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होम भारत

बहुत गहरी साजिश है पत्थरबाजी

भारत में मुसलमानों में यह डर हमेशा रहा है कि मजहब के लोग दोबारा हिंदू वातावरण में सम्मिलित न हो जाएं। देवबंद की स्थापना भी इसीलिए हुई थी। 1857 के युद्ध के बाद मौलवियों की मान्यता थी कि वे मुगल राज पुन: स्थापित करने में असफल हुए, क्योंकि मुसलमानों पर हिंदू धर्म का असर काफी बढ़ गया था

Written byआर.एस.एन. सिंहआर.एस.एन. सिंह
Apr 12, 2023, 08:30 am IST
in भारत, विश्लेषण, दिल्ली
दिल्ली दंगों में मुसलमानों ने पत्थर फेंकने के लिए छतों पर गुलेल लगाए थे

दिल्ली दंगों में मुसलमानों ने पत्थर फेंकने के लिए छतों पर गुलेल लगाए थे

पत्थरबाजी की ऐसी ही घटना राजस्थान के करौली जिले में हिंदू नववर्ष की यात्रा के दौरान घटी थी। यह यात्रा सात साल बाद पुन: निकाली गई थी। गौर करने वाली बात है कि ये घटनाएं भारत की हर दिशा और हर भू-क्षेत्र में हुई। इनका स्वरुप भी एक जैसा था। कौन कहता है कि भारत विविधताओं का देश है! जिहादी लक्ष्य, जिहादी मिजाज और जिहादी तौर-तरीका पूरे देश में एक जैसा है। ऐसी जिहादी एकता तो पाकिस्तान में भी नहीं है।

आरएसएन सिंह

अभी रमजान के दौरान हिंदुओं की रामनवमी शोभायात्रा पर देश के कई जगहों में मुसलमानों के द्वारा पथराव की कई घटनाएं हुई हैं। ये घटनाएं विशेष तौर पर गुजरात, पश्चिम बंगाल, बिहार, मध्य प्रदेश और कर्नाटक में हुई। हाल ही में पत्थरबाजी की ऐसी ही घटना राजस्थान के करौली जिले में हिंदू नववर्ष की यात्रा के दौरान घटी थी। यह यात्रा सात साल बाद पुन: निकाली गई थी। गौर करने वाली बात है कि ये घटनाएं भारत की हर दिशा और हर भू-क्षेत्र में हुई। इनका स्वरुप भी एक जैसा था। कौन कहता है कि भारत विविधताओं का देश है! जिहादी लक्ष्य, जिहादी मिजाज और जिहादी तौर-तरीका पूरे देश में एक जैसा है। ऐसी जिहादी एकता तो पाकिस्तान में भी नहीं है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पूरा दोषारोपण हिंदुओं पर किया। उन्होंने कहा कि रमजान के पवित्र महीने में मुसलमान कोई हिंसात्मक कार्यवाही कर ही नहीं सकते। एक मुख्यमंत्री, जिसके राज्य में 2.5 करोड़ या 28 प्रतिशत मुस्लिम हों, वह वास्तविकता से कितनी अनभिज्ञ हो सकती है?

रमजान में जिहाद
मुख्यमंत्री को यह मालूम होना चाहिए कि इस्लामी ग्रंथों के मुताबिक रमजान में जिहाद का विशेष महत्व है। इस्लामी इतिहास और मजहब में बद्र की लड़ाई की बहुत ज्यादा अहमियत है। इस लड़ाई में मोहम्मद की 300 मुस्लिम सेना ने मक्का के कुरैश कबीले की हजार से ज्यादा बड़ी सेना को पराजित किया था। यह हमला मक्का के एक बड़े कारवां को लूटने के लिए किया गया था। यह हमला रमजान में मोहम्मद के संचालन में हुआ था। 1629 में रमजान के समय ही मुसलमानों का मक्का पर कब्जा हुआ था। रमजान में ही मोहम्मद के अधीन 30,000 की बड़ी सेना ने बाइजेंटाइन पर कब्जा किया। 1187 का दौर क्रूसेड्स का था और उस रमजान में मुसलमानों ने जेरूसलम पर कब्जा किया। 1973 में मिस्र ने इस्राइल पर हमला किया और अरबों को भौंचक्का करने के लिए रमजान का वक्त चुना।

1981 में ईरान-इराक युद्ध के दौरान ईरान ने रमजान में इराक के युद्धविराम की पेशकश को ठुकरा दिया था। 1982 में तो ईरान ने इराक पर रमजान में ही हमला किया और उसे ‘आपरेशन रमजान’ का नाम भी दिया। 16 अगस्त, 1946 को पाकिस्तान बनाने के लिए मुस्लिम लीग द्वारा डायरेक्ट एक्शन डे को कार्यान्वित किया गया। हिंदुओं का कत्लेआम शुरू हुआ, लाखों हिंदू काट दिए गए। वह भी रमजान का समय था और बद्र की लड़ाई की तारीख पर शुरू किया गया था। मुस्लिम लीग ने अपने पैम्फलेट में रमजान का वास्ता देकर बंगाल के मुसलमानों का जिहाद के लिए आह्वान किया था। भारत में अलग-अलग सरकारों ने कश्मीर में कई बार रमजान के समय सीजफायर की पेशकश की थी, हालांकि जिहादियों ने उसे ठुकरा दिया था।

टू-नेशन थ्योरी
अगर रमजान को जिहाद के लिए शुभ अवधि माना जाता है, तो पत्थरबाजी को जिहाद का शुभ तरीका। तीन स्तंभ के रूप में स्थित काल्पनिक शैतान पर पत्थर मारना हज की अनिवार्य धार्मिक क्रिया है। इसका मनोवैज्ञानिक असर मुसलमानों पर यह होता है कि वह काफिर को शैतान मानने लगते हैं और काफिरों की धार्मिक गतिविधिओं को शैतानी हरकत। रामनवमी यात्रा को भी वे शैतानी परम्परा समझते हैं और इसलिए जहां भी सहूलियत होती है, उस पर पथराव करते हैं। सबसे ज्यादा सहूलियत उनको मुस्लिम बहुल इलाकों में मिलती है। इसीलिए ममता बनर्जी ने मुस्लिम बहुल इलाकों से रामनवमी यात्रा ले जाने के लिए हिंदुओं को ही दोषी ठहराया।

जब कोई मुख्यमंत्री अपने राज्य को हिंदू बहुल और मुस्लिम बहुल नजरिए से देखे तो क्या यह ‘टू-नेशन थ्योरी’ की वास्तविकता की स्वीकार्यता नहीं है? हम टू-स्टेट थ्योरी कि नहीं, टू-नेशन थ्योरी की बात कर रहे हैं। उसी टू-नेशन थ्योरी के तहत पाकिस्तान बना। पाकिस्तान, भारतीय उपमहाद्वीप में कोई देश नहीं, बल्कि एक विचार है, एक अवधारणा है। भारत के अंदर का पाकिस्तान 1947 के बाद मरा नहीं, बल्कि उसका विस्तार होता रहा और वह अब अपना जिहादी रूप दिखा रहा है। पॉपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया (पीएफआई) इस विचार, विस्तार और जिहादी रूप का सबसे बड़ा उदाहरण है।

जिहाद का पहलू
रामनवमी यात्रा पर मुसलमानों द्वारा पथराव कोई नई बात नहीं है। इसका उल्लेख कम से कम 18वीं शताब्दी से मिलता है। इसलिए इसे संस्कृतियों का द्वंद्व भी कह सकते हैं। अनुच्छेद 370 हटने से पहले कश्मीर घाटी में सुरक्षाबलों पर पथराव एक आम बात थी। हुर्रियत पत्थरबाजी या संगबाजी का कैलेंडर निकालती थी। संगबाजी को इस्लामी जामा बनाया जाता था। इस संदर्भ में बच्चों और नौजवानों को प्रोत्साहित करने के लिए पाकिस्तान से आए वीडियो वायरल किए जाते थे। छोटे बच्चे भी इस्लामी टोपी लगाकर हाथ में पत्थर लिए दिखते थे। जब भी सुरक्षाबल आतंकवादियों के खिलाफ कार्यवाही करते थे, तब संगबाज उन पर पथराव करते थे। इस तरह वे जिहादी दहशतगर्दों के भागने के लिए अवसर बनाते थे। यह समझना जरूरी है कि संगबाजी भी जिहाद का एक पहलू है। इसलिए देश के विभिन्न हिस्सों में रामनवमी यात्रा पर जो हुआ वह जिहाद था।

सोची-समझी रणनीति
संगबाजी या पत्थरबाजी एक बहुत सोची-समझी जिहादी रणनीति है। एक खास तरह के पत्थरों को इकट्ठा करना, उन्हें फेंकने का प्रशिक्षण देना, उसका नियंत्रित इस्तेमाल करना, यह सब संगबाजी जिहाद का हिस्सा हैं। बिना पूर्व योजना के संगबाजी हो ही नहीं सकती। संगबाजी का सबसे बड़ा फायदा है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में यह सुरक्षाबलों की बंदूकों को निष्क्रिय कर देती है। अगर सुरक्षाबल गोली से जवाब दें, तो यह उनके दुष्प्रचार और मुसलमानों के एकत्रीकरण के लिए बहुत लाभदायक होता है। संगबाजी के कई स्वरूप होते हैं। पहला, जो कश्मीर में देखने को मिला। दूसरा, जो रामनवमी शोभायात्राओं में दिखा और तीसरा, जो हाल के दिल्ली दंगों में, जिसमें कि संगबाजी विशाल गुलेलों के द्वारा की गई थी। गुलेल, जिसे अंग्रेजी में कैटापुल्ट कहते हैं, उसका मोहम्मद की सेना के हथियारों में खास स्थान था।

इस्लाम में पत्थरबाजी
इस्लाम में पत्थरबाजी के द्वारा मौत की सजा उन मर्दों और औरतों के लिए भी निर्धारित है, जो नाजायज संबंध की कसूरवार पाई जाएं। हालांकि कुरान कहता है कि नाजायज संबंध के लिए मर्द और औरत, दोनों के लिए सौ-सौ कोड़े मारे जाएं (24:2)। लेकिन कुछ हदीस का यह मानना है कि मूल कुरान में पत्थरबाजी से मौत की सजा का प्रावधान था, परंतु अमुक पृष्ठ को भूखी बकरी खा गई थी। अल बुखारा हदीस के मुताबिक (1691) अल्लाह ने पैगंबर को संदेश भेजा था कि नाजायज संबंध बनाने वालों को पत्थरबाजी से मार दिया जाए। सहीह मुसलमान हदीस के मुताबिक (1692), एक माइज-इब्न-मलिक को पैगंबर के पास लाया गया। उसने कबूल किया कि उसने जिना यानी कि नाजायज संबंध बनाए, तब पैगंबर ने उसे पत्थरबाजी से मार दिया। पत्थरबाजी से मौत की सजा अभी भी जोर-शोर से कायम है।

दिल्ली दंगे में प्रयुक्त गुलेल। दंगा ग्रस्त इलाकों की सड़कों पर दूर-दूर तक टनों ईंट-पत्थर बिखरे हुए थे

फरवरी 2022 में पाकिस्तान के पंजाब के खानेवाला गांव में 41 वर्ष के मुश्ताक अहमद को कुरान के खिलाफ गुस्ताखी के जुर्म के लिए पत्थरबाजी से मार दिया गया। स्थानीय मस्जिद के मौलवी ने कहा कि उसने मुश्ताक को कुरान जलाते देखा है। पत्थरबाजी के समय जब पुलिस आई, तो उस पर भी पथराव कर भगा दिया गया। फिर पुलिस का एक बड़ा दल भेजा गया, लेकिन तब तक संगबाज अपने शिकार की जान ले चुके थे।

अप्रैल 2019 में ब्रुनेई की शाही हुकूमत ने समलैंगिक और नाजायज संबंध या संभोग के लिए पत्थरबाजी से मौत की सजा निर्धारित की। वहां यही सजा इस्लाम निंदा के लिए पहले से निर्धारित है। अब मलेशिया और इंडोनेशिया के नागरिकों को इस बात का डर है कि ब्रुनेई की शरियत की आग उन तक न पहुंच जाए। उनका डर इस कारण जायज है कि पत्थरबाजी को इस्लाम में एक बहुत ‘पवित्र कर्म’ माना गया है।

यह कहना बिल्कुल गलत है कि एक गुजराती मुसलमान और एक गुजराती हिंदू या एक कश्मीरी हिंदू और एक कश्मीरी मुसलमान, सांस्कृतिक रूप से एक हैं। उनका कहना है कि यह केवल एक मुसलमान की सोच में अस्थाई समझौता है। उनका मानना है कि किन्हीं कारणों से इस्लामीकरण रुक गया था, जो कभी न कभी पूरा होगा। अगर डॉ. आंबेडकर का विश्लेषण गलत रहा होता, तो बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल एक राज्य होते। बांग्लादेश से हिंदुओं का पलायन नहीं होता और कोलकाता में रामनवमी की शोभायात्रा पर बंगाली मुसलमान पत्थरबाजी न करते।

-डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने अपनी किताब ‘थॉट्स आन पाकिस्तान’ 

सबसे बड़ा सवाल
अब सबसे बड़ा सवाल यह उत्पन्न होता है कि रमजान के दौरान रामनवमी की यात्रा पर हिंसा से लाभ किसको मिलता है। इसके उत्तर के लिए हमें गजवा-ए-हिंद के इस्लामिक सिद्धांत पर गौर करना होगा। सभी भारतीय मुसलमान इस सिद्धांत से मजहबी रूप से बंधे हुए हैं। इसकी निंदा या इसके बहिष्कार की सजा शरियत के मुताबिक मौत है। गजवा-ए-हिंद इस्लामिक कट्टरपंथ और ध्रुवीकरण के बिना संभव नहीं है। दारुल हरब से दारुल इस्लाम की यात्रा ध्रुवीकरण के बिना संभव नहीं है। इसके लिए हिंदुओं के खिलाफ समय-समय पर हिंसा अत्यंत आवश्यक है। भारत में मुसलमानों में यह डर हमेशा रहा है कि उनके मजहब के लोग कहीं अतीत की रास्ते पर न चल पड़ें। कहीं हिंदू वातावरण में दोबारा सम्मिलित न हो जाएं। देवबंद की स्थापना भी इसीलिए हुई थी, क्योंकि 1857 के युद्ध के बाद मौलवियों की यही मान्यता थी कि वह मुगल राज पुन: स्थापित करने में इसलिए नाकामयाब हुए, क्योंकि भारत के मुसलमानों पर हिंदू धर्म का असर काफी बढ़ गया था और एक साझा संस्कृति बनती जा रही थी। अहल-ए-हदीस आंदोलन का भी यही कारण था।

डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने अपनी किताब ‘थॉट्स आन पाकिस्तान’ में लिखा है कि यह कहना बिल्कुल गलत है कि एक गुजराती मुसलमान और एक गुजराती हिंदू या एक कश्मीरी हिंदू और एक कश्मीरी मुसलमान, सांस्कृतिक रूप से एक हैं। उनका कहना है कि यह केवल एक मुसलमान की सोच में अस्थाई समझौता है। उनका मानना है कि किन्हीं कारणों से इस्लामीकरण रुक गया था, जो कभी न कभी पूरा होगा। अगर डॉ. आंबेडकर का विश्लेषण गलत रहा होता, तो बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल एक राज्य होते। बांग्लादेश से हिंदुओं का पलायन नहीं होता और कोलकाता में रामनवमी की शोभायात्रा पर बंगाली मुसलमान पत्थरबाजी न करते।

(लेखक रक्षा मामलों के विशेषज्ञ हैं)

Topics: stone pelting is a very deep conspiracyTwo-state theory or nottwo-nation theoryरामनवमी शोभायात्राटू-नेशन थ्योरीरमजान के दौरानजिहाद का पहलूदिल्ली दंगेसोची-समझी रणनीतिरमजान में जिहादJihad in Ramzanइस्लाम में पत्थरबाजीAspects of Jihadडॉ. बी.आर. आंबेडकरThoughtful Strategyकिताब ‘थॉट्स आन पाकिस्तान’Stone-pelting in IslamDr. B.R. Ambedkar in his book 'Thoughts on Pakistan'
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