ली उच्च न्यायालय में एक याचिका (1512) दायर कर कहा कि भारत सरकार ने गलत ढंग से अरबों की संपत्ति दिल्ली वक्फ बोर्ड को दी है। याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने सरकार के निर्णय पर रोक लगा दी। यह मामला कई वर्ष तक उच्च न्यायालय में चला। न्यायालय ने बार-बार सरकार से पूछा कि उसने किस आधार पर वे संपत्तियां वक्फ बोर्ड को दी हैं? क्या इस बाबत कोई नीति बनाई गई है? लेकिन तत्कालीन सरकार गोल-मोल जवाब देती रही और समय बर्बाद करती रही। कई वर्ष तक ऐसे ही चलता रहा।

कहा जाता है कि 2014 के आम चुनाव से ठीक पहले कुछ मुसलमानों ने एक बार फिर से सरकार पर दबाव बनाया कि वह दिल्ली की 123 संपत्तियों से जुड़े वाद को समाप्त करे और ये संपत्तियां दिल्ली वक्फ बोर्ड को दी जाएं।

यही कारण है कि 2014 में 16वीं लोकसभा के चुनाव की घोषणा होने के बाद तत्कालीन मनमोहन सरकार ने 5 मार्च, 2014 को एक राजपत्र (566) जारी कर 123 संपत्तियों को दिल्ली वक्फ बोर्ड को दे दिया।

चूंकि उस समय चुनाव की घोेषणा हो चुकी थी। इसलिए विहिप ने इस राजपत्र को गलत माना और उसका एक प्रतिनिधिमंडल चुनाव आयोग से मिला और कहा कि सरकार ने 123 संपत्तियों को वक्फ बोर्ड को देकर चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन किया है। इसके बाद चुनाव आयोग ने इसकी जांच की और उसने इसे चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन मानते हुए सरकार के आदेश पर रोक लगा दी। इस तरह यह मामला उस समय रुक गया।

बाद में मई, 2014 में केंद्र सरकार बदल गई। नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने। इसके बाद विश्व हिंदू परिषद ने एक बार फिर से इस मामले को सरकार के समक्ष उठाया। इसे देखते हुए भारत सरकार ने गर्ग समिति का गठन किया। इस समिति ने कई बार दिल्ली वक्फ बोर्ड को अपना पक्ष रखने के लिए बुलाया, लेकिन वक्फ बोर्ड ने इस पर ध्यान नहीं दिया। कहा जा रहा है कि उसने जान-बूझकर गर्ग समिति को अपना पक्ष नहीं बताया। और जब वक्फ बोर्ड ने इस मामले पर कोई आपत्ति दर्ज नहीं की, तो गर्ग समिति ने अपनी अंतिम रिपोर्ट सरकार को सौंप दी। अब उसी समिति की रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने इन संपत्तियों को अपने स्वामित्व में रखने का निर्णय लिया है।

Topics: Muslim Leaderदिल्ली उच्च न्यायालयMuslim Vote BankDelhi High CourtVishwa Hindu Parishadविश्व हिंदू परिषददिल्ली वक्फ बोर्डDelhi Waqf Boardनरेंद्र मोदी प्रधानमंत्रीNarendra Modi Prime Ministerमुस्लिम नेतामुस्लिम वोट बैंक
अरुण कुमार सिंह
अरुण कुमार सिंह
समाचार संपादक, पाञ्चजन्य | अरुण कुमार सिंह लगभग 25 वर्ष से पत्रकारिता में हैं। वर्तमान में साप्ताहिक पाञ्चजन्य के समाचार संपादक हैं। [Read more]
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