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लथपथ लोकतंत्र

पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव के लिए हुए मतदान में जमकर हिंसा हुई। मतदान समाप्त होने तक 16 की मौत से कुल 45 से ज्यादा लोग चुनावी हिंसा की भेंट चढ़ चुके थे। राज्य सरकार और राज्य चुनाव आयोग जहां बचाव की मुद्रा में दिखे, वहीं विपक्ष ने लोकतंत्र को बदरंग करने के लिए तृणमूल को दोषी ठहराया है

Written byसंतोष मधुपसंतोष मधुप
Jul 19, 2023, 04:22 pm IST
inभारत, विश्लेषण, पश्चिम बंगाल
पुलिस ने एक स्थानीय उपद्रवी के घर तलाशी अभियान चलाया।

पुलिस ने एक स्थानीय उपद्रवी के घर तलाशी अभियान चलाया।

जब देश के अन्य हिस्सों में बादल बरस रहे थे, तब पूर्वी राज्य पश्चिम बंगाल में बम और गोलियों की बरसात हो रही थी। हो भी क्यों न, मौका भी था और वहां राजनीति का चलन भी। मौका था पंचायत चुनाव के लिए मतदान का और बंगाल में किसी भी स्तर के मतदान में मार-काट का पुराना दस्तूर रहा है।

आठ जुलाई 2023 को जब देश के अन्य हिस्सों में बादल बरस रहे थे, तब पूर्वी राज्य पश्चिम बंगाल में बम और गोलियों की बरसात हो रही थी। हो भी क्यों न, मौका भी था और वहां राजनीति का चलन भी। मौका था पंचायत चुनाव के लिए मतदान का और बंगाल में किसी भी स्तर के मतदान में मार-काट का पुराना दस्तूर रहा है। हिंसा बंगाल की चुनावी राजनीति में किस कदर रच-बस गई है, पंचायत चुनाव में इसका एक और भयावह उदाहरण सामने आया।

सुबह से शुरू हुआ खूनी खेल मतदान समाप्त होने के बाद जब शांत हुआ तब तक 16 लोग हिंसा की भेंट चढ़ चुके थे जिससे चुनावी प्रक्रिया में जान गंवाने वालों की संख्या 45 से अधिक हो चुकी थी। सैकड़ों लोग घायल हुए। पूरे दिन हर तरफ भय, तनाव और अव्यवस्था का माहौल रहा। उच्च न्यायालय की निगरानी, राज्यपाल का हिंसा मुक्त चुनाव का आश्वासन, चुनाव आयोग के बड़े-बड़े दावे, केंद्रीय बलों की 822 कंपनियों की तैनाती, सब धरे रह गये। मतदान के दौरान जिस तरह दिनभर खून-खराबे का सिलसिला चला, उसने लोकतंत्र का उत्सव कही जाने वाली चुनावी प्रक्रिया को न सिर्फ कलंकित किया बल्कि एक बार फिर यह साबित हो गया कि पश्चिम बंगाल में निष्पक्ष और शांतिपूर्ण मतदान करा पाना कदाचित संभव ही नहीं है।

चुनाव की घोषणा के बाद से मतदान की प्रक्रिया शुरू होने तक राज्य भर में जमकर हिंसा हुई, उसे देखते हुए इस बात का पूरा अंदेशा था कि मतदान के दौरान भी खून-खराबा होगा लेकिन कलकत्ता उच्च न्यायालय और राज्यपाल की सक्रियता तथा केंद्रीय बलों की तैनाती से आम मतदाताओं में शांतिपूर्ण मतदान की हल्की उम्मीद जगी। परंतु 8 जुलाई की सुबह मतदान शुरू होते ही यह उम्मीद धराशायी हो गयी। वाम मोर्चा और तृणमूल कांग्रेस से जुड़े अपराधी जिस तरह मीडिया के कैमरों के सामने बंदूकें लहराते और बम उड़ाते नजर आये, उससे स्पष्ट हो गया कि हर बार की तरह इस बार भी हिंसा फैलाने की तैयारी काफी पहले से की जा रही थी।

मतदाताओं में खौफ पैदा करने के लिए परंपरागत तरीके से पर्याप्त मात्रा में बम और गोला-बारूद जमा किया गया था। तृणमूल कांग्रेस ने सत्ता का लाभ लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सिर्फ पुलिस प्रशासन ही नहीं, बल्कि चुनाव प्रक्रिया का संचालन करने वाले राज्य चुनाव आयुक्त तक सत्ता के प्रति वफादार बने रहने की कोशिश में लगे रहे। सुरक्षा के इंतजाम इस तरह से किये गये कि सत्तारूढ़ पार्टी के लोगों को मनमानी करने की पूरी सहूलियत मिल सके। केंद्रीय बलों की तैनाती महज उपस्थिति दर्ज कराने तक सीमित होकर रह गई। फर्जी मतदान, बूथ पर कब्जे, विपक्षी समर्थकों को मतदान से वंचित रखने जैसी घटनाओं की भरमार से एक बार फिर लोकतंत्र का उत्सव प्रहसन बन कर रह गया। मतदान के दौरान राज्यभर में सौ से अधिक स्थानों पर हिंसा हुई।

सुबह सात बजे मतदान शुरू होते ही मुर्शिदाबाद जिले से तीन लोगों की हत्या की खबर आई। उसके बाद मालदा में तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता की हत्या हुई। कूचबिहार के दिनहटा में भाजपा कार्यकर्ता को मौत के घाट उतार दिया गया जबकि नदिया, बर्दवान, उत्तर एवं दक्षिण 24 परगना में भी मारपीट और हत्या की घटनाएं सामने आती रहीं।

विपक्ष ने बोला हमला

विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष शुवेंदु अधिकारी ने केंद्रीय बलों के संयोजक बीएसएफ के आईजी एसएस गुलेरिया को पत्र लिखकर नाराजगी जाहिर की और कहा कि उच्च न्यायालय ने सभी मतदान केंद्रों पर केंद्रीय बलों की तैनाती का निर्देश दिया था, जिसका अनुपालन नहीं हुआ। यह न्यायालय की अवमानना है। उन्होंने राज्य चुनाव आयुक्त राजीव सिन्हा को ममता का ‘सुपारी किलर’ करार दिया और कहा कि उन्होंने जितनी अवैध संपत्ति एकत्रित की है, उसकी सूची उनके पास है। इसका हिसाब-किताब आगे करेंगे। उन्होंने चुनाव आयोग के दफ्तर में ताला लगाने की चेतावनी दी। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि जिस तरह से राज्य में हिंसा की घटनाएं हुई हैं, वे दिल दहलाने वाली हैं। उन्होंने केंद्रीय बल और राज्य पुलिस दोनों को आड़े हाथों लिया। माकपा नेता मोहम्मद सलीम ने कहा कि जगह-जगह हमले और हिंसा की घटनाओं ने स्पष्ट कर दिया है कि पश्चिम बंगाल में चुनाव नहीं हुआ है बल्कि लोकतंत्र का मजाक बनाया गया है।

जिम्मेदारियों से बचते रहे चुनाव आयुक्त

उधर राज्य चुनाव आयुक्त राजीव सिन्हा मतदान शुरू होने के तीन घंटे बाद दफ्तर पहुंचे। उनके पहुंचने से पहले राज्य चुनाव आयोग के दफ्तर में लगे दसियों फोन लगातार बजते रहे, लेकिन शिकायतें नहीं सुनी गईं। चुनाव आयुक्त हिंसा और अव्यवस्था के लिए कभी राज्य पुलिस तो कभी केद्रीय बलों को जिम्मेदार ठहराते रहे।

हिंसा की घटनाओं के लिए केंद्रीय बलों पर ठीकरा फोड़ते हुए राजीव सिन्हा ने कहा कि केंद्रीय बलों की तैनाती के लिए हमने केंद्रीय गृह मंत्रालय को 25 जून को ही पत्र दे दिया था। कायदे से 27 जून को केंद्रीय बलों की तैनाती हो जानी चाहिए थी, लेकिन उसमें काफी देरी हुई। अगर केंद्रीय बलों के जवान समय पर आ गये होते तो हिंसा की इन घटनाओं को रोका जा सकता था। हालांकि बीएसएफ की रिपोर्ट आने के बाद स्पष्ट हो गया कि राज्य चुनाव आयोग ने केंद्रीय बलों को न तो संवेदनशील बूथों की जानकारी दी और न ही तैनाती स्थल की। बार-बार पूछने पर आयोग ने डीसी-एसपी से संपर्क करने को कहा। डीसी-एसपी ने जवानों को जहां तैनात होने को कहा, वहां जवान तैनात कर दिये गये।

मतदान आरंभ होते ही मतपत्रों की लूट की घटनाएं सामने आने लगीं। महज दो घंटे के भीतर पांच लोगों की मौत हो गई। इनमें चार तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ता थे, जबकि एक भाजपा समर्थक था। इसके अलावा गोलीबारी में इंडियन सेकुलर फ्रंट (आईएसएफ) के दो और कांग्रेस का एक कार्यकर्ता घायल हो गया।

जिन जिलों में सबसे अधिक हिंसा हुई, उनमें मुर्शिदाबाद, दक्षिण 24 परगना, नदिया, मालदा एवं कूचबिहार शामिल हैं। मुर्शिदाबाद के बेलडांगा थाना अंतर्गत कपासडांगा षष्टीतला इलाके में मतदान शुरू होने के साथ ही कांग्रेस और तृणमूल कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़प होने लगी। इस दौरान हुई गोलीबारी में तृणमूल कार्यकर्ता बाबर अली की मौत हो गई जबकि पार्टी का एक अन्य कार्यकर्ता फूलचंद शेख गंभीर रूप से घायल हो गया। इसी जिले के रेजीनगर थाना क्षेत्र के नजीरपुर इलाके में तृणमूल कार्यकर्ता यासीन शेख को बम से उड़ा दिया गया जबकि खड़ग्राम में एक खाली जमीन पर तृणमूल समर्थक शरीफुद्दीन शेख का शव बरामद हुआ। इन तीनों की हत्या के आरोप माकपा और कांग्रेस पर लगे।

पंचायत चुनाव 2023 : इस्लामपुर में तृणमूल कांग्रेस और स्वतंत्र उम्मीदवार के समर्थकों के बीच झड़प में घायल कार्यकर्ता।

कूचबिहार दक्षिण विधानसभा के फालामारी ग्राम पंचायत इलाके में मतदान केंद्र के अंदर बमबारी में भाजपा के पोलिंग एजेंट माधव विश्वास की जान चली गयी। यहां भी कई पुलिसकर्मी और पीठासीन अधिकार गंभीर रूप से घायल हो गए। भारी हिंसा के बीच इस मतदान केन्द्र को आग के हवाले कर दिया गया। मालदा के मानिकचक गोपालपुर ग्राम पंचायत इलाके में एक तृणमूल कार्यकर्ता की गोली मारकर हत्या कर दी गई। हत्या का आरोप कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर लगा। यहां कांग्रेस और तृणमूल के बीच हुई झ़ड़पों में आठ लोग घायल हुए। दक्षिण 24 परगना के भांगड़ में इंडियन सेक्युलर फ्रंट (आईएसएफ) और तृणमूल कार्यकर्ताओं के बीच संघर्ष हुआ जिसमें आईएसएफ के दो कार्यकर्ताओं को गोली मार दी गयी।

खौफनाक माहौल के चलते दोपहर एक बजे तक महज 36.37 प्रतिशत मतदान हो पाया था। इस दौरान हिंसा के कुछ वीडियो सामने आए, जिनमें कहीं आपराधिक तत्व बैलेट बॉक्स लेकर भागते नजर आ रहे थे तो कहीं पुलिसकर्मी नाले या तालाब के अंदर से बैलट बॉक्स निकालते दिखे।

राज्यपाल ने उठाए सवाल

मतदान के दौरान हिंसा की सूचना मिलने के बाद राज्यपाल डॉ. सीवी आनंद बोस भी राजभवन से निकले और बैरकपुर होते हुए मुर्शिदाबाद और अन्य क्षेत्रों में जाकर मतदान प्रक्रिया का अवलोकन किया और हिंसा पीड़ित लोगों से मुलाकात की। उन्होंने हिंसक घटनाओं पर चिंता जताते हुए प्रशासन को हिंसा करने वालों पर कार्रवाई का आदेश दिया।

हिंसक तृणमूल का झूठ

सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा, माकपा और कांग्रेस के साथ-साथ राज्यपाल पर भी हिंसा को बढ़ावा देने का आरोप लगाया। राज्य की मंत्री शशि पांजा ने दावा किया कि राज्यभर में 61 हजार से अधिक मतदान केंद्रों में से केवल 7 से 8 मतदान केन्द्रों पर भारी और करीब 60 केंद्रों पर थोड़ी-बहुत हिंसा हुई है। बाकी सब जगह ‘शांतिपूर्वक’ चुनाव हुए हैं। शशि पांजा ने कहा कि सबसे अधिक तृणमूल के लोग मारे गये हैं। जाहिर सी बात है कि हिंसा भड़काई गई थी। उन्होंने केंद्रीय बलों पर भी लोगों को धमकाने का आरोप लगाया।

पुलिस ने एक स्थानीय उपद्रवी के घर तलाशी अभियान चलाया।

बढ़ती जा रही है भाजपा

पश्चिम बंगाल पंचायत चुनाव में नामांकन के समय से ही शुरू हुई हिंसा के अनुरूप नतीजे भी आये हैं। राज्य में कुल 63,229 ग्राम पंचायत सीटें हैं। इनमें तृणमूल कांग्रेस ने साढ़े 35 हजार से अधिक सीटें जीती हैं। पिछली बार 2018 में तृणमूल को 38118 सीटें मिली थीं। भाजपा ने दूसरे स्थान पर रहते हुए 9877 सीटें जीती हैं। पिछली बार भाजपा को 5779 सीटें मिली थीं। पंचायत समिति की 9730 सीटों में से तृणमूल साढ़े छह हजार से अधिक सीटें जीत चुकी है। भाजपा ने 1038 सीटों पर जीत हासिल की है। पिछली बार तृणमूल को 8062 सीटें और भाजपा को 769 सीटें मिली थीं। राज्य में जिला परिषद की कुल 928 सीटें हैं। तृणमूल ने इनमें से 880 सीटों पर जीत हासिल की है। भाजपा ने 31 सीटें जीती हैं। पिछली बार तृणमूल को 793 और भाजपा को 22 सीटें मिली थीं।

नतीजे बताते हैं कि भाजपा ने पिछली बार के मुकाबले इस बार ग्राम पंचायत चुनाव में लगभग दोगुनी सीटें और पंचायत समिति में लगभग डेढ़ गुना सीटें हासिल की हैं। जिला परिषद में भी भाजपा की सीटें लगभग डेढ़ गुना हो गई हैं।

मतदान के बाद भी जारी रही हिंसा

मतदान खत्म होने के बाद राज्य के कई हिस्सों में रातभर हिंसा हुई। एक जगह तो मतदान पेटी खोलकर धांधली की गयी। नदिया, बांकुड़ा, उत्तर और दक्षिण 24 परगना, कूचबिहार, मुर्शिदाबाद, मालदा और हावड़ा जिलों में भाजपा, माकपा और कांग्रेस कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया गया। हावड़ा के जगत बल्लभपुर विधानसभा अंतर्गत पार्वतीपुर ग्राम पंचायत में निर्दलीय उम्मीदवार शेख इस्लाम के घर देर रात सत्तारूढ़ पार्टी के समर्थक घुस गये और तोड़फोड़ कर आग लगा दी। मालदा के गाजोल में स्थानीय बीडीओ के नेतृत्व में मतदान पेटी को स्ट्रांग रूम में ले जाने से पहले ही खोलकर खाली कर दिया गया और पहले से छापकर रखे गये बैलेट पेपर पर तृणमूल उम्मीदवारों के नाम के आगे मुहर लगाकर हिंसा की। आसनसोल के मयूरेश्वर में पुलिस ने भाजपा कार्यकर्ताओं के घरों में घुसकर मारपीट और तोड़फोड़ की।

पंचायत चुनाव 2023 : कुलताली में तृणमूल कांग्रेस के एक कार्यकर्ता का शव पाया गया।

मतदान के दौरान हुई व्यापक हिंसा का मामला उच्च न्यायालय पहुंच चुका है। नेता प्रतिपक्ष शुवेंदु अधिकारी एवं कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी ने अलग-अलग याचिकाएं दाखिल कर हिंसा की निष्पक्ष जांच और पीड़ितों के लिये मुआवजे की मांग की है। हिंसा का सिलसिला अभी तक थमा नहीं है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक उम्मीद अनुरूप सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस भारी जीत की ओर अग्रसर थी। सत्ता की ताकत के दम पर हासिल की गयी जीत से इसके कार्यकर्ताओं में उत्साह जरूर है लेकिन पार्टी नेतृत्व इससे अधिक आश्वस्त नहीं हो सकेगा। उसे विपक्ष, खासकर भाजपा के बढ़ते जनाधार की चिंता जरूर हो रही होगी। बहरहाल, ग्रामीण पश्चिम बंगाल पर वर्चस्व कायम करने की जंग में जीत भले ही किसी की हो, लेकिन रक्तरंजित चुनावी प्रक्रिया ने एक बार फिर लोकतांत्रिक मूल्यों को पराजित कर दिया है।

Topics: तृणमूल कांग्रेस ने सत्ता का लाभMurshidabad districtपश्चिम बंगालTrinamool workersतृणमूल कांग्रेसruling partyTrinamool CongressSharifuddin ShaikhWest BengalTrinamool Congress gains powerसत्तारूढ़ पार्टीsoaked democracyलोकतंत्रतृणमूल कार्यकर्तामुर्शिदाबाद जिलेशरीफुद्दीन शेख
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