जलगांव में जमीन जिहाद
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जलगांव में जमीन जिहाद

महाराष्ट्र के जलगांव जिले में पांडववाड़ा नामक एक ऐतिहासिक स्थल है। इसकी देखरेख भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण करता है। इसके बाद भी वहां मदरसा और मस्जिद बना दी गई है

Written byअरुण कुमार सिंहअरुण कुमार सिंह
Jul 26, 2023, 03:18 pm IST
in महाराष्ट्र
पांडववाड़ा का बाहरी भाग, प्रकोष्ठ में पांडववाड़ा के अंदर मौजूद ‘मजार’

पांडववाड़ा का बाहरी भाग, प्रकोष्ठ में पांडववाड़ा के अंदर मौजूद ‘मजार’

ऐसी भी मान्यता है कि भीम ने एरंडोल से लगभग 15 किलोमीटर दूर पद्मालय में राक्षस बकासुर का वध किया था। पांडववाड़ा के निकट द्रौपदी कूप यानी द्रौपदी का कुआं है। आधिकारिक सरकारी कागजातों में भी इस क्षेत्र को ‘पांडववाड़ा’ के नाम से ही जाना जाता है।

इस समय महाराष्ट्र के जलगांव जिले में हुए जमीन जिहाद की चर्चा पूरे देश में हो रही है। बता दें कि जलगांव नगर से लगभग 27 किलोमीटर दूर अंजनी नदी के तट पर एरंडोल नामक स्थान है। मान्यता है कि यही महाभारत में वर्णित ‘एकचक्रनगरी’ है। एरंडोल को एरानवेल या अरुणावती के नाम से भी जाना जाता था। कहा जाता है कि महाभारत युद्ध से पहले पांडवों ने अपने अज्ञातवास का कुछ समय एकचक्रनगरी में बिताया था। जिस क्षेत्र में वे रहे थे आज वहां एक ऐतिहासिक भवन है, जिसे ‘पांडववाड़ा’ के नाम से जाना जाता है।

ऐसी भी मान्यता है कि भीम ने एरंडोल से लगभग 15 किलोमीटर दूर पद्मालय में राक्षस बकासुर का वध किया था। पांडववाड़ा के निकट द्रौपदी कूप यानी द्रौपदी का कुआं है। आधिकारिक सरकारी कागजातों में भी इस क्षेत्र को ‘पांडववाड़ा’ के नाम से ही जाना जाता है। कुछ साल पहले तक विद्यालय की पाठ्य पुस्तकों में भी इस स्थान की महत्ता पर एक अध्याय था।

पांडववाड़ा 4515.9 वर्ग मीटर क्षेत्रफल में फैला हुआ है। इसके मुख्य प्रवेश द्वार के पास लगाए गए पत्थरों पर प्राचीन नक्काशी है, जिनमें कमल को प्रमुखता से देखा जाता है। पांडववाड़ा के पास एक धर्मशाला है, जो हिंदू मंदिरों में आम बात है। वाड़े में प्रवेश करते ही दोनों ओर खुली जगह मिलती है। आसपास की दीवारों में कई खिड़कियां हैं, जिनमें से सभी पर कमल और दीपक जैसी नक्काशी है। वाड़े के अंत में गर्भगृह जैसी एक संरचना है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ए.एस.आई.) मानता है कि पांडववाड़ा के आसपास 52 जैन मंदिर भी थे। खुदाई में भगवान महावीर की अनेक मूर्तियां भी मिली हैं, जिन्हें नासिक के संग्रहालय में रखा गया है।

यही पांडववाड़ा जमीन जिहाद का शिकार हो चुका है। यहां मस्जिद और मदरसा बना दिया हैं। इस जिहाद के विरुद्ध जलगांव के हिंदू 1980 के दशक से ही संघर्ष कर रहे हैं, किंतु गत मई महीने से यह मामला अधिक चर्चा में है। इस वर्ष 26 जनवरी को जलगांव के हिंदुओं ने पांडववाड़ा को कट्टर मजहबी तत्वों के चंगुल से मुक्त कराने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया। फिर एक सामाजिक कार्यकर्ता प्रसाद मधुसूदन दंडवते की अध्यक्षता में ‘पांडववाड़ा संघर्ष समिति’ का गठन हुआ। इस समिति ने 18 मई को जलगांव के जिलाधिकारी अमन मित्तल को एक पत्र दिया। इसमें कहा गया है कि पांडवावाड़ा पर मुसलमानों ने अवैध कब्जा कर रखा है।

जिलाधिकारी ने जुम्मा मस्जिद ट्रस्ट से कागजात मांगे, लेकिन मस्जिद के लोग पांडववाड़ा से संबंधित कागजात नहीं दिखा पाए। प्रसाद मधुसूदन दंडवते कहते हैं, ‘‘ट्रस्ट के पास केवल भूखंड संख्या 315,318 और 320 के कागजात हैं। उनके पास भूखंड संख्या 1100, जहां पांडववाड़ा स्थित है, के कागजात नहीं हैं। इसलिए वे जिलाधिकारी को कागज नहीं दिखा पाए। यही कारण है कि 11 जुलाई को जलगांव के जिलाधिकारी ने पांडववाड़ा की कथित मस्जिद में नमाज पढ़ने से रोक लगा दी।’’ इस रोक को हटाने के लिए मस्जिद ट्रस्ट ने मुम्बई उच्च न्यायालय की औरंगाबाद पीठ में एक याचिका दायर की। न्यायमूर्ति आर.एम. जोशी की एकल पीठ ने 18 जुलाई को जिलाधिकारी के आदेश पर दो हफ्ते के लिए रोक लगाते हुए दोनों पक्षों को नोटिस जारी किया है।

ऐसे किया कब्जा

सरकारी कागजातों के अनुसार भूखंड संख्या 1100 में पांडववाड़ा स्थित है। इस समय पूरे पांडववाड़ा पर ‘जुम्मा मस्जिद ट्रस्ट’ का कब्जा है। हिंदुओं का कहना है कि इस कब्जे के लिए ट्रस्ट के लोगोें ने बड़ी चालाकी से काम किया। पांडववाड़ा के पीछे जीर्णशीर्ण अवस्था में एक ढांचा था, जिसे कुछ मुसलमान ‘जुम्मा मस्जिद’ बताकर वहां नमाज पढ़ने लगे। सरकारी दस्तावेज बताते हैं कि 1880 में भारी वर्षा के कारण वह ढांचा ढह गया। इसके बाद 2 फरवरी, 1880 को सरकारी वकील चिंतामन विष्णु खरे (उस समय सरकारी वकील को जमीन पट्टे पर देने का अधिकार था) और कुछ मुसलमानों के बीच एक करार हुआ। एक रुपए के स्टांप पेपर पर हुए इस करार के अनुसार मुसलमानों को वह स्थल 25 साल की अवधि यानी 1905 तक के लिए पट्टे पर दिया गया। इसके लिए प्रतिवर्ष दो रुपए किराया तय हुआ था।

मुसलमानों ने वायदा किया कि उस जगह पर केवल चारा, लकड़ी आदि सामग्री रखी जाएगी, लेकिन मुसलमानों ने वहां की कई ऐतिहासिक संरचनाएं नष्ट कर दीं। पत्थर के नक्काशीदार खंभों को नुकसान पहुंचाया गया। उस समय ए.एस.आई. ने घोर आपत्ति दर्ज की। दंड से बचने के लिए मुसलमानों ने लिखित माफी भी मांगी। इसके बाद 1905 में जैसे ही पट्टे की अवधि समाप्त हुई तो ए.एस.आई. ने वहां अपना बोर्ड लगाया, जिस पर लिखा गया, ‘‘यहां किसी भी तरह का निर्माण करना या फिर तोड़-फोड़ करना दंडनीय अपराध है। जो ऐसा करेगा उस पर 200 रु. का जुर्माना लगाया जाएगा।’’ इसके बाद वहां से सभी को निकालकर मुख्य दरवाजे पर ताला जड़ दिया गया।

12 फरवरी, 1922 को भी जलगांव नगरपालिका ने इस स्थान की जांच की और सब कुछ ठीक पाया। माना जाता है कि इसके बाद कुछ जमीन जिहादियों ने इस जगह पर कब्जा करने के लिए एक षड्यंत्र रचा। पांडववाड़ा से लगभग चार किलोमीटर दूर खेती की जमीन (भूखंड संख्या 315, 318 और 320) पर अवैध रूप से एक मकान बनाया। उन मुसलमानों ने 1927 में जलगांव के तत्कालीन जिलाधिकारी मोहम्मद शाह को एक तकरीर के लिए बुलाया। उन्होंने उन मुसलमानों से कहा कि ऐसे अवैध निर्माण से तो कभी भी हटा दिए जाओगे। इसके लिए एक ट्रस्ट बनाओ। फिर मुसलमानों ने ‘जुम्मा मस्जिद ट्रस्ट’ बनाया। बाद में भूखंड संख्या 315,318 और 320 को उस ट्रस्ट के नाम कर दिया गया। यानी कानूनी रूप से ‘जुम्मा मस्जिद ट्रस्ट’ इन्हीं तीन भूखंडों का मालिक है।

हिंदू जनजागृति समिति के राष्ट्रीय प्रवक्ता रमेश शिंदे ने बताया कि महाराष्ट्र सरकार ने 19 फरवरी, 1977 को पांडव वाड़ा को संरक्षित स्मारक घोषित किया और यह सहायक निदेशक, पुरातत्व विभाग, नासिक कार्यालय के अधिकार क्षेत्र में है। 

इस ट्रस्ट की आड़ में मुसलमानों ने पांडववाड़ा पर कब्जा करना शुरू किया। स्वतंत्रता की प्राप्ति के बाद कब्जे की गति तेज हुई। सेकुलर सरकारों ने उन्हें रोकने की हिम्मत कभी नहीं जुटाई। परिणाम यह हुआ कि पांडवपाड़ा जैसे ऐतिहासिक स्थल पर मस्जिद और मदरसे का निर्माण हो गया। वजूखाना और शौचालय भी बन गए। इतना होने के बाद भी सरकारी स्तर पर इस कब्जे को हटाने के लिए कुछ नहीं किया गया। इस कारण जलगांव के कुछ हिंदुओं ने पांडववाड़ा को अतिक्रमण-मुक्त करने की मांग की। इसका असर यह हुआ कि 1985 में सरकार ने पांडववाड़ा को सभी लोगों के लिए खोल दिया। मुसलमानों ने इसका विरोध किया। इसके बाद जलगांव के कुछ हिंदुओं ने पांडववाड़ा को पूरी तरह कब्जा-मुक्त कराने के लिए आंदोलन चलाया।

1987 में हिंदुओं ने प्रसाद मधुसूदन दंडवते के नेतृत्व में संबंधित विभागों को आवेदन देकर पांडववाड़ा को अतिक्रमण-मुक्त करने का आग्रह किया। यानी पांडववाड़ा को कब्जा-मुक्त कराने के लिए 1987 से ही आंदोलन चल रहे हैं।

हिंदू जनजागृति समिति के राष्ट्रीय प्रवक्ता रमेश शिंदे ने बताया कि महाराष्ट्र सरकार ने 19 फरवरी, 1977 को पांडव वाड़ा को संरक्षित स्मारक घोषित किया और यह सहायक निदेशक, पुरातत्व विभाग, नासिक कार्यालय के अधिकार क्षेत्र में है।

Topics: algaon in Maharashtradiscussion of land jihadPandavwadaEranvel or Arunavati to ErandolJumma Masjidहिंदू जनजागृति समितिमहाराष्ट्र के जलगांवजमीन जिहाद की चर्चापांडववाड़ाएरंडोल को एरानवेल या अरुणावतीजुम्मा मस्जिद
अरुण कुमार सिंह
अरुण कुमार सिंह
समाचार संपादक, पाञ्चजन्य | अरुण कुमार सिंह लगभग 25 वर्ष से पत्रकारिता में हैं। वर्तमान में साप्ताहिक पाञ्चजन्य के समाचार संपादक हैं। [Read more]
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