विश्व वेटलैंड दिवस विशेष : सिकुड़ रहीं हैं पर्यावरण की जीवनरेखाएं !
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विश्व वेटलैंड दिवस विशेष : सिकुड़ रहीं हैं पर्यावरण की जीवनरेखाएं !

- जानकारों की मानें 1900 के बाद से वर्तमान तक दुनिया में 64 प्रतिशत वेटलैंड्स लुप्त हो चुके हैं। बीते सौ सालों में अमेरिका ने अपने आधे से ज्यादा वेटलैंड्स गंवा दिए हैं।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी
Feb 2, 2023, 06:42 pm IST
in भारत, विश्लेषण

जैव विविधता के लिए आर्द्रभूमियां (वेटलैंड्स) वरदान होती हैं। आर्द्रभूमि यानी ऐसे प्राकृतिक जलक्षेत्र जहां सैकड़ों पक्षी-प्रजातियां और वन्यजीव फलते-फूलते हैं, विकसित होते हैं। ये नम भूमियां न सिर्फ पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बनाए रखती हैं, बल्कि ग्राउंड वॉटर रिचार्ज करने के साथ हमारे वायुमंडल को कई पर्यावरणीय समस्याओं से भी बचाती हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार ये नम भूमियां हमारी प्राकृतिक संपदा का एक बेशकीमती हिस्सा हैं। इन्हें पर्यावरण की जीवनरेखा कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं। धरती की इस बहुमूल्य संपत्ति की सुरक्षा व इन्हें विकसित, सम्वर्धित करने के लिए प्रति वर्ष 2 फरवरी को विश्व वेटलैंड दिवस मनाया जाता है।

भले ही हम आर्थिक विकास की सीढ़ियों पर लगातार चढ़ते जा रहे हों, लेकिन पर्यावरणीय संतुलन से काफी हद तक फिसलते जा रहे हैं। बढ़ती जनसंख्या का दबाव हमारी नमभूमियों को तेजी से निगलती जा रही है। जानकारों की मानें 1900 के बाद से वर्तमान तक दुनिया में 64 प्रतिशत वेटलैंड्स लुप्त हो चुके हैं।   बीते सौ सालों में अमेरिका ने अपने आधे से ज्यादा वेटलैंड्स गंवा दिए हैं। भारत की बात करें तो यह सच है कि हमारे देश में कई राज्यों में बड़े-बड़े वेटलैंड मौजूद हैं लेकिन संरक्षण के अभाव में ये आर्द्रभूमियां संकट के दौर से गुजर रही हैं। कश्मीर की डल झील, लोहतक झील, वुलर झील, पश्चिम बंगाल की साल्ट लेक, हरिके झील, सुन्दरवन का डेल्टा, हल्दिया का दलदली भूमि और ओडिशा का चिल्का झील, दाहर एवं संज झील, कोलेरू झील, गुजरात में कच्छ, कर्नाटक का तटीय क्षेत्र, खम्भात की खाड़ी, कोचीन के झील और अण्डमान निकोबार द्वीप समूह समेत देश के अधिकांश राज्यों में आर्द्रभूमियों का सिमटता वजूद गंभीर चिंता का विषय है।

राष्ट्रीय राजधानी की बात करें तो दिल्ली क्षेत्र में कुछ साल पहले तक करीब 19 वेटलैंड थे, लेकिन अब इनकी संख्या मात्र छह रह गई है। इनमें भी मात्र दो वेटलैंड ओखला पक्षी विहार और सूरजपुर पक्षी विहार ही प्रमुख हैं। गढी मेंडू सिटी फॉरेस्ट नार्थ ईस्ट दिल्ली के उस्मानपुर-खजूरी इलाके में यमुना के किनारे करीब 895 एकड़ में फैला हुआ है। यह इलाका 121 प्रजातियों के देशी-विदेशी परिन्दों का घर है और यहाँ 57 किस्म के पेड-पौधे, जडी-बूटियाँ, झाड़िया, जलीय पौधे और अन्य प्रकार की वनस्पतियाँ पाई जाती हैं। पर्यावरण के लिहाज से खासा समृद्ध क्षेत्र होने के बावजूद इस वेटलैंड में इलाके का नगर निगम कचरा और मलबा डालता है, तो स्थानीय लोग भी अपने घर का कचरा यहाँ फेंक आते हैं। इसके साथ यहां कचरा जलाने से वेटलैंड को तो नुकसान हो ही रहा है, हवा भी प्रदूषित हो रही है।

गौरतलब हो कि वेटलैंड को खत्म करने में पंजाब और हरियाणा सबसे आगे हैं। सीधा कारण यह है कि इन दोनों राज्यों में सबसे पहले हरित क्रान्ति हुई। इस सिलसिले में कृषि विकास का जो मॉडल अपनाया गया उसमें पानी के पारम्परिक स्रोतों को पाटने का अभियान ही चल निकला। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि आज पंजाब में 70 फीसदी वेटलैंड का वजूद खत्म हो चुका है। इनमें 30 फीसदी की स्थिति भी गम्भीर होती जा रही है। सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ पंजाब के वातावरण शिक्षा के प्रो. डॉ. सुनील मित्तल कहते हैं कि यही हाल रहा तो आने वाले समय में पंजाब की धरती की उपजाऊ शक्ति पूरी तरह खत्म हो जाने की आशंका नकारी नहीं जा सकती। उत्तर प्रदेश की बात करें तो लखनऊ के नवाबगंज पक्षी विहार व कुरकैल, लखीमपुर खीरी के दुधवा नेशनल पार्क से सटा वेटलैंड, बहराइच का कर्तनिया घाट, आगरा की भरतपुर बर्ड सेंचुरी की आद्रभूमियां पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र हैं लेकिन गहराते प्रदूषण के कारण इनकी रौनक भी फीकी होती जा रही है। इसी तरह मध्य प्रदेश सरकार द्वारा भोपाल स्थित बड़े और छोटे तालाब को जोड़कर 31 वर्ग किमी तक फैले “भोज वेटलैंड” को संरक्षित किया गया था, अब सिकुड़ कर करीब आधा रह गया है।

चिंतनीय स्थिति यह है कि क्षमता से कम पानी संग्रहित कर पाने से आद्रभूमियां  समय से पहले ही सूख रही हैं। पानी की कमी से प्रवासी पक्षियों की आमद पर भी प्रतिकूल असर पड़ा है। महानगरों और शहरों में तो इन भूमियों पर अतिक्रमण हुआ ही है, कई जगह गांव में किसानों ने भी अपने खेत बड़े कर लेने की गरज से इन्हें सिकुड़ा दिया है। सोचना होगा कि यदि इसी गति से यदि ये नम भूमियां सिकुड़ती गयीं तो आने वाले दिनों के संकट से हमें कोई नहीं बचा सकता।

दुर्भाग्य का विषय है कि हमने अपने लालच में जिस तरह प्रकृति का दोहन कर इन नम भूमियों को मिटाने के दुष्कृत्य किये हैं, उसके नतीजे हमारे सामने हैं। ग्लोबल वार्मिंग का असर पूरी दुनिया में देखने को मिल रहा है। इस पर्यावरण असंतुलन का सीधा असर जन-जीवन और वनस्पतियों पर पड़ रहा है। हमारे आसपास पशु-पक्षियों और वन्य जीव-जन्तुओं की कई प्रजातियां लुप्त हो रही हैं। शीत ऋतु में आने वाले प्रवासी पक्षियों की संख्या में भी बीते कुछ सालों में भारी कमी आई है। वक्त का तकाजा है कि यदि अब भी हम इस दिशा में जागरूक और गम्भीर नहीं हुए तो हमें आैर हमारी आने वाली पीढ़ी को इसके भारी खतरे उठाने होंगे। कुदरत से खिलवाड़ मत कीजिए, क्योंकि अगर कुदरत ने इंसानों के साथ खिलवाड़ शुरू कर दिया तो आने वाली पीढ़ी झील और नदियों को सिर्फ किताबों में ही देख पाएगी।

वेटलैंड्स यानी जैविक सुपर मार्केट

वेटलैंड और कृषि में गहरा सम्बन्ध है। वैज्ञानिक अनुसन्धानों से यह साबित हो चुका है कि वेटलैंड न केवल जमीन की उर्वरा शक्ति को बढ़ाता है बल्कि जैव विविधता को समृद्ध और संरक्षित करने में भी इनका बड़ा योगदान है। झीलों में जलीय और उसके आसपास दलदली जमीन में विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधों, वन्यजीवों तथा पशु-पक्षियों का प्राकृतिक आवास होता है या वे यहां आश्रय लेते हैं। इंटरनेशनल क्रेन फाउंडेशन के गोपी सुन्दरम कहते हैं कि पक्षियों की 400 प्रजातियों में 37 प्रतिशत प्रजातियां वेटलैंड में पाई जाती हैं। इनमें सारस, ब्लेक नेक्ड स्टार्क, एशियन ओपन बिल्ड स्टार्क और पर्पल हेरल्ड मुख्य हैं। प्रवासी पक्षियों के लिये तो वेटलैंड्स किसी वरदान से कम नहीं होते। अपनी पसन्दीदा सैरगाह की चाह में ये सुंदर परिंदे हजारों किमी की यात्रा कर हमारे देश को खिंचे चले आते हैं। वेटलैंड के घटने से इन पक्षियों के अस्तित्त्व पर खतरा मंडरा रहा है। नदियों, जलस्रोतों और भूजल भण्डारों की तरह वेटलैंड भी जलीय चक्र का अभिन्न हिस्सा है। इन वेटलैंड्स में मछली पकड़ने, धान की खेती, पर्यटन और जल प्रावधान जैसी अनेक टिकाऊ आजीविकाएं भी टिकी हैं। वेटलैंड्स क्षेत्र के सिकुड़ने के कारण भूजल कम होता जा रहा है जिससे पानी की भी किल्लत हो रही है। बरसात के दिनों में ये वेटलैंड बरसाती पानी को व्यर्थ बह जाने से रोकते हैं और करोड़ो गैलन पानी को सहेजते हैं। ये पानी को धरती की रगों तक रिसाने तथा इसके जरिए भूजल भण्डार को बढ़ाने में अपना अहम योगदान भी करते हैं। इनके महत्त्व को देखते हुए कुछ स्थानों पर कृत्रिम रूप से भी इन्हें बनाया जाता है। पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक नम भूमियां भूजल का पुनर्भरण कर प्रकृति के जलचक्र को संतुलित करती हैं, प्रदूषित पानी को साफ कर धरती को उर्वर बनाती हैं, तटरेखाओं की रक्षा करती हैं और बाढ़ को कम करने के लिए स्पंज की भूमिका निभाती हैं। वेटलैंड की वजह से न सिर्फ पारिस्थितिकी तंत्र बना रहता है, साथ ही अन्य कई प्राकृतिक आपदाओं से भी सुरक्षा मिलती है। यानी जैविक विविधता और व्यापक खाद्य श्रृंखला वेटलैंड्स को “जैविक सुपरमार्केट” बनाती है।

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