14 मार्च विशेष : नदियों की दशा सुधारने के लिए गंभीर प्रयासों की जरूरत
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14 मार्च विशेष : नदियों की दशा सुधारने के लिए गंभीर प्रयासों की जरूरत

भारत में प्राचीन काल से ही नदियों को बहुत सम्मान दिया जाता रहा है लेकिन दुनियाभर में नदियों में बढ़ते बेतहाशा प्रदूषण के कारण अब कई नदियों का अस्तित्व ही खतरे में है। भारत में भी कई नदियों की हालत बहुत दयनीय है। वैश्विक स्तर पर नदी प्रबंधन, नदी प्रदूषण, नदी संरक्षण इत्यादि मुद्दों पर चर्चा करने के लिए देश-विदेश के लोगों को एकजुट करने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 14 मार्च को नदियों के लिए अंतर्राष्ट्रीय कार्रवाई दिवस मनाया जाता है।

Written byयोगेश कुमार गोयलयोगेश कुमार गोयल
Mar 14, 2023, 06:00 am IST
inपर्यावरण

मानव सभ्यता के लिए नदियों को वरदान माना गया है क्योंकि यदि धरती पर नदियां नहीं होती तो जीवन भी नहीं होता। भारत में प्राचीन काल से ही नदियों को बहुत सम्मान दिया जाता रहा है। गंगा हो या सरस्वती अथवा यमुना हो या अन्य नदियां, हमारी भारतीय संस्कृति में नदियों को मां कहकर पुकारा जाता है। दरअसल धरती यदि हमारी मां है तो नदियां इसी धरती मां की नसें हैं और धरती पर यदि नदियां सुरक्षित हैं, तभी जीवन भी सुरक्षित है। जीवनदायिनी नदियां केवल जल मार्ग ही नहीं हैं बल्कि बारिश के पानी को सहेजकर धरती की नमी को भी बनाए रखती हैं। दुनिया में हर कोई चाहता है कि नदियां विश्वभर में लोगों के लिए मुक्त रहें और हमारा पोषण करने में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभा सकें ताकि हम आनंदपूर्ण जीवन व्यतीत कर सकें लेकिन इसके लिए अनिवार्य है कि नदियां न सिर्फ हर तरह के बंधनों से मुक्त हों बल्कि प्रदूषण रहित भी हों और कॉरपोरेट नियंत्रण से भी आजाद हों। नदियों को बड़े पैमाने पर प्रदूषित करने में कॉरपोरेट का बड़ा योगदान रहता है, अवैध खनन ने भी कई जगहों पर नदियों की सूरत बिगाड़ दी है। हालांकि लगभग सभी देशों में उद्योगों से निकलने वाले प्रदूषित जल और विषैले पदार्थों के निपटान के लिए कानून बने हैं किन्तु इन कानूनों पर सख्ती से अमल नहीं होने के कारण नदियों को प्रदूषित होने से बचाना मुश्किल हो गया है। नियम-कानूनों को ताक पर रखने और नदियों के उद्धार के लिए योजनाएं फाइलों तक ही सीमित रहने के कारण कुछ स्थानों पर तो नदियों का पानी हाथ लगाने लायक भी नहीं दिखता जबकि कुछ जगहों पर तो नदियां गंदे नालों में तब्दील होती नजर आती हैं। यही कारण है कि नदियों के संरक्षण के लिए अब दुनियाभर में वैश्विक प्रयास हो रहे हैं।

प्रतिवर्ष 14 मार्च को वैश्विक स्तर पर ‘नदियों के लिए अंतर्राष्ट्रीय कार्रवाई दिवस’ भी मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य नदियों के महत्व पर जोर देना है और लोगों में यह जागरूकता पैदा करना है कि नदियां उनके जीवन को कैसे प्रभावित कर सकती हैं। इस वर्ष नदियों के लिए 26वां वार्षिक अंतर्राष्ट्रीय कार्रवाई दिवस मनाया जा रहा है। मार्च 1997 में ब्राजील के कूर्टिबा में बांधों से प्रभावित लोगों की प्रथम अंतर्राष्ट्रीय बैठक में बांधों तथा नदियों के लिए अंतर्राष्ट्रीय जल दिवस और नदियों के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस की शुरुआत की गई थी। तब 20 देशों के नदी विशेषज्ञों द्वारा 14 मार्च को नदियों के लिए कार्रवाई के दिन के रूप में इसे अंतर्राष्ट्रीय दिवस नामित किया गया था। उस समय इन 20 देशों के प्रतिनिधियों ने इस दिवस को नामित करते हुए शपथ ली थी कि दुनियाभर में जितने भी बड़े बांध हैं, उनकी सुरक्षा तथा देखरेख पर विशेष ध्यान दिया जाए। अमेरिका में कैलिफोर्निया के ऑकलैंड में स्थित एक पारिस्थितिकी संगठन ‘इंटरनेशनल रिवर्स’ ने नदियों के लिए कार्रवाई के अंतर्राष्ट्रीय दिवस को मनाने की पहल की थी। विनाशकारी जल विकास परियोजनाओं के विरुद्ध लोगों की आवाज उठाने, हमारे वाटरशेड के स्वास्थ्य को पुनः प्राप्त करने तथा हमारी नदियों के समान एवं स्थायी प्रबंधन की मांग करने के लिए नामित किए जा चुके इस दिवस को मनाने का मूल उद्देश्य वैश्विक स्तर पर नदी प्रबंधन, नदी प्रदूषण, नदी संरक्षण इत्यादि मुद्दों पर चर्चा करने के लिए देश-विदेश के लोगों को एकजुट करना है। वर्तमान में सौ से भी ज्यादा देश इसके साथ जुड़ चुके हैं।

इंगलैंड की यॉर्क यूनिवर्सिटी के शोधकर्त्ताओं द्वारा कुछ समय पहले नदियों में मनुष्य द्वारा उपयोग की जाने वाली रासायनिक दवाओं, कीटनाशकों इत्यादि से होने वाले प्रदूषण का पता लगाने के लिए दुनियाभर के 104 देशों की 258 नदियों पर व्यापक शोध किया गया था। 86 संस्थानों के 127 वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस शोध में अन्य देशों के अलावा भारत की नदियों में भी दवा से जुड़े तत्वों का स्तर काफी ज्यादा मिला। अमेरिका की ‘प्रोसिडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज’ द्वारा प्रकाशित इस शोध रिपोर्ट के अनुसार पैरासिटामोल, निकोटिन, कैफीन के अलावा मिर्गी, मधुमेह इत्यादि की दवाएं भी नदियों के जल के लिए खतरा बनती जा रही हैं, जिनके अंश लापरवाही से नदियों के हवाले किए जा रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान के लाहौर, बोलिविया के ला पाज तथा इथियोपिया के आदिस अबाबा में नदियों के जल स्तर में एक्टिव फार्मास्यूटिकल्स इन्ग्रेडिएंट्स (एपीआई) का स्तर बहुत ज्यादा पाया गया। ब्रिटेन, स्कॉटलैंड के ग्लासगो तथा अमेरिका के डलास में एपीआई का स्तर करीब बीस प्रतिशत पाया गया। नदी में सभी प्रकार की दवाओं के एपीआई का मिश्रण सर्वाधिक पाए जाने वाले स्थानों मंग स्पेन का मैड्रिड भी शीर्ष 10 स्थानों में शामिल है। लाहौर की नदियों में दवाओं की मात्रा सर्वाधिक 70700, दिल्ली में 46700 और लंदन में 3080 नैनोग्राम प्रति लीटर पाई गई। मजबूरीवश नदियों का जहरीला पानी पीने के कारण दुनियाभर में लाखों-करोड़ों लोग कैंसर तथा कई अन्य गंभीर बीमारियों के शिकार हो रहे हैं और अनेक लोग इसी कारण मौत के मुंह में भी समा जाते हैं।

प्लास्टिक कचरा भी नदियों को प्रदूषित करने का बहुत बड़ा कारण बन रहा है। एक अध्ययन के अनुसार दुनियाभर में बीस ऐसी नदियां हैं, जिनके जरिये बहुत बड़ी मात्रा में प्लास्टिक महासागरों में समा जाता है। इन नदियों में चीन की 6, इंडोनेशिया की 4, नाइजीरिया की 3 तथा भारत, ब्राजील, फिलीपींस, म्यांमार, थाईलैंड, कोलंबिया और ताइवान की एक-एक नदी शामिल हैं। महासागरों में प्लास्टिक उड़ेलने वाली नदियों में शीर्ष स्थान पर चीन की यांग्तजे नदी है, जिससे प्रतिवर्ष 3.33 लाख टन प्लास्टिक महासागरों तक पहुंचता है। दूसरे नंबर पर गंगा नदी है, जिससे 1.15 लाख टन प्लास्टिक महासागरों में जाता है। तीसरे स्थान पर चीन की क्सी नदी, चौथे पर चीन की हुंग्पू नदी तथा पांचवे पर नाइजीरिया तथा कैमरून में बहने वाली क्रॉस नदी है। करीब ढ़ाई साल पहले नेशनल जियोग्राफिक के सौजन्य से 18 सदस्यीय महिला वैज्ञानिकों के एक दल ने गंगा नदी में प्लास्टिक प्रदूषण के स्तर का विस्तृत अध्ययन करने के लिए गंगा नदी के आरंभ से अंत तक की यात्रा की थी और पाया था कि भारत की सबसे बड़ी गंगा नदी सर्वाधिक पूजनीय होने के साथ ही सबसे ज्यादा प्रदूषित भी है। गंगा नदी विश्व की उन 10 नदियों में शामिल है, जिनसे महासागरों में पहुंचने वाले कुल प्लास्टिक का 90 प्रतिशत हिस्सा जाता है।

हालांकि कुछ समय पहले बिहार तथा उत्तराखंड राज्य में गंगा नदी में प्रदूषण का स्तर कुछ कम होने का दावा किया गया था। बताया गया था कि जैविक ऑक्सीजन मांग (बीओडी) में कमी आने के कारण गंगा नदी के जल की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। बीओडी पानी की गुणवत्ता तय करने का महत्वपूर्ण मानक है, जिसका अभिप्राय जैविक जंतुओं द्वारा ऑक्सीजन के उपभोग से है। स्वच्छ गंगा के राष्ट्रीय मिशन के महानिदेशक जी अशोक कुमार के मुताबिक वर्ष 2015 के मुकाबले 2021 में गंगा के पानी की गुणवत्ता की तुलना करने पर उत्तराखण्ड में हरिद्वार से सुल्तानपुर तथा बिहार में बक्सर से भागलपुर तक गंगाजल में बीओडी का स्तर तीन मिलीग्राम प्रति लीटर रहा, जो अप्रदूषित की श्रेणी में आता है। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश के कन्नौज से वाराणसी के बीच तथा पश्चिम बंगाल में त्रिवेणी से डायमंड हार्बर के बीच प्रदूषण का स्तर 1.3 से 4.3 मिलीग्राम प्रति लीटर रहा। न्यूनतम श्रेणी में बीओडी का स्तर प्रति लीटर तीन से छह मिलीग्राम तक होता है। निम्न मूल्य होने का अभिप्राय पानी की बेहतर गुणवत्ता से है जबकि बीओडी का स्तर छह मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक होने पर पानी को प्रदूषित माना जाता है, जिसके बाद उपचारात्मक कार्रवाई की जरूरत होती है। वैसे तमाम प्रयासों के बावजूद कई स्थानों पर गंगा की हालत आज भी दयनीय है और देशभर में जिस प्रकार विभिन्न नदियों की हत्या की जा रही है, ऐसे में यदि शीघ्र ही ठोस उपाय नहीं किए गए तो कई नदियों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। हमें भली-भांति समझ लेना होगा कि नदियों को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए केवल भारी भरकम बजट आवंटित कर पानी की तरह पैसा बहाने से ही लक्ष्य हासिल नहीं होगा बल्कि गंगा सहित तमाम नदियों की दशा सुधारने के लिए गंभीर प्रयासों के साथ जन चेतना जागृत करने की सख्त जरूरत है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार तथा पर्यावरण मामलों के जानकार हैं और पर्यावरण पर ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ पुस्तक के लेखक हैं)

Topics: नदियों की दशाअंतर्राष्ट्रीय नदी कार्रवाई दिवस14 मार्च विशेषCondition of riversInternational River Action Day14 March Special
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