उत्तराखंड : 5 मई को खुलेंगे भगवती नंदा के धर्म भाई लाटू देवता के कपाट
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उत्तराखंड : 5 मई को खुलेंगे भगवती नंदा के धर्म भाई लाटू देवता के कपाट

भगवान लाटू ही वाण गांव से नंदा देवी राजजात यात्रा की अगुवाई करते हैं। कहते हैं यहां से मांगी मनोकामना जरूर पूरी होती है।

Written byसंजय चौहानसंजय चौहान
Apr 30, 2023, 10:41 am IST
in भारत, उत्तराखंड, धर्म-संस्कृति

हिमालय की गोद में सीमांत जनपद चमोली के देवाल ब्लाक में 8 हजार फीट की ऊंचाई में बसा बेहद खूबसूरत हिमालय का अंतिम गांव है वाण। जहां सिद्ध पीठ लाटू देवता का पौराणिक मंदिर है। मंदिर समिति, पुजारी, कुल पुरोहित और ग्रामीण की उपस्थिति में लाटू देवता के कपाट खुलने का दिन तय हुआ है। आगामी 5 मई को बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर मंदिर के कपाट आगामी 6 माह के लिए आम श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाएंगे। जिसके बाद श्रद्धालु 6 महीने तक लाटू देवता की पूजा अर्चना कर सकेंगे।

देवताओं का देव नृत्य और महिलाओं का पारम्परिक लोकनृत्य होता है आकर्षण का केंद्र

लाटू मंदिर के कपाट खुलने पर देवनृत्य करते देवताओं के पश्वा मुख्य आकर्षण का केंद्र होते हैं। वहीं यहां पर श्रद्धालुओं और महिलाओं द्वारा पारम्परिक परिधानों/आभूषणों में मां नंदा और लाटू देवता के लोकगीत और जागरों के संग झोडा, चांचणी लोकनृत्य हर किसी को मंत्रमुग्ध कर देता है। यहां के लोग सालों से चली आ रही अपनी परम्पराओं का पीढ़ी दर पीढ़ी बखूबी निर्वहन करते हैं। लाटू मंदिर के लाटू देवता के प्रति अटूट आस्था की बानगी है कि दूर-दूर से श्रद्धालुओं का इस मंदिर में तांता लगा रहता है। हिमालयी महाकुंभ नंदा देवी राजजात यात्रा का ये आखिरी पड़ाव है, जहां आबादी है इसके बाद निर्जन पड़ाव शुरू हो जाते हैं। वाण गांव रूपकुंड, बेदनी बुग्याल और आली बुग्याल का बेस कैंप है।

ये है मान्यता

कहते हैं कि भक्त की एक ही पुकार पर भगवान दौड़े चले आते हैं, लेकिन भगोती नंदा के धर्म भाई एवं भगवान शिव के साले लाटू की माया ही निराली है। लाटू देवाल क्षेत्र (चमोली) के ऐसे देवता हैं, जिनके दर्शन भक्त तो दूर, खुद पुजारी भी नहीं कर सकता। मंदिर के कपाट बैसाख के महीने पूर्णिमा को खुलते हैं और 6 माह बाद मंगशीर्ष पूर्णिमा को बंद कर दिए जाते हैं। मंदिर के अंदर क्या है, किसी को नहीं मालूम। लाटू देवता पूरे पिंडर/दशोली(आंशिक) क्षेत्र के ईष्टदेव हैं। माना जाता है कि लाटू कन्नौज के गर्ग गोत्र के कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे। जब शिव के साथ नंदा का विवाह हुआ तो बहन को विदा करने सभी भाई कैलाश की ओर चल पड़े। इनमें लाटू भी शामिल थे। मार्ग में लाटू को इतनी प्यास लगी कि वह पानी के लिए इधर-उधर भटकने लगे। इस बीच उन्हें एक घर दिखा और वो पानी की तलाश में इस घर के अंदर पहुंच गए। घर का मालिक बुजुर्ग था, सो उसने लाटू से कहा कि कोने में रखे मटके से खुद पानी पी लो।

संयोग से वहां दो मटके रखे थे, लाटू ने उनमें से एक को उठाया और पूरा पानी गटक गए। प्यास के कारण वह समझ नहीं पाए कि जिसे वह पानी समझकर पी गए, असल में वह मदिरा थी। कुछ देर में मदिरा ने असर दिखाना शुरू कर दिया और वह उत्पात मचाने लगे। इसे देख नंदा क्रोधित हो गईं और लाटू को कैद में डाल दिया। जहां भगवान लाटू कैद में रहे कालांतर में वही स्थान उनके मंदिर के रूप में प्रसिद्ध हुआ। पौराणिक लोकगीतों और जागरों में माना जाता है कि एक बार भगवती नंदा और उनके साथ कैलाश जानें वाले लोग वाण से आगे रणकधार से कैलाश जाने का रास्ता भटक जाते हैं, जिसके बाद मां भगवती लाटू का स्मरण करती हैं और आगे जाने का रास्ता प्रशस्त हो पाता है। तत्पश्चात मां भगवती लाटू भगवान से आग्रह करती हैं कि जब भी 12 साल में वो कैलाश को जाएंगी तो वाण से आगे लाटू भगवान ही कैलाश तक उनकी यात्रा की अगुवाई करेंगे। तब से लेकर आज तक वाण गांव से नंदा देवी राजजात यात्रा की अगुवाई भगवान लाटू ही करते हैं। दूर-दूर से श्रद्धालु अपनी मनोकामना लेकर लाटू के मंदिर में आते हैं। कहते हैं यहां से मांगी मनोकामना जरूर पूरी होती है।

भाई- बहन के मिलन से छलछला उठती हैं आंखे

हिमालयी महाकुंभ नंदा देवी राजजात यात्रा में 12 साल बाद जब नंदा मायके (कांसुवा) से ससुराल (कैलाश) जाते हुए वाण पहुंचती हैं, तब इस दौरान नंदा का अपने धर्म भाई लाटू से भावपूर्ण मिलन होता है। इस दृश्य को देख यात्रियों की आंखें छलछला उठती हैं।  यहां से लाटू की अगुआई में चौसिंग्या खाडू के साथ राजजात होमकुंड के लिए आगे बढ़ती हैं, लेकिन वाद्य यंत्र राजजात के साथ नहीं जाते। वहीं मान्यता है कि वाण में ही लाटू सात बहनों (देवियों) को एक साथ मिलते हैं। यहीं पर दशौली (दशमद्वार की नंदा), बंड भूमियाल की छंतोली, लाता पैनखंडा की नंदा, बद्रीश रिंगाल छंतोली और बधाण क्षेत्र की तमाम भोजपत्र छंतोलियों का मिलन होता है। अल्मोड़ा की नंदा डोली व कोट (बागेश्वर) की श्री नंदा देवी असुर संहारक कटार (खड्ग) वाण में राजजात से मिलन के पश्चात वापस लौटती है।

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